ऊँट और उसकी अनोखी करवट

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता?
-        मिर्जा गालिब
बात निकलेगी तो...
बचपन में मेरे दिमाग में तरह-तरह के सवाल उठा करते थे वैसे ही जैसे सभी बच्चों के मन में उठा करते हैं। कुछ सवालों को बड़ों से पूछने की बात मन में उठती थी जिनमें से कुछ के संतोषजनक उत्तर भी मिल जाया करते, पर कुछ ऐसे थे जिन्हें दोस्तों की मदद से या खुद ही निपटना होता था। कुछ इतने बेहूदा किस्म के होते थे कि उन्हें  निकाल बाहर करना पड़ता था। वैसे अक्सर कई मजेदार सवाल भी होते थे जिनमें एक सवाल था एक मुहावरे के बारे में; बातचीत में लोगों को अक्सर कहते सुनते थे ‘देखते हैं ऊँट किस करवट बैठता है ‘ जिसका अर्थ यही है कि ‘देखते हैं हालात कैसे बनते हैं’। बात समझ में आयी कि मामला अनिश्चित हालात बयां करता है वैसे ही जैसे अगर सिक्का उछाला जाय तो क्या मिलेगा चित या पट, हैड या टेल? तो फिर ऊँट किस करवट बैठेगा, दाहिनी या बायीं? अब आते हैं दूसरे बिंदु पर कि ऊँट की करवट को ही क्यों इतना महत्व का समझा गया? वैसे मुझे तो ऊँट किसी करवट पर बैठा नहीं दिखा हमेशा यही लगा जैसे बैठा हो बिलकुल सीधा, दोनों करवटों के बीच। वैसे हो सकता है जिसने मुहावरा ईजाद किया हो उसके पास ऊँट हो जिसके बैठने पर उसका सामान गिर जाता हो। अगर उसे पहले से पता हो कि उस दिन ऊँट बायीं करवट बैठेगा तो वह कीमती सामान दायीं ओर रख लेगा और इसमें उसको नुकसान कम होगा। पर यह तो वह जान नहीं सकता और सच कहूँ ऊँट को शायद खुद भी न पता नहीं होता होगा वह कैसे बैठेगा? मेरे एक ज्ञानी दोस्त ने कहा कि ऊँट बड़ा अडियल किस्म का जंतु है उसे दाहिनी ओर बैठने को कहो तो वो बायीं ओर बैठ जायगा। वैसे धीरे-धीरे मैं जान गया कि कुछ सवाल होते हैं जिनके जवाब नहीं होते और ये सवाल भी वैसा ही है। लेकिन मुहावरा अपनी जगह सही है कि कई स्थितियों में पहले से बता सकना मुश्किल है कि हालात आगे चलकर क्या होंगे। क्रिकेट के खेल में यह बात आसानी से समझ आ जाती है जब आप  सोच रहे होते हैं कि आज अमुक बल्लेबाज पहली गेंद पर आउट होगा या शतकीय पारी खेलेगा?  
बात से बात चल निकलती है सवालों से नये सवाल निकल आते हैं। ऐसा क्यों है कि करवट दो ही हो सकती है ज्यादा नहीं? किसी बड़े से पूछने में तो ड़ांट पड़ती इसलिये अपने ज्ञानी दोस्त का रुख किया। उसको भी ये मालूम न था पर वो बडा जुगाडू किस्म का बंदा है कभी हताश नहीं होता। उसने वादा किया कि वो जल्दी पता लगाकर बतायेगा। एक दिन वो सवेरे ही आ पहुँचा और बोला कि उस सवाल का जवाब मिल गया है यानि कि क्या करवट दो ही हो सकती हैं ज्यादा नहीं? बस अब तो वो शिक्षक था और मैं शिक्षार्थी, बोला ‘तुम लूडो खेलते हो?’
