यथार्थ के आईने में स्त्री (‘एक बटा दो’ उपन्यास के सन्दर्भ में)

मधुमिता ओझा

शोधार्थी, प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता
ईमेल: honeyojha525@gmail.com
चलभाष: +91 629 047 0145

आज के सन्दर्भ में आज की स्त्री के बाहर और भीतर के संघर्ष को समझने के लिए लेखिका सुजाता का उपन्यास ‘एक बटा दो’ एक मुकम्मल माध्यम है। स्त्री क्या चाहती है? कैसे चाहती है? और क्यों चाहती है? उपन्यास को पढ़ने के क्रम में इन सवालों के जवाब मिलते चले जाते हैं।

‘एक बटा दो’ दो स्त्रियों की दो कहानियाँ हैं। दोनों पात्रों का आपस में एक-दूसरे से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्कूल शिक्षिका निवेदिता तथा ब्यूटी पार्लर चलाने वाली मीना का आपस में कोई सम्बन्ध न होते हुए भी उनकी कहानियों में एक समानता दिखाई देती है –‘स्त्री संघर्ष की’।

दो पात्रों की दो कहानियों में विभाजित एक उपन्यास अर्थात् ‘एक बटा दो’ बदलते दौर की बदलती परिस्थितियों से मुठभेड़ करती स्त्रियों की कहानी हैं। जहाँ कभी जिम्मेदारियों के बीच पिसती स्त्री की सुगबुगाहट सुनायी देती है, तो कभी तनावों से बच निकलने की छटपटाहट दिखायी देती है। बचपन से एडजस्ट करती स्त्री कैसे धीरे-धीरे ऐसी आकारहीन प्राणी बना दी जाती है जो स्वयं ही स्वयं को किनारे ढकेल अन्य व्यक्तियों के के हितार्थ जीती चली जाती है और बेखबर सी बँटती चली जाती है दो हिस्सों में। कुछ इसी तरह निवेदिता और मीना भी बँटती चली जाती है अपने-आप में। “शादी के 15 साल बाद मैंने पहली बार ख़ुद को आईने में देखा था। पूरी मीना। निर्वस्त्र। मोम से बना हुआ बदन। बस नाभि के नीचे का मांस डब्ल्यू के आकार में लटका हुआ जिस पर किसी बच्चे ने कुछ खरोंचें डाल दी थीं। फिर एक सघन वन। उँगलियाँ फिराई तो गुदगुदी सी हुई। जंगल अंगड़ाई लेने लगा... हाथ टटोल आया... जितनी नाभि के ऊपर हूँ उतनी ही जीवित नाभि के नीचे भी। अजीब सा ख़याल आया। अगर नाभि के ऊपर-नीचे की देह की अपनी-अपनी अलग सत्ता हो जाए तो एक देह में निवास करना कैसा होगा? ऊपर वाला कहेगा नीचे वाले के कर्मों के लिए मैं जिम्मेदार नहीं और नीचे वाला कहेगा ऊपर वाले के फैसले मुझ पर मत थोपो। हमारा तो काम नहीं चलेगा भैया। हम कहेंगे दोनों को अलग-अलग दिल-दिमाग दे दिया जाए महसूस करने को। या दोनों के दिल-दिमाग छीन लिए जाएँ। आख़िर चैन से जीना भी तो चाहती है फीमेल बॉडी!”1 स्त्री केवल देह नहीं, मन भी है। लेखिका कथानक, पात्रों के बीच के संवाद तथा परिस्थितियों के हवाले स्त्री से जुड़े उन तमाम बिन्दुओं को उभारकर सामने लाती हैं जिससे जूझती हुई वह आगे बढ़ती है। उन सूक्ष्म से सूक्ष्म दिखने वाले पहलुओं पर प्रश्न करती चली जाती हैं जो अमूमन पितृसत्तात्मक लेंस से बाहर छूट जाया करता है।

