कहानी: बाबा

मधु संधु

मधु संधु

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,हिन्दी विभाग,गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब।
सुना है कि मध्यवर्ग कभी डॉक्टर और इंजीनियर दोनों के लिए समभाव रखता था। लेकिन  डॉक्टरी पढ़ने वालों की संख्या समय के साथ घटती ही गई। कारण- कभी न खत्म होने वाली पढ़ाई, दूर-दराज के गाँवों में पोस्टिंग, स्वस्थ जीवटयुक्त, मनमौजी लोगों से मेल-मिलाप का अभाव, आह- कराह से लगातार दो-चार होने की नियति। 
प्लस टू में स्कूल के ब्रिलियंट, कुशाग्र छात्र-छात्राएँ परी, आर्यन, त्रिशान, ध्रुव सभी ने नॉन मेडिकल में  दाखिला लिया। भले ही 95% से ऊपर अंक पाकर भी रुचि और रैंक के कारण सब को अलग- अलग जगहों पर ही सीट मिली। यानी प्लस टू के बाद चार साल और खाने- कमाने के द्वार खुल खुल जाएँ। कहते हैं कि जीवन में बार-बार चुनाव करना पड़ता है। यह चुनाव का शुरुआती दौर था- जिसमें अपना कम और ममा-पापा तथा समाज का अधिक योगदान होता है। बेटे के इंजीनियर हो जाने पर माँ-बाप ने भी चैन की साँस ली कि चलो खानदान की,  कुनबे की इज्जत तो बच गई।
त्रिशान इंजीनियर हो गया। ममा पापा का एक टास्क पूरा हो गया। बेटे की पढ़ाई पूरी हो गई। बड़ी कंपनी का बड़ा पैकेज मिल गया। यह क्या? सभी बी. टेक? ऊपर से बी. टेक. की शादी एम. टेक. से हो गई। एक भटकन, एक बेचैनी, विशेष होने की लालसा - उसे अपने को साबित करना है। पर कैसे? एक गुस्सा है, जो उसके अंदर आग प्रज्ज्वलित करता है, धकेलता है, भटकाता है। उसने जल्दी ही एम. बी. ए. कर ली। वर्चस्व चाहिए - एक के बाद दूसरी कंपनी बदलता गया - पर हर जगह इंजीनियर ही इंजीनियर - उसके जैसे। सर्वोपरि कैसे बना जाये? अपने मन का कमांडर इन चीफ़ कैसे हुआ जाये। यही आग, यही ज्वाला उसे बेचैन रखती। इधर गृहस्थी की कारा? ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास जैसी रूढ़ बाते उसके लिए ठहरे पानी जैसी थी। गृहस्थ का राजयोग उसे रास नहीं आ रहा था। गृहस्थ उसकी नैसर्गिक निरंकुश वृति के रास्ते का सबसे बड़ा अवरोध ही बन कर खड़ा था। गृहस्थ समझौते की बात करता है। उत्तरदायित्वों का बोझ गले में लटका देता है। परामर्श, अनुमति, नियम, परम्परा समाज पर खड़ा है। उसने निर्णय लिया कि गृहस्थ के सारे सुख अपनी मुट्ठी में रखेगा। संतान को अपना नाम देने का पूरा फायदा उठाएगा। उसका लक्ष्य इस दुनिया को छोड़ना नहीं अपनी सुविधा के अनुरूप मोड़ना है। उसे अध्यात्म और भौतिकता दोनों ही चाहिए- गृहस्थ और संन्यास दोनों एक साथ।
      इधर कोरोना काल आ धमका। अनेक गतिरोध आ गये। कम्पनियाँ बंद होने लगी या वर्क फ़्रोम  होम का विकल्प चल पड़ा। उसे भी यही अपनाना पड़ा। सुबह कम्प्युटर टेबल पर बैठता, रात ग्यारह बजे तक ही टास्क पूरा हो पाता। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ देने लगे थे। वह बेचैन सा हो उठा। शहर के योगाश्रम के शिविरों में उसकी उपस्थिति अनिवार्य होने लगी। वह योग गुरु के आसपास ही रहता। कितना सुख -कितना वैभव -कितना यश -कितना सम्मान !