मैंने हाँ में जवाब दिया तो बोला ‘बस हो गया सवाल का जवाब’. मैंने कहा, ‘मेरे भाई पहेली ना बुझाओ साफ-साफ समझाओ’। ज्ञानी दोस्त ने जो समझाया वह कुछ इस प्रकार है: लूडो खेलने में जो पांसा प्रयोग होता है वह घनाकार (क्यूबिकल) होता है जिसमें छह पृष्ठ होते हैं जब पांसा फेंका जाता है तब कोई भी सतह ऊपर आ सकती है और हरेक सतह के ऊपर आने की संभावना समान है जो 1/6 के तुल्य है। पांसा इस मामले में छह करवटों वाला ऊँट है और पांसा फेंकने के पहले यह बताना मुश्किल है कि वह किस सतह पर पड़ेगा- इक्का, दुग्गी, तिग्गी, चौका, पंजा या छक्का।  हर सतह एक करवट ही तो है। बात पहले अजीब सी लगी पर जब सोचा गहराई से तो देखा कि बात दमदार है।
बात से बात निकलती है तो सोचने लगता हूँ अगर छह करवट संभव हैं तो बारह, बीस या पचास भी संभव होने चाहिये। अबकी बार मैंने ज्ञानी दोस्त का रुख नहीं किया और सोचा कुछ जुगाड़ मैं भी करूं। तभी मुझे याद आया महाभारत में अर्जुन का श्रीकृष्ण से संवाद: ‘चंचलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दढम, तस्यां निग्रहं मन्यो वायुरैव सुदुष्करम’। यह मन ही है जो अनगिनत करवटों वाला ऊँट है और इस कारण उस पर नियंत्रण भी उतना ही मुश्किल। जब दो करवटों वाले ऊँट की करवट नहीं बता सकते तो सौ या हजार करवटों वाले मन रूपी ऊँट की क्या कह सकते हैं?   
मस्तिष्क और मन
विश्व में जो भी रचनाएँ हैं उनमें सबसे जटिल और चुनौती पूर्ण मानव-मस्तिष्क है। विज्ञान की अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद मस्तिष्क व उसकी कार्यविधि को समझना आसान नहीं प्रतीत होता और आज विज्ञानविदों के लिये सबसे दुरूह और चुनौतीपूर्ण [1] प्रश्न यही है। ऐसा नहीं कि आधुनिक प्रौद्योगिकी का लाभ मस्तिष्क को समझने में न हो पाया हो पर वह जिसे हम मन कहते हैं उसकी गहन जानकारी अभी दूर ही लगती है।
मुझे नहीं मालूम था ऊँट की जिन करवटों ने मुझे बचपन में इतना आकर्षित किया बाद के वर्षों में वही मन रूपी ऊँट मेरे लेख में चर्चा का विशेष विषय बनेगा। जो कुछ भी हम जानते समझते हैं या देखते सुनते हैं उसके आधार में यही सैकड़ों-हजारों करवटों वाला ऊँट है। दार्शनिक-गणितज्ञ रेने देकार्त का एक कथन बहुचर्चित है ‘एरगो कोगितो एरगो सम’, यानि मैं सोचता हूँ इसलिये मैं हूँ। बड़ा मजेदार वाक्य है अरे भाई कहना चाहिये था ‘मैं हूँ इसलिये मैं सोच पाता हूँ अगर मैं होता ही नहीं तो सोच कैसे पाता’? लेकिन दार्शनिक लोगों को इस तरह की बातों में मजा आता है। पर मैंने भी जब सोचा गहराई से तो लगा देकार्त की बात में दम तो है जबकि दूसरी बात भी ठीक ही लगती है। सोचिये क्या एक चींटी जानती है कि वो है? अब वो तो बतायेगी नहीं पर लगता है वो नहीं जानती कि वो अस्तित्ववान है। एक और उदाहरण लेते हैं क्या एक पर्वत जानता है कि वो है? शायद नहीं क्योंकि उसका मस्तिष्क न होने से वह सोच नहीं सकेगा। हमको ऐसा लगता है वैसे हो भी सकता है वह सोचता हो, पर जहाँ तक हमारी जानकारी है उसको नहीं मालूम कि वह है जबकि हमको मालूम है कि वो है। देकार्त की बात में दम तो है और जितना सोचो दम बढ़ता जाता है। दूसरे पक्ष की बात को कहने के लिये गालिब का अंदाजे बयां: डुबोया मुझको होने ने; अदर देकार्त शायर होते तो शायद कह बैठते- डुबोया मुझको सोचने ने.
