सब्जियों का नैसर्गिक बगीचा बनाएँ

- भीष्म देसाई
इस लेख का उद्देश्य लोगों को बागवानी के लिए प्रेरित करना और आगे चल कर सब्ज़ी की अपनी जरुरत के लिये आत्मनिर्भर बनाना है। मुख्य विषय पर कुछ सामान्य प्रश्नों के उत्तर

मेरे पास सब्ज़ी खरीदने के पैसे हैं। फिर बागवानी क्यों?
नैसर्गिक तरीके से उगाई शाक-सब्ज़ी रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से मुक्त होने के कारण अधिक स्वास्थप्रद होती है। रासायनिक पद्धति से उगाई सब्ज़ी कई रोगों का कारण बनती है।

पर मैं तो सेंद्रिय (ऑर्गेनिक) तरीके से उगायी सब्ज़ी खरीदने के लिए समर्थ हूँ।
स्वयं उगाने का आनंद कुछ और है। जैसे जैसे प्रकृति का साथ बढ़ता हैं, एक आध्यात्मिक सा सुखद आनंद की अनुभूति होती है। बागवानी की गतिविधि के दौरान हल्का व्यायाम भी होता है। जब एक बार बागबानी शुरू होती है तो धीरे धीरे पूरा परिवार और मित्र देर-सवेर उसमें घुलते जाते हैं। इस तरह पारिवारिक मेल-मिलाप का वातावरण बनता हैं। मनोवैज्ञानिक शोध बताता है कि बागबानी मानसिक तनाव कम करने का अहम् तरीका हो सकता हैं।

मुझे बागवानी का अनुभव नहीं है।
कोई भी अनुभव काम करने से ही होता हैं। यह लेख आपको बागवानी आरम्भ करने मे सहायक सिद्ध होगा यही आशा है। लेखक द्वारा आपके प्रश्नों और सुझावों का स्वागत है।

मेरे घर के आसपास भूमि नहीं हैं।
शुरुआत में १० फुट बाय १० फुट भूमि पर्याप्त है। अगर इतनी भी जमीन न हो तो छोटे बड़े गमले से भी काम चल सकता हैं। कई लोगों का मानना हैं कि घर के आगे फूलों के बगीचे में सब्ज़ी नहीं उगा सकते। वह सौंदर्य की दृष्टि से ठीक नहीं रहेगा। सच यह है कि कई सब्जियों के फूल, फल तथा पौधे सुंदर दिखाते हैं, जैसे कि टमाटर, विविध रंग के कैप्सिकम (पहाड़ी/शिमला मिर्च ) आदि।

शारीरिक श्रम
सामान्यत: वरिष्ठ आयु के लोग बागवानी को श्रमसाध्य समझते हैं। हाँ,  खुदाई आदि कार्यों में काफी शारीरिक श्रम लगता हैं, पर नैसर्गिक बागवानी में केवल शुरू में एक बार खुदाई करनी पड़ती हैं। जिसके लिए किसी की मदद ले सकते हैं अथवा किसी युवा मजदूर से काम करा सकते हैं। बाकी कई काम खड़े खड़े ही कर सकते हैं जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

अब आपने नैसर्गिक बागबानी का निश्चय कर लिया हैं तो निम्नलिखित मुद्दों पर ध्यान दें।
आमतौर पर जीवनसाथी, बच्चे और मित्र ही अपना उत्साह कम करते हैं। कई बार ऐसी टिपणियाँ होती हैं कि कहीं गिर-गिरा गए तो कौन देखेगा? इसलिए जोखिम वाला और क्षमता से ऊपर वाला काम न करे।

