हिंदी के ऐतिहासिक उपन्यासों में (1950-1980 तक) पारिवारिक मूल्यों का अध्ययन

सुभाष चन्द्र श्रीवास्तव


प्राचार्य, दयानंद बछरावाँ डिग्री कॉलेज, बछरावाँ, राय बरेली, उत्तर प्रदेश

सारांश:
ऐतिहासिक उपन्यास साहित्यिक शैली है जिसकी पूर्वपीठिका अतीत की प्रख्यात घटनाओं पर चित्रित होती है।कल्पना और वास्तविकता के आनुपातिक मिश्रण के फल स्वरुप ऐतिहासिक उपन्यास तत्कालीन परिवेश से अवगत कराते हैं। साहित्य समाज का दर्पण है और समाज की इकाई परिवार है। तीन दशक 1950 से 1980 की ऐतिहासिक उपन्यास में शौर्य गाथाएँ तो मिलती ही है एवं उनके साथ पारिवारिक मूल्यों का महत्व भी निरूपित होता है।

मुख्य शब्द:  ऐतिहासिक उपन्यास, पारिवारिक मूल्य, सब्लिमिटी, सार्वजनिक दृष्टि, घुमक्कड़ प्रवृत्ति।

प्रस्तावना: 
उपन्यास एक गद्यबद्ध कथानक है जिसमें जीवन तथा समाज की व्याख्या को सर्वोच्च रुप से प्रदर्शित किया जाता है। विश्व साहित्य का प्रारंभिक चरण कहानियों के माध्यम से प्रारंभ होता है पर उपन्यास को आधुनिक युग की देन कहना अधिक समीचीन होगा। साहित्य में गद्य का प्रयोग जीवन के यथार्थ चित्रण का द्योतक है। कृत्रिमता से विमुख होकर जीवन का सरस चित्र उपन्यासकार की सार्थकता है। उपन्यासकार यथार्थ की परिधि में संभावित विकल्पों से समाज को सामान्य धरातल पर मूर्तिमान करता है। उपन्यासकार अपने उपन्यासों के माध्यम से सामाजिक समस्याओं का चित्रण ही नहीं वरन् सामाजिक जागरूकता को भी अभिव्यक्त करता है। जीवन का सर्वांगीण चित्र व्यापक रूप से उपन्यास में मिलता है। यदि औद्योगिकीकरण एवं उपन्यास का आविर्भाव देखा जाए तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उपन्यास का विकास वैज्ञानिक प्रगति के साथ हुआ।

महाकाव्यों में जहाँ आदर्शवादी चित्रण की प्रधानता है वही उपन्यासों में शाश्वत सत्य का प्रादुर्भाव हुआ। उपन्यास समाज की आलोचनात्मक व्याख्या प्रदर्शित करता है। उपन्यासकार वास्तविक अर्थों में सत्य और कल्पना को मिश्रित कर इन दोनों के माध्यम से सामाजिक जीवन की झाँकी प्रस्तुत करता है। वास्तव में हिंदी उपन्यास का उद्भव एवं विकास अंग्रेजी शब्द 'नोवेल' से हुआ है जिसका अर्थ है - कुछ नया। गुजराती भाषा में इसे 'नवलक' के नाम से जाना जाता है। हिंदी भाषा में 'उपन्यास' दो शब्दों के मेल से उद्धृत है। उप+ न्यास मे 'उप' उपसर्ग है जिसका अर्थ है निकट व समीपवर्ती और 'न्यास' का अर्थ है रखना, अर्थात निकट या समीपवर्ती रखी हुई वस्तु। उपन्यास विधा है जो हर एक पाठक को अपनी से प्रतीत होती है। जीवन का प्रतिबिंब है। व्यक्ति स्वयं को उपन्यास की कथावस्तु से जोड़कर उसके उतार-चढ़ाव पर सवार होकर अपने जीवन को उपन्यास के माध्यम से जीने लगता है। लान्जाइनस 'ऑन द सब्लाइम' मे उच्च कोटि के लेखन का सर्वश्रेष्ठ गुण उदात्त को मानते हैं। पाठकऔर पठन सामग्री (उपन्यास) उपन्यास ना होकर, जीवन की आकांक्षाएँ इच्छाएँ,सफलताएँ, असफलताएँ, कुंठाओं की अभिव्यक्ति जान पड़ने लगते हैं। उपन्यासकार की अभिव्यक्ति सभी की अभिव्यक्ति बन जाती है, तब उपन्यास एक व्यक्ति का नहीं वरन समष्टि का भोगा हुआ यथार्थ बन जाता है जो चिरस्थाई रूप से स्थापित हो जाता है। प्रेमचंद के शब्दों में, "मैं उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मानता हूँ। मानव चरित्र पर प्रकाश डालना ही उपन्यास का मूल तत्व है।"

