संस्मरण: बरफ़ी

प्रियांकी मिश्रा

- प्रियांकी मिश्रा


बादल सारी रात रोते रहे थे। पौ फट चुकी थी पर ये रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तूफानी हवाओं ने उनकी नाक में दम कर रखा था। काठ के दरवाजे इधर उधर पटकाते हुए, रात के सन्नाटे और सुबह की शान्ति को भंग करने की जिद लिए हुए बैठे थे। बरफ़ी के लघु जीवन की पटकथा पर परदा गिरने की तैयारी पूरी हो चुकी थी।

नित्य कर्म से निवृत्त होकर जब मैं बरफ़ी को देखने गई, उसकी आँखें मेरी ओर विवशता से निर्निमेष ताकती रहीं। कह रही थीं जैसे, "क्षमा कर दो मुझे, और दूर तक साथ नहीं दे पाऊँगा तुम्हारा।" मेरा ह्रदय भीतर ही भीतर चीत्कार कर उठा। मेरे एकाकीपन का साथी मुझे नितांत अकेला छोड़कर बिल्कुल नहीं जाना चाह रहा था।

चिकित्सा महाविद्यालय की स्नातकोत्तर परीक्षा में उसका उपयोग एक प्रायोगिक जंतु के रूप में किया गया था। कार्य समाप्ति के पश्चात उसे समीपवर्ती अरण्य में छोड़ आने की बात हुई थी। पर इतने छोटे से खरगोश के लिए, जो शहरी जीवन का आदी था, निश्चित तौर पर किसी बड़े पशु का आहार बन, शीघ्र ही काल के गाल में समा जाना संभावित था।

जाने क्या उभरा था दिल में, मैं उसे अपनी गाड़ी में बिठा कर अपने घर ले आई। पीछे नौकरों के क्वार्टर में रहने वाले बच्चों का खिलौना सोच कर शायद खुश थी मैं। आरंभ में तो सभी बड़े प्रसन्न हुए उसकी हरकतों से, पर कम समय में ही ऊब गए। काम वाली को भी कष्ट होने लगा, उस पर नजर रखने में। मेरे पति तो आरंभ से ही खिलाफ थे उसके घर में रहने पर। उसके उड़ते रोऐं और जिस्म की एक अलग सी गंध उनके नाकाबिले बर्दाश्त थी। मैं पसोपेश में थी कि क्या करना ठीक होगा।

बर्फ से श्वेत, धवल इस प्राणी को डरते हुए पहली बार गोद में उठा कर, अपना सनसिल्क शैंपू देकर, जब उसकी अच्छी धुलाई की मैंने, तो उसके मखमली बाल चमक उठे। बेटे ने पुलकित हो कर कहा, "इसका नाम बरफ़ी रख दो।" नामकरण हो गया, अब तो घर का सदस्य हो गया था वो। काम वाली ने सलाह दी, "दीदी, इसको एक पिंजरा ला दो।" मुझे भी इस सुझाव को मानने में ही अपनी खैर दिखी, अन्यथा मुहल्ले में घूमती आठ दस बिल्लियाँ इस नन्ही सी जान का खेल शीघ्र ही खत्म कर देने वाली थी।

कुछ ही दिनों में बरफ़ी सभी का चहेता बन गया। इतना शिष्ट और शालीन जानवर तो मैंने कभी देखा ही नहीं था। लोग व्यर्थ ही इन्हें ज॔गली की संज्ञा दे देते हैं।
पिन्जरा तो उसका स्थायी निवास था, पर घर भर में घूमता रहता था वह। मजाल नहीं कि किसी भी जगह मल मूत्र त्यागें, ग॔दगी फैलाए। हाँ, मेरे पति का स्टडी रूम उसे विशेष रूप से प्रिय था। जितना भी वह चीखते, उसके पिंजरे को बाहर फेंकने की धमकी देते, अपने भोजन-पानी के अवशेष उसी कमरे में, एक नियत कोने में त्याग करता। पता नहीं, उसकी पशु सुलभ प्रवृत्ति थी यह, या मेरे पति को कुछ धैर्य के पाठ पढ़ाना चाहता था वह। एक दो बार मेरे बिस्तर पर चढ़ना चाहता था वह, पर मेरी नापसंदगी वह शीघ्र ही भांप गया और अपनी जगह समझ गया। शुरूआती दिनों में कुछ फूलों के पौधे और खिड़कियों के पर्दों को कुतर कुतर कर हमारे क्रोध का कारण बना वह। फिर एक सामंजस्य बैठ गया और वह एक सभ्य शहरी बन गया।

खाने की मेज पर बैठते ही मेरे पति का पहला प्रश्न उसके भोजन को लेकर होता था कि उसे खाना दे दिया गया या नहीं। यदि उस वक्त वह अपने पिंजरे में नहीं होता, अपनी आगे वाली दोनों टाँगें ऊपर उठा कर, दोनों कान हिला हिला कर हमसे भोजन की मांग करता। भावों की अभिव्यक्ति के लिये शायद शब्दों का शोर अनावश्यक होता है;मौन की भी अपनी एक भाषा होती है। छोटा सा एक निवाला पाकर, संतुष्ट होकर नीचे प्रेम से बैठ कर उसे भोजन करते देख बड़ा आनंद मिलता था मुझे।