आम तौर पर जब तक कोई बागबानी में दिलचस्पी न ले तब तक इसकी चर्चा न करें, क्योकि भारतीय समाज में श्रम की बड़ी उपेक्षा की जाती हैं इसलिए आपको सुनने मिलेगा, पौधे के खर्च में तो 5 किलो टमाटर मिल जाते और मेहनत तो मुफ्त ही गई। जितने का पानी डाला उतनी भी मिर्ची न हुई। परंतु तनाव और उदासी कम होने से जीवन की गुणवत्ता (quality of life) बढने के लाभ के बारे में कोई मुश्किल से ही सोचेगा। खेती और घरेलू बागवानी के अंतर को समझना भी ज़रुरी है। खेती आमतौर से मुख्य आय का जरिया होता है इसलिए खेती में योग्य उत्पादन / कमाई जरुरी हैं। घरेलू बागबानी शौक का विषय होने के कारण यहाँ उत्पादन या कमाई की अनिवार्यता नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे जब हम क्रिकेट या बेडमिन्टन सीखने या खेलने जाते हैं तब व्यवसायिक खिलाड़ी या खेल प्रशिक्षक बनके पैसे कमाने की बात नहीं सोचते हैं।

सब्जियाँ ही क्यों?
बाज़ार से खरीदी सब्जियाँ और छिलके के साथ खाये जाने वाले फल, उदाहरण के तौर पर अंगूर, सेब, स्ट्रॉबेरी वगैरह पर छिड़के हुए जहरीले जंतुनाशक रसायन सीधे हमारे खाने में आते हैं क्योंकि उनमें जहरीले जंतुनाशक रसायनों का उपयोग भी ज्यादा होता है। इसलिये घरेलू बागवानी ज़रूरी है लेकिन सामान्यतः फल उगाने मे समय बहुत ज्यादा लगता हैं और जगह भी अधिक चाहिए। सब्जियाँ तुरंत परिणाम देती हैं, जिससे अपना उत्साह भी बरकरार रहता हैं।

कौन सी सब्जियाँ उगायें?
यहाँ सब्जियों की सूची दी गयी हैं। साथ में कौनसी ऋतु में उगानी हैं और  उसे कितना प्रकाश चाहिए यह जानकारी दी गयी हैं। । ऋतुयें भारत के अनुसार दी गयी हैं। संयुक्त अमरिका के दक्षिण राज्यों में यह सूची थोड़े परिवर्तन के साथ सीधे लागू कर सकते है। संयुक्त अमेरिका के उत्तर  के राज्यों के लिए टिप्पणियाँ की गयी हैं। जाहिर हैं कि संयुक्त अमेरिका के उत्तर  के राज्यों में वसंत ऋतु में पाला बंध होने के बाद और गर्मियो में लगाई जा सकती हैं।

सूर्य प्रकाश के भेद

  • पूर्ण सूर्य प्रकाश, मतलब दिन में कम से कम 5 घंटे का सीधा सूर्य प्रकाश।
  • आंशिक प्रकाश / आंशिक छाया मतलब दिन में कम से कम 3 से 6 घंटे का सूर्य प्रकाश अथवा छोटे-मोटे पत्तों में से आता प्रकाश।
  • पूर्ण छाया मतलब दिन में 3 घंटे से कम सूर्य प्रकाश अथवा पूर्ण छाया।

आइये अब एक नज़र विभिन्न प्रकार की शाक-भाजी की बागवानी पर
पालक परिवार के (Amaranthaceae उच्चारण अमरन्थेसिआय)
 पालक - सर्दी की मौसम का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश।
 चवलाई - गर्मी तथा बारिश की मौसम का पाक, पूर्ण सूर्य प्रकाश

स्विसचार्ड (एक तरह की भाजी)
सर्दी की मौसम का पाक।
पूर्ण सूर्य प्रकाश, आंशिक सूर्य प्रकाश। एक  बार लगाने के बाद, दो से तीन वर्ष चलने वाला। बस पत्ते तोड़ते रहिये।

चुकन्दर (बीट रूट) - सर्दी की मौसम का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश, आंशिक सूर्य प्रकाश।

