कहानी: हिटलर की प्रेमकथा

- कुसुम भट्ट


बी- 39, नेहरू कालोनी, देहरादून
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बचपन के दिन थे। चिंता से मुक्त और कौतूहल से भरे पाँवों के नीचे आसमान बिछ जाता। पंख उग आए, पंखों को फैलाए हम नाना के आसमान में जाने को बेताब, हम यानि मैं, माँ और छोटी, वैसे हम तीन जोड़ी पंखों को लेकर ही अपने जहाँ से उड़ते लेकिन माँ के पंख छोटे होकर सिकुड़ने लगते। आसमान धरती पर गिरता और पलक झपकते ही बिला जाता, धरती पर पथरीली चट्टानें उग आती। माँ कठपुतली में तब्दील हो जाती। तब्दीली हममें भी आई पर वह मनुष्य से पंछी की तब्दीली हुई... कभी नीले आसमान के छोर पकड़ बादलों में घर बनाने की जिद तो कभी बाँस-बुराँश के घने जंगल में पेड़ों की टहनियों पर फुदक-फुदक किलकारी मारने की जिद... गोया शराबी का नशा सा हमें चढ़ आया, बचपन की सरल पारदर्शी ज़िंदगी का नशा। ज़िंदगी के इस नशे से जो भी मुझे दूर करने की कोशिश करता, मैं अपने मन की डायरी में उसका पृष्ठ फाड़ने की पुरजोर कोशिश करती और अगले पृष्ठ पर दुनिया की सबसे अच्छी चीजें, जैसे मोर का पंख, फूलों की पंखुड़ियाँ, रंग-बिरंगे कागज़ की किश्तियाँ, धूप की नन्हीं तितलियाँ, वर्षा की पहली फुहार, चैत के महिने में फलों पर मँडराती तितली और भौंरे, और भोर का बाल सूरज और पूर्णिमा का चाँद, चोरी से आकर दाना टिपती गौरया और पके आमों पर चोंच मारते हरे तोते... ऐसा ही बहुत जिससे भरा रहता पृष्ठ। पर वह पेज फटता ही नहीं, आधा-अधूरा लगा रहता, अपनी समूची उलझन को लिए... मुझे वह चेहरा आतंकित करता... वीभत्स चेहरा, जो चूस जाना चाहता हो... मासूम बचपन का रस... ननिहाल हमारे गाँव से इतना दूर कि सोती चिड़ियों की जागबेला में जब वे पत्तों के बिछौनों पर पलक झपकती नन्हीं आँखों से आकाश का बड़ा सपना लिए, हवा में छलाँग लगाने की कवायद में चूँ-चूँ-चीं-चीं का रस कानों में घोलता माँ का स्वर उनके स्वर में समरस होता, ‘मुन्नी! नाना के गाँव जाना है ना?’ तो बहुत सुंदर रंग आँखों के आगे झिलमिलाते और हवा के मानिंद हमारी यात्रा की शुरूआत होती तो गोधूलि की बेला पर ही समाप्त होती। पहाड़ी रास्ते की दुर्गम पगडंडियाँ, नन्हें पाँवों में पत्थरों की खरोंच। रास्ते भर चमड़ी ही छिलती, मन तो किलकारियाँ भरता। नाना का घर ऊँचे पहाड़ की ढलान पर था एकदम अकेला भूत बंगले जैसा! रात में बाघ डुकरने की आवाज से थरथरा जाता तन... मन! भय के लिहाफ के भीतर बमुश्किल ब्रह्मबेला में नींद आती तो धूप चढ़ने पर भी आँख न खुलती फिर... एक और बाघ की गर्जना थरथरा देती प्राण, ‘अब्बी तक सो रही राजकुमारी! ससुराल में पंखा झलेगी सासू!’

माँ के होंठ कुछ कहने को होते... पर जीभ तालू से चिपक जाती... बाघ के मुँह में हाथ डालें? हाथ साबुत रहेगा भला? मैं अकबक बिछौना छोड़ कलेवा बनाती माँ के पास आ बैठती। टुकुर-टुकुर ताकती माँ की पानी भरी आँखों को-जिस घोंसले में हर पल बाज से पंख नुचवाने का भय बना रहे, वहाँ कब तक ठहरेंगे, माँ?’

माँ गूंगी सिर झुकाकर रोटी पाथती रहती - गोया पाथ रही हो उपला!

... पर कुछ था ननिहाल में - अपने गाँव से एकदम अलग, इतना अलग... कि प्रकृति की नीयत पर शंका होने लगती - ऐसे खूबसूरत पहाड़ों पर पूस माघ में जब बर्फ पड़ती तो लगता, धरती ने गले में चाँदी का चमकता हार पहन लिया, फिर उस पर धूप की अंकवार! और पहाड़ी की ओट में डूबते सूरज को रंग बदलते सुर्ख बादलों का लाल सलाम! कैसा दिव्य दृश्य!

