लघुकथाएँ: कुमार सम्भव जोशी

कुमार सम्भव जोशी

तेरे नाम अनेक


"प्रणाम बाबा!"
जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण वेश धारण किए छोटे बच्चे ने पुजारी जी को नमन किया।
"अरे! बालगोपाल स्वयं पधारे हैं।" एक अनजान सुन्दर बालक को देख पुजारी का मन आह्लादित हो गया।
"बाबा! यह मन्दिर किसका है?" बच्चे ने हाथ में पकड़ी बाँसुरी नचाते हुए पूछा।
"क्या मतलब?" पुजारी ने मधुर मुस्कान लिए पूछा।
"यहाँ राम जी की मूर्ति भी है, कान्हा जी की भी। उधर शिव जी की मूर्ति भी है, तो यह मन्दिर है किसका?" बच्चे ने बालसुलभ जिज्ञासा व्यक्त की।
"बेटा! ये राम, कृष्ण आदि उन्हीं भगवान के विभिन्न रूप हैं। हम जिस रूप में उन्हें चाहते हैं, उसी रूप में उनकी पूजा कर सकते हैं।" पुजारी ने बताया।
"मतलब कान्हा जी की मूर्ति, राम जी के मन्दिर में हो तो भी उनकी पूजा कर सकते हैं?" बच्चे ने फिर प्रश्न किया।
"बेटा! ईश्वर कण-कण में है। पत्थर में- लकड़ी में- मुझमें- तुम में, सब जगह। वे जहाँ भी स्थापित हों, पूजनीय ही होते हैं।" पुजारी को बच्चे के भोले प्रश्नों पर स्नेह उमड़ आया।
"तो कान्हा जी की मूर्ति राम मन्दिर में रख दें तो भी वे हमारे अपने ही हुए, हमें उन्हें ठुकराना नहीं चाहिए?" बच्चा बड़ा जिज्ञासु लग रहा था।
"बिलकुल नहीं बेटा। देखो! कोई राम को माने, चाहे कृष्ण को, या कोई शिव को मानता हो। पूजते तो वे उसी परमपिता को ही हैं ना। ये सब तो रूप हैं।" पुजारी को बच्चे की रूचि देखकर अच्छा लगा।

"इसका मतलब तो कान्हा जी की आरती से राम जी भी प्रसन्न होंगें?" बच्चे ने अगला प्रश्न किया।
"हाँ जरूर। वह श्रद्धा स्वरूप आरती पहुँचती तो उन्हीं एक परमपिता के पास ही है।" पुजारी ने स्नेह से बालक के सिर पर हाथ फेरा।
"तो जरीना अगर रवि के घर में नमाज के रूप में उस परमपिता की आरती करे तो उन्हें ठुकराना ग़लत बात हुई ना?" बच्चे ने जैसे धमाका सा किया।
"तू रवि का बेटा है?" पुजारी चौंक कर बोला।
"हाँ दादा जी। मैं रवि और जरीना का ही बेटा हूँ।" बच्चे ने रहस्योद्घाटन किया।
"मुझे माफ कर दो बेटा। मैं भूल गया था कि ईश्वर तो एक ही है। जरीना बहू से कहना कि उसके ससुर ने उन्हें ‘अपने’ घर वापस बुलाया है।" पुजारी की आँखों में आँसू भर आये।
"वो यहीं हैं दादू, मन्दिर के बाहर।"
बच्चा दौड़ता हुआ गया और हाथ पकड़कर जरीना को मन्दिर में खींच लाया।
पुजारी को बालगोपाल का हाथ थामे जरीना, जसोदा सी ही लग रही थी।