टमाटर परिवार के (Solanoideae उच्चारण सोल्नसिआइयि)
 जैसे कि टमाटर, आलू, बैगन, केप्सोकम, मिर्ची  - ज्यादा पोषक तत्वों की जरुरत वाले। सर्दी / गर्मी की मौसम का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश।

पत्ता गोभी परिवार के (Brassicaceae उच्चारण ब्रसिसिआय)
 जैसे कि पत्ता गोभी, फूलगोभी, ब्रोकली, सरसव की भाजी, कोलार्ड (एक तरह की भाजी) सर्दी की मौसम का पाक। आंशिक सूर्य प्रकाश। कम पोषक तत्वों की जरुरत वाले।

प्याज परिवार के ((Allium उच्चारण एलियम)
 जैसे कि प्याज, लहसुन, हरा प्याज (Leek), चाईव
 सर्दी की मौसम का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश। ज्यादा पोषक तत्वों की जरुरत वाले।

दलहन परिवार के (Fabaceae उच्चारण फाबेसी)
भूमि में नत्रवायु (नाइट्रोजन) को संयोजित करके भूमि की उर्वरकता बढाने वाले
 जैसे कि मटर, चने, वल, फ्रांसबीन्स, चौली, गवार, विभिन्न दालें आदि।
 सर्दी / गर्मी की मौसम का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश। मटर और फ्रांसबीन्स के सिवाय अन्य पाक उत्तर अमरिका में होने की सम्भावना कम हैं।

ककड़ी के परिवार के (Curcubitaceae उच्चारण कुर्कुबिटेसी)
 जैसे कि ककड़ी, घिया, तरबूज, खरबूजा, करेले आदि।
बारिश, सर्दी, गर्मी की मौसम के पाक। एक ही बेल के ऊपर नर और मादा फूल होते हैं। परागण के लिए मधुमक्खी या दूसरे अन्य कीटों की ज़रुरत होती हैं। ज़ुकीनी (Zucchini) सर्दी / गर्मी की मौसम का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश। ज़ुकीनी के पकोड़े बहुत अच्छे बनते हैं।
उत्तर अमेरिका में ककड़ी, करेले और ज़ुकीनी बहुत अच्छी होती है। घिया ठीक नहीं होता क्योंकि सर्दी हो या गर्मी, हर मौसम में बारिश होती रहती है।
तेन्द्ली / टेंडी (Coccinia Grandis), कटवल / कंटोला / कंकरोल अंग्रेजी स्पाईनी गोअर्ड (Mimirdica dioica), नर और मादा फूल अलग अलग बेल पर होते हैं। उनकी बेल बहुवर्षीय (Perennial) होती हैं, इसलिए एक बार लगाने से सालों साल चलती हैं। तेन्द्ली के लिए बेल का कटिंग लगाना पड़ता हैं। कटवल बीज से भी हो सकता हैं और उस के कंद से भी हो सकता हैं। बीज से होने में थोड़ा समय लगता हैं। सामान्यत कटवल बारिश के बाद होते हैं।

कंदमूल
 जैसे कि जिमीकंद (पौधा) को 7 से 9 महीने लगते हैं।
 शक्करकंद (बेल) को समय, स्थानीय परिस्थिति के अनुसार 2 से 9 महीने लगते हैं,
 रतालू (बेल) को 4 से 5 महीने लगते हैं।
आंशिक प्रकाश चलता हैं। कंद के कम से कम एक आँख (अंकुर) वाले टुकड़े बोये जाते हैं। सामान्यतः बारिश के बाद बोये जाते हैं। यह कंदमूल उत्तर अमरीका के लिए नहीं हैं।

