सामाजिक जीवन-दर्शन और चिंतामणि की व्यापकता

अमित कुमार राय (JRF)

कुछ पत्र – पत्रिकाओं में लेख और कविताएँ संकलित। वर्तमान में हिन्दी विभाग, राँची विश्वविद्यालय राँची से डॉ. हीरा नन्दन प्रसाद के निर्देशन में ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल की चिंतामणि (भाग-1) का सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण विषय पर शोध कार्य (पीएच. डी)।

भारतीय वाड्मय अपनी स्थिति के लिए विश्वविख्यात है और इस विश्व पटल पर भारतीय साहित्य में एक से बढ़कर एक ऐसे साहित्यिक धुरंधर हुए हैं जिनकी चेतना की आभा से चारों दिशाएँ जगमगा रही हैं। उनके इस आलोक सम्पन्न प्रभाव से एक ओर तो लोग नवीन जीवन-दृष्टि पा लेते हैं, तो दूसरी ओर उसमें निमग्न होकर आनन्द के उस लोक में पहुँच जाते हैं जहाँ जगत के प्रत्येक चराचर प्राणियों के साथ उनका सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित हो सकता है। वे अपने ज्ञान की वचनावली से मनुष्य के सामान्य हृदय में रागात्मक संबंध उत्पन्न करने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे साहित्य मनीषियों का जीवन ही परम साधना है जो लोक में फैली हुई कालिमा को हटाने के लिए ऐसा नूतन निर्माण करते हैं, जिसमें मनुष्य ही नहीं, अपितु समस्त प्राणी अपना ठीक-ठीक निर्वाह कर सकें।

साहित्य की भाव धारा का मूलाधार लोक है और लोक की भाव धारा का मूलाधार साहित्य। इस प्रकार इन दोनों का संबंध अन्योन्याश्रित ठहरा। अतः इस भाव धारा में जो साहित्यान्वेषी स्वयं को निमज्जित करके नाना प्रकार के रत्न लाते हैं, वे धन्य हैं और उनका जीवन सार्थक है। किन्तु इस लोक की सामान्य भाव भूमि पर सर्वमान्य व्याख्या दे देना, असाधारण मनीषा का कार्य है। ऐसा कार्य सबके बूते की बात नहीं। ऐसी नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा का उदय हिन्दी साहित्येतिहास के आधुनिक काल में आचार्य प्रवर रामचंद्र शुक्ल के रूप में प्रकट हुई। उनके द्वारा रचित ‘चिंतामणि’ (भाग-1) हिन्दी साहित्य की अन्यतम कृति है जिसमें भाव सम्बन्धी विषयों पर उनके गम्भीरातिगम्भीर चिंतन सर्वमान्य हैं। आचार्य शुक्ल का निबंध-संग्रह पहले पहल ‘विचारवीथी’ नाम से सन 1930 में प्रकाशित हुआ, किन्तु नाम-संक्षेप के कारण वह परिष्कृत और परिवर्धित हो कर ‘चिंतामणि’ के रूप में प्रकाशित हुआ। ‘विचारवीथी’ अथवा ‘चिंतामणि’ के भाव सम्बन्धी निबंध सन 1912 से सन 1918 तक नागरी प्रचारिणी पत्रिका में धारा प्रवाह ‘मनोविकारों का विकास’ शीर्षक से प्रकाशित हुए। 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मनोविकार सम्बन्धी निबंधों में विषय का प्रसार मनोविज्ञान की परिपाटी के अनुसार नहीं किया, अपितु उस विषय की अनुभूति, अध्ययन और प्रेरणा के फलस्वरूप किया है। इन निबंधों के प्रणयन में उनकी दृष्टि मूलतः जीवन और साहित्य पर ही केंद्रित रही, मनोविज्ञान के सैद्धांतिक अनुसंधान पर नहीं। शुक्ल जी ने अपने ज्ञान में अपनी अनुभूति का संयोग कर साहित्य, समाज और मानव जीवन की तत्कालीन समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न करने के साथ-साथ भविष्य पर भी दृष्टि रखकर उसे नवीन ऊर्जा देने का काम किया है। उन्होंने इन निबंधों की रचना में भावों के साथ नव रस के परिपाक को मिलाकर लोक व्यावहारिक जीवन की आधार-भूमि तैयार की है।

मनुष्य के भीतर की दुनिया और मनुष्य के बाहर की दुनिया में कितना विशाल अन्तर है, इससे शुक्ल जी पूर्ण परिचित थे। इस प्रकार ‘चिंतामणि’ के सृजन में बाहरी और भीतरी दुनिया को समेट कर एक साथ रखने का प्रयास किया गया है और वह भी सकारण। ‘चिंतामणि’ को विशिष्ट प्रसंग में उद्धृत करते हुए मूर्धन्य मार्क्सवादी समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है, “चिंतामणि में शुक्ल जी के दस निबंध ऐसे हैं जिनका संबंध मुख्यतः मनोविज्ञान से है। ये निबंध शुक्ल जी के साहित्यालोचन का मनोवैज्ञानिक आधार स्पष्ट करते हैं।... शुक्ल जी की आलोचना पद्धति न तो रीतिशास्त्रों का अनुसरण करती है, न पश्चिम के काव्यशास्त्र का। इसलिए मनोविज्ञान के बारे में उनकी स्थापनाएँ और भी दिलचस्प हो जाती हैं। इनमें न तो शुक्ल जी ने रीतिशास्त्र के भाव-विवेचन को अपना आधार बनाया, न पश्चिम के मनोविज्ञान को। उनकी स्थापनाएँ मौलिक हैं और न केवल साहित्य शास्त्र को, वरन मनोविज्ञान और समाजशास्त्र को भी महत्त्वपूर्ण देन हैं।”1