यहाँ हर पल कुछ नया होने को होता। इसमें भय विस्मय, जिज्ञासा और अलसुबह कीचड़ में खिलते कमल पत्ते पर तिरती बूंद सी खुशी... गर्भनाल सी जुड़ी रहती।

हमारा गाँव पहाड़ की तलहटी पर था। जहाँ से सीधी खड़ी चढ़ाई चढ़कर कई पहाड़ों को फलांगते हम घुड़दौड़ी के सीधे रास्ते पर डाँडापनी की सड़क के लिए तनिक थकान उतार कर चलते, डाँडा पानी की पौड़ी जाने वाली सड़क पर तारकोल बिछा रहे मजदूर हमें देख विस्मय से भर जाते! गरम-गरम तारकोल बिछ रही रड़क के किनारे मैं और छोटी दौड़ने की प्रतियोगिता रखते, खिलखिल हँसती छोटी की कछुआ दौड़... खिल-खिल हँसती मेरी खरगोश दौड़... हमें दौड़ते देख तारकोल पुते धूल से सने चुंधी आँखों वाले नेपाली मजदूरों के हाथ रूक जाते... हमारी नई रंग-बिरंगी फूलदार फ्राकें उस पहाड़ी के नीचे धूप उड़ाती सड़क पर इंद्रधनुष बिछा रही होतीं। रंग अपने पूरे शबाब में झमक रहे होते, मजदूरों की बाँहें रंगों को पकड़ते त्वरित गति से क्रियाशील होने को होती तो पीछे हाँप-हाँप कर दौड़ती माँ आवाज देती, ‘ठहरो मुन्नी! छोटी ठहर जाओ... मत दौड़ो इतनी तेज... ठोकर लग जाएगी अरेऽऽ देखोऽऽ जीप आ रही है... सुनो घर्र घर्र की आवाज... मैं पीछे मुड़कर देखती, एक हाथ में प्लास्टिक की कंडी (टोकरी) पकड़े दूसरे हाथ को हवा में लहराती हवा की मांनिद दौड़ी चली आई माँ और छोटी का हाथ पकड़ लिया, “खरगोश सी छोटी खरगोश को छू सके तो मानूँ” मैं और तेज दौड़ती... अभी रूक गई तो शायद रूक जाएगी ज़िंदगी।

खिलखिलाती ज़िदगी कभी रूक सकी है भला? माँ गिरने का डर दिखाती... डर को मैँ और डराती... जब तक मेरी फूल सी देह पत्थर की ठोकर से सचमुच औंधी न पड़ जाती? गिर-गिर कर भी मैं खूब हँसती और दुगने उल्लास से उठकर भागती... छोटी हँसती, माँ भी हँसती, हमारी हँसी के टुकड़े पहाड़ी पर बिछलते... मजदूर हँसते, उसकी धूल भरी आँखों में आग की लपट जलती... वे उस लपट में कैद करना चाहते दो नन्हीं और एक युवा देह... माँ के पाँवों में पायल की झनकार शायद उनके अवचेतन पर रस की फुहार बरसाने लगती। तभी तो ठेकेदार ने आकर माँ का रास्ता रोक कर जाने क्या पूछना चाहा था, मैंने मुड़कर देखा, माँ का हाथ हवा में लहराया और मैं मुड़ी... माँ ने हाथ का इशारा किया ‘‘और तेज...’’ अब हम तीनों दौड़ रहे थे अपने-अपने भय के पहाड़ का बोझ सिर पर लिए... आषाढ़ की धुर दोपहर में... टोकरी के ऊपर चाय की उस छोटी दुकान पर जाकर हम तीनों ने बमुश्किल उखड़ती साँसों पर काबू पाया। फिर चाय और जलेबियों का मजा लेते माँ हमारे चेहरों की धूल झाड़ती, हम डाँडा पानी की दुकान से नीचे पहाड़ी उतरते, चलते-चलते माँ बरजती, ‘‘लड़कियों को इस कदर न हँसना चाहिए कि राहगीरों को चुभने लगे हँसी... और वे अंधेरे में गायब कर दें लड़कियाँ।’’ माँ डराती राहगीरों से, माँ डराती नाना से। तुम्हारे नाना ने तुम्हारी हँसी देख ली तो जानती हो क्या होगा? लेकिन उस क्या होगा का उस समय पता नहीं चला। सामने पहाड़ी, मस्त गिरता झरना, उसकी खिलखिलाहट! माँ के रोपे डर के पौधे को हम निर्ममता से उखाड़ कर झरने के पास दौड़ते। प्यास बुझाकर हम बौछारों से खेलने लगे। नीचे देखकर मन और किलक उठा। एक छोटी नदी अपनी चपलता में झिलमिलाती लहरों के साथ चुपचाप बहे जा रही थी। हम चप्पल हाथ में लिए नदी के किनारे नन्हीं मछलियों को पानी की गोद में खेलते देख आगे बढ़ते।