उसके समक्ष अनेक उदाहरण थे, उन लोगों के, जिन्होंने इंजीनियरिंग को बेसिक एजुकेशन की तरह ही लिया और बाद में कैरियर के मुख्य विकल्प चुने। जिनकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय और चयन प्रशंसनीय रहे। इंजीनियरिंग की बेसिक पढ़ाई के बाद कितने लोगों ने नेता, अभिनेता, संत-गुरु बन यश, अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष कमाया। जीवन रुकने का नहीं, चलने का नाम है। चुनाव तो बार-बार करना ही पड़ता है। वह वक्त गया जब एक चुनाव के बाद जीवन भर उसी के साथ घिसटना पड़ता था। अनेक कद्दावर राजनेता इंजीनियरिंग को धत्ता बता ही राजनीति में आए। हर आई. टी. संस्थान सुंदर पिचई बनने के सपने तो बेच सकता है, लेकिन हर आइटियन सुंदर पिचई नहीं बन सकता। राजनेता दिग्विजय सिंह मैकेनिकल अभियंता थे और शरद यादव इलैक्ट्रिक। राष्ट्रपति महामहिम अबुल कलाम ऐरोस्पेस और भौतिकी में थे। अजीत जोगी को इंजीनियरिंग देर तक प्रभावित नहीं कर पाई, पहले आई. पी. एस. की और फिर राजनीति में चले आए। चिराग पासवान ने भी अपनी कम्प्यूटर इंजीनियरिंग के प्रति विरक्ति ही दिखाई। मैटलर्जिकल इंजीनियर मनोहर परिकर गोवा के मुख्यमंत्री बने, सिविल इंजीनियर भूपेन्द्र पॉल गुजरात के मुख्य मंत्री रहे। अरविंद केजरीवाल तो खड़गपुर से  मैकेनिकल अभियंता थे। वहाँ क्या कर लेते? राजनीति में आते ही उन्होने दिल्ली के मुख्य मंत्री बन प्रदेश की हवा ही बदल दी। 
अभिनेता भी तो अनेकों मिलते हैं। तापसी पन्नू, अमीषा पटेल, सुशांत सिंह राजपूत, रितेश देशमुख, कार्तिक आर्यन, सोनू सूद, आर. माधवन, हास्य कलाकार रजत सूद और बेस्ट सेलर लेखक और स्क्रिप्ट राइटर चेतन भगत आदि। 
भगवान विश्व कर्मा को भी तो दुनिया का अभियंता माना जाता है। बड़ी कंपनी में नौकरी और बड़े वेतन के बावजूद बहुत से लोग सफ़ेद या भगवा चोला पहन धर्मगुरु बने, मोटिवेशनल स्पीकर बने, तत्वज्ञानी/ ब्रह्मज्ञानी हो गए, योगी हो गए। धर्म, अर्थ और यश हाथ बांध उनके समक्ष गिड़गिड़ाने लगा। मैकेनिकल अभियंता जय दामोदर दास हरे कृष्णा में नाम कमाने लगे, सॉफ्टवेयर अभियंता आशीष ने गीता प्रचार का चुनाव किया। इलैक्ट्रिक अभियंता गौर गोपाल दास ‘इस्कान’ यानी ‘इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कोनशिअसनेस’ में आ भारतीय जीवन शैली के कोच/ प्रशिक्षक और प्रेरक प्रवक्ता बन धर्म, अर्थ, यश बटोरने लगे। हरियाणा के रामपाल दास अठारह वर्ष सिंचाई विभाग में अभियंता रहने के बाद कबीर पंथी बाबा बने और उनकी ‘कष्ट निवारक पूजा’ में भगतों के जमघट लगने लगे। जन्म दिवस बोध दिवस बन गए। हाँ ! रामपाल जैसे बाबाओं के आश्रम कालान्तर में अड्डों में भी परिणित हो गए।
महीनों में ही त्रिशान ने योगाश्रम और योगगुरु के सारे गुण आत्मसात कर लिए। सब छक्के- पंजे अपना लिए। वह न आशुमल से आसाराम बापू बना, न गुरमीत सिंह से राम रहीम, न सुखजिंदर कौर से राधे माँ, न निर्मलजीत से निर्मल बाबा। वह त्रिशान ही रहा। 
