कबीरदास की भक्ति भावना

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी); ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

हिंदी भाषा और साहित्य के 1000 वर्ष के इतिहास में कबीर जैसा कवि तथा समाज सुधारक कदाचित ही कोई हुआ। कबीर की भक्ति का मार्ग आदिकालीन सिद्ध तथा नाथों की विचारधारा से होता हुआ कबीर में प्रवेश करता है। हिंदी साहित्य के भक्ति काल में निर्गुण काव्य धारा के अंतर्गत कबीर का स्थान सर्वोपरि है। कबीर हिंदी साहित्य की भक्तिकालीन साहित्य परंपरा के शिखर कवि हैं। निर्गुण काव्य धारा के अंतर्गत लगभग सभी कवि निरक्षर थे। पर्यटन शील थे। इस काल के कवि अपने व्यक्तिगत अनुभव पर बल देते हुए समाज को नया मार्ग दिखा रहे थे। जिसकी पुष्टि कबीर की इस साखी से होती है। कबीर कहते हैं - 
 "तेरा मेरा मनवा कैसे एक होवे रे।
 तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आँखन की देखी।।

 कबीर भक्तिकालीन निर्गुण काव्यधारा के ऐसे शिखर पुरुष थे जिनका प्रभाव संपूर्ण काव्यधारा पर परिलक्षित होता है। भक्तिकालीन निर्गुण काव्यधारा अर्थात संतमत के उद्भव एवं विकास के अध्ययन के फलस्वरूप यह स्पष्ट है कि इसका श्री गणेश सिद्ध, नाथों की वाणियों से ही होता हुआ नामदेव के माध्यम से उत्तर भारत में आकाशधर्मा गुरु रामानंद का सानिध्य प्राप्त कर चतुर्दिक फैला। भक्ति का आरंभ द्रविड़ के आलवार तथा नयनारों से प्रारंभ होकर महाराष्ट्र म़े नामदेव, ज्ञानदेव, तुकाराम आदि साधकों का सानिध्य प्राप्त कर उत्तर में आया। उत्तर भारत में काशी के स्वनामधन्य गुरु रामानंद का स्पर्श प्राप्त कर भक्ति को नया मंच मिला। इसलिए डॉ. सत्येंद्र कहते हैं कि - "भक्ति द्रविड़ उपजी लाए रामानंद, सात दीप नौ खंड में कबीर ने किया प्रचंड।" रामानंद के अनेक शिष्य थे। उनमें कबीर का स्थान सर्वोपरि है। कबीर के अतिरिक्त धर्मदास, गुरुनानक, शेख फरीद, मलूकदास, दादूदयाल, हरिदास, सुंदरदास, यारी साहब, दरिया साहब, बुल्ला साहब, चरणदास, तुलसीसाहब, गरीबदास, जगजीवनदास, दयाबाई, सहजोबाई, पलटूदास आदि कितने ही संत कवि हुए जिन्होंने अपनी भाव विभोर वाणी द्वारा अध्यात्मिक साधना एवं सामाजिक अभ्युत्थान के प्रति अपने विचार प्रकट किए। इन्होंने माया, मोह, बाह्यडंबर, कनक और कामिनी, माँसाहार, तीर्थाटन आदि का विरोध करते हुए जीवन के संयम, दया, क्षमा, संतोष, ईश्वर विश्वास आदि पर बल दिया। इनमें कबीरदास की वाणी सबसे ऊपर आती है। कबीर न केवल महान कवि थे बल्कि वे उच्च कोटि के समाज सुधारक थे। वे निर्गुण भक्ति के प्रबल प्रचारक तथा हिंदी संत काव्य के प्रतिनिधि कवि हैं। हिंदी संत काव्य धारा में उनका सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता है।