दुबली नदी के हरे पानी में धूप की किरणों का जाल बिछलता, हमारे भीतर खुशी का झरना फूटने लगता और कोई शैतान बादल लाकर सूरज आँख-मिचैली खेलने को लपकता... हमारे रास्ते में अंधेरा डगमगाने लगता, हम गिरने को होते, उससे पहले माँ की हिदायत मिलती। रास्ते में नदी के ऊपर एक गाँव के बीच हम जा रहे होते। औरत घास-पानी लेकर आ रही होतीं। पहचान का रंग उनके चेहरों पर घुल कर चमकता। माँ उनके पाँव छूती, वे हमारा मुँह चूमतीं, ‘‘कितनी प्यारी बच्ची है तेरी सरसुती! कब बड़ी हुई! गोद में लेकर आई थी इसे तू।’ वे इशारा करतीं मेरी ओर। मेरे जेहन में धुंधली सी तस्वीर थी, एक बूढ़ी औरत का पानीदार चेहरा गोरा झुर्रियों भरा, उस पर दो सजल आँखें जो हर वक्त अपने पास आने को उकसाती।

माँ ने लकड़ी का गेट खोला। मुझे नीचे से पहले घोड़ा दिखा। नानी दीवार की ओट में थे, वे घोड़े को दाना खिला रहे थे। हमने एक स्वर में कहा ‘‘नानाजी, प्रणाम!’’ नाना ने घूर कर देखा! उनके हाथ में घोड़े की लगाम आ गई! वे शायद बाहर जाने की तैयारी में थे। उन्हांेने हमारे जुड़े नन्हें-नन्हें हाथों की उपेक्षा की और माँ से मुखतिब हुए, ‘‘सरसुती, यह भी अच्छा हुआ कि तू आ गई! घर में चावल का एक दाना भी नहीं, तू जल्दी कर, कुठार से धान निकाल ला... ओखल मैंने सुबह लीप दी थी।’’

माँ सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। छोटी माँ के पीछे घोड़े के किनारे से निकलने को हुई। घोड़ा हिनहिनाया, नाना की गर्जना सुनकर छोटी थर-थर काँपने लगी। उसके मुँह से आवाज बंद हो गई।

‘‘माँ की पूंछ खड़ी रह यहीं...’’, नाना की आवाज। पत्थर मेरे हृदय तल पर पड़ा, स्नेह छलकती वह प्रतिमा खंडित होकर टुकड़े-टुकड़े हो गई माँ ने देहरी में खड़े होकर इशारा न किया होता तो जमीन पर मेरे पाँव भी जम गए होते। छोटी का हाथ पकड़कर मैं सीढ़ियाँ चढ़ी। नाना घोड़े को पुचकारते रहे, उसकी पीठ पर हाथ फेरते रहे... मंने ऊपर से नाना को देखा, ‘‘साँवले रंग का लम्बा-चैड़ा अधेड़ पठान पत्थर का चेहरा लिए। हमारे प्यासे मन उससे पानी पीने की उम्मीद में थे। रास्ते भर का उल्लास पल भर में ही तिरोहित हो गया।’’

भौं भौं भौंऽऽऽ अभी एक सीढ़ी चढ़नी बाकी रही। मेरी फ़्रॉक का कोना झपटने को आतुर झबरे बालों वाला वह चीनी कुत्ता जिसकी आँखें कह रही थीं ‘‘नीचे उतर लड़की वरना चबा डालूँगा हड्डियाँ!’’ अब मैं जोर से चिल्लाई! माँ कुठार के अंदर घुसी थी बमुश्किल मृत्यु से खींच लाई हमें, ‘‘अभी पहचाना नहीं न उसने, दोस्ती करोगी तो वह भी खेलेगा तम्हारे साथ।’’ वह अभी भी थोड़ी दूरी पर गुर्रा रहा था। हमने उसके एक छत्र राज्य पर सेंध लगाई थी, उसे कैसे सहन होता। मैंने पहली बार ऐसा भयानक कुत्ता देखा था, छोटा सा पर आँखों की पुतलियाँ चीते सी हिंसक। चेहरे का पता ही नहीं, बालों से ढका। मैंने सोचा, ना बाबा मृत्यु से दोस्ती नहीं होगी। नाना नीचे से पुचकार कर न कहते उसे ‘‘चीनी बेटा! जाने दे... दीदी है... दूर से आई है... रास्ता छोड़ दे बेटा...’’ तो हो गया होता हमारा राम नाम सत्। माँ पर बहुत गुस्सा आया, ‘‘हम कुत्ते की दीदी कुत्ते से भी कमतर... क्यों आई है यहाँ? ये हमारे नाना... नहीं हो सकते माँ... यह काला पठान! ओऽ मेरी प्यारी माँ, क्यों लाई मुझे यहाँ?’’ मैं बहुत जोर से चीख रही थी लेकिन हैरान थी कि मेरे शब्द न कोई सुन रहा था, न मेरे होंठ सी सुन पा रहे थे। वहाँ चीखती चुप्पी चड़ी थी। मैंने पाया कि ज्वालामुखी के लावे से बहते शब्द कीड़े जैसे मेरे भीतर गोल-गोल रंगने लगे थे।