करवटों की किस्में
मन जब करवट लेता है तब न केवल उनकी संख्या अधिक होती है अपितु उनकी किस्में भी कई प्रकार की होती हैं। ऊँट की करवटों में सिर्फ बायें और दायें का फर्क है जबकि मन रूपी ऊँट की करवटें अलग तरह की होती हैं। अपनी सबसे पुरानी और जानी-पहचानी करवट में वह दिल तक जा पहुँचता है जो कवियों व शायरों के लिये एक वरदान सा है। दिल देना और लेना –इसके बिना साहित्य अधूरा ही रह जाता अगर मन की करवट दिल तक न पहुँच पाई तो सब बेकार जबकि बेचारा दिल सिर्फ धड़कना जानता है सारा जलजला तो मन में ही उठता है। ऐसी हर लेन-देन में सच कहें तो मन ही लिया-दिया जाता है पर सारी वाहवाही दिल को मिल जाती है।  अब बताइये कि मन-ऊँट दिल की करवट न बैठता तो कवियों का क्या होता? साथ ही श्रोताओं या पाठकों का भी आनन्द आधा रह जाता।
बातें कई हैं और कई तरह की हैं। जब से कम्प्यूटर प्रयोग में आने लगे हैं बहुत सा काम जो मानव मस्तिष्क किया करता था कम्प्यूटर द्वारा किया जा रहा है। निश्चय ही दोनों में साम्य देखा जाना स्वाभाविक है और जो बात नजर आती है वह यह कि मस्तिष्क एक कम्प्यूटर की तरह है और मन उसका सौफ्टवेयर। मन कई जटिल एवं सरल प्रोग्रामों का विराट समूह सा है जो मस्तिष्क नामक मशीन पर चलाया जा रहा है। यह तुलना शायद पूरी तरह सही न भी हो पर इसमें कुछ सचाई जरूर है और ऐसा सरलीकरण कई बार गहन धारणाओं के समझने में मददगार होता है। इस साम्य के बावजूद दोनों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। यह सही है कि कम्प्यूटर मानव मन से कई गुना अधिक तेजी से गणना कर सकता है जिसके लिये उसका उपयोग किया भी जाता है। यहाँ तक कि वह शतरंज भी खेल सकता है और मानव को हरा देता है पर कुछ खास तरह की बातें हैं जो मानव मन की अपनी विशेषता है। मानव मन हमेशा मशीनी तरीके से गणन‍ा नहीं करता अपितु कई बार वह स्थिति को उसकी समग्रता में लेकर निर्णय ले सकता है। इसे हम पैटर्न आधारित कार्यविधि कह सकते हैं जिसका जिक्र पहले के लेख [1] में किया जा चुका है फिर भी संक्षेप में उसका वर्णन यहाँ उपयोगी होगा। कई बार ऐसा होता है कि हम किसी चेहरे पर नजर डालते हैं और अचानक हमें लगता है कि इसे देखा है कहीं, पर कहाँ याद नहीं? कुछ जोर डालते हैं याददास्त पर, अरे हाँ, कुछ सेकेंड, और अचानक याद आ जाता है कि ये तो अपने ही गांव का हरिया है जिसके साथ गुल्ली-डंडा खेला करते थे। किसी गीत की लाइन हम भूल रहे होते हैं लाख कोशिश करने पर भी याद नहीं आता पर तभी कोई गीत का पहला ही शब्द बोल देता है बस तब सारा गीत याद आ जाता है। इसे पैटर्न-आधारित कार्यविधि कह सकते हैं और इस बात को बड़ी खूबसूरती से एडवर्ड दि बोनो एक सरल प्रयोग [2] द्वारा समझाते हैं।
जिलेटिन प्रयोग
