व्यंग्य: इस रचना समय में

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

मित्र सम्पादक की ईमेल आई, आप अपना कोई कालजयी व्यंग्य शीघ्र भेजिए। मैंने अपने सारे व्यंग्य टटोल मारे। उनमें कोई ऐसा पराक्रमी व्यंग्य नहीं निकला, जिसे मैं कालजयी कह सकूँ। मेरा मन वितृष्णा से भर गया। ओह, सारा अकालमयी जीवन बीत गया पर कुछ कालजयी नहीं लिखा। आमतौर पर व्यंग्य लिखना टोपी सिलने जैसा काम है। अन्ना अनशन करें तो गाँधी टोपी की माँग होती है, रामलला का टेंट उखड़वाना हो तो विशेष टोपी चाहिए। दक्षिणपंथियों को बेदख़ल करना हो तो क्रांति के आह्वान के लिए लाल टोपी की माँग होती है। जैसी माँग वैसा लेखन, जैसा काल वैसा साहित्य। कोई ऐसा शाश्वत समय आया ही नहीं कि कालजयी व्यंग्य की माँग उठती। मैं जिस समय और समाज में रहता हूँ वह गिरगिटिया है। मैं सवेरे सो कर उठता हूँ तो सिर्फ मौसम या ख़बरों के रंग ही नहीं बदलते, आदमी की निष्ठा, संवेदना और आत्मा की आवाज़ तक बदल जाती है। आश्रयदाता, आश्रयपाता की जेब में सिमट जाता है, उसमें विलीन हो जाता है।  देश राजनीतिक पार्टी में सिमट जाता है। कुर्सी, राजनेता में विलीन हो जाती है। लेखन, टीआरपी में लीन हो जाता है। महानता, टुच्चेपन में विलीन हो जाती है। 
मैं कई दिनों से टटोल रहा हूँ, कुछ ऐसा माल मिल जाए जो शाश्वत हो। मैं जो लिख पाता हूँ, वह बारीक़ व्यंग्य होता है। अब जो स्पीड रीडिंग करते हैं वे चाहते हैं कि व्यंग्य तत्काल बन जाए। संज्ञा में व्यंग्य नहीं बने तो क्रिया में व्यंग्य बन ही जाना चाहिए। वे विशेषण तक रुकें तो मैं व्यंग्य का ढेर लगा दूँ आलसी, क़िताबभक्षी पाठकों के लिए। उन्हें समझना चाहिए आदमी का बच्चा जन्म लेने में ही लगभग नौ महीने ले लेता है, फिर भी एक जन्म में उसके आदमी बन जाने की गारंटी नहीं होती। सोचता हूँ आदमी पर ही लिखूँ। आदमी के साथ बड़ी ज़्यादती यह है कि वह नश्वर है, जिस पर लिखता हूँ वह दुनिया से विदा हो जाता है। मैं मारक नहीं लिखता पर मेरा लिखा पढ़ कर वह शर्म से मर जाता है। आदमी के मरने पर मुझे घोर पीड़ा होती है, मैं जिस पर शाश्वत लिख रहा था वह बड़ा दग़ाबाज़ निकला, रचना छपती उसके पहले ही चल बसा। मैंने सोचा, आदमी की बजाय आदमी की प्रवृत्तियों पर लिखना चाहिए। ज्ञानियों ने कहा भी है भूत भाग रहा हो तो उसकी लंगोट से संतोष कर लेना चाहिए। वाह, यह हुई शाश्वत बात। आदमी नश्वर है पर उसकी लंगोट शाश्वत है। इसलिए उसका बलात्कारी होना शाश्वत है, व्याभिचारी होना शाश्वत है। इन प्रवृत्तियों का पूरा का पूरा कुनबा रिश्वतख़ोरी, बेईमानी, चोरी आदि सब शाश्वत हैं। हड़पने की प्रवृत्ति शाश्वत है, वह कौरव काल में थी, ट्रम्प-पुतिन काल में भी है। हमारे समय में हड़पने का कौशल मुखर हुआ है, शस्त्रों की मारक क्षमता बढ़ी है। मैं ख़ुश हूँ कि एक लंगोट पकड़ में आई तो शाश्वत विषयों का गड़ा ख़जाना मेरे हाथ आ गया।
कालजयी लिखने का कीड़ा जो दिमाग़ में घुसा है, कबसे बड़ी खलबल मचा रहा है। मेरे मित्र कहते हैं ईश्वर शाश्वत है, प्रेम शाश्वत है, प्रकृति शाश्वत है, इन पर लिखो। मेरा लेखक मन कहता है, ये विषय भले शाश्वत हों पर घिसेपिटे हैं। इन पर नया लिखो तो भी पाठकों को लगता है कि पुराने फर्नीचर पर रद्दा घुमा कर पॉलिश कर दी गई है। लेखन में ऊपरी चमक तो है, पर इसके मूल में आदिम बासी गंध है। मुझे ऐसा शाश्वत लिखने की बजाय अपने सामान्य ज्ञानी लोगों के साथ बैठ कर दुनियादारी की बातें करना ज़्यादा रुचिकर लगता है। जिस लेखन में सोचना पड़े, संदर्भ लेने पड़ें ऐसा कठिन, सायासी लेखन जोर-ज़बरदस्ती वाला लेखन है, कृत्रिम लेखन है। मुझे जो बिना सांप्रदायिक चश्मा लगाये साफ़-साफ़ दिखता है वैसा ही लिखना अच्छा लगता है। सरल-सच्चे विचारों को लिखने में दिमाग़ जैसी जटिल प्रणाली की ज़रूरत नहीं लगती। मेरे कई समकालीन जो दावा करते हैं कि उनका लेखन कालजयी है, उसे मैं अपनी बुकशेल्फ के टॉप पर सजा देता हूँ। चूँकि यह चिरकाल के लिए लिखा गया है, इसलिए पाठक अनंत समय तक इसे पढ़ना टालते रहते हैं। जो भी हो, शाश्वत लेखन का स्थान शीर्ष पर होना चाहिए, भले जब पढ़ने का मन हो उसे सीढ़ी लगा कर नीचे उतारना पड़े। मैं हवा में लटक कर उसे नहीं पढ़ सकता। अपनी कुर्सी या सोफे के स्तर पर जो लेखन है पाठक उसे ही पढ़ सकता है। फिर, शाश्वत लेखन छापने वाली पत्रिकायें जो संपादक को समझ में आये वैसा छापती हैं, सामान्य पाठक के ऊपर से निकल जाये तो शाश्वत लेखन भारी-भारी लगता है।