निहितार्थ


"ये लड़का कौन है अमित?" उसके साथ खड़े लड़के को देखकर कॉलोनी के राजीव अंकल ने पूछा।
"अंकल! ये मेरी क्लास में पढ़ता है। मेरा दोस्त है।" अमित ने बताया।
"ओह, ब्वॉयफ्रैण्ड!" अंकल ने कहा।
"नहीं-नहीं! ब्वॉयफ्रैण्ड नहीं, दोस्त।" वह झेंप सा गया।
"हाँ, लड़का है तो ब्वॉयफ्रैण्ड हुआ न!" उन्होने सामान्य तौर पर कहा।
"अरे आप समझ नहीं रहे। सिर्फ फ्रैण्ड।" वह बुरी तरह खिसिया गया।
"अरे वही तो मैं भी कह रहा हूँ। तुम्हारा फ्रैण्ड है, ब्वॉय है, यानि कि ब्वॉयफ्रैण्ड है।" अंकल ने फिर वही सब दोहरा दिया।
पास खड़ा दोस्त मुँह दबाये हँसी रोकने की कोशिश कर रहा था।
"क्या अंकल आप कब से ब्वॉयफ्रैण्ड-ब्वॉयफ्रैण्ड किये जा रहे हैं। क्या दोस्त सिर्फ दोस्त नहीं होते? कैसी विचित्र सोच है आपकी।" अमित गुस्से में लिहाज़ छोड़ बैठा।
"सॉरी बेटा। मगर क्या ये ब्वॉयफ्रैण्ड कोई ग़लत शब्द है?" वे कुछ सकुचा से गए।
"शब्द ग़लत नहीं है अंकल। मगर आजकल जो इसका निहितार्थ निकाला जाता है, वह ठीक नहीं।" उसने खीझते हुए जवाब दिया।
"तो बेटा, अतुल भी मेरी बेटी रश्मि का सिर्फ दोस्त है दोस्त।" उन्होने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।
अमित अंकल से निगाह नहीं मिला पा रहा था। मगर उसने तय कर लिया था कि कल स्कूल जाते ही वह रश्मि से माफी ज़रूर माँग लेगा।

हमरी बहुरिया


"हम तुम्हारे बिना कैसे रह पाऐंगे।" मदन ने मीना को बाँहों में भरते हुए कहा।
"और हम? हम तो जैसे बिलकुल ही अकेले रह जाऐंगे ना।" मीना रूँआसी हो आई।
"अकेली काहे?"
"पहले तो पीहर छोड़ तुम्हारे पीछे ससुराल चले आए। हफ्ता भी न हुआ, अब तुम्ही हमें यहाँ छोड़ काम पर शहर चल दिए हो। " उसकी आँखें विछोह से भर आई थी।
"का करें मीना! काम पर तो जाना ही पड़ेगा, और माँ-बाबूजी के पास भी तो कोई होना चाहिए।" मदन ने मीना से अधिक अपने मन को समझाने का प्रयास किया।
"कोई बहाना बना के हमको नहीं ले जा सकते का?" नई दुल्हन का दिल बैठा जा रहा था।
"माँ बाबा को क्या कहें?... कि हम बीवी के बिना नहीं रह पाऐंगे?" वह बोला। चाहता तो मदन भी यही था पर किसी तरह मन को दबाये था।
"... और वहाँ खाना पीना? खुद बनाओगे?" मीना ने फिर कोशिश की।
"कर लेंगे कुछ व्यवस्था। कभी बना लेंगे, कभी ढाबे होटल में खा लेंगें।" उसने साँत्वना सी दी।
"कपड़े, बरतन... झाड़ू?" उसका दिल भर आया।
"वो भी देख लेंगे... और तुम इतना मन छोटा ना करो, हम हर महीने के आखिरी शनीचर
को आते रहेंगे।" दोनो गले लग कर रो से ही पड़े।
"ऐ मदन! मदनवा... सुनो।" बाबूजी ने पुकारा तो अनिच्छा से अलग हो कर वह बाहर चौक
में आया।
"जी" नजरें झुकाये, हाथ बांधे हौले से बोला।
"हम क्या कहते हैं, कि तू बहुरिया को भी साथ ले जा।" बाबूजी ने आदेशात्मक स्वर में कहा।
"जी! मगर आप यहाँ अकेले, सारा काम माँ... , और सब क्या कहेंगे?" मदन को जैसे विश्वास न हुआ।
"अरे पहले भी तो अकेले ही तो रह रहे थे। तुम्हारी नई शादी हुई है, जरा साथ रहो। एक दूजे को समझो। भई पूरी ज़िन्दगी तुम्ही को साथ बितानी है।" माँ ने बाबूजी की बात को समर्थन दिया।
मदन की आँखों में जमाने भर की खुशियाँ तैर गई। उसने कमरे के दरवाजे पर घूँघट डाले खड़ी मीना की ओर देखा।
कुछ पल सोच कर मीना बोली, "जी हम यहीं आपके पास ही आपकी सेवा में रहेंगे। वैसे भी ये हर महीने तो आते ही रहेंगे।"
मीना को बूढे सास ससुर में अपने माई-बापू नजर आए।
सास ससुर ने बहुरिया को आशीर्वचनों से लाद दिया, और अगर माँ बाबू वहाँ न होते तो मदन तो उसे चूम ही लेता।

2 comments :

  1. Great stories sir, very meaningful and inspirationals..

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  2. कुमार संभव जोशी की सभी लघुकथाएँ अच्छी लगीं ।

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