 कल्पना करें एक समतल बोर्ड की जिस पर जिलेटिन की तह चढी हुई है जिसे थोडा तिरछा रख देते हैं ताकि हल्का ढाल उसमें बना रहे। अब बोर्ड के ऊपरी हिस्से के किसी स्थान पर गरम स्याही धीरे-धीरे उड़ेलते हैं  स्याही ढाल की दिशा लेकर बहना आरम्भ करती है और उसके बहाव-पथ में कुछ जिलेटिन पिघल जाता है इस तरह जिलेटिन की सतह पर बहाव-पथ साफ दिखायी देता है। यही प्रयोग दोहराने पर एक बात साफ दिखायी देती है कि दूसरी बार अधिकतर स्याही पूर्व निर्मित बहाव-पथ की ओर ही बहती है जिसके कारण कुछ और जिलेटिन पिघल कर बहाव-पथ को कुछ और गहरा कर देती है। यह माना जाता है कि एक बच्चे का मन कुछ जिलेटिन सतह की तरह ही होता है जिसपर पहली सूचना गहरा और स्थायी असर करती है। हमारे संस्कार कुछ इसी तरह मन-पटल पर अंकित होते हैं, इन्हीं पूर्व अंकित लगभग स्थायी व अर्द्ध-स्थायी प्रभावों को पैटर्न कहा जाता है। हमारी कई आदतें, संस्कार और अवधारणाएँ विशेष प्रकार के पैटर्न ही हैं।
हमारा काम अक्सर आसान कर देते हैं ये पैटर्न और हमारी शिक्षा में बड़ी भूमिका निभाते हैं। साथ ही यह भी जान लेना जरूरी है कि हम इनकी गिरफ्त में भी आसानी से आ सकते हैं जिनसे बाहर आना असंभव नहीं पर कठिन जरूर होता है। इनका प्रभाव वांछित भी हो सकता है और अवांछित भी। कट्टरपंथी चाहे धार्मिक आधार पर हो या राजनैतिक या किसी भी विचारधारा से जुड़े हों ऐसे ही पैटर्नों की गिरफ्त में हुवा करते हैं। उन्हें नहीं लगता कि उनकी सोच में कहीं कुछ गलत हो सकता है या वे किन्हीं पैटर्न की गिरफ्त में हैं।
मन का ऊँट अपनी सैकड़ों संभावित करवटों के चलते हमारी चर्चा का विषय है। दरअसल पैटर्न एक गड्ढे के समान है और मन वहाँ जा पहुँचा तो काफी जोर लगाना पड़ सकता है बाहर निकलने के लिये, या फिर अंधेरी गुफा की तरह जहाँ रास्ता खोजना मुश्किल हो जाता है। कई बार तो यह भी होता है कि पैटर्न का कैदी बाहर निकलना ही न चाहे क्योंकि उसे लगता है कि सत्य को उसने खोज लिया है और उसे अपनी मंजिल मिल गयी है।
इतना सब जान लेने के बाद मुझे फिर याद आता है मेरा बचपन का पुराना सवाल कि ऊँट की करवट को ही क्यों लिया जाता है बिल्ली की करवट क्यों नहीं? बात समझने की कुछ और कोशिश करते हैं। ऊँट अपनी करवट आसानी से नहीं बदल सकता उसके लिये उसे अपनी लम्बी टांगों पर खड़ा होना पड़ेगा तब कहीं दूसरी तरफ का रुख करना पड़ेगा। बिल्ली को कुछ देर नहीं लगती लेकिन सबसे मजेदार केस तो अपने लोगों यानि इंसानों का है बस थोढा लुढ़क जाना है और बदल जाती है करवट, जैसे बेपैंदी का लोटा। मन चंचल है जैसे बेपैंदी का लोटा, यानि जो स्थिर नहीं। वैसे चंचल मन पैटर्न की गिरफ्त में नहीं लेकिन बेपैंदी का लोटा होना भी वांछित नहीं। आदर्श स्थिति तो दोनों के मध्य कहीं होनी चाहिये।