      उसने भक्त जुटाने की कला जान ली। एक ताम-झाम जुटा वह महानगर में आ बसा। अपना तत्वज्ञान, अपना योग शिविर, अपने टोटके, अपने देसी दवाइयों के नुस्खे, अपने प्रवचन शुरू कर दिये। भक्तों द्वारा लिखवा, उनके द्वारा छपवा, मुफ्त में तत्व ज्ञान घर- घर बांटने और शिष्यत्व बढ़ा अपने साम्राज्य को अमरत्व देने का काम ज़ोर- शोर से चलाने लगा। यह उसका साम्राज्य है- सर्वोच्च और अद्वितीय। यहाँ उसके आदेश चलते हैं। हर आने वाले का मनोविज्ञान वह पढ़ सकता है। उसकी दुनिया बदलने लगी। अब ‘घर का न घाट का’ की स्थिति नहीं थी। इस यात्रा ने उसे हीरो ही बना दिया। टाटा, बिरला, अंबानी बना दिया। उसके अरमानों को पंख लग गए। जोड़ने/ जुटाने की कला सीखी।
बाबा लोगों को घरों से बुलाने नहीं जाते, भक्त खुद आते हैं और बाबा को भगवान और खुद को कंगाल बनाने की प्रक्रिया में जुट जाते हैं। भक्तों के दुखी मन को शांति देने वाले आत्म ज्ञान को बांटने की प्रक्रिया शुरू हो गई। स्कूली बच्चों की तरह प्रवचनों की नोट बुक्स तैयार थी। भाषण कला के सभी आयाम उसने आत्मसात कर लिए थे-
योग- यानी जोड़। जीवात्मा और आत्मा का। यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।  मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम योग करता है। भगवद्गीता में बुद्धियोग, संन्यास योग, कर्म योग मिलता है। श्री कृष्ण ने कहा है- ‘योग कर्मसु कुशलम’- यानी कर्मों की कुशलता ही योग है। चित की वृत्तियों के निरोध का नाम ही योग है। 
दुखों का निवारण बताने वाला बहुत बार कर्मफल भी समझाने लगता। कर्मफल दो प्रकार का होता है- तत्काल कर्मफल और विलंबित कर्मफल। विलंबित यानी पिछले जन्म के कर्मों का फल।  
अब त्रिशान सब के शरीर को फ़ुर्तीला बनाने के, हर रोग के निवारण के जादुई उपचार बताने लगा। हमारे त्रिशान बाबा के पास भक्तों की हर बीमारी का उपचार, हर समस्या का समाधान, हर मुसीबत का हल, हर कठिनाई से छुटकारे के रामबाणी उपाय हैं। कहते हैं- योग सुगम और स्वस्थ जीवन देता है। रोगों से मुक्त करता है। रामदेव और शिल्पा शेट्टी उनके मनसा योग गुरु हैं। अस्थमा से मुक्त होने के लिए- प्राणायाम- धनुरासन, मोटापे को अलविदा कहने के लिए- ताड़ासन- त्रिकोणासन- पार्श्वाकोणासान, डायबिटीज़ को बाय बोलने के लिए- प्राणायाम, धनुरासन, हाइपर्टेंशन- माइग्रेन से छुटकारा पाने के लिए- शीर्षासन, हलासन। साँस छोड़ो, साँस रोको- त्रिशान का रामबाण अमर- अज़र नुस्खा है। ध्यान के लिए रामेश्वरम जैसा एक बड़ा हाल है, जिसमें ओम का जाप होता है। स्पीकर से ओम शब्द चलता है। भक्त पालथी लगा, आँखें मूंद, पद्मासन में घंटों बैठे रहते हैं। बाबा बहुत बार सदियों पीछे ले जाते हैं- पेठे, पालक का जूस, भाप में पकी सब्जियाँ, गंदमी चावल, कच्चे मोटे अनाज के सेवन की बात करते हैं।     
किसी एंटाप्रेन्योर की तरह, किसी बड़े व्यापारिक संस्थान की तरह- उनकी वेब साइट्स है। इन्स्टाग्राम अकाउंट है, यूट्यूब भाषण है। लाइक और सबसक्राइब के लिए भी अनुरोध करते है।
सभी को प्रेम और सम्मान देना, मुख्य अनुयायियों के साथ समय बिताना, उनकी प्रशंसा करना, आत्मीयता का जादू चलाना और उन्हें योग्यता अनुसार काम बताना- बांटना जानते हैं। भक्तों की कुछ ऐसी श्रद्धा झोली में पड़ी है कि विदेश यात्राएँ भी आम हो गई हैं। जो आत्मविश्वास और अर्थ भी देती हैं और कद भी ऊँचा करती हैं। 