गाजर परिवार के (Umbelliferae उच्चारण अम्बेलिफेरी)
 जैसे कि गाजर, धनिया, जीरा, सौंफ़, मोटी सौंफ़ आदि। इनके छोटे छोटे फूलों के गुच्छे  उलटे छाते के आकार के होते हैं। सर्दी / गर्मी की मौसम का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश।
इस प्रकार के पौधों पर होने वाले फूलों के रस पर हितकारी कीट जैसे कि इन्द्रगोप (Lady Bug) आदि जीते हैं जिनकी कमला (catterpillar) हानिकारक कीटों को खा जाती हैं। इसलिए भले ही आपको इन पौधों की जरुरत न हो, इन्हें किनारे पर लगाना अच्छा है।

भिंडी सर्दी / गर्मी का पाक। पूर्ण सूर्य प्रकाश उत्तर अमेरिका में भी अच्छा होता हैं।
बागवानी की शुरुआत उपरोक्त सूची से चुनकर उस सब्ज़ी से करें जिसे आपके क्षेत्र में उस ऋतु  में उगाया जाता हो। एक बार थोड़ा अनुभव होने के बाद ही दूसरे प्रयोग करने चाहिए। एक ऋतु में दो और ज्यादा पाक एक साथ लगाने चाहिए। कम से कम एक दलहन, एक ककड़ी, एक पालक, एक टमाटर परिवार का तथा आवश्यकता अनुसार गोभी परिवार का पादप लेना चाहिए। एक विभाग में एक और दूसरे विभाग में दूसरा, न करके मिला-जुला लगाना चाहिए। बीच में बीच में गाजर के बीज छिड़क दें। जितनी अधिक विविधता होगी उतना ही उत्पाद ज्यादा होगा और पौधों में रोग लगाने की संभावना कम होगी।
ज़मीन कैसे तैयार करें?
कुछ भी उगाने के लिए ज़मीन फलद्रुप और भुरभुरी होनी चाहिए। फलद्रुप मतलब सेंद्रिय पदार्थों तथा सूक्ष्म जीवाणुओं से भरपूर ज़मीन। अब ज़मीन अगर ठीक न हों तो? आगे हम उस पर भी सोच विचार करेंगे।

अगर जमीन अच्छी हो और बीज का आकार ज्वार, गेहूँ जितना या उससे बड़ा हो तो जमीन में 2 से 3 इंच व्यास (Diameter) के और 2 से 3 इंच गहराई का खड्डा करके उसमे सेंद्रिय खाद (Compost) मिटटी डाल कर उसमें खुदी हुई मिटटी मिलाकर उसमें आधा इंच गहराई पर बीज लगा दे। बीज लगाकर हलके हाथ या पैर से मिटटी दबा दे जिससे मिटटी और बीज एक दुसरे के साथ अच्छा स्पर्श हों। बाद में हलके हाथ से पानी छिड़क दे।

अगर बीज सरसव जितने या इससे छोटे हों और उसके बड़े पौधे हों, जैसे कि टमाटर, बैगन, मिर्ची, तो उसे कागज़ या प्लास्टिक के कप में उगाये। यदि प्लास्टिक की सीड स्टार्टर ट्रे मिलें तो उसका उपयोग आसान रहेगा। अगर कागज़ या प्लास्टिक के कप का उपयोग करते हैं तो कप के नीचे 2 या तीन छोटे छेद करें, जिससे ज्यादा पानी जमा न हो। ज्यादा पानी जमा होने से मूल सड़ जाते हैं।
कप के नीचे एक चतुर्थांश इंच रेत या छोटे छोटे कंकड़ बिछा के उसे सामान भाग के मिटटी और सेंद्रिय खाद के मिश्रण से भर दें। उपर से एक चतुर्थांश इंच खाली रखें। और उसमे दो बीज एक दुसरे से थोड़े अंतर पर सतह पर रखें। उसके बाद  मिटटी और सेंद्रिय खाद के मिश्रण के हलका सा ऐसे छिड़कें कि बीज पर हल्का सा आवरण हो जाए। बाद में उसके ऊपर हलके से पानी छिड़क दें। अगर झारी/फव्वारा हो तो उसका उपयोग करें।
अब बीज बोये हुए सभी कपों को एक ट्रे में रख कर उसमें (ट्रे में) एक चतुर्थांश इंच पानी भर के ढक्कन, या काला नहीं तो पारदर्शी पोलीथिन लगा दें, जिससे उसमें भेज कायम रहें। ट्रे को अब छाया में रखे।