‘चिंतामणि’ के सभी निबंध विचार-प्रधान हैं, इसलिए इन निबंधों में हृदय-तत्व की अपेक्षा बुद्धि-तत्व को अधिक अवकाश मिला है। फिर भी इन निबंधों में ऐसे बहुत से स्थल हैं, जिन्हें हम मार्मिक या भावाकर्षक कह सकते हैं। इस संबंध में स्वयं शुक्ल जी ने कहा है, “यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि, पर हृदय को भी साथ लेकर। अपना रास्ता निकलती हुई बुद्धि जहाँ कहीं मार्मिक या भावाकर्षक स्थलों पर पहुँची है, वहाँ हृदय थोड़ा-बहुत रमता और अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कुछ कहता गया है। इस प्रकार यात्रा के श्रम का परिहार होता रहा है। बुद्धि-पथ पर हृदय भी अपने लिए कुछ-न-कुछ पाता रहा है।”2

हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल में निबन्ध लेखन की परम्परा के साथ ही मनोविकारों पर भी निबंध लिखे जाने लगे। हिन्दी के आधुनिक निबंध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘खुशी’ शीर्षक से एक लम्बा निबंध लिखा, जो सहज उर्दू भाषा में था, किन्तु लिपि देवनागरी थी। आगे चलकर पंडित बालकृष्ण भट्ट ने ‘प्रीति’, ‘सहानुभूति’, ‘आत्मनिर्भरता’, ‘भक्ति’ जैसे निबंध लिखे। प्रताप नारायण मिश्र ने ‘मनोयोग’, माधव प्रसाद मिश्र ने ‘धृति’, और ‘क्षमा’ तथा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘क्रोध’ और ‘लोभ’ नाम से मनोभाव सम्बन्धी निबंधों का प्रणयन किया। किन्तु इन सभी निबंधों का वैचारिक स्तर अत्यन्त ही न्यून था और विषय-प्रतिपादन भी बहुत सतही तथा लेखन-दृष्टि भी नीति-धर्म से जुड़ी उपदेशात्मक थी। किन्तु इसके विपरीत आचार्य शुक्ल के मनोविकार सम्बन्धी निबंधों का इस धारा में विशेष महत्व एवं स्थान है। उनकी महत्ता और विशिष्टता का सबसे बड़ा कारण यह है कि उनके ये निबंध साहित्य, समाज और मनोवैज्ञानिक अनुसंधान से समन्वित और प्रस्तुत विषय के गूढ़ चिंतन-मनन से परिपुष्ट है। उन्हें पढ़कर सहज ही यह समझ में आ जाता है कि ये भावानुभूति-विषयक निबंध किसी तत्वान्वेषी परम विद्वान, बृहद जीवनानुभव से परिपूर्ण प्रतिभाशाली कृतिकार की गूढ़-गंभीर, किन्तु सरस सृष्टि है।

‘चिंतामणि’ का पहला निबंध मनोभावों के सैद्धांतिक पक्ष को को उद्घाटित करता है। शुक्ल जी रसवादी परम्परा के आचार्य हैं। अतः उनकी वृत्तियां रस से सम्बन्धित भावों में अतिशय निमग्न हुई हैं। भाव या मनोविकार स्वयं में एक व्यापक और जटिल शब्द है और अपने अनुसंधान के लिए गंभीर वैचारिकता की अपेक्षा रखता है। अपने गम्भीर चिंतन-सिंधु के आलोड़न-विलोड़न के उपरांत शुक्ल जी अपना मत स्थिर करते हुए भावों की प्रविष्टि को किस प्रकार से लोक जीवन में दिखाते हैं जिनका सदुपयोग भी है और दुरुपयोग भी, “समस्त मानव जीवन के प्रवर्तक भाव या मनोविकार ही होते हैं। मनुष्य की प्रवृत्तियों के तह में अनेक प्रकार के भाव ही प्रेरक के रूप में पाये जाते हैं। शील या चरित्र का मूल भी भावों के विशेष प्रकार के संगठन में ही समझना चाहिए। ... जिस प्रकार लोक-कल्याण के व्यापक उद्देश्य की सिद्धि के लिए मनुष्य के मनोविकार काम में लाये गये हैं उसी प्रकार किसी सम्प्रदाय या संस्था के संकुचित और परिमित विधान की सफलता के लिए भी।”3