इन कीड़ों से निजात पाने के लिए मैं दुगने वेग से चीखती रही, लेकिन मेरे भीतर का स्वच्छ पानी सड़ता रहा... उसमें असंख्य कीड़े कुलबुलाते रहे... मैं खुद के लिए अजनबी होती रही। मैं अधिक देर इस स्थिति में न रह पाई और छटपटाते हुए माँ को पकड़ने भागी... लेकिन माँ मुझसे कोसांे दूर थी, अपने काम में मशगूल। दो घूँट पानी से गला तर करके ओखली में लय के साथ धान कूटती लड़कियाँ जाएँ भाड़ में... किसने कहा था आओ मेरी ही कोख में... माँ का अनकहा जोर से गिरता रहा मेरे ऊपर... वह मुट्ठी खुली तो बालू के कण चमक रहे थे।

‘‘मुन्नी, माँ के वास्ते चा बना दे’’ नाना ने आदेश दिया। वे घोड़े की पीठ पर बैठे थे, लगाम उनके हाथ में थी... वे जिधर का भ रूख करेंगे, घोड़ा उन्हें बादशाह बना देगा! रौंद डालेगा-धरती का जीवन... हवा, पानी धूप... खिलती कोंपलें... बादशाह के भारी-भरकम बूटों तले कुचले... सिसकते दृश्य को पकड़ने की मेरी कवायद भी छूटी... क्षण भर का सुख तकदीर में नहीं... तकदीर कोई और लिखता है... जो घोड़े की पीठ पर बैठ सकता है... जिसके हाथ में लगाम होती है। मेरा मन एक दीवार है उसके आरपार नाना की चीख गूंज रही है, ‘‘मुन्नी, सुना नी तूने माँ का चा बनाकर दे-’’ नौ साल की लड़की जिसे चूल्हा जलाना न आता हो, वह चाय बनाए तो कैसे? ऊपर से भूख के मारे पेट में चूहों की दौड़।

अंधेरा घिरने पर टक बक टक बक घोड़ा आया। उस पर शान से बैठे नाना, उनके हाथ में मुर्गावी थी, जिसके पंखों से खून चू रहा था- नाना ने बंदूक दीवार से टाँगी, ‘‘चा बना दी थी न मुन्नी ने तेरे वास्ते?’’ खून से सना पक्षी परात में रखकर नाना माँ को घूरते रहे... माँ चुप्प। वह चूल्हे पर बैठी आग जलाने की कोशिश कर रही थी। सीली लकड़ी आग पकड़ने में असमर्थ, तो माँ के चेहरे पर झुंझलाहट आई, ‘‘मुन्नी को आग जलानी नहीं आती तो चा कैसे बनाती, बाबा जी?’’ सीली मरियल लकड़ी ने अचानक आग पकड़ ली।

नाना चुपचाप सीढ़ियाँ उतरे, कुल्हाड़ी उठाई और जोर से लकड़ियाँ फाड़ने लगे। जैसे ही उनका गुस्सा लकड़ियों पर पड़ता, वे छिटक कर उछलतीं, देहरी पर आ लगतीं, जब लकड़ियों का ढेर जमा हो गया तो नाना की आवाज़ से हमारी जमीन काँपने लगी।

‘‘सरसुती! अपनी बेटी से लकड़ियाँ उठाने को बोल’’ नाना ने बाल्टी में पानी भरा, सामने भैंस के नीचे बैठ गए।

मेरी आँखें विवशता से भर गई। इतनी सारी लकड़ियाँ अंधेरे में कैसे सीढ़ियों से ला पाऊँगी? नाना दीवार पर रखी टार्च की रोशनी में दूध दुह रहे थे। दो आँखें पीठ पर भी लगी थीं। माँ का कहा। ‘‘तू और छोटी कुछ खा ले, लकड़ियाँ मैं ले आऊँगी।’’ माँ चाय औटाकर टोकरी से डाँडापानी की दुकान से नाना के वास्ते लाई जलेबियों व पेड़ों को निकाल कर मेरी हथेली में थमाने लगी। ठन्न नाना ने छप-छप आकर दूध की बाल्टी माँ के पास रखी, ‘‘लकड़ी तो मुन्नी ही लाएगी, सरसुती।’’ आवाज़ दबाकर मेरी हथेली से जलेबी छिटक कर गिर पड़ी- भूख को ठेंगा दिखाती। नाना तुर्शी से उसी नन्ही हथेली को पकड़े खींचने लगे, ‘‘कामचोर की औलाद, लकड़ी उठाएगी तो तू ही।’’ इस दहाड़ से मिट्टी-पत्थर की दीवारें हिलने लगीं, मेरे नन्हे पाँव थरथराते हुए सीढ़ियाँ उतरने लगे। छोटी सी बाँह में जितनी लकड़ी आ सकती है, उसके हाथ चार-पाँच बार ऊपर-नीचे होते हुए चूल्हे की ओट में ढेर बना दिया मैंने।

नाना खिल उठे, ‘शाबाश’। उन्होंने चूल्हे से दूध पतीला उतारा, पीतल का सेर भर का गिलास भरा, मेरे सामने रखा, ‘‘ले बच्ची, फटाफट पी ले।’ फीके मलाई वाले दूध का घूँट भर मुझे उबकाई आने को हुई। नाना ने चूल्हे की जलती लकड़ी उठा ली!! माँ डर गई। बीच-बचाव की स्थिति में बोली, ‘‘बाबा जी, सेर भर दूध कहाँ पी पाएगी बेचारी...’’

