यात्रा संस्मरण: माँगने वालों का सम्मान

अजय जयहरि कीर्तिप्रद


स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़ा मैं काफी समय से गाड़ी के आने का इंतजार कर रहा था। किन्तु गाड़ी शायद लेट थी। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। मैं इस विचार मंथन में डूबा हुआ था कि गाड़ी में जगह मिलेगी भी या नहीं या हर बार की तरह मुझे जयपुर तक का सफर खड़े-खड़े ही तय करना पड़ेगा।

मैं होली की छुट्टियों मैं अपनी बड़ी दीदी के घर जयपुर जा रहा था। बाऊजी और दीदी ने कई बार मुझे समझाया था कि कहीं जाने से पूर्व गाड़ी की सीट का टिकट अवश्य बुक करवा लिया करूँ ताकि गाड़ी में सीट न मिलने की चिंता से छुटकारा पाया जा सकें। किन्तु मेरे कान पर जूँ कहाँ रेंगती। खैर छोड़ो! छोटा सा सफर है, बैठकर न सही खडे़-खड़े ही लोगों से दो चार चुलबुली बातें करके निकाल लेंगे। मैं विचार कर ही रहा था कि किसी ने चेताया, "भाईसाहब थोड़ा पटरियों से दूर हो जाईये, गाड़ी आ रही है।" मैं थोड़ा सकपकाया, फिर अपना सामान उठाकर गाड़ी की ओर भागा। गाड़ी रुकते ही गाड़ी में चढ़ने वालों व उतरने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा। गाड़ी का प्रत्येक डिब्बा ठसा ठस भरा पड़ा था। पैर रखने की भी जगह नहीं थी। खैर, सफर तो करना ही था, सो जैसे-तैसे मैं एक डिब्बे में घुसा और बैग को अपने सिर पर रखकर भीड़-भड़क्के में खुद के लिए थोड़ा ढंग से खड़े होने की जगह तलाशने लगा। थोड़ी कशमकश के बाद टिककर खड़े होने की जगह मिल ही गई। और बैग सिर से उताकर बगल वाली सीट के नीचे खिसका दिया और अखबार वाले से दो रुपये का अखबार लेकर आराम से पढ़ने लगा।

लोग अब भी सीटों पर बैठने और खड़े होने को लेकर आपस में झगड़ा कर रहे थे। किन्तु जैसे ही गाड़ी प्लेटफार्म से रवाना हुई धीरे-धीरे सबकुछ शांत हो गया। अचानक इसी भीड़ के बीच एक बच्चों का दल थोड़ी जगह बनाकर ट्रेन के अंदर अपने करतब दिखाने लगा। पाँच-छह साल की एक लड़की एक छोटी सी गोल रिंग में से बड़ी आसानी से अपने शरीर को अन्दर बाहर निकाल कर करतब दिखा रही थी। उसके कपड़े फटे-पुराने व मैले थे।  सभी यात्री उसका यह हैरतअंगेज कारनामा देख आश्चर्यचकित थे व तालियाँ पीट रहे थे। गले में एक सूथ की माला पहने, और अनसुलझे बालोंवाली वह लड़की बाद में नाच गाकर सबका मनोरंजन करने लगी थी। खेल-तमाशा समाप्त कर जब वह लड़की अपने हाथों को पैसा माँगने के लिए लोगों के सामने फैलाने लगी तो कुुुुुछ लोगों ने उसे तैश भरी नजरों से देखा और कुछ नज़रें चुराने लगे। एक व्यक्ति तो कुुुुछ देने के बजाय उस मासूम से कहने लगा, "पैसे क्या पेड़ पर लगते हैं जो तुम्हें दे दें? इसके लिए मेहनत करनी पड़ती है तब जाके पैसा मिलता है।"

मैं दूर से खड़ा खड़ा यह सब देख रहा था। मुझे लगा शायद यह करतब दिखाने वाला दल और यह लड़की काफी दिनों से भूखे है। मैं यह विचार कर ही रहा था; इतने में वह बच्ची मेरे सामने आ खड़ी हुई। मैंने अखबार एक तरफ रख उसके मासूम चेहरे को बड़े ध्यान से देखा और मुझे अपने बच्चे का चेहरा उसमें नजर आया। अगर मेरा अपना बच्चा मुझसे कुछ माँगता तो क्या मैं उसे मना कर पाता? ... बस यही सोचकर मैंने अपनी जेब से सौ रुपये का नोट निकाला और उसके सर पर हाथ फैरते हुये उसे दे दिया। बच्ची व खेल दिखाने वाले समस्त बच्चे बहुत खुश हुये। जिन व्यक्ति ने उन खेल दिखाने वाली बच्ची को भला बुरा कहा था वे मुझसे कहने लगे, "कहाँ भाईसाहब आप भी इनके मासूम चेहरों को देखकर इनकी बातों में आ गये। सब चोर हैं चोर। मुझसे भी न रहा गया, मैंने कहा, "हाँ अगर हमने उन्हें कुछ न दिया तो वे अवश्य चोरी ही करेंगे। उनके माता पिता भी फिर उनसे चोरियाँ ही करवायेंगे। औलाद को धरती पर बोझ मानेंगे; क्या काम करेंगे? चोरी, यह सोचकर, जन्म लेने से पहले ही मार देंगे या पैदा होने के बाद किसी गढ्डे में फैंक देंगे। किन्तु अगर आज हम इनको कुछ देगें तो इनके गरीब माँ बाप इनको मारेंगे नहीं बल्कि हमें दुआएँ देगें। और कहेंगे जिन्होंने इनको दिया भगवान उनको बहुत कुछ दे। हम पर आया दुःख भी टल जायेगा।" मेरी यह बात सुनकर उन्हें अपनी बात पर पछतावा हुआ। वहाँ बैठे एक वृद्ध ने मेरी पीठ थपथपाई। इसके बाद ट्रेन के उस डिब्बे में बैठे प्रत्येक व्यक्ति ने उन बच्चों को कुछ न कुछ दिया। हाँ, शायद! कुछ देते वक्त उन सबके अन्तर्मन से एक ही आवाज निकल रही होगी,  कि "माँगने वालों का सम्मान" होना ही चाहिए। मैं वापस अखबार पढ़ने में मगन हो गया। सफर कब पूरा हुआ कुछ पता ही नहीं चला।

रामगंजमंडी (कोटा); चलभाष: +91 820 980 9358

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