ध्यान देने से यह बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाती है कि ‘चिंतामणि’ का पहला निबंध ‘भाव’ या ‘मनोविकार’ मनोभाव सम्बन्धी निबंधों की भूमिका के रूप में हमारे सामने आता है। इन भावों के सामाजिक रूप की व्याख्या शुक्ल जी का प्रतिपाद्य विषय है। वे निबंध के सर्वाधिक सजग लेखक हैं। इसलिए जीवन, समाज तथा साहित्य में किसी भाव का कौन - सा स्वरूप उचित है, कौन-सा अनुचित; कौन स्वरूप रसान्तर्गत है, कौन-सा रसाभास के अन्तर्गत; किसी मनोभाव का कौन स्वरूप लोक मंगल का संस्थापक है तथा कौन स्वरूप मानसिक रोग के रूप में है जो जीवन संतुलन को खंडित कर देता है-आदि बातों की विवेचना इन निबंधों में बड़े जोरदार तरीके से की गई हैं।

कार्य के आरम्भ में ‘उत्साह’ का स्वरूप तीन श्रेणियों में विभाजित करके उसके लौकिक विधान का मानवोपयोगी पक्ष सामने रखते हुए कर्म और फल दोनों का जुड़ाव मानव के चेतना-सम्पन्न हृदय से इस प्रकार करते हैं जिसमें किसी को आगा-पीछा नहीं हो सकता है, “उत्साह वास्तव में कर्म और फल की मिली-जुली अनुभूति है जिसकी प्रेरणा से तत्परता आती है। यदि फल दूर ही पर दिखाई पड़े, उसकी भावना के साथ ही उसका लेशमात्र भी कर्म या प्रयत्न के साथ लगाव न मालूम हो तो हमारे हाथ-पाँव कभी न उठें और उस फल के साथ हमारा संयोग ही न हो। इससे कर्म श्रृंखला की पहली कड़ी पकड़ते ही फल के आनन्द की भी कुछ अनुभूति होने लगती है। यदि हमें निश्चय हो जाए कि अमुक स्थान पर जाने से हमें किसी प्रिय व्यक्ति का दर्शन होगा तो उस निश्चय के प्रभाव से हमारी यात्रा भी अत्यंत प्रिय हो जाएगी। हम चल पड़ेंगे और हमारे अंगों की प्रत्येक गति में प्रफुल्लता दिखाई देगी। यही प्रफुल्लता कठिन-से-कठिन कर्मों के साधन में भी देखी जाती है। वे कर्म भी प्रिय हो जाते हैं और अच्छे लगने लगते हैं।”4

समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो कर्म से तो अधिकाधिक दूर रहना चाहते हैं पर फल के अधिक समीप। वे कर्म को भार स्वरूप और फल को सर्वाधिक अनुकूल या महत्त्वपूर्ण समझते हैं। ऐसे लोगों की इस स्थिति के उपचार हेतु शुक्ल जी एक कर्मोपासक की भांति स्पष्ट लिखते हैं, “आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है। कर्म सामने उपस्थित रहता है, इससे आसक्ति उसी में चाहिये। फल दूर रखता है, इससे उसकी ओर कर्म का लक्ष्य काफी है। जिस आनन्द से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनन्द कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है।”5

शुक्ल जी ने भावों को सुखात्मक और दुखात्मक दो श्रेणियों में बाँटा है। ‘उत्साह’, ‘श्रद्धा-भक्ति’, ‘लोभ-प्रीति’ को उन्होंने सुखात्मक तथा ‘करुणा’, ‘लज्जा-ग्लानि’, ‘घृणा’, ‘ईर्ष्या’, ‘भय’, ‘क्रोध’ को दुःखात्मक श्रेणी में रखा है। श्रद्धा किसी व्यक्ति के प्रति विशेष गुण व शक्ति के प्रभाव से दूसरे के हृदय में उत्पन्न होती है और उसके क्रियमाण रूप को देखकर बढ़ती ही चली जाती है। यही रूप समाज को एक-दूसरे से जोड़े रखता है जिससे दूसरों पर श्रद्धा करके हम अपने कार्य को सुगम बनाते हैं। समाज के हृदय-गति की शुक्ल जी को कितनी गम्भीर परख है और सामाजिक व्यवस्था के ढांचे को स्वाभाविक रूप में किस प्रकार कर्म और श्रद्धा के परस्पर मेल से हमारे सामने लाते हैं - “कर्ता से बढ़कर कर्म का स्मारक दूसरा नहीं। कर्म की क्षमता प्राप्त करने के लिए बार-बार कर्ता ही की ओर आँख उठती है। कर्मों से कर्ता की स्थिति को जो मनोहरता प्राप्त हो जाती है उस पर मुग्ध होकर बहुत से प्राणी उन कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं। कर्ता अपने सत्कर्म द्वारा एक विस्तृत क्षेत्र में मनुष्य की सद्वृत्तियों के आकर्षण का एक शक्ति केन्द्र हो जाता है। जिस समाज में किसी ऐसे ज्योतिषमान शक्ति केन्द्र का उदय होता है उस समाज में भिन्न-भिन्न हृदयों से शुभ भावनायें मेघ-खण्डों के समान उठकर तथा एक ओर और एक साथ अग्रसर होने के कारण परस्पर मिलकर, इतनी घनी हो जाती हैं कि उनकी घटा-सी उमड़ पड़ती है और मंगल की ऐसी वर्षा होती है कि कि सारे दुःख और क्लेश बह जाते हैं।”6 इस प्रकार की भाव-संपृक्त वाक्य योजना चिंतामणि के अतिरिक्त और कहीं नहीं मिलेगी।