कबीर की भक्ति भावना-
 हिंदी साहित्य की भक्ति काव्य धारा में दो काव्य धाराएँ प्रमुख है- सगुण तथा निर्गुण भक्ति। कबीर निर्गुण भक्ति के अनुयायी थे। गुरु रामानंद से दीक्षा प्राप्त कर कबीर ने वैविध्यपूर्ण भक्ति को समाजसुधार से जोड़ा। जनसामान्य तथा विविधवर्णी सोच को साफ तथा निर्मल बनाया। भक्ति को कबीर ने सैद्धांतिक अवधारणाओं से निकालकर व्यावहारिक रूप प्रदान किया। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा तथा अन्य धार्मिक स्थलों की महत्ता मानव से ऊपर नहीं बतायी। मानवता को सर्वोपरि बताया। कबीर की यह वैष्णवत्रभक्ति एक और तो भारतीय अद्वैतवादी भावना से प्रभावित थी और दूसरी ओर इस पर मुसलमानी एकेश्वरवाद का भी प्रभाव था। इसका मूल कारण यह था कि कबीर एक ऐसी भक्ति धारा को प्रवाहित करना चाहते थे, जिसे सभी वर्ग एवं सभी वर्ण के व्यक्ति बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सके। उस समय हिंदू और मुसलमानों में पारस्परिक वैमनस्य एवं ईर्ष्या- द्वेष अत्यधिक बढ़ रहे थे। अतः कबीर ने अपनी निर्गुण भक्ति का आश्रय लेकर दोनों धर्मों की पारस्परिक कटुता एवं वैमनस्य की भावना को दूर करके एक ऐसी सामान्य भक्ति का प्रचार किया, जिसमें राम और रहीम, कृष्ण और करीम, महादेव और मोहम्मद की एकरूपता स्थापित करके एक ईश्वर की उपासना पर जोर दिया गया और ईश्वर की एकता के आधार पर मानव मात्र की एकता का प्रचार किया गया। 

कबीर की निर्गुण भक्ति की महत्वपूर्ण विशेषताओं निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है-

1. गुरु महिमा/गुरु की महत्ता-
गुरु का महत्व भक्तिकाल के लगभग सभी कवियों ने बताया परंतु कबीर ने बहुत ही व्यावहारिक तरीके से गुरु के महत्व पर या गुरु की महिमा पर प्रकाश डाला। कबीर ने कहा कि गुरु गोविंद से भी बड़ा है। वे कहते हैं-
 "गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
 बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दियो बताए।।"
अर्थात् गुरु हमें ईश्वर तक पहुँचाने के लिए हमें रास्ता, मार्ग दिखाते हैं। इसलिए अगर गुरु और गोविंद (भगवान) एक साथ हो तो उस समय हमें गुरु को पहले नमन करना चाहिए । कबीरदास के उपर्युक्त इस पद्य से स्पष्ट है। यहाँ स्वयं भगवान कह रहे हैं कि पहले आप अपने गुरु को नमन करें।
 कबीर के एक अन्य पद से गुरु की महत्ता को समझा जा सकता है। कबीर कहते है-
 "कबीरा ते नर अंध है, जो गुरु को कहते और।
 हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ।।"
अर्थात् कबीर कहते हैं कि वे लोग अंधे हैं, अज्ञानी है जो गुरु के महत्व को नहीं जानते हैं, क्योंकि भगवान को प्राप्त करने के लिए गुरु रूपी मार्ग से गुजरना आवश्यक है। यदि भगवान रूठ जाता है तो उनको मनाने की विधि गुरु ही हमें बताएंगे लेकिन यदि गुरु ही रूठ गए तो फिर इस संसार में हमारा कोई भी हितैषी नहीं हो सकता।
कबीर के एक और पद से गुरु के महत्व को रेखांकित किया जा सकता है। कबीर कहते हैं-
 "सतगुरु की महिमा अनत, अनंत किया उपगार। 
 लोचन अनंत हो उघाड़िया, अनंत दिखावणहार।।" यहाँ बताया है कि गुरु ही उस अनंत, असीम सचराचर सत्ता से व्यक्ति को मिलाता है या यूं कहें कि उस तक पहुँचाने का काम करता है। स्पष्ट है कि गुरु हमें अज्ञानता से प्रकाशमान की ओर लेकर जाता है। 

2. ईश्वर की एकता/परमात्मा की एकता/एकेश्वरवाद पर बल-
 कबीर ने हिंदुओं के बहुदेववादऔर तथा मुसलमानों के एकेश्वरवाद के विरुद्ध एक ईश्वर का प्रसार किया। जो घट घट वासी है। सर्वत्र रमा हुआ है। निर्गुण निराकार है। इसलिए कबीर ने "मुसलमान का एक खुदाई, कबीर का स्वामी रह्या समाई" कहकर मुसलमानों के उस एकेश्वरवाद का विरोध किया, जिसके अनुसार खुदा को बंदे से पृथक सातवें आसमान पर बैठा हुआ माना है और 'अपरंपार के नाउँ अनंत' तथा 'जाके मुख माथा नहीं, नाही रूप कुरूप" आदि कहकर हिंदुओं की बहुदेव उपासना का विरोध करते हुए एक ईश्वर के अनेक नाम बताएं तथा उसे निर्गुण, निराकार बताया है। 
 