“मैं सिर्फ चाहती हूँ कोई ऐसा हो जिसके लिए मैं देह से अलग भी अस्तित्व रखती होऊँ। वह मेरे पास बैठा बतियाता रहे, मेरी जुल्फें सहलाकर मुझे सुला दे, जब सो जाऊँ तो चुपके से माथा चूम ले। जब जागूँ तो उसकी मुस्कुराहट मेरी नींद की पहरेदारी के बाद खिलखिलाहट में बदल जाए कि कैसे बच्चों की तरह टाँगे फैलाकर सोती हो तुम! मैं अँगड़ाई लेती उठूँ तो उसे एक के बाद एक अपने सारे अजीब सपने सुनाऊं कि कैसे मैं परीक्षा भवन नहीं ढूँढ़ पा रही थी। कि मुझे अपना रोल नंबर ही नहीं दिख रहा था” 2

जेंडर भूमिका पितृसत्तात्मक समाज की आत्मा है। जेंडर भूमिका के बाहर पाँव पसारती स्त्री पितृसत्तात्मक समाज को फूटे आँख नहीं सुहाती। “कैसे टाँगें फाड़कर सोती हो ...कितना भद्दा लगता है...कम से कम सोना सीख लो ढंग से... औरतों की तरह”3 सीमोन कहती हैं कि “पुरुष औरत को, औरत के लिए परिभाषित नहीं करता ... वह पुरुष के सन्दर्भ में ही परिभाषित तथा विभेदित की जाती है” 4

भारतीय नारी को सहचरी और अर्धांगिनी जैसे कई संबोधन मिले किन्तु पुरुष की सहयोगी वह आज भी नहीं हो सकी है। स्त्री साथ चाहती है प्रेम का, अपनापन का और सहयोग का। निवेदिता अपने माँ बनने के उस क्षण को याद करती है -

“मुझे सिर्फ़ सिद्धांत का साथ होना ही महसूस करना था। माँ-बाप हम दोनों बने थे न! हम इस सुख को या दुःख को साथ-साथ क्यों नहीं भोग रहे थे”5

हर युग में द्वन्द का शिकार स्त्री को ही होना पड़ा है। तब भी जब वह आर्थिक रूप से निर्भर थी और अब भी तब जब वो आर्थिक रूप से स्वतंत्र है। आज भी अपने हिस्से का निर्णय वह स्वयं नहीं ले पाती। “मैंने झूठ बोले थे जगजीत से। लेकिन यह हमेशा से था। झूठ न बोलती तो ज़िन्दा रहना ही मुश्किल था। अबीर से भी झूठ बोले थे कभी-कभी और वह अक्सर समझ भी जाता था। झूठ मेरे लिए सच को बचाने की तकनीक बन गया था। जैसे यह सबसे बड़ा सच कि सबसे ज्यादा मुझे अपना साथ पसंद था। झूठ यह कि इतना ज़रूरी काम है कि अभी मिलना फ़ोन पर बात करना संभव नहीं। जो काम मेरे लिए गंभीर होता अक्सर वह अबीर को इतना अगंभीर लगता कि वह उसे छोड़ देने का आग्रह करता। ... खुले मुँह से नहीं कह पाती थी कि आज घर आने का मन नहीं ... .किसी काम का बहाना करके माँ के यहाँ जाती थी” 6

कहानी की पात्र मीना का विद्रोह अचानक नहीं पैदा होता। घर-परिवार की जिम्मेदारीनुमा श्रृंखला से होते हुए स्वयं को पहचानने की कोशिश के रूप में उभरकर सामने आता है। मीना का यह कदम मुक्त होने का साहसिक उद्घोष है। मीना के रूप में लेखिका जिस स्त्री को गढ़ती है वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था से सीधे टक्कर लेती है -

अबीर- मैं इतना निरर्थक हूँ तुम्हारे जीवन में कि ज़रूरी फ़ैसलों से मुझे बाहर कर दिया जाए?

मीना- एक औरत जब अपने लिए लड़ने को खड़ी होती है तो उसके पक्ष में खड़े रहने के बावजूद आप ख़ुद को उससे बाहर रखें यह बेहतर है। मैंने आज तक किसी का सहारा नहीं लिया।

अबीर- और मेरी चाहत? मैंने भी अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया तुम्हारे लिए मीना। और पता चलता है कि यह सिर्फ़ तुम्हारी लड़ाई है और मैं इसमें बाहर हूँ। कह दो तुम्हारे जीवन में मेरी कोई सार्थकता नहीं!