सामाजिक और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा ‘चिंतामणि’ की पहली शर्त है और सामाजिक महत्त्व के लिए श्रद्धा आवश्यक है। चाहे किसी के हम श्रद्धेय हो जायें या कोई हमारा श्रद्धेय हो जाये। श्रद्धा के विस्तृत व्यापार भूमि के दर्शन से स्पष्ट हो जाता है कि इसका अधिकारी समस्त मनुष्य जाति है, कतिपय या सम्मानीय लोगों तक ही उसकी पहुँच नहीं। श्रद्धा जन जागरण की भावना है जो समाज में रहने वाले जन-समूह के चेतना की सूचक है। इस जन-समूह की चेतना का परिदृश्य इतना विशाल है कि यह किसी से छिपा नहीं है - “श्रद्धा एक ऐसी आनन्दपूर्ण कृतज्ञता है जिसे हम केवल समाज के प्रतिनिधि के रूप में प्रकट करते हैं। सदाचार पर श्रद्धा और अत्याचार पर क्रोध या घृणा प्रकट करने के लिए समाज ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिनिधित्व प्रदान कर रखा है। यह काम उसने इतना भारी समझा है कि उसका भार सारे मनुष्यों में बांट दिया है, दो-चार माननीय लोगों के ही सिर पर नहीं रख छोड़ा है। जिस समाज में सदाचार पर श्रद्धा और अत्याचार पर क्रोध प्रकट करने के लिए जितने ही अधिक लोग तत्पर पाए जाएँगे, उतना ही वह समाज जाग्रत समझा जाएगा।”7

मनुष्य जिसकी निकटता की सर्वाधिक आकांक्षा रखता है उसके लिए वह अपनी बहुत सी क्रियाओं को नियमित करना चाहता है। वह चाहता है कि अभीष्ट जैसा चाहे, वैसा मैं हो जाऊँ। वह अपने प्रिय के नैकट्य-सुख के लिए बहुत सारी बुराइयों की तिलांजलि देता है और अच्छाइयों की स्थापना स्वयं में करना चाहता है। इस स्वरूप को शुक्ल जी ने ‘भक्ति’ के अन्तर्गत रखते हुए उसे लौकिकता प्रदान की है, “भक्ति में किसी ऐसे सान्निध्य की प्रवृत्ति होती है जिसके द्वारा हमारी महत्व के अनुकूल गति का प्रसार और प्रतिकूल गति का संकोच होता है। इस प्रकार का सामीप्य-लाभ करके हम अपने ऊपर पहरा बिठा देते हैं-अपने को ऐसे स्वच्छ आदर्श के सामने रख देते हैं जिससे हमारे कर्मों का प्रतिबिंब ठीक-ठीक दिखाई पड़ता है।”8

संचारी भावों में ‘लज्जा और ग्लानि’ को लेकर शुक्ल जी सामाजिक व्यवस्था की पुष्टि और प्रसार का स्वरूप निर्धारित करते हैं। लज्जा अपने दोष या त्रुटि के कारण नहीं होती,  अपितु दूसरे के निश्चय या अनुमान से होती है। पर ग्लानि इसके उलट होती है। ग्लानि के लिए क्षुद्रता, तुच्छता, बुराई आदि बातों का एकांत अनुभव आवश्यक है। शुक्ल जी इसे अन्तःकरण के शोधन का एक महत्वपूर्ण तरीका मानते हैं। इसीलिए जिसे ग्लानि हो गयी, उसके सुधरने की संभावना सर्वाधिक है, “ग्लानि में अपनी बुराई तुच्छता आदि के अनुभव से जो संताप होता है वह अकेले में भी होता है और दस आदमियों के सामने भी प्रकट किया जाता है। ग्लानि अंतःकरण की शुद्धि का एक विधान है। उससे इसके उद्गार में अपने दोष, अपराध, तुच्छता, बुराई इत्यादि का लोग दुख से या सुख के कथन से ही भी अनुभव करते हैं-उनमें दुराव या छिपाव की प्रवृत्ति नहीं रहती है। अपने दोष का अनुभव, अपने अपराध का स्वीकार, आन्तरिक अस्वस्थता का उपचार तथा सच्चे सुधार का द्वार है। ‘हम बुरे हैं’ जब तक यह न समझेंगे तब तक अच्छे नहीं हो सकते।”9 पर इतने ही से मनुष्य का काम नहीं चलता। वह सामाजिक प्राणी होने के साथ-साथ एक चालाक प्राणी भी है। वह अपनी दुष्प्रवृत्तियों का अनुभव करते हुए भी लोक से उसे छिपा कर समाज को धोखा देना चाहता है। पर उसकी यह सफलता निरापद नहीं। वास्तव में वह समाज को कम और स्वयं को अधिकाधिक धोखा देता है जिसका परिणाम नाना रूपों में उसके सामने आता है। इसीलिए मनुष्य को स्वदोषों के प्रति सतर्क रहना चाहिए और उसे अपने अन्तःकरण से निकाल फेंकना चाहिए, “दूसरों को हम अच्छे नहीं लगते, यह समझकर हम लज्जित होते हैं। अतः औरों को अच्छी न लगने वाली अपनी बातों को केवल उनकी दृष्टि से दूर रखकर ही बहुत से लोग न लज्जित होते हैं, न निर्लज्ज कहलाते हैं। दूसरों के हृदय में अज्ञान की प्रतिष्ठा करके वे उसकी शरण में जाते हैं। पर अज्ञान, चाहे अपना हो चाहे पराया, सब दिन रक्षा नहीं कर सकता। बलि-पशु होकर ही हम उसके आश्रय में पलते हैं। जीवन के किसी अंग की यदि वह रक्षा करता है तो सर्वांग भक्षण के लिए। अज्ञान अन्धकार स्वरूप है। दीया बुझाकर भागने वाला यदि समझता है कि उसे दूसरे देख नहीं सकते, तो उसे यह भी समझ रखना चाहिए कि वह ठोकर खाकर गिर भी सकता है।”10