ऐतिहासिक उपन्यास साहित्य की विधा है जिसमें किसी कालावधि की प्रख्यात कथा का चित्रण हो। यह एक साहित्यिक शैली है जिसमें कथानक अतीत में स्थित एक सेटिंग में होता है। ऐतिहासिक कथा साहित्य का एक अनिवार्य तत्व है। इसका कथानक अतीत में सेट किया जाता है तथा शिष्टाचार, सामाजिक परिस्थितियों, पारिवारिक मूल्यों और निर्धारित अवधि में अन्य विवरणों पर केंद्रित होता है। अंग्रेजी साहित्य में वॉल्टर स्कॉट के उपन्यासों से ऐतिहासिक उपन्यासों का प्रारंभ माना जाता है।

विवेचन: 
मृगनयनी वृंदावन लाल वर्मा की प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति है। यह उपन्यास ग्वालियर राज्य के प्रतापी राजा मानसिंह तोमर एवं गुजरी रानी मृगनयनी की प्रेम कथा का चित्रण करता है। तत्कालीन ग्वालियर रियासत एवं ऐतिहासिक परिस्थितियों का समीचीन विवरण मिलता है। यदि कथासार पर ध्यान आकृष्ट किया जाए तो निम्मी अपने भाई अटल एवं सखी राखी के साथ राई नामक ग्राम में रहते हैं। दिल्ली के तख्त पर गयासुद्दीन खिलजी का साम्राज्य स्थापित था। निम्मी एवं राखी के सौंदर्य की चर्चा चतुर्दिक फैली हुई है। नटो के सरदार के माध्यम से खिलजी राखी एवं निम्मी को दिल्ली लाने की योजना तैयार कर रहे थे किंतु मान सिंह एवं निम्मी की अकस्मात भेंट के फल स्वरुप दोनों का विवाह हो गया। विवाह पश्चात राजा तोमर सिंह की सबसे बड़ी रानी सुमनमोहिनी का व्यवहार मृगनैनी के प्रति उदात्त नहीं था। परिवार के एकीकरण के लिए मृगनयनी ने सुमनमोहिनी के ज्येष्ठ पुत्र विक्रम सिंह को राज्य अधिकारी बनाया एवं आजीवन राजा को कर्तव्य पथ की ओर अग्रसर करती रही। इतिहास साक्षी है कि राजा मानसिंह तोमर ने चित्रकला,संगीत कला,मूर्तिकला एवं भवन निर्माण कला का समुचित विकास तत्कालीन परिवेश में किया। लाखी अहीर एवं अटल गुर्जर था। ग्रामवासियों ने उनके विवाह का विरोध किया। राजा मानसिंह तोमर ने उन्हें ग्वालियर में लाकर उनका विवाह संपन्न कराया।

उपर्युक्त कथानक से यह ज्ञातव्य है कि मुख्य कथानक एवं उप कथानक में पारिवारिक प्रेम एवं मूल्यों पर जोर दिया गया है। नायिका नायक के साथ एक ऐसे वातावरण को निर्मित करती हैं जिसमें परिवार के प्रत्येक पात्र को एक साथ जोड़ कर रख सके।

भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिंतक, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत,  सार्वदेशिक दृष्टि एवं घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के महान पुरुष सांकृत्यायन द्वारा रचित मधुर स्वप्न एक ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें 492 से 529 ईसवी का मध्य एशियाई क्षेत्र का वर्णन मिलता है। राज परिवार पर चित्रित होने के कारण कालबद्ध कहानी के रूप में राजगद्दी पर बैठना, पदच्युत होना एवं मित्र देश भाग जाना, पुनः राजगद्दी पाना दिखाया जाता है किंतु यह भाग गौण है।