नाना के घूरकर माँ को देखा, लकड़ी चूल्हे की राख में घोंप दी, ‘‘पहाड़ की बेटी है, इसे पहाड़ जैसा मजबूत बना सरसुती, वरना रोती रहेगी ज़िंदगी भर।’’

अनायास मेरी पलकें बंद होने लगी। माँ के रोटी पाथने की थप-थप आवाज़ कानों में पड़ी, ‘‘माँ मैं सो जाऊँ।’’ माँ ने कहा, ‘‘छोटी के साथ सो जा अभी, बाद में दूसरी खाट पर सुला दूँगी।’’ उठने लगी तो कोहनी से दूध गिर गया। एक बार फिर दीवारें थरथरा उठीं। उसके बाद क्या हुआ... मुझे कुछ पता नहीं। अचानक एक बाघ आकर मुझे डराने लगा और मैं चीख पड़ी।

‘‘मुन्नी! क्या हुआ मुन्नी।’’ माँ ने झकझोरा तो पता चला सपना था। मरने के भय से मैं जार-जार रो रही थीं। माँ बुदबुदा रही थी अस्फुट, ‘‘सपने में बाघ दिखना नरसिंह का दोष होता है, नहा कर देवता का उचाणा (सौगात) रखती हूँ।’’

तभी नाना चाय का गिलास लिए आए, ‘‘कोई दोष-ओष नहीं, सरसुती डरखू (डरपोक) लड़की है तेरी।’’

नाना मेरे लिए भी प्याली में चाय ले आए। थोड़ी देर बाद नाना बोले, ‘‘मसक में पानी भर लाएगी, मुन्नी?’’ मैंने हामी भरी, बंदूक जैसे मुँह वाले थैले पर पानी भरना मुझे अच्छा लगता था।

माँ के साथ झरने पर गई। वहाँ गाँधी नानी दिखीं, पानी भर रही थीं। देखते ही छाती से कस लिया, बलैया लेती आँखों से वात्सल्य रस छलकने लगा, ‘‘दोपहर में आना हमारे घर, तेरी नानी की तस्वीर दिखाऊँगा।’’

‘‘आऊँगी... थोड़ी देर में ही आऊँगी’’ मैं मसक में पानी भरने लगी। माँ और नानी जाने कहाँ-कहाँ की बातें करने लगीं। वे बातें मुझे रहस्यपूर्ण लगीं जो कोशिश करने पर भी मैं समझ न पाई। ‘‘पानी की गागर बड़े पत्थर पर रख पहाड़ी पर चढ़कर माँ घास काटने लगी। मैं मसक लिए घर लौटी। नाना व्यस्त दिखे, कहीं जाने की तैयारी में थे शायद। मेरे हाथ से मसक लेकर दीवार पर लगी कील पर टाँगा, वहाँ से थोड़ा पत्थर और उखड़ गया। उस सुराख से कुछ उस पार... की दुनिया का सुराग मिलने को हुआ... आइने के सामने खड़े नाना, खिचड़ी बालों में चमेली का तेल चुपड़ते, साँवली रात पर ताजातरीन सुबह की उजास जैसा चेहरा।

आईना उस दुनिया को जोड़ता, पाँवों के नीचे सरसराती नदी... नाना को उस पार ले जाती है जीवन की किश्ती... वहाँ जहाँ हमारा होना वर्जित होता... खादी का झोला सामान से ठसा-ठस भरा... उड़नतश्तरी आए और पहुँचा दे तोहफे लेकर नायाब... नाना ने पहन लिया अब खादी का कुर्ता पजामा... सुगंध से महक रहा मिट्टी का घर... रात को काँप रहा था जो थर-थर... पाँवों में तोते की चोंच वाली नई जूतियाँ भी... केचुंली बदल चुका था साँप। एकदम नया! गोया पा लिया नया जन्म!! नाना ने कहाँ सिलवाया होगा नया कुरता पजामा... खुशबू उड़ रही है इससे गाँधी नानी से पूछूँगी। नाना के सख्त चेहरे पर खुशी झरती देख मन होता है, पूछूँ? पूछूँ यह भी कि जहाँ तुम जा रहे हो बादशाह, उस दुनिया में मैं भी लगाना चाहती हूँ छलाँग... अपने लोहे के हाथ से मेरी फूल सी उंगली पकड़ो तो जरा... उस दुनिया में इन बालू के कणांे को बहा लूँगी... बारिश की बूँद बटोरूंगी, उसमें तैराऊँगी अपनी कागज़ की नाव... जोरों से भरूंगी किलकारी, ‘‘नाना, तुमसे आगे निकल चुकी हूँ मैं... जहाँ मुट्ठी में बालू के कण नहीं बारिश की बूँदें हों... कुछ आवाजें हों, बच्चों जैसी कुछ खिखिलाहटें हों, फूलों जैसी... नाना, उस दुनिया के भीतर प्रवेश करेंगे... मैं माँ के साथ बालू के कण चुनूंगी? नहीं।’’