मीना- मैं चाहकर भी नहीं समझा पा रही तुम्हें अबीर ... तुम्हारे होने ने मुझे कितनी ताक़त दी है... लेकिन यह मेरी लड़ाई है ... 7

मीना समझ रही है कि सवाल जगजीत या अबीर का नहीं बल्कि उस नीति -निर्धारण से है जिसकी जड़े पितृसत्तात्मक व्यवस्था में छिपी है –

“खैरात! एक औरत ज़रा सी, एकदम ज़रा सी तरक्की कर ले तो क्या वह उसे किसी पुरुष की अनुकम्पा के बदले मिली है? क्या मेरा अपना किया मेरी अपनी मेहनत जिसे इतने बरसों से जिज्जी देख रही है वह कुछ नहीं?”8

“इसलिये मीना कटघरे में है। वही औरत-मर्द का भेदभाव। मर्द आगे बढ़े तो होशियार है और औरत तरक्की करे तो किसी मर्द की कृपा है। वही ढाँचा समाज का जिसमें औरत को इतनी बेचारी समझा जाता है कि जब तक वह किसी एक मर्द का हाथ न थाम ले, उसकी मुहर ख़ुद के चेहरे पर ठुकवा न ले, तब तक उसे स्वीकृति नहीं मिलती” 9 ऐसा नहीं कि इस उधेड़बुन से निकल पाना स्त्री के लिए सहज और सरल है। एक तरफ अपने स्पेस को पाने की इच्छा तो दूसरी ओर भावुकता का वह डोर जो उसे अपनी ओर खींचें रखता है। “तीन बच्चे जिनका चेहरा देखकर उस घर में लौटती रही उन्हें साथ लिए बिना कहाँ भागूँ? जरा आँख बंद की तो झटका सा लगा मानो दरवाजे में घुसते ही जगजीत ने मेरे मुँह पर थप्पड़ मारा है ज़ोर से। बच्चियाँ रोने लगी हैं ...चिंचियाने लगी हैं नईं पापा नईं ... छोटू खौफ़जदा सा कोने में दुबक गया है ... ” 10

मीना और निवेदिता अंत तक अपने लिए स्पेस तलाशती हैं। स्त्री के प्रथम लक्ष्य पत्नीत्व और अंतिम लक्ष्य मातृत्व की कड़वी किन्तु यथार्थ मान्यता को पचा नहीं पाती हैं। मीना कहती है “मेरा सारा संघर्ष उस पहचान के लिए था जिसे रौंदने की तमाम कोशिशें बचपन से लेकर अब तक होती रहीं। अगर यह मेरे अपनों को नहीं दिख रहा था तो परायों की टेढ़ी आँख को देखकर क्या परवाह करना?”11 तो दूसरी ओर निवेदिता कहती है “मुझमें कमियाँ हैं और कहीं एक धीमी सी ज़िद कि मुझे ऐसे ही स्वीकार किया जाए। मुझे कुछ समय के लिए भूल जाओ ताकि मैं ख़ुद को याद कर सकूँ। जीवन की किताब इतने हाथों में इतनी लापरवाही से पड़ती है कि मुझ तक लौटती है तो देखकर रुआँसी हो जाती हूँ। अपने ही घर में किसी रात तड़पकर कहती थी-ओह, माँ मुझे घर जाना है... और वह घर कहीं नहीं होता था। माँ के घर भी नहीं” 12

स्त्री अपनी जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपने लिए अपना स्पेस भी चाहती है। स्वतंत्रता चाहती है। बेबाकी से जीना भी चाहती है “एक पूरा कमरा! इसके सोफ़े, इसका करीने से लगाया हुआ बिस्तर, तौलिए, पूरा बाथरूम, टीवी और उसका रिमोट, सब मेरे लिए था। सिर्फ़ मेरे लिए। एक पल को अपने इस ख़याल पर शर्म आई। लेकिन अब मैं यहाँ फैल जाना चाहती थी। मानसून में जैसे सोफ़ा, मेज़, कुर्सी, बच्चे की साइकिल, खिड़की की रॉड सब जगहें कपड़े कपड़े सुखाने के काम आती है ऐसे ही एक-एक पुर्ज़ा देह का अलग-अलग सुखाने के लिए डाल देना चाहती हूँ सब ओर और फिर तेज़ पंखा चलाकर एक चाय पीती हुई बालकनी में से झरने का सौन्दर्य निहारना चाहती हूँ। जब सब पुर्ज़े हवा खा चुके होते तो उन्हें वापस समेटकर कुछ देर के लिए सो जाती मैं निश्चिन्त!”13