‘लोभ और प्रीति’ निबंध ‘श्रद्धा और भक्ति’ की ही भाँति विस्तृत और विवेचनात्मक है। इस निबंध में उनका हृदय उनकी बुद्धि का अधिकाधिक साथ पकड़े हुए है। लोभ और प्रीति को समाज में प्रायः विरोधी ध्रुवों के रूप में देखा गया है। पर शुक्ल जी ने अपनी मौलिक स्थापनाओं के द्वारा यह दिखाया है कि किस प्रकार दोनों का उद्भव एक स्रोत से हुआ है। परस्पर तुलनात्मक दृष्टि से दोनों में कोई अन्तर नहीं है। शुक्ल जी के मानस-कोश से दोनों का स्वरूप एक जैसा जान पड़ता है, “पर मूल में लोभ और प्रेम दोनों एक ही हैं, इसका पता हमारी भाषा देती है।”11 फिर आगे चलकर वस्तु और व्यक्ति के आश्रय से प्रेम को लोभ से अलग करते हैं, “लोभ सामान्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख। कहीं कोई अच्छी चीज़ सुनकर दौड़ पड़ना लोभ है। किसी विशेष वस्तु पर इस प्रकार मुग्ध रहना कि उससे कितनी ही अच्छी-अच्छी वस्तुओं के सामने आने पर भी उस विशेष वस्तु से प्रवृत्ति न हटे, रुचि या प्रेम है।”12

एक समय ऐसा था जब समाज में वस्तु-विनिमय प्रणाली थी। हमारे पास जो वस्तु थी, उसे दूसरों को देकर हम उसके पास की उपलब्ध वस्तु ले सकते थे। उस समय वस्तुओं के मूल्य-निर्धारण की परम्पराएँ न थीं। किन्तु आगे चलकर इस सभ्य मानव-जाति के लिए वस्तु-विनिमय जंजाल का काम जान पड़ा। लोभ की इस वृहत्तर बुरी दशा का भान शुक्ल जी को है। किसी वस्तु के अच्छे लगने के साथ-साथ उससे संपर्क या सान्निध्य की आकांक्षा मनुष्य की जितनी ही प्रबल होगी, वह उतना ही लोभी माना जाएगा। पर रुपये के प्रभाव ने मनुष्य के अन्तःकरण को असंतोष से आप्लावित कर दिया और उसके लिए पैसा ही सब कुछ हो गया - “पर विनिमय की कठिनता दूर करने के लिए मनुष्यों ने कुछ धातुओं में सब आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करने का कृत्रिम गुण आरोपित किया जिससे मनुष्य मात्र की सांसारिक इच्छा और प्रयत्न का लक्ष्य एक हो गया, सबकी टक-टकी टके की ओर लग गयी।”13 शुक्ल जी अपने समाज और युग की समस्याओं से पीड़ित होने के साथ-साथ भविष्य में लोभ के विकराल स्वरूप की सूचना भी दे रहे थे।