भगवान! मेरी नानी को वापस दे दो... मेरे भीतर एकाएक उदासी का बादल फैल गया। अकुला रहा मन... रूलाई फूटने को तैयार। मेरी नानी भी गाँधी नानी जैसी रही होंगी, उतना ही प्यार उड़ेलती मुझ पर... माँ कहती है, ‘‘गाँधी नानी से बहुत-बहुत सुंदर थी नानी, गुल गुथनी सी गोरी मुलायम... उसकी आँखों से हर वक्त स्नेह झरता। तू होने को थी तो नानी ने तेरे कितने नाम सोच लिए थे। ...गौरी, राधा, सीना परी और माँ का गला रूँध गया था... असूज (अश्विन) का महीना काल बनकर उतरा... खा गई अपनी नानी... हाँ... तू खा गई’’, मेरी माँ ने मुझे कोसा था।

मैं सिसकते हुए बोली, ‘‘नाना, मेरी नानी मर क्यों गई?’’ नाना चुप्प! काठ मार गया हो जैसे।

मेरे कंठ से अनायास शब्द उमगने लगे ‘‘नाना, मेरी नानी वापस ला दो।’’

‘‘वही तो करने जा रहा हूँ, कमबख्त यहाँ आने को राजी नहीं होती’’ नाना तपाक से बोले। फिर घोड़े की ओर लपके, सीढ़ी के पीछे खड़े घोड़े की पीठ पर उछलकर बैठे, उन्हें गेट पर पानी लाती माँ दिखी, ‘‘सरसुती, हम थोड़े दिन बाद लौटेंगे, चीनू का ख्याल रखना। डंगरों को घास-पानी समय पर देती रहना।’’ उनके हाथ ने लगाम थामी, घोड़े ने राणा प्रताप के चेतक की तरह हवा में छलांग लगाई टक-टक-टक वक पहाड़ी चढ़ने लगा घोड़ा, जिधर का भी रूख करेगा, नाना पृथ्वी के उस टुकड़े के बादशाह होंगे! मेरे दृष्टि पटल से यह दृश्य अडोल नहीं। हमारे भीतर अनेक दृश्य छायाओं की तरह काँप रहे हैं। सहसा मैं फूट-फूट कर रोने लगी थी। आखिरी सीढ़ी पर बैठी जिसके नीचे धरती धँसी हुई और ऊपर निचाट शून्य। माँ हड़बड़ा कर आई थी, ‘‘अरे, क्यों रोने लगी अचानक?’’

मैं आक्रामक मुद्रा में खड़ी हुई और नीचे की ओर दौड़ी।

गाँधी नानी का घर ढलान पर होता एकदम नीचे... वह तुर्शी से ऊपर दौड़ाती मन का घोड़ा, ‘‘मुन्नी, अब तेरे नाना पौड़ी बाज़ार पहुँच गए होंगे। वहाँ बूचड़खाने से मोटा मुर्गा लेकर हलवाई की दुकान पर पंतबेड़े की मिठाई और उसके बाद चूड़ी बिंदी-सुरमा।’’

गाँधी नानी एक मकड़जाल के भीतर धकेलती मुझे।

यहाँ से वह घर दिखता जहाँ सन जैसे सफेद बालों वाली बुढ़िया लाठी टेकती अपनी जवान बेटी लेकर पौड़ी बाजार में साड़ियों की दुकान पर ठहरी होती। बेटी के वास्ते धोती और मखमल का जम्फर (कुर्ती) खरीदती, मोल-भाव करते उसका हाथ थैले के भीतर घुसता, कुछ सरसराहट होती और उसके चेहरे का रंग उड़ने लगता... ततैया आकर उँगली में डंक मारता। वह थैले को फर्श पर उलटाती-यहीं तो रखी थी।

छुकानदार उसे हैरानी से देखता, ‘‘क्या रखी थी, माता जी?’’

‘‘पता नहीं बेटा, पुरानी धोती के टुकड़े में नोटों की गड्डी... कहाँ गिर गई?’’