उपन्यास एवं इसके पात्र ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। उपन्यास में समकालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं भौगोलिक स्थिति का वास्तविक दृश्य देखने को मिलता है। धर्म एवं अध्यात्म पर चर्चा की गई है। प्लेटो, अरस्तु एवं बुद्ध के किरदारों से सामाजिक व्यवस्था का प्रतिपादन एवं नए धर्म से विषमता से समता की ओर समाज को प्रेरित करने का प्रयास किया गया है। परिवार समाज की एक इकाई है मनुष्य अपने धर्म का अनुपालन करके ही आपसी संबंधों को प्रगाढ़ कर सकता है।

राहुल सांकृत्यायन के जीवन का मूल मंत्र ही घुमक्कड़ी यानी गतिशीलता रहा है हिंदी साहित्य में राहुल सांकृत्यायन इतिहासविद् व युग परिवर्तनकार के रूप में जाने जाते हैं। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिंदी साहित्य में युगांतरकारी माना जाता है।

चीवर भारत के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव द्वारा रचित है। इस कृति में हर्षवर्धन काल के पतनशील भारतीय सामंतवाद को रेखांकित किया गया है। राजनीतिक सत्ता के संदर्भ में होने वाले परस्पर संघर्ष चित्रित है। प्रवाहमान, तत्सम भाषा में रस की सर्जना कर राज्यश्री या हर्षवर्धन के पात्र को उन्होंने पाठकों की स्मृति पर अंकित कर दिया। राज्यश्री हर्षवर्धन की भगिनी का विवाह कन्नौज के शासक गृहणबमन से हुआ था। गृहर्वमन के वध के पश्चात राज्यश्री को बंदी बना लिया गया। राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद हर्षवर्धन राज्यश्री के कनिष्ठ अग्रज उत्तराधिकारी बन चुके थे। राज्यश्री कारागार से भागकर विंध्याचल के जंगलों में पहुँची। अंततः हर्षवर्धन ने उन्हें ढूंढ निकाला जब वह निराश होकर चिता में प्रवेश करने वाली थी। आजीवन राज्यश्री का सम्मान किया गया। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार हर्षवर्धन राज्यश्री से राज्य कार्य में परामर्श लेते थे। चीवर हर्षवर्धन काल की राजनीतिक स्थितियों के साथ-साथ पारिवारिक मूल्यों में भारतीय संस्कृति के उदार एवं आदर्श तत्वों को प्रतिष्ठित करती है।

अमिता ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में कल्पना को आधार बनाकर लिखा गया उपन्यास है। इस उपन्यास के प्रथम में यशपाल स्वयं उसके मूल मंत्र की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि 'विश्व शांति के प्रयत्नों में सहयोग देने के लिए मुझे भी 3 वर्ष में दो बार यूरोप जाना पड़ा। स्वभाविक था कि इस समय 1954 से 1956 में लिखे मेरे उपन्यास में मुद्दों द्वारा लक्ष्यों को प्राप्त करने अथवा समस्याओं को समझने की नीति की विफलता का विचार कहानी का मेरुदंड बन गया है।' कलिंग पर अशोक के आक्रमण की घटना में परिवर्तन करके यशपाल ने इस उपन्यास का केंद्र कलिंग की बालिका राजकुमारी अमिता को बनाया है। उपन्यास के माध्यम से यह संदेश युद्ध त्रस्त संसार को देना चाहते हैं। उन्हीं के शब्दों में 'मनुष्य ने अपने अनुभव और विकास से शांति की रक्षा का अधिक विश्वास योग्य उपाय खोज लिया है। यह सत्य बहुत सरल है। मनुष्य अंतर्राष्ट्रीय रूप से दूसरों की भावना एवं सदिच्छा पर विश्वास करें दूसरों के लिए भी अपने समान ही जीवित रहने और आत्म निर्णय से सह अस्तित्व के अधिकार को स्वीकार करें। सभी राष्ट्र और समाज अपने राष्ट्रों की सीमाओं में अपने सिद्धांतों और विश्वास   के अनुसार व्यवस्था रखने में स्वतंत्र जीवन में समृद्धि और संतोष पाने का मार्ग अपनी शक्ति को उत्पादन में लगाना है, दूसरों को डराकर और मार कर छीन लेने की इच्छा करना नहीं है।"