देश-प्रेम के अन्तर्गत शुक्ल जी के हृदय के उद्गार नखरे हुए रूप में हमारे सामने आता है और साथ ही साथ उनके प्रकृति-प्रेम का स्वरूप भी दिखाई पड़ता है। राष्ट्र-प्रेम की ऐसी व्याख्या शायद ही कहीं देखने को मिले। मनुष्य जिस स्थान पर निवास करता है, उस स्थान से उसे स्वतः अनुराग हो जाता है। पर यह अनुराग साधारण नहीं है। बहुत काल से एक स्थान पर टिके रहने के कारण यह भावना उद्भूत होती है। उसे अपने आस-पास के लोगों, चराचर और प्रकृति सबसे लगाव होता है। देश-प्रेम मनुष्य का देश के प्रति चिर-संचित भावों का प्रबल निक्षेप है। यही बात शुक्ल जी देश-प्रेम के लिए कहते हैं। यदि ऐसी बात जहाँ नहीं है, वहाँ देश-प्रेम ढोंग है, पाखंड है, “यदि किसी को अपने देश से प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य, पशु, पक्षी, लता, गुल्म, पेड़, पत्ते, वन, पर्वत, नदी, निर्झर सबसे प्रेम होगा, सबको वह चाह भरी दृष्टि से देखेगा, सबकी सुध करके वह विदेश में आँसू बहाएगा। जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किस चिड़िया का नाम है, जो यह भी नहीं सुनते कि चातक कहाँ चिल्लाता है, जो आँख भर यह भी नहीं देखते कि आम प्रणय-सौरभपूर्ण मंजरियों से कैसे लदे हुए हैं, जो यह भी नहीं झांकते कि किसानों के झोपड़ों के भीतर क्या हो रहा है, वे यदि दस बने-ठने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का परता बता कर देश-प्रेम का दावा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि, ‘भाइयों ! बिना परिचय के यह प्रेम कैसा ? जिनके सुख-दुख के तुम कभी साथी न हुए उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो, यह समझते नहीं बनता। उनसे कोसों दूर बैठे-बैठे, पड़े-पड़े या खड़े-खड़े, तुम विलायती बोली में अर्थशास्त्र की दुहाई दिया करो, पर प्रेम का नाम उसके साथ न घसीटो। प्रेम हिसाब-किताब की बात नहीं है। हिसाब-किताब करने वाले भाड़े पर भी मिल सकते हैं पर प्रेम करने वाले नहीं। हिसाब-किताब से देश की दशा का ज्ञान मात्र हो सकता है। हित-चिंतन और हित-साधन की प्रवृत्ति इस ज्ञान से भिन्न है।”14

शुक्ल जी किसी समस्या का निदर्शन करके चुप रह जाने वालों में से नहीं हैं, अपितु उस समस्या की ओर खुली दृष्टि से देख कर उसका उपाय भी बताते हैं, “... जिनमें यह देश-प्रेम नहीं है उनमें वह किसी प्रकार हो भी सकता है?  हाँ, हो सकता है-परिचय से, सान्निध्य से।... यदि देश-प्रेम के लिए हृदय में जगह करनी है तो देश के स्वरूप से परिचित और अभ्यस्त हो जाओ। बाहर निकलो तो आँखें खोलकर देखो कि खेत कैसे लहलहा रहे हैं, नाले झाड़ियों के बीच कैसे बह रहे हैं, टेसू के फूलों से वनस्थली कैसे लाल हो रही है, चौपायों के झुंड चरते हैं, चरवाहे तान लड़ा रहे हैं, अमराइयों के बीच में गाँव झाँक रहे हैं।... इस प्रकार जब देश का रूप तुम्हारी आँखों में समा जाएगा; तुम उसके अंग-प्रत्यंग से परिचित हो जाओगे, तब तुम्हारे अन्तःकरण में इस इच्छा का उदय होगा कि वह हमसे कभी न छूटे; वह सदा हरा-भरा और फूला-फला रहे;उसके धन-धान्य की वृद्धि हो, उसके सब प्राणी सुखी रहें।”15

व्यक्तिगत सत्ता के आधार पर शुक्ल जी ने प्रेम को लोभ से अलग किया है। उन्होंने वस्तु के प्रति मन की ललक को लोभ और व्यक्ति के प्रति मन की ललक को प्रीति नाम दिया है। उन्होंने प्रेम के नाना स्वरूप की  चर्चा की है और दो हृदयों में उत्पन्न समान प्रेम को तुल्यानुराग की संज्ञा दी है। वे प्रेम की सफलता भी इसी में मानते हैं। किन्तु प्रेम को सामाजिक स्थिति में स्थापित करना लोकमंगल के लिए अधिक समीचीन मानते हैं, जो समाज के भीतर अपने कर्म स्वरूप को प्रदर्शित करे, “प्रेम का दूसरा रूप वह है जो अपना मधुर और रंजनकारी प्रकाश जीवन-यात्रा के नाना पथों पर फेंकता है। प्रेमी जगत के बीच अपने अस्तित्व की रमणीयता का अनुभव आप भी करता है और अपने प्रिय को भी कराना चाहता है। प्रेम के दिव्य प्रभाव से उसे अपने आसपास चारों ओर सौंदर्य की आभा फैली दिखाई पड़ती है, जिसके बीच वह बड़े उत्साह और प्रफुल्लता के साथ अपना कर्म-सौंदर्य प्रदर्शित करता है। वह प्रिय को अपने समग्र जीवन का सौंदर्य जगत के बीच दिखाना चाहता है।”16