लाला धोती, जम्फर खींच कर बाकी कपड़ों में डाल लेता और बुरा सा मुँह बनाकर कहता ‘‘आगे रास्ता नापो, माई।’’

ठीक उसी वक्त राजा सड़क पर रूकता, जवान औरत कोने पर बैठी आँसू पोंछ रही होती, बूढ़ी लाला से उलझी होती, हमारी दुनिया के खलनायक अचानक दूसरी दुनिया के महानायक में तब्दील होते, ‘‘ए लाला! क्यों बेचारी बूढ़ी औरत को परेशान करता है?’’ लाला की घिग्गी बंध जाती... बादशाह को कोई कैसे भूल सकता है, उसके बूटों की धमक, लाठी की चमक और उसके घोड़े की हिनक जिस राह से गुजरती, भूकंप आने को मचलता, पहाड़ों पर खिलते फूल मुर्झा जाते, झरने बर्फ में तब्दील हो जाते और इठलाती नदियों की गतिरूक जाती।

बूढ़ी औरत दयनीय लहजे में उधार माँगती, नाना तुर्शी से चमड़े की जैकट की गुप्त जेब में हाथ डालते, ‘‘कितने हुए लाला तेरे कलदार (रूपये)?’

‘बीस कलदार’ सिर्फ लाला का चेहरा हलके-हलके काँपता!

नाना उछालते नोट मानो भीख दे रहे हों। दोनों स्त्रियाँ नाना को राम का अवतार मानतीं और अपने घर आने का न्योता देतीं। नाना दोनों को घोड़े पर बिठाना चाहते, बूढ़ी कहती, ‘‘मैं पैदल आ जाऊँगी यहाँ से दूर भी कितना है, सिर्फ तीन कोस ही तो... नाना जवान स्त्री को आगे बिठाते... चेतक हवा में उड़ता... दिलरुबा के साथ जन्नत की सैर! गाँधी नानी के काले मोटे होठों पर रहस्यमई मुस्कान बिछलने लगती।

‘ये जन्नत क्या होती है, नानी’

जन्नत माने सोरग, जहाँ सोने के महलों में देवता रहते हैं, उनके साथ अपसराएँ नाचा करती हैं।

तो दिलरुबा भी नाना के साथ नाचती होगी जन्नत में... पर नाना को तो नाचना आता ही नहीं। उन्हें तो लाठी भाँजना, बंदूक चलाना और लगाम कसना आता है बस्स... मेरी आँखों में कल्पना साकार हो उठती... दृश्य बनते-बिगड़ते... चमड़े की जैकेट और पैंट-पाँवों में गमबूट, हाथ में बंदूक... घोड़े से उतरते हरे पन्नों के बीच आसमान को निहार रही चिड़िया की आँख, गोली दागते धाँय-धाँय। चिड़िया छटपटा कर गिरती लहुलुहान! नाना दिलरुबा का हाथ पकड़कर दिखाते चिड़िया की खून सनी नन्हीं देह... दोनों खुशी का इजहार करते नाचते, फिर टिचंरी के गिलास भरते।

दरअसल गाँधी नानी की छोड़ी मकड़ी एक के बाद एक जाले बुनती और उलझती रहती अनायास मैं उसमें... जाले इतने महीन कि नजर भी न आते और टूट कर मुक्त भी न करते।

जन्नत और दिलरुबा, दो नाम गाँधी नानी के होंठों पर अस्फुट उभरते।

यकीनन इन दो बनैले शब्दों के उत्पादक गाँधी नानी नहीं, बल्कि रफीक मियाँ चूड़ीवाले थे। गाँव-गाँव घूमते रफीक मियाँ, ‘‘चूड़ी ले लो, चूड़ी ले लो... हरी, लाल, नीली, पीली, काँच की चूड़ियाँ ले लो...’’ आवाज लगाते नाना के गाँव में प्रवेश करते। गाँधी नानी बुझती लकड़ियों के नीचे गरम राख पर उपला खोपती झट चाय की केतली चूल्हे पर चढ़ाती। एक आग भीतर सुलगती, एक आग पत्थरों की दीवार पर भी चूड़ियाँ का फंचा रखते रफीक मियाँ के पेट में सुलगती ‘‘सलाम बड़ी अम्मा।’’ खैरियत तो है? रफीक, मियाँ, चूड़ियों के फंचे की गाँठ खोलते, गाँधी नानी के भीतर भी एक सदियों से पुरानी गाँठ खुलने लगती, ‘‘रोजी-रोटी की खातिर अपना देश छोड़ पहाड़ पर आया है बेचारा। कौन-कौन से गाँव जाकर आया रफीक कुछ खाया-पिया भी... कि घूम रहा है भूखा?’’ गाँधी नानी स्नेह की निर्झरणी जितना बाँटती, बढ़ता ही जाता, ‘‘रफीक तो इंसान का बच्चा है, मेरी छाती में तो चिड़िया, चुरगुन के वास्ते भी भरपूर है।’’

