काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था के आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि

आस्था दीपाली

तृतीय वर्ष बी.ए हिंदी (प्रतिष्ठा), लेडी श्री राम कॉलेज फ़ॉर विमन
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हिंदी साहित्य क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल प्रधानतया आलोचक के रूप में विख्यात हैं। वे हिंदी आलोचना के युग पुरुष है। 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में 'गद्य साहित्य का प्रसार' के द्वितीय उत्थान (संवत‍् 1950-1975) के अंतर्गत  समालोचना पर विचार करते हुए शुक्ल जी ने लिखा है: ''पर यह सब आलोचना बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुण-दोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता इन्हीं सब परंपरागत विषयों तक पहुंची। स्थायी साहित्य में परिगणित होने वाली समालोचना जिसमें कवि की अंतर्वृति का सूक्ष्म व्यवच्छेद होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएं दिखायी जाती है, बहुत कम दिखाई पड़ी।'' आगे गद्य साहित्य के तृतीय उत्थान के अंतर्गत समालोचना के विकास पर लिखते हुए उन्होंने कवियों की 'अंत: प्रवृत्ति की छानबीन की बात की है। शिष्टता और विनम्रता के नाते उन्होंने यह नहीं लिखा कि ऐसी आलोचना मैंने ही की है।' उन्होंने उत्तम पुरुष का प्रयोग बचाते हुए अपने विषय में केवल यह लिखा, 'इस इतिहास के लेखक ने तुलसी, सूर और जायसी पर विस्तृत समीक्षाएं लिखीं जिसमें प्रथम गोस्वामी तुलसीदास के नाम से पुस्तकाकर छपी है, शेष दो क्रमश: 'भ्रमर गीत' और 'जायसी ग्रंथावली' में सम्मलित है।' समालोचना विषयक अपनी धारणा बताकर शुक्लजी ने समालोचना विषयक अपनी विशेषता बता दी है। उन्हीं की गवाही पर कहा जा सकता है कि "किसी कवि या पुस्तक के गुण दोष या सूक्ष्म विशेषताएं दिखने के लिए एक दूसरी पुस्तक तैयार करने की चाल हमारे यहां न थी। और हमारे हिंदी साहित्य में समालोचना पहले पहल केवल गुण-दोष-दर्शन के रूप में प्रकट हुई है।"

पंडित रामचंद्र शुक्ल ने अनेक ऐसे शब्द गढ़े जो उनके आलोचना कर्म को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। कविता की परिभाषा बताते हुए शुक्ल जी कहते हैं, "कविता हम वाणी की उस साधना को कहते है जिसके द्वारा मानव हृदय अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ, योग-क्षेम के बंधनों से मुक्त होकर लोक सामान्य भाव-भूमि में पहुंच जाता है और वहां रस-दशा को प्राप्त होता है। इसका फल होता है भावों का परिष्कार और शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध की स्थापना और रक्षा।''

शुक्ल जी ने काव्य की इस भावात्मक अनुभूति के संबंध में उन वस्तुओं और व्यापारों पर अधिक जोर दिया है जिनसे कि मनुष्य आदिम युगों से परिचित चला आया और जिनसे मनुष्य जीवन आदिम काल से लुब्ध और क्षुप्त होता चला आया है। शुक्ल जी ऐसी ही वस्तुओं से हमारे भावों का सीधा संबंध मानते है। कवि का कर्म यह हो जाता है कि वह सभ्यता के आवरण के चीखर उन मूल रूपों को निकाल ले जिनसे हमारा सीधा संबंध मानते है। कवि का कर्म यह हो जाता है कि वह सभ्यता के आवरण के चीरवर उन मूल रूपों को निकाल ले जिनसे हमारा सीधा संबंध है।

जगत‍् को शुक्ल जी काव्य का मूल कारण मानते है। जगत‍्, कल्पना, सौंदर्य, भावों या मनोविकारों के निर्माण का आधार है। जगत‍् को शुक्ल जी 'विश्वकाव्य' तथा 'महाकाव्य' कहते हैं। मन क्या है इसका उत्तर देते हुए वे लिखते है, ''यही बाहर हंसता-खेलता, रोता-गाता, खिलता, मुरझाता जगत भीतर भी है जिसे हम मन कहते है। जिस प्रकार यह जगत‍् रूपमय और गतिमय है उसी प्रकार मन भी। मन भी रूप गति का संघात ही है।''