भावों के सामाजिक मूल्य पर शुक्ल जी की गहन दृष्टि है। भाव की उपयुक्तता और अनुपयुक्तता की चर्चा जहाँ आवश्यक समझी, उन्होंने कर दी। एकान्तिक प्रेम को वे समाज के लिए उचित नहीं मानते। इसमें प्रेमी प्रिय-केंद्रित होकर रह जाता है और वह समाजोपयोगी नहीं ठहरता। किन्तु जो समाजोपयोगी ठहरा, उसकी उन्होंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है और प्रेम के उस स्वरूप को भगवद्भक्ति की सीमा में ले जाते हैं जहाँ मानव के कर्म-क्षेत्र में आनन्द ही आनन्द है, “… हम उस प्रेम का अधिक मान करते हैं जो संजीवन रस के रूप में प्रेमी के सारे जीवन-पथ को रमणीय और सुन्दर कर देता है, उसके सारे कर्म-क्षेत्र को अपनी ज्योति से जगमगा देता है। जो प्रेम जीवन की नीरसता हटाकर उसमें सरलता ला दे, वह प्रेम धन्य है। जिस प्रेम का रंजनकारी प्रभाव विद्वान की बुद्धि, कवि की प्रतिभा, चित्रकार की कला, उद्योगी की तत्परता, वीर के उत्साह तक बराबर फैली दिखाई दे, उसे हम भगवान का अनुग्रह समझते हैं। भगवद्भक्ति के लिए हम तो प्रेम की यही पद्धति समीचीन मानते हैं। जबकि प्रिय के संबंध से न जाने कितनी वस्तुएँ प्रिय हो जाती हैं तब उस परमप्रिय के संबंध से सारा जगत प्रिय हो सकता है।”17

प्रेमी अपने हृदय को प्रिय के हृदय से मिलाना चाहता है, वह एकीकृत होना चाहता है। पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि प्रेमी प्रिय को अत्यंत चाहता है पर प्रिय उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता या उसे तिरस्कृत करते जाता है। प्रीति दोनों पक्षों में बराबर हो या न हो, पर प्रेमी का प्रिय के प्रति एकपक्षीय अनुराग भी उसे विशुद्ध रूप में श्रेष्ठता प्रदान करता है, “प्रेमी तो प्रेम कर चुका, उसका कोई प्रभाव प्रिय पर पड़े या न पड़े। उसके प्रेम में कोई कसर नहीं। प्रिय यदि उससे प्रेम करके उसकी आत्मा को तुष्ट नहीं करता तो इसमें उसका क्या दोष ? तुष्टि का विधान न होने से प्रेम के स्वरूप की पूर्णता में कोई त्रुटि नहीं आ सकती। जहाँ तक ऐसे प्रेम के साथ तुष्टि की कामना या अतृप्ति का लोभ लगा दिखाई पड़ता है और वहाँ तक तो उसका उत्कर्ष प्रकट नहीं होता; पर जहाँ आत्म तुष्टि की वासना विरत हो जाती है या पहले ही से नहीं रहती, वहाँ प्रेम का अत्यंत निखरा हुआ निर्मल और विशुद्ध रूप दिखाई पड़ता है। ऐसे प्रेम की अविचल प्रतिष्ठा अत्यंत उच्च भूमि पर होती है जहाँ सामान्य हृदयों की पहुँच नहीं हो सकती। इस उच्च भूमि पर पहुँचा हुआ प्रेमी प्रिय से कुछ भी नहीं चाहता, केवल यही चाहता है-प्रिय से नहीं, ईश्वर से-कि हमारा प्रिय बना रहे और हमें ऐसा ही प्रिय रहे।”18

संसार-सागर में नाना मति के लोग हैं। जिन लोगों को दूसरों के कष्ट-क्रंदन से दुख होता है और उस दुख को दूर करने के लिए जो भाव उनके हृदय में सात्विकता के रूप में प्रस्फुटित होता है, उसे करुणा या दया के नाम से हम जानते हैं। पर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमें दूसरों के सुख या सम्पन्नता पर दुख होता है, जिसे ईर्ष्या कहते हैं। शुक्ल जी इसकी उत्पत्ति के सटीक कारण बताते हैं, “ईर्ष्या एक संकर भाव है जिसकी संप्राप्ति आलस्य, अभिमान और नैराश्य के योग से होती है। …किसी विषय में अपनी स्थिति को रक्षित रख सकने या समुन्नत कर सकने के निश्चय में अयोग्यता या आलस्य आदि के कारण कुछ कसर रहती है तभी इस इच्छा का उदय होता है।”19