इस प्रकार कबीर ईश्वर संबंधी भावना में एकता की स्थापना करते हुए एक निराकार ईश्वर की उपासना पर जोर देते हैं। उसे सर्वव्यापी, सर्व नियंता, सर्वोपरि तथा परात्पर ब्रह्म कहकर बुद्धि, मन और वाणी से सर्वथा अगम, अगोचर बताते हैं तथा " हमरै राम रहीम करीमा कैसो अलह राम सति सोई, बिस्मिल मेटि बिसंबर एकै और न दूजा कोई" कहकर राम रहिम, कृष्ण करीम, राम अल्लाह, बिसमिल विश्वंभर आदि सबकी एकता स्थापित करते हुए परमात्मा की एकता पर जोर देते हैं।

3. नाम स्मरण-
निर्गुण भक्ति में ईश्वर के नाम का अत्यधिक महत्व दिया गया है। सभी निर्गुण भक्त कवियों ने परमात्मा के नाम के महत्व पर बल दिया है। उन्होंने परमात्मा के नाम को ही ब्रह्म माना है। जिस तरह से कबीर ईश्वर के रूप के स्थान पर उनके नाम के महत्व को महत्व देते हैं। ठीक उसी तरह से वे ऐसी ईश्वर के नाम स्मरण का विरोध करते हैं। यथा-
 "माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं।
 मनुवाँ तो दस दिसि फिरै, सो तो सुमिरन नाहिं।।"
अर्थात् माला तो हाथ में फिरती और जीभ मुख में फिरती है परंतु मन दस दिशाओं में फिरता है। कबीर कहते हैं कि चिल्लाने से ही भगवान प्राप्त नहीं होता, हम अपने मन में हे ईश्वर के नाम का स्मरण करें। दिखावा आवश्यक नहीं। कबीर दिखावे का विरोध करते हैं। 

4. आचरण की शुद्धता-
 कबीरदास आचरण की शुद्धता पर बल देते हैं। कबीर माया-मोह, कनक-कामिनी, काम, क्रोध, लोभ, आदि को छोड़ते हुए विशुद्ध आचरण पर बल देते हैं। कबीर सज्जनों की संगति और दुष्टों से दूरी की बात करते हैं। यथा-
 "कबीर संगति साधु की, बेगि करीजै जाइ।
 दुरमति दूरि गँबाइ सो, देसी सुमति बताइ।।"
अर्थात् साधु संगत से ही मनुष्य की अज्ञानता दूर होती है।

5. मध्यमार्गी दृष्टि का अनुसरण- 
 कबीर ने गौतम बुद्ध के मध्यम मार्ग का अनुसरण किया। कबीरदास ने मध्यममार्ग का अनुसरण करते हुए कहा कि हमें न तो पूरी तरह से गृहासक्ति पर बल देना चाहिए हैं तथा न ही गृहस्थ का परित्याग करना चाहिए। इसमें साधक गृहस्थी के अंदर रहकर ही काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों पर विजय पाता हुआ अनासक्त होकर भगवद्भजन में लीन रह सकता है। इसलिए कबीर उस दृष्टि को सामने रखते हुए कहते हैं कि उसे एकांत या जंगल में जाने की आवश्यकता नहीं बल्कि मन को वश में रखने वाला व्यक्ति गृहस्थ होकर भी वैराग्यपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकता है। यदि एकांतवास करने वाले व्यक्ति का मन पर नियंत्रण नहीं है तो वह बैरागी होकर भी गृहासक्त बन सकता है। कबीर कहते हैं कि शरीर को इतना कष्ट दे कि शरीर ही खत्म हो जाए और न इतना आलसी बने कि हम कुछ कर ही नहीं सकते। शरीर को अधिक कष्ट देकर कठिन साधना अधिक दिन तक नहीं चल सकती। अर्थात् सितार के तार को इतना नहीं खींचों कि टूट जाए तथा इतना ढीला भी ना करो कि बेसुरा हो जाए।" मध्यम मार्ग ही सर्वोच्च मार्ग है। 

