इन्हें भी देखिये Links

चार कविताएँ: विक्रमसिंह अमरावत

01 बहुत याद आती हो तुम

बहुत याद आती हो तुम
हर वक्त तो नहीं पर
जब भी मेरा वक्त होता है
तो उस वक्त में
बहुत याद आती हो तुम

वैसे तो कुछ भी याद नहीं है मुझे
कि तुम कैसे मुझे पकड़ती थी
कैसे मुझे खिलाती थी
कैसे मुझे खेलाती थी
कैसे मुझे चुप कराती थी
क्या क्या बतियाती थी मुझसे
पर फिर भी
बहुत याद आती हो तुम

मुझे तो ये भी याद नहीं कि
तुमने मुझे कभी पुकारा हो
मेरे उस नाम से
जो नाम अब नहीं रहा
तुमने कभी सुलाया हो
मुझे थपकियाँ देकर
और जगाया हो नींद से
बालों को सहलाते हुए
पर फिर भी
बहुत याद आती हो तुम

मुझे नहीं ये याद कि कभी
तुमने मुझे तैयार किया था
सजाया था एक परी की तरह
हाथ पकड़कर चलना सिखाया था
मेरे गिरने पर उठाया था
और धूल झाड़ते हुए
मुझे गले से लगाया था
पर फिर भी
बहुत याद आती हो तुम

माँ अब मैं बड़ी हो गई हूँ
लोग कहते है कि
तुम जैसी दिखती हूँ
तुम जैसी चलती हूँ
तुम जैसी ही मचलती हूँ
तुम्हारी तरह रोती हूँ
तुम्हारी तरह हँसती हूँ
जब जब आईना देखती हूँ
जब कभी खुद की तस्वीर देखती हूँ
बहुत याद आती हो तुम

हर वक्त तो नहीं पर
जब भी मेरा वक्त होता है
तो उस वक्त में
बहुत याद आती हो तुम।
***


02 माँ होने की साधना करता हूँ 

मैं एक पिता हूँ
पर मैं शरीर नहीं होना चाहता
मैं शरीर के बंधन से मुक्ति चाहता हूँ
अपने अंदर के मातृत्व का
वैसे ही आनन्द लेना चाहता हूँ
वैसे ही व्यक्त करना चाहता हूँ
जैसे कोई स्त्री करती है

मैं एक पिता के शरीर में
स्त्री होना चाहता हूँ
जब जब अपनी बिटिया को महसूस करूँ
तो मेरी ममता स्वतः बह सके
मुझे भी वो स्तन चाहिए
मुझे उस रस की बूँदों को
अपने शरीर से बाहर आने का
वो दिव्य एहसास चाहिए
मेरी साँसों के साथ जब
मेरी गुड़िया का एहसास
मेरे अंदर उतर आएगा
उन साँसों की ऊष्मा में
लपेट कर उसे मैं
अपने दिल तक पहुँचा दूँगा
अपनी धड़कनों से झुलाकर उसे
दिल की चक्की में मथ दूँगा
फिर जो प्रेमरस स्रावित होगा
उसमें अमृतमयी होकर
मेरे अंदर की माँ
पिता के रूप में
मोक्ष को प्राप्त करेगी

मैं मुमुक्षु की तरह
आराधना करता हूँ
पिता हूँ
माँ होने की साधना करता हूँ।
***


03 खुद से कहीं तो मिला दे

खुद को पहचानने की कोशिश में
वो आईने के सामने खड़ा चेहरा
बहुत कुछ धुंधला सा लग रहा था
खुद से अनजाना सा लग रहा था
धुंधलाहट आखिर कहाँ थी,
चेहरा ही धुंधला था
या नज़र ही कमज़ोर थी
बिम्ब में धुंधलाहट थी
या आईने पर धूल जमी थी
ये जानना मुश्किल था
बिलकुल निरूत्तर सा था
पहचान की अभिप्सा लिए
रु-ब-रू हो रहा था आईने से
वो था, फिर भी नहीं था
हो कर नहीं होने की उसकी परेशानी
धुंधलाहट से उपजी व्याकुलता
लगातार बढ़ रही थी