सायंकाल सोफे पर पसरी जब मैं अपने मनपसंद कार्यक्रम देखती, मेरे करीब उसी मुद्रा में अपने सामने वाले दोनों पैर पसार कर वह बड़ी तल्लीनता से मेरा साथ देता। ऐसा लगता जैसे वह सब कुछ समझ रहा हो। पुत्र के मैगी की फ़रमाइश अक्सर उसी समय होती थी। उसकी कटोरी में थोड़ी सी नूडल्स डाल देने पर वह भी छोटे बच्चों की तरह उसकी एक एक लड़ी यू सुड़क कर खींचता था, जैसे कि वह सीधा चीन से ही निर्यात हुआ हो। खूब हँसते थे हम सब तब उसे देखकर, काम वाली बोलती, "बंगले वाला है न, सारे तौर तरीके मालूम हैं इसे।"

पति के निरन्तर कार्य में व्यस्त रहने और किशोर पुत्र के की अपनी नई दुनिया बन जाने पर मैं यकायक अपने आप को अलग थलग महसूस करने लगी थी। ऐसे समय में बहुत साथ निभाया था बरफ़ी ने मेरा। बरामदे में लगे झूले पर उसे गोद में बैठा, घंटों उससे बतियाती और झूलती जाती थी। उसकी गरदन पर जब प्यार से हाथ फेरती, वह और लंबी तान लेता था, अपनी नाजुक ग्रीवा और सारा शरीर भी। प्यार की भाषा इंसानों से ज्यादा ये बेजुबान जानवर समझते हैं, बरफ़ी के साथ के मेरे अनुभव ने ये मुझे खूब सिखाया। यदा कदा मेरा बेटा ये देखकर खूब रश्क किया करता, "वही तुम्हारा बेटा है, वही देखेगा तुम्हें।" पता नहीं यह ड्यूटी प्रभु ने किस पर सौंपी है, पर जब तक रहा, पल पल मेरी तन्हाई का दर्द बखूबी कम किया बरफ़ी ने।

कभी-कभी लगता कि उसे एक साथी की आवश्यकता है। भय होता कि संक्षिप्त जीवन पाने वाला बरफ़ी यदि एकाकी चला गया, तो मुझे सदा पश्चाताप होता रहेगा। अतिरिक्त भार मैं लेना नहीं चाहती थी, पर सबों के कहने पर मैं एक मादा खरगोश कुछ मूल्य अदा कर ले आई।

अद्भुत विरोधाभास था। भूरी, मटमैली, अस्थिर, हर वक्त अपने दाँत और पंजे गड़ाने को तैयार इस खरगोश का नाम भी मेरे पुत्र ने ही रखा, "जलेबी।" उसे तो पिंजरे में पकड़ कर रखना ही दुष्कर था।

पर, सहसा बरफ़ी परिवर्तित हो गया। आरंभिक, लघु मन मुटाव के पश्चात ही बरफ़ी जलेबी के इर्द-गिर्द मंडराने लगा। लगता था जैसे एक संस्कारी युवक को किसी मनचली के प्रेम ने दीवाना बना दिया हो।

पिंजरे में कुछ भी भोज्य पदार्थ देने से बरफ़ी टुकुर टुकुर ताकता और जलेबी मुंह चलाती रहती। चटोरी जलेबी को वह अपने हिस्से का अन्न भी दान कर देता था। बरफ़ी जितना ही साफ सुथरा था, उसकी पत्नी को स्नान कराना भी उतना ही दुरूह। कुल जमा, एक उत्तरी ध्रुव था, तो दूसरी दक्षिणी।

उसके आने के कुछ ही दिनों के बाद बरफ़ी यकायक कमजोर होने लगा। इसका सही कारण नहीं ज्ञात कर पाई मैं। शायद भोजन नहीं करने देती थी जलेबी उसे, या फिर दो हो जाने की वजह से मेरी ओर से ही कुछ अनदेखी हुई हो। फिर मैंने अनुभव किया कि उसने तो अन्न जल का संपूर्ण त्याग कर दिया है। मेरी चिकित्सक बुद्धि ने उसका अंत ताड़ लिया।

उस दिन प्रातः जब अपनी शाॅल में लपेट कर, मैं उसे अपने अंक में भरकर, पशुओं के डाक्टर के पास ले जा रही थी, उसकी आँखों से अविरल अश्रु झर रहे थे। मेरा उर उन आँसुओं को समाहित करने में सर्वथा अयोग्य था। मेरी आत्मा तो वैसे ही क्षत-विक्षत थी।

ठीक उसके द्वार पर पँहुची ही थी कि उसने एक बार नजर उठा कर मेरी ओर ही देखा और फिर मेरी ही गोद में चिर अनंत में विलीन हो गया वो।

भारी मन से, उसे दोनो करों में समाये, मैं घर लौट आई। लग रहा था, जैसे और पहले लेकर जाना चाहिए था उसे वेट के पास। सभी ने सांत्वना दी कि उसकी जीवन यात्रा मालिक ने उतनी ही तय कर रखी थी। अपने ही अहाते में, विशाल आम्र वृक्ष की छाँव में, जो कि उसका प्रिय विश्रामागार था, और बिल्लियों से छुपने की शरणस्थली भी, गड्ढा खोद कर उसे दफना दिया गया। उसकी स्मृतियाँ ही शेष रह गईं।

जलेबी ने उस रात कुछ अजीब हरकतें की। अपने वक्षस्थल और पेट के बाल नोचती रही। हमें आभास हुआ कि साथी के वियोग में व्याकुल होकर वह इस प्रकार अपना दुःख प्रकट कर रही है। अगले दिन सुबह पिंजरे की सफाई के दौरान काम वाली के चीखने पर मैं पँहुची। हमने देखा कि उन नर्म रोओं के बिस्तर पर, छह रोमहीन छोटे छोटे मासूम बरफ़ी विराजमान हैं।

असीम आनंद से भर गये हम सब। बरफ़ी पुकार रहा था, "मैं कहीं गया नहीं, सदा सदा तुम्हारे पास ही रहूँगा मैं।"

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