6. माधुर्य भाव-
 कबीर की भक्ति में माधुर्य भाव की तीव्रता मिलती है। कबीर की भक्ति में सूफी कवियों जैसा माधुर्य भाव दृष्टिगोचर होता है। आत्मा और परमात्मा के पारस्परिक योग का वर्णन कबीर ने किया है, वह बहुत ही भाव विभोर करने वाला है। उसमें विरह की जो तीव्रता है, वह साहित्य और अध्यात्म में बहुत कम देखने को मिलती है। यथा-
 बासुरी सुख नाँ रैणि सुख,नाँ नाँ सुख सुपिनै माँहि।
 कबीर बिछुट्या राम सूँ,नाँ सुख धूप न छाँहि।।
*** **** ****
बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।
जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मन नाहिं विश्राम।।
*** *** ***
यह तन जालौ मसि करूँ, ज्यूँ धूवाँ जाइ सरग्गि।
मति वै राम दया करैं, बरसि बुझावै अग्गि।।

उपर्युक्त सभी पदों से स्पष्ट है कि कबीर की आत्मा अपने निर्गुण एवं निराकार परमात्मा के लिए विरह व्यथित नारी की भाँति छटपटाती हुई अंकित की गयी है। उसे न दिन में सुख मिलता हैं, न रात में, न जागने पर सुख मिलता है और न स्वप्न में, न धूप मे सुख मिलता है और न छाँह में। इस तरह विरहिणी की भाँति अत्यंत व्यथित आत्मा का चित्रण करके कबीर ने माधुर्य भाव की भक्ति को अपनाया है।

7. हठयोग का समावेश-
कबीर की भक्ति पर आदिकालीन नाथों के हठयोग का प्रभाव दिखाई देता है। कबीर ने जगह - जगह इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, कुंडलिनी, अष्टचक्र आदि का उल्लेख किया है। जैसे-
 ० अष्ट कमल दल चरखा डौले।
 ० सुन्न मंडल में घर किया।
 ० गगन मंडल सींगी बाजै।

इस प्रकार कबीर ने हठयोग का जगह - जगह पर वर्णन करके अपनी निर्गुण भक्ति का निरूपण किया है।

8. प्रपत्ति भाव का अनुगमन- 
 कबीर की भक्ति में प्रपति भाव को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। प्रपति शब्द का शाब्दिक अर्थ है- अनन्य भक्ति। वायु पुराण में प्रपति के छह अंग माने गए हैं -1 अपने इष्ट के अनुकूल गुणों को धारण करने का संकल्प 2. उसके अनुकूल गुणों का त्याग 3. इष्ट देव द्वारा रक्षा का विश्वास 4. रक्षक का गुणगान 5. आत्मसमर्पण 6 दैन्य।

 कबीर की भक्ति में उक्त 'षट् विद्या शरणागति' पूर्ण रूप से विद्यमान है। कबीर की सभी साखियों, पदों में निर्गुण, निराकार ब्रह्म के गुणों का ही वर्णन मिलता है। कबीर ने काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया,आशा, तृष्णा आदि के परित्याग का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर प्राप्ति के मार्ग मे उपर्युक्त सभी गुण बाधक है। अतः उपर्युक्त सभी प्रतिकूल गुणों को छोड़ने की सलाह दी है।

कबीर की भक्ति भावना के वर्णन विश्लेषण तथा अध्ययन करने के पश्चात यह स्पष्ट होता है कि उनकी भक्ति निष्काम भाव की है। कबीर की भक्ति में निष्काम भाव की प्रबलता है। निर्गुण ब्रह्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास प्रकट किया गया है। कबीरदास की भक्ति साधना में बाह्य साधनों की अपेक्षा, आंतरिक साधना पर जोर देते हुए मानसिक पूजा एवं मानसिक ध्यान को महत्व दिया गया है। शुद्ध आचरण तथा सत्य आचरण पर बल दिया है। मूर्ति पूजा एवं अवतारवाद का खंडन करते हुए केवल नाम स्मरण द्वारा ब्रह्म से साक्षात्कार करने के लिए आग्रह है । भगवान के गुण कीर्तन को महत्व देते हुए भक्तों के आत्मसमर्पण को भक्ति का अनिवार्य अंग घोषित किया है तथा सत्संगति, साधु सेवा, इंद्रिय निग्रह, संयम, वैराग्य, अनासक्त भाव, माया का परित्याग, गुरु सेवा, माधुर्य भाव आदि का महत्व कबीर की भक्ति में बहुत ही विनम्रता तथा व्यवहारिकता के साथ स्पष्ट है।

संदर्भ 
1. डॉ. बच्चन सिंह - हिंदी साहित्य का इतिहास -
2. डॉ. द्वारका प्रसाद सक्सेना - प्राचीन प्रतिनिधि कवि- 
3. डॉ. सत्येंद्र - कबीर

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