 

प्रकृति का चित्रण:-  शुक्ल जी ने प्रकृति के वर्णन में अर्थ ग्रहण की अपेक्षा बिम्ब ग्रहण पर अधिक जोर दिया है। अर्थ ग्रहण से केवल मानसिक बोध का और बिम्ब ग्रहण से वस्तु का पूर्ण रूप ज्ञान अभिप्रेत है। प्रकृति से वे मार्मिक तथ्यों के ग्रहण के पक्ष में है।

 

कोलाहल सुनि खगन के सरवर! जानि अनुरागि।

ये बस स्वारथ के सखा, दुर्दिन देहें त्यागी।।

 

इस प्रकार के तथ्यों को ग्रहण करके मनुष्य और मनुष्येतर जाति में एक प्रकार का सामंजस्य स्थापित हो जाता है।

 

भाव और मानव व्यापार:- शुक्ल जी की प्रवृत्ति का मूल कारण भाव ही मानते है। उनके अनुसार 'कविता भाव - प्रसार द्वारा कर्मण्य के लिए कर्म क्षेत्र  - का और विस्तार कर देती है। मनुष्य की यही विशेषता है कि उसका भाव  - विस्तार उसी के निजी सुख - दुख तक सीमित नहीं रहता है वरन‍् उसके ज्ञान  - विस्तार का उसके भाव क्षेत्र का भी विस्तार हो जाता है।

 

मनोरंजन तथा चमत्कारोत्पादन:- शुक्ल जी कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन या चमत्कारोत्पादन नहीं मानते। वे सूक्ति और काव्य में अंतर करते हैं। जो उक्ति हृदय में कोई भाव जागरित कर दे या उसे प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की मार्मिक भावना में लीन कर दे वह तो काव्य और जो उक्ति काव्य के ढंग के अनूठेपन, रचना  - वैचित्र‍्य , चमत्कार, कवि के श्रम या निपुणता के विचार में ही प्रवृत्त करे, वह है सुक्ति।

अलंकारो को भी शुक्ल जी ने प्रस्तुत भाव या भावना के उत्कर्ष साधन के लिए ही माना है, केवल साधर्म्य या सादृश्य दिखाने के लिए नहीं। शुक्ल जी ने स्वभावोक्ति को अलंकार नहीं माना। वे वस्तु की स्वाभाविक रमणीयता को आवश्यक माना है। उसके बिना अलंकारों का ढेर सौंदर्य की सृष्टि नहीं कर सकता। अलंकार शोभा को बढ़ा सकते हैं, उत्पन्न नहीं कर सकते।

कविता के संदर्भ में शुक्ल जी सौंदर्य के ऊपर बहुत जोर दिया है। उनका कथन है कि जो धर्म में 'शिव' है, वहीं काव्य 'सुंदर' है। सौंदर्य केवल रूप रंग तक ही सीमित नहीं है। वह मन, वचन और कर्म सब में देखा जा सकता है।

 

भाषा:- शुक्ल जी ने उपर्युक्त तथ्यों के अनुकूल ही अच्छी भाषा की चार विशेषताएं मानी है। पहली विशेषता तो यह है कि अगोचर बातों और भावनाओं को भी जहां तक हो सके भाषा स्थूल गोचर रूप दे। इस मूर्ति विद्यान के लिए भाषा लक्ष्णा शक्ति से काम ले - 'बनन में बागन में बगरो वसंत है' (पद‍्माकर)। इसी के फलस्वरूप दूसरी मांग यह है कि भाषा जाति संकेत वाले शब्दों की अपेक्षा विशेष रूप व्यापार सूचक शब्दों का अधिक व्यवहार करे (यह भी उनकी विषय प्रधान प्रतिभा का फल है)। तीसरी विशेषता भाषा सुंदर वर्ण विन्यास की होनी चाहिए। नाद-सौंदर्य से कविता का स्थायीत्व बढ़ता है। तो भी विशेषता कोरे नाम की अपेक्षा उनके रूप गुण या कार्य बोधक शब्दों के व्यवहार की है।

 