सब उन्हें मानते हैं। मन में बसाते हैं। भगवान का अवतार नहीं भगवान कहते हैं। सेवा भाव रखते हैं। नहीं मानती तो वह मंदभाग, मन्दबुद्धि  बीबी। उसकी आँखों में लिखा रहता है कि वे विश्व के सबसे तुच्छ और हेय पति और पिता हैं। यह उनके वर्चस्व पर प्रहार है। शांति का संदेश देने वाले की क्रोधाग्नि भड़काने का उपादान है। कभी पी लेते हैं और कभी दो ठोक देते हैं। कभी यही काफी लगता है कि वह घर- बाहर सब संभाल रही है। पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक बोझ और बोध से वे मुक्त हैं।
और पत्नी? वह गौतम बुद्ध की यशोधरा नहीं थी, न नरेंद्र मोदी की जसोदा बेन- जिन्हें पति अपनी उच्चाकांक्षाओं के लिए विवाहित होने का दाग लगाकर किसी अन्य दिशा में कूच कर गए। ‘मैं कहीं भी जाऊँ, कुछ भी करूँ- मेरे मर्जी’- का फार्मूला उस पर लागू किया गया। लेकिन वह न बेचारी थी और न बनी। बड़ी बड़ी कंपनियों की सी.  ई. ओ. बन कुछ ऐसा छाई कि बहुत बार त्रिशान के सारे ताम-झाम के बावजूद उसकी भी पहचान बन गई। यूँ वर्षों उन्हें घर बुलाता रहा और वे नहीं पहुँच पाये। बंधन वे अपनी ओर से तोड़ना चाहते थे, पर वे दूसरी ओर से चरमरा कर चकनाचूर हो गए। अब वे घर की खोज में आते तो हैं, लेकिन घर नहीं मकान ही मिलता है। कभी उन्होने अति व्यस्तता का लबादा ओढ़ रखा था और अब सब अपने में व्यस्त हैं, यहाँ आकर बौनापन ही झेलना पड़ता हैं।
देशी- विदेशी हवाई यात्राएँ, पच्चीस लाख की गाड़ी, एपल का आई फोन – समझते थे कि इस व्यवसाय ने उन पर लक्ष्मी की बौछार की है, लेकिन यह क्या? पत्नी बच्चों, पूर्व साथियों- सब के पास यह सब था। देश का, विश्व का बदलता स्वरूप - वे कहाँ हैं?  
*** 

यह विवाह प्रेम की हत्या सा ही था। किसी आत्मकेंद्रित ईगोइस्ट से प्रेम किया जा सकता है? बस निभाना पत्नी की मध्यवर्गीय, सांस्कृतिक विवशता रही। जबकि वह अपनी सारी ऊर्जा, जीवन संघर्ष और बिटिया की आत्मीयता में खर्च कर रही थी। 
और फिर एक दिन वह महासंत, वह धीर प्रशांत धर्म गुरु, वह आत्मोत्कर्ष और परमानंद के भ्रमजाल में फँसा बुद्ध अपने गृहस्थ आश्रम की प्रभातफेरी पर निकला और देखा वहाँ कुछ भी नहीं था। न पत्नी, न बेटी। न घर में, न शहर में, न देश में। उसकी कंपनी के साथियों से, बिटिया के ननिहाल से पता चला कि वे तो केलिफोर्निया के पालो आल्टो में फेसबुक के 8,000 कर्मचारियों-अधिकारियों में शामिल हो चुके हैं। पता ही नहीं चला कि बेबी ने कब बी. टेक. किया और दोनों ने मिलकर दूर देश की उड़ान भर ली। गृहस्थ ने वर्षों पहले अपना गुरुत्वाकर्षण खो दिया था। लगाव, स्नेह, दायित्वहीन इस पति-पिता के कारण मनःस्थितियों का तो पहले ही स्थानांतरण हो चुका था, स्थान बदलना तो उनके लिए एक झूठ से, ओढ़े हुये रिश्ते के टैग से मुक्ति का एहसास मात्र था। 
अनासक्त की आसक्ति का ढोंग समाप्त हो गया।

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