नूतन परिवेश में उपनिषद

निलिम्प त्रिपाठी

निलिम्प त्रिपाठी

आचार्य, भारतीय भाषा विभाग, महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय, सी 190 न्यू मिनाल, भोपाल
चलभाष: 9424466697


पदार्थ प्रियता मनुष्य का सहज स्वभाव है इस आसक्ति और विरक्ति के मध्य तटस्थता का बोध शास्त्र कराते हैं, गुरु उपासना सिखाते हैं और उपवास स्वयं करना पड़ता है। यह परमार्थबोध अविद्या से परे है। इस अज्ञान का अभाव ही आनंद की अनुभूति को प्रकट करता है।
मन, बुद्धि, ज्ञान तथा ब्रह्म आदि का विश्लेषण उपनिषदों में व्याख्यायित किया गया है। हमारी अतुलनीय आध्यात्मिक संपत्ति का कोषालय उपनिषद हैं। उपनिषद का तात्विक अर्थ ही ब्रह्म विद्या कहा जा सकता है। कठोपनिषद के उपोद्घात में भगवान शंकराचार्य लिखते हैं कि जिससे मुमुक्षुओं की संसार बीज अविद्या नष्ट होती है, जो विद्या उन्हें ब्रह्म प्राप्ति करा देती है और जिससे दुखों का सर्वथा शिथिलीकरण हो जाता है वही आत्मविद्या उपनिषद है।

आत्मा के अनंत आनंद को व्याख्यायित करने के लिए उपनिषदों का आश्रय लिया जाता है। गुरू के निकट पहुँचकर और नीचे बैठकर! हम जो मुक्ति का पाठ पढ़ते हैं वह मुक्ति का ज्ञान हमें उपनिषदों से मिलता है।

ईश–केन–कठ–प्रश्न–मुण्ड–माण्डूक्य–तित्तिरः ।
ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा ।।

1– ईशावास्योपनिषद्
2– केनोपनिषद्
3– कठोपनिषद्
4– प्रश्नोपनिषद्
5– मुण्डकोपनिषद्
6– माण्डूक्योपनिषद्
7– तैत्तिरीयोपनिषद्
8– ऐतरेयोपनिषद्
9– छान्दोग्योपनिषद्
10– बृहदारण्यकोपनिषद्

वेद रूपी वृक्ष की ब्राह्मण शाखाएँ हैं तथा आरण्यक उन शाखाओं में प्रकट पुष्प हैं और उन पुष्पों की सुगंध उपनिषद हैं। वस्तुतः प्राचीन काल में ऋषियों ने जो ज्ञानबीज वपित किया था वह आरण्यक रूप बीज ही उपनिषद के रूप में पल्लवित, पुष्पित, सुरभित और फलित दिखाई पड़ते हैं। यह वेदों का ही अंतिम प्रसार है; इसीलिए इसका नाम वेदांत पड़ा। यही ब्रह्म विद्या है। उपनिषद शब्द की निष्पत्ति उप और नि उपसर्ग पूर्वक सदृल धातु से हुई है। यहाँ सदृल धातु का प्रयोग विसरण अर्थात नाश, गति, जानना या प्राप्त करना तथा अवसादन इन तीन अर्थों में प्रयुक्त होता है। इस तरह उपनिषद का अभिप्राय अविद्या का नाश, ब्रह्मविद्या की प्राप्ति एवं सांसारिक दुखों का शिथिलीकरण अर्थात अवसादन है। उपनिषदों के अनुसार यह सारा जगत ब्रह्ममय है। ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।

ईशोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद् अपने नन्हें कलेवर के कारण अन्य उपनिषदों के बीच बेहद महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें कोई कथा-कहानी नहीं है केवल आत्म वर्णन है। इस उपनिषद् के पहले श्लोक ‘‘ईशावास्यमिदंसर्वंयत्किंच जगत्यां-जगत…’’ से लेकर अठारहवें श्लोक ‘‘अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विध्वानि देव वयुनानि विद्वान्…’’ तक शब्द-शब्द में मानों ब्रह्म-वर्णन, उपासना, प्रार्थना आदि झंकृत है। एक ही स्वर है — ब्रह्म का, ज्ञान का, आत्म-ज्ञान का।