जिस समय अशोक ने कलिंग को अपने साम्राज्य में समेट लेने के लिए प्रथम आक्रमण किया थ। कलिंग राजा करवेल को राज सिंहासन पर आरूढ़ हुए 8 वर्ष बीत चुके थे पर वे निःसंतान थे। महारानी भी निःसंतान होने के कारण दुखी थी। अशोक के आक्रमण से एक वर्ष पूर्व महारानी नंदिनी कलिंग नगर में आए योगी बौद्ध शिविर की सिद्धि की प्रशंसा सुनी थी। उन्होंने अपने लिए उपाय की प्रार्थना की। परिणाम स्वरूप उनके आशीर्वाद से रानी ने गर्भधारण किया। महारानी नंदा ने प्रथम संतान राजकुमारी को जन्म दिया। राज ज्योतिषी ने महाराज के विजय अभियान मुहूर्त में राजकुमारी के अमित अक्षय वैभव और प्रतापी होने की भविष्यवाणी की थी। ज्योतिषी की गणना के अनुसार राजकुमारी के अमित वैभव और पराक्रम की स्वामिनी होने के विश्वास में राजकुमारी का नाम अमिता रखा गया था।

परिवार समाज की सबसे आधारभूत इकाई रही है। मानव जाति के आत्म संरक्षण एवं वंश वर्धन को बनाए रखने में प्रमुख साधन है। मनुष्य नश्वर है परंतु मानव जाति अमर है। मृत्यु और अमृत दो विरोधी वस्तुएँ हैं किंतु परिवार इन दोनों का समन्वय है। परिवार इससे भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर जहाँ उसमें थकी हुई पीढ़ी आश्रय लेती है,  वहीं वह भावी पीढ़ी का निर्माता भी है। परिवार में ही भूत वर्तमान और भविष्य का साकार रूप निश्चित होता है। जीवन को उत्कर्ष की ओर ले जाने के लिए अर्थात उसे सही अर्थों में प्रगतिगामी बनाने के लिए मूल्यों की आवश्यकता का अनुभव किया गया। इस संबंध में डॉ हुकुमचंद का मत दृष्टव्य है। जीवन को सम्यक एवं संयमित ढंग से चलाने के लिए विचारकों ने ऐसा अनुभव किया कि जीवन के लिए कुछ मापदंड रहना चाहिए। उन्हीं के आधार पर कुछ कसौटियाँ बनाई गई है। ये कसौटियाँ या मान्यताएँ मूल्य हैं। मूल्य की स्थिति वस्तु की तरह दृश्य नहीं है। जिस प्रकार वस्तु को देखा जा सकता है उस तरह से मूल्य को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता, चेतना के स्तर पर उसका अनुभव किया जा सकता है। इस प्रकार मूल्य दृश्य नहीं है किंतु उसके यथार्थ पर अनुमान या धारणा के माध्यम से पहुँचा जा सकता है इसलिए डॉक्टर जगदीश गुप्त के मत को स्वीकार करना युक्तिसंगत होगा कि मूल्य अपने आप में धारणा है जिसका निर्धारण मनुष्य की चेतना करती है तो यह भी स्पष्ट हो जाता है कि चेतना और धारणा की तरह मूल्य भी चेतना की धारणा का परिणाम है, अतः अमूर्त ही है। अमूर्त को शब्दों में बांधना कठिन होता है। अतः कहा जाता है कि मूल्य एक ऐसी वस्तु है जिसको पूरी तरह से परिभाषित नहीं किया जा सकता। वस्तु का मूल्य प्रकृति पर आधारित है। व्यक्ति से ही मूल्य दिशागामी होते हैं क्योंकि मनुष्य वह इकाई है जिससे विश्व और समाज का निर्माण हुआ है। अस्तु जीवन की सार्थकता मानव मूल्यों को स्वीकारने में ही निहित है। इस दृष्टि से उन्हें ही जीवन में मूल्य माना जाना चाहिए जिससे मानव का उत्कर्ष संभव हो अर्थात जीवन उत्कर्ष के लिए मूल्य अनिवार्य है। ऐतिहासिक उपन्यास में इतिहास दृष्टि, इतिहास का ऐतिहासिक महत्व एवं मूल्यांकन पर विवेचन विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है इसके साथ ही साथ समकालीन पारिवारिक मूल्य भी दृष्टिगत होते हैं।