लोकमंगल की साधनावस्था:- शुक्ल जी ने इसी सौंदर्य को लोक-मंगल भी कहा है और अपने काव्य में लोक-मंगल की साधनावस्था वाले निबंध में उन्होंने काव्य को दो विभाग किये है-

1. आनंद की साधानावस्था या प्रयत्न पक्ष को लेकर चलने वाले।

2. आनंद सिद्धावस्था या उपयोग पक्ष को लेकर चलने वाले।

इस विभाजन द्वारा आचार्य शुक्ल ने यह बतला दिया है कि सौंदय को हम केवल श्रृंगार प्रधान कविताओं में ही जहां नायक-नायिकाओं या चंद्र, ज्योत्सना, यमुना, पुलिन, गीत वाद्य, मलय-समीर में नहीं देख सकते हैं वरन ऐसे स्थलों में भी देख सकते हैं कि जहां क्रोध, घृणा और मार-काट हो। यह क्रोध, घृणा और मारकाट अत्याचार और जीवन की वीभत्सताओं को दूर करने के प्रयत्न में होती है। इसलि सौंदर्य (जिसमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों का प्रकार शामिल है) के स्थापन का जहां प्रयत्न दिखाई पड़े वह भी सुंदरता है।

 

साधारणीकरण:- शुक्ल जी कहते है 'साधारणीकरण का अभिप्राय यह है कि पाठक या श्रोता के मन में जो व्यक्ति विशेष या वस्तु आती है, वह जैसे काव्य में वर्णित आश्रय के भाव का आलंबन होती है वैसे ही सब सहृदय पाठकों या श्रोताओं के भाव का आलंबन होती है।'

शुक्ल जी ने इस संबंध में यह और बतलाया है कि सब अवस्थाओं में पाठक का आश्रय की अनुभूति से तादाम्य नहीं हो सकता। जैसे यदि कोई निरपराध के प्रति क्रोध करे तो हम क्रोध करने वाले आश्रय के भावों से तादाम्य नहीं रखते वरन‍् उसके प्रति घृणा के भाव को रखने लगते है। ऐसी अवस्था में आश्रय आश्रय नहीं रहता वरन‍् स्वयं वही हमारा आलंबन बन जाता है।

 

रीति ग्रंथों का विरोध:- शुक्ल जी ने हिंदी में पहली बार जमकर रीति ग्रंथों का विरोध किया, साहित्य पर उनके घातक प्रभाव का उल्लेख किया। कुछ खास तरह के नायकों, नायिकाओं, उद्दीपन आदि के भीतर साहित्य को बांध रखने के प्रयास का विरोध करते हुए उन्होंने कहा - ''जिस प्रकार बाह्य दृश्यों के अनंत रूप है उसी प्रकार मनुष्य की मानसिक स्थिति के भी विविध प्रवृत्तियों के मेल में संघठित जो अनेक स्वभाव के मनुष्य दिखाई पड़ते है उनके स्पष्टीकरण के लिए मानव प्रकृति के अन्वीक्षण की आवश्यकता होती है। यह आवश्यकता उक्त चार प्रकार के ढाचे तैयार मिलने से पिछले कवियों में न रह गई।''

रीति ग्रंथों के विरोध का मूल सूत्र यही है - मानव प्रकृति के विविधता। शुक्ल जी यर्थाथवाद की भूमि से रीति ग्रंथों की कृत्रिमता दिखतो है। उनका आग्रह साहित्य को यर्थाथ जीवन के निकट लाने के लिए हैउसे सच्चा और स्वभाविक बनाने के लिए है।

इसी तरह शुक्ल जी वीर रस के स्थायी भाव उत्साह का क्षेत्र भी व्यापक कर दिया है। वैज्ञानिक अनुसंधान, अगम स्थानों की यात्रा, कुरीतियों के विरोध आदि में उन्होंने उत्साह की व्यापकता दिखाकर उसे सामंती युद्धों के तथाकथित वीर रस की परिधि से बाहर निकाला।

शुक्ल जी सामंतों के हाथों कविता की जो दुर्दशा हुई है उसके बारे में क्रोध से लिखते है -