वापस आते हैं अपने मूल विषय पर – मन रूपी ऊँट और उसकी सैकडों करवटें। अगर हर पैटर्न को एक करवट से निरूपित किया जाय तो तय है कि पैटर्न की गिरफ्त से निकलना आसान नहीं। आदतें या मानसिकता अगर बदलना चाहे तो प्रयास करना पड़ेगा और समय लगेगा। जब बात से बात निकल रही है तब क्यों न कुछ और तरह के काम की बात पर आ जायें। ऊँट जिस तरह बैठता हो बैठे हम उसकी शारीरिक रूपरेखा से बहुत कुछ सीख सकते हैं। यौगिक आसनों में एक महत्वपूर्ण आसन है उष्ट्रासन जिसमें पहले घुटनों के बल बैठते हैं फिर शरीर को पीछे की ओर ले जाकर सीना आगे बढ़ा हाथों को भी पीछे पैरों के पास टिका देते हैं। माना जाता है कि यह आसन कुछ कठिन जरूर है पर इसमें मेरुदंड व सीने पर अच्छा असर होता है। इसका आरंभिक रूप अर्द्ध उष्ट्रासन कहलाता है जिसमें हाथों को पीछे कर पैरों के पास तक न लाकर कमर से नीचे ले जाकर टिकाना होता है। यह बताना जरूरी है कि इन सभी योगासनों को पहले किसी प्रशिक्षक की देख-रेख में ही करना उचित है एक बार सीख लेने पर फिर स्वयं भी कर सकते हैं। मैंने अब ज्यादा सवाल पूछना बंद कर दिया अन्यथा पूछता कि उष्ट्रासन ही क्यों घोड़ासन ता बकरासन क्यों नहीं? शायद ऊँट की शारीरिक रूपरेखा में कुछ खास हो। उसके मन में क्या है इसको जान सकने का सवाल ही नहीं।
वैसे कुछ खास है जरूर ऊँट में, उसकी करवट में और उसके खाने में भी। अब वो मुहावरा भी याद करें, ऊँट के मुंह में जीरा। समझना मुश्किल नहीं है और फिर वही सवाल ऊँट को ही क्यों लिया जाता है हाथी को या घोड़े को क्यों नहीं। जब खास बातों पर बात हो रही है तब ऊंचाई की बात भी कर लें: ‘ऊँट की ऊंचाई ऊंचाई से नहीं होती, होती ही है होती ही है पीठ ऊंची ऊँट की’। बच्चे अक्सर इसे गाया करते थे और मैं इसका मतलब निकालने के प्रयास करता रहता था और आज तक कर रहा हूँ
आधुनिक परिद्दश्य
देकार्त के कथन-‘मैं सोचता हूँ इसलिये मैं हूँ’ का विस्तार कर देते हैं ‘हम सोच सकते हैं इसलिये ये दुनिया है’- एकदम सच है। सैकड़ों इच्छाओं वाले लाखों करोडों मन लगातार संघर्षरत हैं कभी खुद से कभी औरों से। यह टकराहट ही महाभारत का मूल है हाल के समय मे दो विश्व-युद्धों का भी और आतंकी गतिविधियों सहित संसार के अधिकांश संघर्षो का। साथ ही घर-घर में महाभारत का भी।
यों त्रासदी के स्वरूप और भी हैं। अखबार देखते रूह कांप जाती है मासूमों पर हो रहे अमानवीय जुल्म, निजी स्वार्थों से प्रेरित बर्बर क्रूर कृत्य, बच्चों के प्रति यौन हिंसा; ऐसी भी करवटें हैं मन की जो हालात को इतना बेकाबू कर देती है। यह अक्सर सुनाईं देता है कि अवसाद की हालत में किसी ने आत्महत्या कर ली, कभी-कभी पूरे परिवार उजड़ जाते हैं जब कोई खास अपना ही उस मनोदशा में पहुँच जाता है। जबसे मीडिया की पहुँच बढ़ी है इस तरह की धटनायें भी बढ़ी हैं। तनावग्रस्त मन:स्थिति एवं विकृत मानसिकता के नित नये रूप उजागर होते हैं। मन की इन बेहूदा करवटों पर नियंत्रण पाना ही होगा पर कैसे?