दो से सात दिन में अंकुर फूटना शुरू होने के बाद, पोलीथिन हटा दीजिए। उस पर सुबह शाम को हलकी धूप वाली जगह में रखिये। ध्यान रहे कि दोपहर की कड़ी धूप न लगे। जैसे पौधा 4 इंच लंबा हो जाय तब उसे दो दिन, एक दो घंटे दोपहर की धूप लगाइए जिससे दोपहर की धूप का अभ्यस्त हो जाय। इसके बाद आप आप उसे छोटे गमले में या बाहर बाग में लगा सकते हैं।

बाहर लगाने के लिए कप से 4 इंच बडे व्यास और कप जितना गहरा खड्डा करके उसे पानी से भर दें। ज़मीन के पानी सोखने के बाद पौधे को एक हाथ से तने के पास से पकड़कर, दूसरे हाथ से कप को चारों तरफ से हलके हाथ से दबा कर, पौधे को कप से मिटटी के साथ निकाल कर गढ़े में रख दें। खाली जगह में 50% मिटटी, 50% कम्पोस्ट से भर के हलके हाथ से दबा दें। इसी योग्य अंतर से बाकी के पौधे लगा दे। हलके से पानी छिड़क के जमीन को आच्छादन (मल्च) यानी की घास पत्ती या दूसरी वनस्पति के अवशेषों, लोन का कटा नीला घास, या सब्ज़ी काटनेके बाद बचे अवशेषों से ढँक दें। इस आच्छादन की चौड़ाई 2 से 4 इंच तक होनी चाहिए।
उसके बाद उस पर थोड़ा कम्पोस्ट फैलाके पानी छिड़क दें।

अब बस आराम करो और सब्ज़ी उगते देखो। बीच-बीच में 10 से 15 दिनके बाद पानी देते रहें। हर रोज पानी डालने की जरुरत नहीं है। ज्यादा पानी देने से पौधे के मूल में पानी भर जाता हैं इसलिए वह सांस नहीं ले सकता और सड़ जाता हैं। कम्पोस्ट में रहे सूक्ष्म जीवाणु आच्छादन खा के उसकी खाद बनाते हैं और जमीन को उर्वर बनाते हैं। जैसे जैसे हम पाक लेते जाएंगे, और आच्छादन और कम्पोस्ट देते जाएंगे, वैसे वैसे धरा की उर्वरा बढती जाएगी।

कम्पोस्ट क्या है?
कोई भी सेंद्रिय पदार्थ जैसे कि घास पत्ती या दूसरी वनस्पति के अवशेषों, लोन का कटा नीला घास, या सब्ज़ी काटनेके बाद बचे अवशेषों जब तरह से सड़ जाते हैं तब वह कम्पोस्ट कहलाता है। गौ / भेंस का गोबर भी सडने के बाद कम्पोस्ट बनाता हैं। सामान्यत भारत में कम्पोस्ट गोबर से ही बनाता हैं। अमरीका में कई काउंटी व नगर पालिका पतझड़/पानखर में झड़े पत्तो से बहुत उत्तम दर्जे का कम्पोस्ट बनाती हैं। सामान्यत वह मुफ्त में बाँटा जाता है।

भारत में दूधवाले खाद (कम्पोस्ट) ला के दे सकते हैं। गौशाला से भी ले आ सकते हों। लोनावला में 150 रुपये में एक (सीमेंट) की बोरी/कट्टे के हिसाब से खरीदा था। मेरा अनुभव है कि जब तक वे भुगतान के बारे में निश्चिंत नहीं हो जाते, वे लाते नहीं हैं, टालते रहते हैं।