रफीक मियाँ इस दर पर चाय पीते, रोटी खाते गाँधी नानी को दुनिया जहाँ की खबरें सुनाते! पेट की आग बुझती तो भीगे शब्द गाँधी नानी के हृदयतल पर पहुँचते ‘‘मेरी अम्मा भी आपके जैसी थी... इसी इसरार से खिलाती थी मुझे... विभाजन के दंगांे ने छीन ली मेरी अम्मी... मेरा परिवार।’’ रफीक की आँखें गीली हो उठतीं, गाँधी नानी की छाती में बगूला उठता, ‘‘आदमी क्यों आदमी के खून का प्यासा होता है। ताकतवर क्यों कमजोर पर जुल्म करता है। क्यों होता है ऐसा जब मनखी ही मनखी को मिटाने की सोचता है....।’’

गाँधी नानी को किस्सा कोताह सुनने का रोग चरम सीमा तक था। एक के बाद एक किस्से रफीक मियाँ की जुबान पर होते। पौड़ी बाज़ार में थी मियाँ की दुकान। पंद्रह-बीस दिनों के अंतराल पर आ ही जाते। उस दिन शनिवार था। रफीक मियाँ की चूड़ियाँ लगभग बिक चुकी थीं। गाँधी नानी भी फुरसत में थी। रफीक मियाँ को उसने दोपहर का खाना भी दिया था। पीतल की थाली मांजकर रफीक मियाँ ने धूप में सुखाने रख दी थी। गाँधी नानी ने नीम के पेड़ की छाया में मिट्टी-गोबर से लिपी जमीन पर पुरानी चटाई बिछा दी थी। रफीक मियाँ किस्से सुना रहे थे। नानी बंेत की कुर्सी पर बैठी हाथ में सूप लिए सुन रही थी। साथ ही दाल से कंकड़ चुन रही थी। दुर्योग से गाँधी नाना का पौड़ी से लौटना हुआ। धूप में पीतल की थाली-गिलास देख उनका माथा ठनका। थोड़ा आगे जाने पर दोनों को बतकही में तल्लीन देख उनकी छाती में आग सुलगने लगी। उन्होंने झोला फेंका बरामदे में और अपने सीने में जलती आग में नानी को झोकने आगे बढ़े... सूप उछलकर गिरा, दाल आसमान छूने को मचली। रफीक मियाँ सलाम-सलाम करते हुए उठे और परिदृश्य से गायब।

गाँधी नाना ने गाँधी टोपी उतारी, दीवार में रखी चूड़ियों को पत्थर पर दे मारा, ‘‘ले अब पहन राँड चूड़ियाँ... बैठ जा मुसल्ले के घर में... कभी भगा ले गया राँड को... बिठा दिया हरम में... बना दिया चैथी बेगम... रो-रोकर कोसती रहेगी नसीब अपना।’’ गाँधी नाना लाल-भभूका चेहरा लिए नानी की कलाई पकड़ने आगे बढ़े... पर गाँधी नानी हाथ झटककर अलग हुई, ‘‘गाँधी बाबा के चेले कुछ तो शर्म करो... भूखे को दो दाना अन्न दे दिया तो अकाल पड़ गया तुम्हारे घर में... गाँधी बाबा ने यही सिखाया था तुम्हें?’’

गाँधी नाना गुर्रा उठे, ‘‘खबरदार! जो अपनी गंदी जुबान से बापू का नाम लिया!’’ गाँधी नाना ने नानी की मरगिल्ली चुहिया सी चोटी पकड़ी, तड़ाक-तड़ाक थप्पड़ लगे मारने। गाँधी नानी पर सवार हो गई काली। जाने कहाँ से ताकत आई इतनी कि छह फुटे हट्टे-कट्टे आदमी को धक्का देकर फुंकार उठी, ‘‘हाँ, हाँ, मार दो मुझे, मार दो जान से... अपने भाई की तरह... जैसे उस पापी ने डंडे से मारकर अधमरा किया था मेरी सुलोचना दीदी को... बेचारी ज़िंदगी और मौत से लड़ते हुए आखिर दुनिया से चली ही गई!!’’ ‘‘तुम भी... तुम करना ऐसे ही... जैसे तुम्हारे भाई ने किया... तुम भी बिठा देना कोई दिलरुबा… मारकर मुझे।’’ ‘‘थूऽ... यूऽ है तुम्हारी मर्दानगी पर...’’ नानी ने गाँधी नाना के खद्दर के कुरते पर थूक दिया था।

... और मैं एकाएक बदलते आँखें फाड़े उस दृश्य को देखती रही। ज़िंदगी की भीख मांग रही लहूलुहान नानी और नानी की मरियल बीमार देह को बूटों से कुचलते बादशाह...! राजा की पीठ पर बैठे दिलरुबा को जन्नत की सैर करा रहे थे।

मैंने भी गाँधी नानी के अंदाज में शून्य में थूक दिया था और इतने वर्षों बाद भी समझ न पाई कि मैंने किस पर थूका था।

हिटलर के चोले पर।
समय के मुँह पर।
या अपनी बेबसी पर?

1 comment :

  1. दिल के अंदर धँसती सृष्टि,यथार्थ,प्रकृति का अद्भुत वर्णन

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