उपन्यास का आधार जीवन की वास्तविक घटनाओं पर आधारित हो सकता है किंतु कुछ अन्य तत्वों का समावेश आवश्यक रूप से होता है। वह आवश्यक तत्व है उपन्यासकार का स्वभाव विशेष और जीवन को देखने की उसकी अपनी दृष्टि तथा साक्षी भूत घटनाओं को प्रभावित भी करता है। उपन्यास सत्य में स्वप्न को,वास्तव में कल्पना मिलाकर, आदर्श का सामंजस्य स्थापित कर, वर्तमान पर भविष्य का रंग चढ़ा कर जीवन का वह रूप पेश करता है जो जीवन से मिलता-जुलता है। उपन्यास अपने अभिनव शिल्प वैशिष्ट्य के कारण प्रसिद्ध है। जीवन की विविध परिस्थितियों, संघर्ष में जटिलताओं, भावात्मक प्रतिक्रिया एवं संभावनाओं का सफल उद्घाटन एवं चित्रण ऐतिहासिक साहित्य में मिलता है।

1947 में भारतीय समाज को परतंत्रता के जीवन से मुक्ति मिली तथा आदमी को एक नई दिशा प्राप्त होने की आशा का अनुभव हुआ। अपने जीवन को दांव पर लगाकर जिस प्रकार भारतीयों ने अंग्रेजों से संघर्ष किया यह उनके आत्मविश्वास और प्राण उत्सर्ग का प्रमाण है। ऐसे समय में साहित्यकारों का दायित्व पड़ गया। वह अपनी अमर लेखनी से भारतीय शौर्य गाथाओं को प्रस्तुत करें साथ ही साथ पारिवारिक मूल्यों का महत्व भी निरूपित करें जो भारतीय संस्कृति की विशेषताओं से संबद्ध रहे हैं। प्रमुख ऐतिहासिक उपन्यासों की रचनाएँ हुई है जिनमें अतीत भारत की शौर्य गाथाएँ तो मिलती ही है एवं उनके परिवेश एवं पारिवारिक मूल्यों का चित्रांकन भी प्राप्त होता है। इन रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज को जहाँ एक ओर नव स्फूर्ति प्रदान करने का कार्य किया है वही जीवन मूल्यों को भी प्रतिष्ठित किया गया है। इन सभी रचनाओं में जहाँ एक और सांस्कृतिक गरिमा भारतीय जीवन की यशोगाथा मिलती है वहीं पारिवारिक मूल्यों का उल्लेख भी प्राप्त होता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची: 
1. अमिता- यशपाल, प्रकाशन केंद्र, दिल्ली
2. आधुनिक गद्य साहित्य - डॉ वाल्मीकि त्रिपाठी, गिरीश तिवारी (2005)
3. इतिहास की पृष्ठभूमि पर भूगोल- श्री प्रकाश शुक्ला
4. केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में प्रगतिशील चेतना: एक आलोचनात्मक अध्ययन -कुमारी प्रज्ञा शर्मा
5. चीवर - रांगेय राघव वाणी प्रकाशन, दिल्ली
6. मृगनयनी - वृंदावनलाल वर्मा (1950 )प्रभात प्रकाशन, दिल्ली
7. मधुर स्वप्न - राहुल सांकृत्यायन (1949) साहित्य प्रकाशन, दिल्ली
8. हिंदी उपन्यास:  उदय और उत्कर्ष - डॉ सत्यपाल चुघ, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली

पत्रिकाएँ: 
1. आजकल साहित्य और संस्कृति का मासिक अमृतलाल नागर पर केंद्रित  प्रकाशन विभाग
2. समकालीन भारतीय साहित्य

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