उपनिषद में यह उद्घोष किया गया है कि जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, जीवित रहते हैं और अंत में जिसकी ओर जाते हैं वही ब्रह्म है। इस प्रकार ब्राह्म शब्द का प्रयोग अद्वैत, सर्वव्यापी तथा सत तत्त्व के रूप में बहुधा हुआ है। यथा-

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।
येन जातानि जीवन्ति।
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति॥
                                             - तैत्तिरीयोपनिषत् ३-१-३

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता॥2.20॥

मुण्डकोपनिषद में ब्रह्म का प्रतिपादन करते हुए ऋषि कहते हैं कि~

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयारन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यश्रत्रन्यो अभिचाकशीति॥
एक साथ रहने वाले तथा परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी जीवात्मा एवं परमात्मा, एक हि वृक्ष शरीर का आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनों में से एक जीवात्मा तो उस वृक्ष के फल, कर्मफलों का स्वाद ले-लेकर खाता है। किंतु दूसरा, ईश्वर उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है।

यह तत्त्व जब सूक्ष्म रूप से गुरु के निकट व्यवहार में लाया जाता है। तब वह उपासना कहलाती है। उपासना पद्धति भिन्न भिन्न होती है किंतु परिणाम में सर्वसमर्थता, सर्वज्ञता एवं सर्वसुलभता दिलाती है। प्राथमिक इकाई के रूप में भगवान की पादसेवा जिसमें स्नान, ध्यान, पूजन कराना। जप एवं अनुष्ठान। अजपाजप इत्यादि आचरणीय हैं।

भगवदीय अनुष्ठानों को प्रासादिक बनाकर फल प्राप्ति के लिए किए गए सत्कर्म को उपवास कहते हैं। यह उपवास परमात्मा के निकट वास करने के अभिप्राय को प्रकट करता है। हम साधन सिद्धि के लिए तथा परमार्थ प्राप्ति के लिए जो सद्कर्म करते हैं, पुण्य अर्जन करते हैं यही योग है। जो आत्मा को महात्मा बनाते हुए परमात्मतत्त्व की सिद्धि करता है। इस उपवास की प्राप्ति साधन शुद्धि से होती है। यह ज्ञान तीन तरह से मिल सकता है। मनन! सब से श्रेष्ठ होता है, अनुसरण! सरल होता है और अनुभव कठिन होता है।

अन्न के उपवास से तात्पर्य है कि हम रस के प्रति आग्रही न हों। छ: रसों में आसक्ति न रखते हुए केवल प्रसाद मानकर भोग लगाएँ। नेत्रों के उपवास से तात्पर्य है कि प्रतिकूल दर्शन न करें। कानों के उपवास से अर्थ है कि हम निंदा श्रवण न करें। जिह्वा के उपवास का अर्थ है कटु वचन न बोलें। आसन शुद्धि! भूमि का उपवास है। शुद्ध मन रखें! यह मनका उपवास है। वाणी का मौन तो केवल चुप है, मन का मौन होना ही वस्तुतः मौन है। हाथों से सत्कर्म हों यह हाथ का उपवास है और हमारे चरणों का उपवास यह है कि हमारा आचरण ठीक हो, प्रतिकूल मार्ग में हम चरण न रखें। केवल साबूदाना खाना; यह उपवास नहीं है।

शास्त्र चर्चा में उपनिषदों की व्यापकता और व्यवहार का समन्वय ही आत्मज्ञान है। यही (मोहस्य त्यागः मोक्षः) मोह का क्षय कराने वाला मोक्ष है। यही प्रासंगिक उपनिषद है।

सेतु, फ़रवरी 2019

2 comments :

  1. आदरणीय निलिम्प जी,
    आपने 21वीं सदी के अनुकूल, उपनिषदों की महत्ता व विज्ञान ज्ञान की उत्तम व्याख्या प्रस्तुत की । पढ़कर आनंदित प्रफुल्लित हुआ, आप जैसे विद्वान ही भारत वर्ष व मानव समाज की धुरी हैं । ॐ हरि:ॐ तत्सत।
    "सर्व मङ्गलम् भवतु"
    डॉ वेदव्यासजी जयप्रकाशनारायणजी द्विवेदी
    कुलपति, सी यू शाह यूनिवर्सिटी गुजरात भारतवर्ष

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