''कविता पर अत्याचार भी बहुत कुछ हुआ है। लोभियों, स्वार्थियों और खुशामदियों ने उसका गला दबाकर कहीं अपात्रों की आसमान पर चढ़ाने वाली स्तुतित करायी, कहीं द्रव्य न देने वालों की निंदा। ऐसी तुच्छ वृत्तिवालों का अपवित्र हृदय कविता के निवास के योग्य नहीं।''

शुक्लजी सामंती संस्कृति के ही विरूद्ध नहीं है, वे यूरोप की बर्बर साम्राज्यवादी संस्कृति का भी विरोध करते है।

शुक्ल जी ने भारतीय सामंतवाद और यूरोपीय पूंजीवाद की सांस्कृतिक धाराओं का जहां खंडन किया है, वहां उन्होंने भारतीय पूंजीवाद की मूल सांस्कृतिक स्थापना निष्क्रिय प्रतिरोध का भी खंडन किया है।

 

काव्य चिंतन:- शुक्ल जी के विचार में काव्या के रसास्वादन का लक्ष्य आनंद नहीं 'भाव योग' है। अर्थात कविता के द्वारा मनुष्य हृदय की मुक्ति की साधना करता है। कविता का लक्ष्य मनुष्य को व्यष्टि से समष्टि में लीन कर देना है। जिसे रस दशा कहा जाता है उसके विषय में शुक्ल जी का कहना है कि ''लोक हृदय में हृदय लीन होने की दशा का नाम रस-दशा है।"

 

विभिन्न यादों की जो विवेचना शुक्ल जी ने की है, उसमें उन्होंने अद‍्भुत पाण्डित्य, मौलिकता और पर्यवेक्षण का सबूत दिया है। उदाहरणस्वरूप करूणा और प्रेम विषयक विवेचन को रखा जा सकता है। उनके अनुसार करूणा ही ऐसी भावना है जो मनुष्य को अंतत: लोक - रक्षा की ओर उन्मुख करती है। करूणा के ही कारण काव्य लोक-सामान्य भावभूमि तक पहुंचाता है। अत: करूणा सामाजिकता का मूल आधार है।

प्रेम और करूणा संबंधी विवेचना भारतीय काव्यशास्त्र को शुक्ल जी की देन है। उनकी इस विवेचना का प्रभाव उनके काव्य चिंतन और उनकी व्यवहारिक समीक्षा पर अत्यंत व्यापक एवं गंभीर रूप से पड़ा है। करूणा का संबंध उन्होंने साधानावस्था से जोड़ा और प्रेम का सिद्धावस्था से।

'प्रेम' का अदकाश करूणा द्वारा प्रेरित प्रयत्नों के सफल होने के बाद होता है। आदि-काव्य रामायण के कथानक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने लिखा है, "लोक के प्रति करूणा जब सफल हो जाती है, लोक जब पीड़ा और विघ्न-बाधा से मुक्त हो जाता है तब राम राज्य में जाकर लोक के प्रति प्रेम पवर्तन का , प्रज्ञा के रंजन का, उसके अधिकाधिक सुख के विधान का अवकाश मिलता है।''

आनंद सिद्धावस्था का चित्रण करने वाली रचनाओं का बीज भाव 'प्रेम' है। प्रेम के दो पक्ष हैं - रंजन और पालन।

रंजन का संबंध श्रृंगार से है और पालन का वात्सल्य से। प्रेम के केवल श्रृंगार पक्ष पर ही बल देने को शुक्ल जी ठीक नहीं समझते। सूरदास की कविता को शुक्ल जी इसलिए पसंद करते है कि सूरदास ऐसे कवि है जिन्होंने वात्सल्य का चित्रण भी किया है और उसे श्रृंगार से अधिक नहीं तो कम महत्व भी दिया है।

शुक्ल जी के काव्य चिंतन में काव्य और जीवन का भेद नहीं के बराबर है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि हमें सृष्टि सौंदर्य के प्रत्यक्ष दर्शन में उसी प्रकार की रसानुभूति होती है जैसी रसानुभूति उत्तम काव्य के परायण से होती है।

 

रूप विधान:- शुक्ल जी ने माना है कि रूप विधान तीन प्रकार के हाेते है-

1. प्रत्यक्ष रूप विधान

2. स्मृत रूप विधान

3. संभावित या कल्पित रूप विधान।

 