सिमोन कहती है “प्रश्न उठता है कि कैसे एक व्यक्ति स्त्री की स्थिति में रहते हुए परितोष पा सकता है? कौन से रास्ते उसके लिए खुले होते हैं और कौन से बंद? वह कैसे उस आत्मनिर्भरता को प्राप्त करे, जिससे स्त्री की स्वाधीनता को सीमित करने वाली परिस्थितियों का सामना किया जा सके। ये कुछ ऐसे मौलिक प्रश्न हैं, जिनका सम्बन्ध स्त्री के अस्तित्व और उसकी स्वतंत्रता से है” 14 स्त्री समानता व सशक्तीकरण के लिए आर्थिक स्वावलंबन आवश्यक तो है लेकिन एकमात्र रास्ता नहीं। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद भी स्त्री परिवार की चौहद्दियों से बाहर नहीं निकल पाती। संभवतः इसी कारण जर्मेन ग्रीयर कहती भी है कि स्वतंत्र स्त्री का पहला अभ्यास है, विद्रोह का अपना तरीका, एक ऐसी पद्धति तैयार करना, जो उसकी अपनी स्वतंत्रता और मौलिकता को प्रतिबिंबित करे 15 ।

स्त्री की अपनी इच्छाएँ, जीवन के प्रति उसकी निजी अभिरुचि को महत्त्व दिए बिना न तो स्त्री को समझा जा सकता है, न लैंगिक-समानता को, न स्त्री के प्रेम को और न ही स्त्री-विमर्श को। स्त्री-विमर्श को समझने के लिए स्त्री की ऑटोनोमी को समझना अनिवार्य है। यही कारण है कि लेखिका स्त्री को उसकी स्वायत्तता के प्रति जागरूक करती हैं। अपने उपन्यास की नायिका मीना और निवेदिता को उन्होंने इसी स्वप्न हेतु गढ़ा हैं। अतः स्त्री के अस्मिता से जुड़े सवालों को नई रौशनी में नई दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।

लेखिका ने स्त्री जीवन से जुड़े यथार्थबोध को गहरी संवेदनशीलता व बेबाकी के साथ चित्रित किया है। निवेदिता और मीना की कहानी पढ़ते हुए हमारे आस-पास की कई कहानियाँ खुलती जाती है।

उपन्यास में लेखिका की पैनी दृष्टि तथा कल्पनाशीलता का ग़जब समायोजन दिखता है। वह चाहे चिड़ियों की चिक-चिक और गिलहरी की खटपट हो या सोफे की सीट और दीवार के बीच फँसे सिक्कों का अंदाजे बयाँ ही क्यों न हो।

सन्दर्भ-ग्रन्थ
1. सुजाता, एक बटा दो, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण, 2019, पृष्ठ-27
2. सुजाता, एक बटा दो, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण, 2019, पृष्ठ-28
3. सुजाता, एक बटा दो, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण, 2019, पृष्ठ-33
4. सीमोन द बोउवार, स्त्री उपेक्षिता, 2002, हिंदी पॉकेट बुक्स, पृष्ठ-23
5. सुजाता, एक बटा दो, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण, 2019, पृष्ठ-41
6. वही, पृष्ठ-107
7. वही, पृष्ठ-106
8. वही, पृष्ठ-97
9. वही, पृष्ठ-112 103
10. वही, पृष्ठ-99
11. वही, पृष्ठ-95
12. वही, पृष्ठ- 134
13. वही, पृष्ठ- 126
14. सिमोन द बोउवार, स्त्री उपेक्षिता, अनुवाद -डॉ प्रभा खेतान, 2002, हिंदी पॉकेट बुक्स, पृष्ठ-31
15. जर्मेन ग्रीयर, विद्रोही स्त्री, अनुवाद-मधु.बी.जोशी., राजकमल प्रकाशन, 2001, पृष्ठ-21

सेतु, अक्टूबर 2020

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