समाज में निवसित लोग अपने वैचारिक साम्य के कारण परस्पर स्नेह-व्यवहार रखते हैं और इससे समाज का कल्याण भी होता है। इसी सामाजिक अवस्था के कारण, जहाँ लोग एक-दूसरे की स्थिति को ठीक ढंग से देख पाते हैं, ईर्ष्या जैसी बुरी वृत्ति का जन्म भी होता है। कुछ विशेष सम्पन्न दशा वाले लोगों के प्रति सामाजिक दृष्टि से तुलना होने पर लोगों में ईर्ष्या का विकास होता है, “.... ईर्ष्या व्यक्ति-विशेष से होती है। यह नहीं होता कि जिस किसी को ऐश्वर्य, गुण या मान से सम्पन्न देखा उसी से ईर्ष्या हो गयी। ईर्ष्या उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है कि लोगों की दृष्टि हमारे साथ-साथ उन पर भी अवश्य पड़ती होगी। अपने से दूरस्थ होने के कारण अपने साथ-साथ जिन पर लोगों का ध्यान जाने का निश्चय नहीं होता उनके प्रति ईर्ष्या नहीं उत्पन्न होती।... संबंधियों, बालसखाओं, सहपाठियों और पड़ोसियों के बीच ईर्ष्या का विकास अधिक देखा जाता है।”20 पर समाज के सजीव प्राणियों की तुष्टि यही तक सीमित नहीं है। वह अभाव में रहकर भी समाज की धारणा से इस प्रकार संतुष्ट होता है, “... ईर्ष्या के संसार के लिए ईर्ष्या करने वाले और ईर्ष्या के पात्र के अतिरिक्त स्थिति पर ध्यान देने वाले समाज की भी आवश्यकता है। इसी समाज की धारणा पर प्रभाव डालने के लिए ईर्ष्या की जाती है; ऐश्वर्य गुण या मान का गुप्त रूप से बिना किसी समुदाय को विदित कराये, सुख या संतोष भोगने के लिए नहीं। ऐश्वर्य या गुण में हम चाहे किसी व्यक्ति से वस्तुतः बढ़कर या उसके तुल्य न हों, पर यदि समाज की यह धारणा है कि हम उससे बढ़कर या उसके तुल्य हैं तो हम संतुष्ट रहेंगे, ईर्ष्या का घोर कष्ट उठाने न जाएंगे। कैसी अनोखी बात है कि वस्तु-प्राप्ति से वंचित रहकर भी हम समाज की धारणा मात्र से संतुष्ट रहते हैं। ईर्ष्या सामाजिक जीवन की कृत्रिमता से उत्पन्न एक विष है। इसके प्रभाव से हम दूसरे की बढ़ती से अपनी कोई वास्तविक हानि न देखकर भी व्यर्थ दुखी होते हैं।”21

पहले ही यह कहा जा चुका है कि शुक्ल जी किसी समस्या को केवल लोक के सामने ही लाकर नहीं रह गये, अपितु उसके निवारण के लिए उपाय भी बताते गये हैं। यदि ईर्ष्या इतनी ही बुरी वृत्ति है तो उसकी निवृत्ति की चिन्ता होनी चाहिए। इसी चिन्ता से छुटकारा पाने के लिए उनकी ‘चिंतामणि’ का यह स्वर है, “ईर्ष्या की सबसे अच्छी दवा है उद्योग और आशा। जिस बात के लिए उद्योग और आशा निष्फल हो, उस पर से अपना ध्यान हटाकर दृष्टि की अनंतता से लाभ उठाना चाहिए।”22

संक्षेप में कहा जा सकता है कि ‘चिंतामणि’ निबंध-जगत का प्राण है। मनुष्य की गति जिस ओर जा सकती है, वहाँ तक इसकी पहुँच है। बस इतना ही कह कर हम इस निबंध-संग्रह की महत्ता को डॉ. रामकृपाल पांडेय के कथन के आश्रय से छोड़ जाते हैं, “आचार्य शुक्ल का निबंध-संग्रह ‘चिंतामणि’ (पहला भाग) हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। यदि संपूर्ण हिन्दी निबंध साहित्य नष्ट हो रहा हो और मुझसे कहा जाए कि अपनी मनचाही कोई एक कृति बचा सकते हो तो मैं ‘चिंतामणि’ को ही चुनूंगा। यह हिंदी जाति के एक अत्यंत प्रखर मस्तिष्क और अत्यंत शीलवान हृदय की प्रतिनिधि निबंध कृति है।”23

सन्दर्भ ग्रंथ सूची-
1 आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, डॉ. रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, पृ सं. 191
2. चिंतामणि (भाग-1) आचार्य रामचंद्र शुक्ल, निवेदन, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद 
3. वही, पृ सं. 2-3
4. वही, पृ सं. 7-8
5. वही, पृ सं. 8
6. वही, पृ सं. 10
7. वही, पृ सं. 11-12
8. वही, पृ सं. 19
9. वही,  पृ सं. 33
10. वही, पृ सं. 34
11. वही, पृ सं. 49 
12. वही, पृ सं. 40
13. वही, पृ सं. 42
14. वही, पृ सं 44
15. वही, पृ सं. 44-45
16. वही, पृ सं. 51
17. वही, पृ सं. 52
18. वही, पृ सं. 54
19. वही, पृ सं. 62
20. वही, पृ सं. 63
21. वही, पृ सं. 64 
22. वही, पृ सं. 70 
23. चिंतामणि-विमर्श, डॉ. रामकृपाल पांडेय, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ सं. 177 

सेतु, अक्टूबर 2020

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