अगर जमीन अच्छी न हों तो?
अगर जमीन अच्छी न हों तो थोडा धीरज रखना पडेगा। पहेली दफा एक एक फुट के अंतर पर दो इंच चौडी और दो इंच गहरी रेखा खोदके उसमे मिटटी और कम्पोस्ट का मिश्रण भर दो। छोटे छोटे कंकड़ / पत्थर न निकालें क्योकि वनस्पति के मूल में रहती फूग(fungi)  पत्थर से खनिजों (Mineral) को धीरे धीरे खींचकर धरती की उर्वरकता बनाए रखती हैं। पत्थर अगर बहुत ही बड़े तीन चार इंच या उससे बड़े हों तभी निकालिए। हो सके तो बोआई की रेखा उत्तर / दक्षिण रखें।

अब उसमे घास वर्गीय अनाज जैसे कि जवार / बाजरा / मक्का, और घर मे जितने हों उतने दलहन जैसे कि मटर / चने / चौली / राजमा और हों सके तो ककड़ी परिवार के जैसे ककड़ी / घिया  तथा जमीन में उगने वाले गाजर / मुली वगैरह के बीज मिक्स करके कम्पोस्ट के उपर डाल दें। ऊपर कम्पोस्ट मिटटी की एक और तह डाल कर फिर से दबा दे और हलके से पानी डाल दें। हो सके तो, उसके बाद 2 इंच का आच्छादन कर के उसपर हल्का सा कम्पोस्ट  डाल दें। फिर ज़मीन को पूरी तरह से गीला कर दें। अब इस मौसम का काम ख़त्म हुआ। ज़रुरत के हिसाब से बीच-बीच में 10-15 दिन के बाद पानी देते रहें।

इस समय कुछ उत्पादन मिले या न मिले उसकी परवाह न करें। घास वर्गीय अनाज के मूल, जमीन में गहराई तक जा के जमीन को भुरभुरी बनाते हैं। इनके मूलों पर पतले धागे जैसी फूग (fungi) होती हैं, जो पौधों के जमीन में नीचे तक जाकर फ़ॉस्फरस और पोटेशियम खींचकर लाते हैं। मौसम समाप्त होने पर जमीन में रहे मूल पर अनेक तरह के जीवाणु जीते हैं और जमीन को उर्वरक बनाते हैं।

दलहन जमीन में नाइट्रोजन बनाता हैं। ककड़ी के परिवार की बेल जल्दी से जमीन पर फ़ैल कर उसे ढक देती हैं, जिससे धरती की नमी बनी रहती है। जमीन के सूक्ष्म जीवाणु तथा केंचुए की संख्या बढ़ने से जमीन भुरभुरी हो जाती हैं, इसलिए उसे दोबारा खोदने की जरुरत नहीं होती। मौसम समाप्त होने पर सभी पौधों के अवशेष बचाकर उसे आच्छादन के लिए उपयोग करें। ऐसा करने से खराब से खराब जमीन दो मौसम में अच्छी जायेगी।

मेरे हिसाब से इतनी मेहनत शुरुआत के लिए काफी हैं। अगर कोई संदेह हैं कि यह चलेगा या नहीं, तब प्रयोग कर ही लीजिए। अनुभव जैसा कोई शिक्षक नहीं। अनुभव तो करने से ही होता हैं। इसलिए दुविधा को त्याग कर बागवानी शुरू करके उसका आनंद लीजिये। अगर कोई प्रश्न हों या और सहायता चाहिए तो बेझिझक हमसे संपर्क करें। आप अपने अनुभव हमें बतायें, जिससे हम दूसरो के साथ बाँट सके और इस सूची में सुधार कर सकें।

भीष्म देसाई
Email: bhishmadesai@yahoo.com