प्रत्यक्ष रूप में विधान के अंतर्गत् शुक्ल जी के परम प्रिय विषय प्रकृति तथा मनुष्य का कर्म-कलाप आ जाता है तथा स्मृत रूप विधान के अंतर्गत इतिहास। संभावित या कल्पित रूप विधान के अंतर्गत प्रत्यक्ष देखे या जाने पदार्थों के आधार पर नवीन वस्तु व्यापार-विधान खड़ा किया जात है। कल्पना कवि को अपार शक्ति और क्षेत्र प्रदान करती है।

शुक्ल जी के मत में मूल और महत्वपूर्ण है - प्रस्तुत भाव। अप्रस्तुत या तो प्रस्तुत का पोषण करे या उसके सदृश हो। वस्तुत: सदृश्य विधान से भी पोषण ही होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि रूप विधान में भी शुक्ल जी प्रस्तुत को ही महत्वपूर्ण मानते है। यह मत भी उनकी वस्तुवादी और ऐहिक चिंतन प्रणाली की संगति में है।

 

लोक:- 'लोकमंगल' शब्द परंपरा प्राप्त है। 'श्रीमद‍्भगवतगीता' में कहा गया है कि श्रीकृष्ण का अवतार लोक के मंगल, क्षेम व अभ्युदय के लिए ही हुआ है - ''मंगलाय च लोकानां क्षेमाय च भवाय च।'' इसी आधार पर तुलसीदास ने भी 'रामचरित्रमानस' में वशिष्ठ मुनि के मुख से यह कहलवाया है कि राम जन्म 'जग मंगल' के लिए हुआ है,''राम जन्मु जग मंगल हेतू।''

'रामचरितमानस' में तो आदि से अंत तक मंगल शब्द की व्याप्ति है। ऐसा लगता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा प्रयुक्त 'लोकमंगल' शब्द का आधार 'रामचरितमानस' ही है।

शुक्ल जी ने लोक मंगल की साधनावस्था का संबंध जीवन के प्रयत्न पक्ष से जोड़ा है। आंनद की सिद्धावस्था को जीवन के उपयोग पक्ष से जोड़ा। शुक्ल जी की अहिंसा, दया, शांति, और क्षमा की नींव पर ही 'सिद्धवस्था' को आधारित मानते हैं और 'कलियुगी समाज' के साथ 'जैसे को तैसा' बर्ताव को 'साधनावस्था' में ही संभव मानते है।

"लोकमंगल" शब्द शुक्ल जी ने समाज दर्शन व काव्य दर्शन का केंद्र बिंदु है। यह शब्द उनके द्वारा परिभाषित "लोकसंग्रह" व "लोकधर्म" शब्द से कहीं अधिक व्यापक अर्थ रखता है। 'लोक' के साथ जब मंगल शब्द जुट जाता है तो वह मनुष्य जाति के साथ साथ भूमंडल के समस्त प्राणियों के कल्याण का आकांक्षी बन जाता है।

शुक्ल जी ने समीक्षा-सिद्धांत साहित्य रचनाओं के आधार पर स्थापित किये है। अतः उनकी सैद्धांतिक और व्यवहारिक समीक्षा में संगति है। शुक्ल जी ने प्राचीन साहित्य में से समीक्षा के लिए तुलसीदास, सूरदास और जायसी को चुना। संस्कृत के कवियों में उन्हें वाल्मीकि, भवभूति और कालीदास विशेष रूप से प्रिय थे। करूणा और प्रेम का जो विशद विवेचन उन्होंने किया है शीलदशा की काव्य में जो उपयोगिता आंकी है, आनंद की साधनावस्था और सिद्धावस्था की जो कल्पना की है तथा काव्य में लोकमंगल का जो महत्व स्थापित किया है वह सब अपने प्रिय कवियों की व्याख्या करने के उपक्रम में। तुलसीदास और सूरदास की आलोचना करते हुए प्रसंगवंश उन्होंने भक्ति की भी व्याख्या की है। भक्ति की जो व्याख्या उन्होंने की है वह लौकिक है।

 