उसको ये जानना ही था
कि वो वैसा ही है ना कि
जैसा उसने तय किया है
या फिर कहीं वैसा तो नहीं कि
जैसा वो है ही सही
कहीं ये धुंधलाहट
उस शृंगार का बिम्ब तो नहीं
जो वो मुद्दत से करता आ रहा है
खुद को छुपाने के लिए
और अब ये आईना उसे
सब कुछ सच बता रहा है

काश ऐसा हो कि
आईने पर ही धूल जमी हो
जिससे कि चेहरे पर जमी धूल को
छिपाया जा सके और
कमी आईने की बताई जा सके
अगर आईना साफ हो तो
नज़रों को दोष देना भी वाज़िब रहेगा
आँखें कमज़ोर हो सकती है
अपनी रोशनी खो सकती है
शायद इसलिए चेहरा साफ है
और धुंधला दिखाई दे रहा है
लेकिन आँखों से झूठ बोलना संभव नहीं
उनमें ज़रूर चाहिए रोशनी
पर औरों को देखने के लिए
खुद को देखने के लिए तो
आँखें बंद करनी पड़ती है
खुद को नहीं देखा जाता खुली आँखों से
तो शायद बिम्ब ही कमजोर होगा
जिससे धुंधलाहट दिख रही है
पर बिम्ब तो महज चित्रण है
बिम्ब का अपना कोई अस्तित्व नहीं
तो क्या ये चेहरे का बिम्ब है
जो धुंधला सा है
जो उजागर कर रहा है
चेहरे पर जमी धूल को
उस धूल के रजकणों की विविधताएँ
कह रही है कथाएँ
कि ये चेहरा
कहाँ-कहाँ, कब-कब, कितने-कितने
रंगों से सजा हुआ बहरूपिया है
प्रसाधन से अभिषप्त ये चेहरा
अब भी तलाश में है
कि ये आईना उसको
खुद से कहीं तो मिला दे
वो अकेला ही है अभी तो
ये आईने को कैसे बताए?
***


04. आखिर स्पर्श ही उसे बताएगा

स्पर्श क्या है
ये कोई पूछे उससे
जिसे होता है अनुभव
तरह-तरह के स्पर्शों का
वो स्पर्श जो तय करते हैं
कि वो कौन है
उसे हर कोई छूना चाहता है
पर बताना नहीं चाहता
छूने की अपनी मंशाओं को
इन आवरणयुक्त स्पर्शों की पहचान
स्पर्श के मिथकों का खंडन
ये अभिन्न हिस्सा है
उसकी जीवन शैली का
आखिर स्पर्श ही उसे बताएगा
पहचान को एक नाम दिलाएगा
शरीर पर होता ये स्पर्श
उसे महज शरीर ही बनाए रखता है
उसकी पहचान शरीर से होती है
उस शरीर को
कौन, कब, कहाँ, कैसे छुएगा
इससे तय होगी
उस शरीर की पहचान
यह तय होगा कि
वो शरीर किसका है
उसको क्या करना है
वो बिना मन का तन
पवित्रता, पतितता के खेल में
एक कातर, मोहरे की तरह
अपने तयशुदा चोखटों में
भटकता, मरता, जिन्दा होता
किसी और के लिए
किसी और के स्पर्श से
तो स्पर्श क्या है
स्पर्श एक राजनीति है वर्चस्व की।
***

परिचय: विक्रमसिंह अमरावत
साहित्य, इतिहास, इतिहासलेखन, पर्यावरण, और मानवाधिकार आदि विषय में गहरी दृष्टि रखने वाले युवा कवि डॉ. विक्रमसिंह अमरावत के शोधपत्र -निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। वर्तमान में वह गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद (गुजरात) में  इतिहास विषय के प्रोफेसर हैं।

पता: 117- सर्वोदय नगर, सेक्टर-30, गांधीनगर, गुजरात [भारत]- 382030
ईमेल: vsamarawat@gujaratvidyapith.org


11 comments:

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।