बहुमुखी अभियान
विज्ञान के विकास के आरम्भिक समय में यह धारणा थी कि विज्ञान भौतिक जगत को समझने में कारगर हो सकता है पर मन और उससे जुड़े विषय उसकी परिधि के बाहर हैं। लेकिन यह धारणा विज्ञान की बढ़ती सामर्थ्य के सामने अधिक समय तक टिक न सकी। आज मन को समझने का बहुमुखी अभियान आरम्भ हो चुका है जिसमें न्यूरोलाजी की प्रमुख भूमिका है कुछ समय पहले तक मनोरोगों का अध्ययन व निदान सायकिएट्रिस्ट या मनोचिकित्सक की अपनी सीमित जानकारी पर निर्भर था पर आधुनिक प्रौद्योगिकी के बढते कदमों से मस्तिष्क की कार्यविधि को समझना कुछ-कुछ संभव हो सका है जिसमें एम आर आई (MRI) की भूमिका प्रमुख रही है। हमारी जानकारी बढी जरूर है पर आधुनिक जानकारी के साथ पुरानी पद्धतियों का सार भी लेकर चलना होगा साथ ही मन की परिवेशीय गुणवत्ता में भी जरूरी सुधार करना होगा। आज न केवल हमारा भौतिक परिवेश प्रदूषित हुवा है अपितु मन का परिवेश भी पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है[3]
त्रासदी के विविध रूप, विकृतियों के नये आयाम और मनोरोगों से जुड़े सभी मामले मन रूपी ऊँट की दशाऐं हैं करवटें हैं। पर ऐसा नहीं कि सब कुछ अवांछित है त्याज्य है। इसमें और भी बहुत कुछ है जो संभावित स्थितियों के आयाम प्रस्तुत करता है और थोड़ा ही सही वह भी है जो वांछित एवं स्वीकार्य है। इन अनोखी दास्तानों में एक की चर्चा यहाँ करेंगे।
ऊँट की असली रेगिस्तानी करवट: अमरगोसा की नृत्यांगना                                   
 अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य में विशाल मरुस्थल है जिसे डैथ वैली नाम से जाना जाता है. नवादा राज्य में लास वेगास होते हुए यहाँ पहुँचा जा सकता है। अमरगोसा नामक स्थान से मरुथल आरंभ माना जा सकता है। इस स्थान से जुड़ी नृत्यांगना, गायिका, चित्रकार व लेखिका मार्था बैकेट की दास्तान [4] अपने तरह की अनूठी है। न्यूयार्क की बैलेरिना मार्था आपनी मंडली के साथ देश भ्रमण पर निकली जगह-जगह पर अपने कार्यक्रम पेश करने के उद्देश्य से। लास वेगास के पास मरूथल तक जब वह पहुँची तो उसे लगा कि वह सही जगह आ पहुँची और अब वह इसी स्थान पर रहना चाहेगी। एक हाल उसने किराये पर लिया और उसका नाम रखा अमरगोसा ओपेरा जहाँ वह अपने नृत्य कार्यक्रम पेश करती। हाल की दीवारों को उसने अपने बनाये चित्रों से भर दिया जो दर्शकों की भीड़ को दर्शाते। यहाँ रेगिस्तान में उस निर्जन प्रदेश में जहाँ तब एक दर्जन लोग ही रहते थे किसी दर्शक समूह की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। यह प्रदर्शन न धन के लिये था न प्रसिद्धि के लिये क्योंकि जहाँ अधिक लोग पहुँचते ही नहीं वहाँ प्रशंसा या प्रसिद्धि का कोई अर्थ नहीं हो सकता। यहाँ कलाकार की कला केवल उसकी चाहत थी कला केवल कला के लिये थी। एक हरे भरे प्रदेश एवं न्यूयार्क जैसे विशाल नगर में एक सफल जिंदगी छोड़ अपनी कला का प्रदर्शन एक निर्जन मरुथल में करना और वह भी लगभग पैतालीस लम्बे वर्षों तक – अपने किस्म की एक अद्वितीय दास्तान। मार्था के मन का ऊँट अपने मरु-प्रेम को रोक न पाया और वहीं बस गया। इसी जगह 92 की उम्र में मार्था ने अपना शरीर त्यागा।  