शुक्ल जी के अनुसार प्रेम को ही अपने काव्य के लिए चुनने के कारण सूरदास आनंद की साधना या प्रयत्नावस्था के नहीं, सिद्धावस्था के कवि है। शुक्ल जी को सूर का संयोग वर्णन अच्छा लगता है क्योंकि बाल लीला के समान कृष्ण की प्रेम लीला भी प्रकृति और कर्मक्षेत्र की पृष्ठभूमि में वर्णित है।

तुलसीदास शुक्ल जी के प्रिय क्या आदर्श कवि है। वे कहते हैं, "हिंदी कवियों में इस प्रकार की सर्वांगपूर्ण भावुकता हमारे गोस्वामी जी में है जिसके प्रभाव से रामचरितमानस उत्तरी भारत की सारी जनता के गले का हार हो रहा है।"

शुक्ल जी ने राम कथा के भीतर अनेक अत्यंत मर्मस्पर्शी स्थलों का उल्लेख किया है। इसमें भी सबसे प्रिय एवं मर्मस्पर्शी उन्हें राम वनगमन प्रसंग लगता है।

जायसी मुस्लिम सूफी कवि थे, लेकिन शुक्ल जी ने उन्हें भक्तों की कोटि में परिगणित किया है। जायसी और सूफी कवियों की जिस विशेषता ने शुक्ल जी को सबसे अधिक आकृष्ट किया है वह है कि प्रकृति वर्णन। सूफी कवि "प्रेम की पीर" की व्यंजना करते थे।

नागमति के विरह वर्णन को शुक्ल जी ने हिंदी में अद्वितीय कहा है। शुक्ल जी ने रिचडर्स, वाल्ट हिटमैन, डिकन्सन, कमिंग्ज, जैसे आधुनिक कवियों की प्रासंगिक समालोचना की। शुक्ल जी ने श्रीधर पाठक और रामनरेश त्रिपाठी को सच्चे अर्थों में स्वच्छंदतावादी कवि माना है। उनके अनुसार इन कवियों में स्वच्छंदता का स्वाभाविक विकास है।

 

रहस्यवाद:- शुक्ल जी छायावाद के आध्यात्मिक रहस्यवादी रूप के विरोधी थे। वे ऐस रहस्यवाद को काव्य के क्षेत्र के बाहर की चीज समझते थे। हिंदी के छायावादी आंदोलन को उन्होंने बाहर का अंधानुकरण माना है। उनके अनुसार स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर पर पाश्चात्य ढांचे के आध्यात्मिक रहस्यवाद का प्रभाव था।

 

छायावाद:- शुक्ल जी छायावाद को काव्य शैली मात्र मानते है। इसके कथ्य या वस्तु में कोई नवीनता है, यह वह नहीं मानते। उनके इतिहास को ध्यानपूर्वक पढ़ने से ज्ञात होता है कि वे छायावादी वस्तु और मुकुटधर पांडेय, मैथिलीशरण गुप्त इत्यादि स्वाभाविक स्वच्छंदतावादी कवियों की काव्य वस्तु में कोई खास अंतर नहीं मानते। छायावाद से शुक्ल जी की शिकायत का मुख्य कारण था 'अर्थभूमि के विस्तार की ओर दृष्टि ना जाना' और ''विभाव पक्ष का शून्य अथवा अनिर्दिष्ट रह जाना।'

इस वाद में शुक्ल जी के प्रिय कवि पंत है। वे उन्हें श्रेष्ठ मानते है। निराला को इनसे कमतर मानते थे।

 

निष्कर्ष:- आचार्य रामचंद्र शुक्ल समालोचना के आधुनिक आदर्श की प्रतिष्ठा स्थापित करने वाले एक अधिकृत आचार्य है। इनसे ही हिंदी आलोचना परवान चढ़ती है। डॉ इंद्रनाथ मदान का कहना है, ''शुक्ल जी ने प्रयोगात्मक एवं सैद्धांतिक आलेचना का समन्वय कर निश्चित मानदंड को तुलसी, सूर, जायसी के मूल्यांकन से स्थापित किया। आलोचना के सिद्धांतों का निरूपण करने के लिए प्रधानत: भारतीय काव्यशास्त्र और गौणत: पाश्चात्य काव्य शास्त्र का आधार बनाया।