अमर हो जाने के मुगालते में मैंने ढेर सारा शाश्वत लिखा है। ऐसी रचनाओं को बहुत मार पड़ती है, अपमान सहना पड़ता है। समझदार संपादक स्वीकृत नहीं करते हैं और जो भ्रमवश स्वीकृत कर लेते हैं, वे उन्हें छापने के मामले में मर्यादा पुरुषोत्तम हो जाते हैं। चौदह अंकों का वेटिंग पिरियड बता देते हैं। शाश्वत लेखन की यही नियति है। अशाश्वत लिखो - राजनीति पर, मीटू पर, अमेरीकी राष्ट्रपति पर, फटाफट छपता है। इतनी जल्दी छपता है कि लेखक क्या प्रूफरीडर भी प्रूफ नहीं देख पाता। पाठक उसे एक बार नज़र भर कर देख ले इतना बहुत है। एक अनुलोम-विलोम के समय में किए गए लेखन से किसी को क्रांति या बदलाव की उम्मीद नहीं होती, पर इतनी देर में अंधविश्वासियों की भीड़ किसी बेकसूर, निहत्थे और राह चलते आदमी को पीट-पीट कर मार डालती है। भीड़ क़ानून बनने लगे तो भाड़, भांड, भाड़ेतियों और पुलिस की भूमिका पर तत्काल लिखना ज़रूरी है।     
कभी-कभी मैं कालजयी लेखक बनने के बारे में सोचता हूँ। कालजयी लेखन के लिए ट्रस्ट बनाना ज़रूरी है, ट्रस्ट जो धीरे-से न्यास बन जाए और न्यास धीरे-धीरे पीठ बन जाए। बिना रीढ़ की लचकदार पीठ बन सके तो वह ज़्यादा शुभचिंतकों और वफ़ादारों को आंमत्रित कर सकती है। वे सब मिलकर मेरे लेखन को कालजयी स्टेटस दिलाने में सक्षम हो सकते हैं। मैं जानता हूँ, मुझे मरघट भी जाना हुआ तो उठाने के लिए चार लोग चाहिए। यदि ये चार लोग मैंने पहले ही तलाश लिए तो मेरी रचनाओं को कालजयी बनाने वाले प्रतिभाशाली मेरे पास हो सकते हैं।   
मैं व्यंग्य लिखते हुए छोटी-छोटी मुरकियाँ लगाता हूँ और सोचता हूँ, क्या बंदिश बनाई, क्या समां बांधा। समां है कि वह बंधता नहीं। यहाँ समां के दो अर्थ हैं, पहला पाठक और दूसरा आलोचक। कालजयी लेखन के लिए आलोचकों को बाँध कर रखना पड़ता है, जिसके लिए मोटी, मजबूत रेशमी रस्सियाँ चाहिए। अलबत्त्ता, जब इन्हें बाँध कर सजाने की बारी आती है तो वे खिसक जाते हैं। इस राजदोष के कारण मैं कालजयी लेखन के दायें-बायें ही पहुँच सकता हूँ, केंद्र में जगह खाली नहीं है। केंद्र के दायें या बायें रहने में राजनीति की बू आती है। आप नाक बंद कर बदबू स्वीकार भी करने लगें तो शिकारी आ जाते हैं, वे संगठित होते हैं, मॉब-लिचिंग में सिद्धहस्त होते हैं। वे बताते हैं कि हिंदी के रचनाकार को रचना के साथ-साथ साजिशें रचने में भी विशेषज्ञ होना चाहिए।
आप देख रहे हैं न आम व्यंग्यकार कितना पशोपेश में होता है, शाश्वत लिखना चाहता है, धारदार भी और असरदार भी। एक तीर से तीन शिकार करना चाहता है नासमझ। मेरी सोच से व्यंग्य की जो कारक प्रवृत्तियाँ हैं, वे हर काल और समाज में रही हैं। अन्याय व अनीति को पकड़ना और कलम को थोड़ी धार देना आ जाए तो व्यंग्य अपनी बात कह जाए। मित्रगण जैसा कालजयी लिखते हैं मैं उसे पढ़ता हूँ और फिर व्यंग्य करता हूँ। अब नींव ही अधपकी हो तो मैं क्या करूँ। इसलिए हे मित्रो तुम कालजयी बनने के लिए रचो तो आज के हालात पर लिख-लिख कर मेरी भी कुछ गत सुधरे। निराला हमारे लिए प्रार्थना कर गए - काट अंध उर के बंधन स्तर। अब मैं अपने दिमाग़ के जाले साफ़ करने के साथ-साथ हृदय का अंधकार भी दूर कर रहा हूँ। शाश्वत, अशाश्वत के फेर में न पड़ कर सिर्फ़ लिख रहा हूँ, कोशिश कर रहा हूँ कि मैं अपने लिये न लिख कर हम सबके लिए लिखूँ।
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