       इस तरह की अनोखी मन:स्थिति की बात हर देश-काल में ढ़ूंढ़ी जा सकती हैं। क्या हम सभी नहीं जानते कि ढाई हजार साल पहले किस तरह एक राजकुमार ने आपना राजसी वैभव व परिवार छोड़ सन्यास लिया जीवन के कुछ मूलभूत सवालों के जवाब तलाशने के प्रयास में। हाल के वर्षो में एक भावी सम्राट ने सिंहासन छोड़ दिया अपने प्यार के कारण और कैसे एक वकील ने अफ्रीका में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के साथ आपने जीवन की राह बदल दी और किसी हद तक अपने देश की भी। ये सब मन की अनोखी करवटों के ही अलग-अलग पहलू हैं।

       बातें और भी हैं कि कुछ खास तरह की करवटें (मनोदशा) मस्तिष्क के चुनिंदा स्थलों पर रासायनिक अथवा विद्युत प्रभावों से भी पैदा की जा सकती हैं [5]। कुछ रसायन मन को विशेष दिशा में जाने के लिये प्रेरित करते पाये गये हैं बीसवीं सदी के मध्यवर्ती दशकों में एल एस डी नामक रसायन का प्रचलन हुवा था जो मन को विशेष कलात्मक अभिरुचि प्रदान करती थीं और तब इनके सेवन से सेवन कर्ता खास तरह की पेन्टिंग का सृजन करने में सक्षम हो जाता था जिन्हें ‘साइकेडेलिक कला’ (psychedelic art) कहा जाता है। यह बात अब पूरी तरह स्वीकार्य है कि मन की करवट को अस्थायी रूप से रसायनों के प्रयोग से निर्देशित किया जा सकता है जिसका एक उदाहरण हम ले चुके हैं। मस्तिष्क के कुछ चुनिंदा स्थल ऐसे हैं जिन्हें इलेक्ट्रोडों की सहायता से विद्युत द्वारा उत्तेजित करने पर मन की करवट में खास तरह के परिवर्तन किये जा सकते हैं जैसे कि अध्यात्म के लिये विशेष अभिरुचि। यह भी अपने तरह की अनोखी करवट है।
 मस्तिष्क में चोट लगने से भी ऐसे बदलाव आ सकते हैं जो लगभग स्थायी हो जाते हैं मस्तिष्क के न्यूरोनों के आपसी संपर्क में परिवर्तन होने के कारण। न्यूरोलोजिस्ट ओलिवर जैक [6] ने  मनोरोगों के अपने अध्ययन में ऐसी कुछ मनोदशाओं का जिक्र किया है जो संगीत के प्रति न केवल आकर्षण बढा देती है अपितु अचानक संगीत की गहन समझ भी प्रदान कर देती हैं। कई बार जब हम किसी की प्रतिभा का जिक्र करते हैं तो निश्चय ही बहुत कुछ शिक्षा एवं संस्कारों पर निर्भर करता है पर कुछ ऐसा भी है जो मस्तिष्क के न्यूरोनी परिपथ के जुडाव पर निर्भर करता है। इन जुड़ावों में कुछ इधर-उधर हो जाय तो मनोरोग का कारण बन सकता हैं पर कुछ मामलों में किसी विशेष दिशा में प्रतिभा के धनी भी।
सब मिलाकर यह तो समझ मे आता है कि हजार करवटों वाले हजार करोड़ ऊँट (दुनिया की लगभग पूरी आबादी) जब बैठेंगे तब करवटों व टक्करों के किलने आयाम प्रस्तुत होंगे बताना मुश्किल है। ऐसे ही एक आधुनिक ऊँट की चर्चा अगर नहीं की तो बात अधूरी रह जायगी।
लोकतंत्र का ऊँट