शुक्ल जी काव्य उद्देश्य को एक शब्द 'शील विकास' में व्यक्त करते हैं। वे स्थूल  नैतिकता या भौतिक लाभ-हानि के प्रश्न को त्याग कर साहित्य की सूक्ष्म शक्ति-भावनाओं के उद्वेलन की शक्ति को साहित्य की कसौटी के रूप में अपनााय। उन्होंने काव्य में सौंदर्य या रस को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया।

 

शुक्ल जी ने आलोचना के तीन रूपों सैद्धांतिक, ऐतिहासिक और व्यवहारिक के विकास में पूर्ण रूप से योगदान दिया। शुक्ल जी काव्य में 'लोक' को महत्वपूर्ण स्थान देते है। वे सिद्धावस्था की तुलना में साधनावस्था को अधिक महत्व देते है। शुक्ल जी देशभक्त लेखक थे। वे हिंदू मुस्लमानों की कट‍्टरता के विरोधी थे। शुक्ल जी का दार्शनिक दृष्टिकोण मूलत: वस्तुवादी है।

 

शुक्ल जी उन्हीं कवियों को पूर्ण कवि मानते है जो पीड़ा, बाधा, अन्याय, अत्याचार आदि के दमन में तत्पर शक्ति के संचरणा में भी उत्साह, क्रोध, करूणा, भय, घृणा इत्यादि गतिविधि में पूरी रमणीयता देखते हैं। वे शेली, टॉल्सट‍्वाय से प्रेरित है। वे सामंती, दरबारी साहित्य, पूंजीवादी साहित्य के विरोधी हैं। वे रीति ग्रंथों की आलोचना करते है। वे रहस्यवाद, छायावाद जैसे वादों का विरोध करते है। वे लोक धर्म को सर्वोपरि मानते है, लोकचेतना, लोकमंगल आदि उनके महत्वपूर्ण शब्द है। वे रीतिवाद, कलावाद, वैयक्तिवाद, रूढिवाद का खंडन करते है।

 

संदर्भ सूची ग्रंथ:-

1. हिंदी आलोचना: पाठ एवं विश्लेषण: तरूण
2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना: डॉ रामविलास शर्मा
3. आलोचक रामचंद्र शुक्ल: प्रो गुलबराय
4. ई.ग.न.यू: हिंदी आलोचना
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लेखक परिचय
शिक्षा- बी.ए हिंदी (प्रतिष्ठा),लेडी श्री राम कॉलेज फ़ॉर विमन, नई दिल्ली

● अध्यक्ष, हिंदी साहित्य सभा, लेडी श्री राम कॉलेज फ़ॉर विमन (दिल्ली विश्वविद्यालय) 2020-21.

● लैंग्वेज एडिटर (कॉलेज मैगज़ीन) 2019-2020, 2020-2021
● मुख्य संपादक (हिंदी विभाग) 2019-2020, 2020-2021 
● हिंदी अनुवादक के रूप में स्कॉलिस्टिक इंडिया में कार्य अनुभव।

प्रकाशन:- 'जादू की छड़ी' (बाल कविता संग्रह) अंतरा शब्द-शक्ति प्रकाशन 2019

अखबार:- हिंदुस्तान,सिटी फ्रंट,अमर उजाला,सन्मार्ग,दैनिक जागरण,सच्चा दोस्त
पत्रिका:-छपते छपते 2019, सेतु, कलमजीवी, नूतन कहानियां, अनंतिम, काफला पत्रिका (द्विभाषी)
ई पत्रिका:- हस्ताक्षर,साहित्य सुधा
साझा संग्रह:- वीमेन आवाज़

सम्मान- 
1.बाल श्री सम्मान ( नृत्य के क्षेत्र में) 2011
2.उद्भव कला सम्मान ( नृत्य के क्षेत्र में) 2012
3.बिहार विकास रत्न सम्मान (नृत्य के क्षेत्र में) 2012
4.दैनिक भास्कर मेधावी छात्र सम्मान 2017
5.बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान,पटना 2019
6.चित्रगुप्त सेवा सम्मान(उभरती प्रतिभा) ,चित्रगुप्त सामाजिक संस्थान,पटना 2019
7. आगमन 'युवा तेजस्विनी' सम्मान 2020, आगमन संस्थान

प्रसारण:- दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से सुगम संगीत एवं नृत्य का प्रसारण

रुचि:- साहित्य,संगीत,नृत्य,चित्रकला
 

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