ऊँट वैसे तो अपने आप में अनोखा जन्तु है पर जब बड़ी संख्या में एक साथ हों तो और भी अनोखा हो जाता है।  लोकतंत्र एक प्रणाली है किसी देश के शासन को परिचालित करने के लिये जिसमें हर वयस्क भाग ले सकता है चुनाव के द्वारा। बात वैसे सीधी सी लगती है पर इसकी जमीनी हकीकत से साक्षात्कार करें तो पता चलता है कि मामला उलझा हुवा है।  लोकतंत्र का हर ऊँट अपनी अलग पहचान रखता है। अपने लोकतंत्र को ही लें हर राज्य की अलग दास्तान है हर वोटर की अपनी और चुने गये विधायकों की अपनी। कोई बता नही सकता कि चुनाव के बाद ऊँट किस करवट होगा? या दूसरी ओर मतदाता की ही बात करें। आप वोट के लिये जाते हैं तो अधिकतर मतदाता यही कहते मिलेंगे कि अरे हमारा वोट आपको ही पडेगा। दूसरी पार्टी वालों से भी यही कहेंगे। मतदाता के मन का ऊँट अपने तरह का है।
कहने को लोकतंत्र है पर कई बार लोक अलग होता है तंत्र अलग। कई बार तो इस ऊँट की चारों टांगे चार अलग दिशाओं में जाती दीखती हैं। अमेरिकी लोकतंत्र की अपनी पहचान है और इस देश को आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली के विकास में महत्वपूर्ण योगदान का गौरव प्राप्त है। अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने जब इसकी नींव रखी तो यह स्वीकार किया कि यह प्रणाली आदर्श नहीं कही जा सकती क्योंकि इसमें बहुत खामियां हैं और इसका आसानी से दुरुपयोग हो सकता है जिसके प्रभाव को कम करने के लिये प्रावधान रखने की जरूरत है। यह एक समझदारी भरा सोच था जिसका लाभ देश को मिलता रहा।
मन का भी एक पर्यावरण है जो सामान्य भौतिक परिवेश की तरह स्वस्थ जीवन व चिंतन के लिये जरूरी है। भौतिक पर्यावरण के प्रदूषण की बात हम करते हैं लेकिन मन के पर्यावरण की बात पर ध्यान कम जाता है। जैसे भौतिक पर्यावरण प्रदूषित होता रहा है वैसे ही मन का पर्यावरण भी प्रदूषित हुवा है जिसमें आधुनिक प्रौद्योगिकी एवं मीडिया का बड़ा योगदान है। मन का प्रदूषित परिवेश हमें नये किस्म की उन अंध गुफाओं में पहुँचा सकता है जहाँ से बाहर निकलने के लिये विशेष प्रयत्नों की जरूरत होगी जिसमें विज्ञान की जानकारी के साथ पारम्परिक पद्धतियों का प्रयोग भी जरूरी है फिर चाहे वह राज-योग में शारीरिक क्रियाओं से मन को संतुलित करने की बात हो या निजेतर संदर्भों [7] से  जुड़ने का मनीषियों का सुझाव। 
संदर्भ:

[1] चन्द्रमोहन भंडारी, अंध-गुफाओं का कैदी, सेतु, सितम्बर 2011.
[2] एडवर्ड दि बोनो, पार्श्व चिंतन, शुमाखर लेक्चर्स (Ed. Satish Kumar) , Blond and Briggs,
[3] चन्द्र मोहन भंडारी, Deep Transpersonal Ecology: Gandhian Connection, Mainstream Weekly, October 2009.
[4] मार्था बैकेट, To Dance on Sands: The Life and Art of Marta Becket, Page Publishing, Inc., 2015.
[5] Ray Kurzweil, the Age of Spiritual Machines, Penguin Books (USA), 2000.
[6] Oliver Sacks, Musicophilia, Vintage Books, 2008.
[7] चन्द्रमोहन भंडारी, हिमालय और हडसन के बीच: एक अंदरूनी भ्रमण-पथ पर, सेतु पत्रिका (हिंदी), जून 2019.

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