संतानोत्पादन प्रबन्धन के ऋग्वैदिक सूत्र

कौशलेंद्र

- कौशलेन्द्र

विगत कुछ दशकों से योजना और प्रबन्धन की भारतीय शिक्षा जगत में बहुत चर्चा है किंतु दुर्भाग्य से संतति जनन, जो कि मनुष्य जीवन की एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्रिया है, को हमने इस क्षेत्र में भी उपेक्षित रखा है। प्राचीन भारत में श्रेष्ठ संतति के लिए भी उत्तम योजना और उत्कृष्ट प्रबन्धन की अवधारणा व्यावहारिक रूप ले चुकी थी जिस पर आज कोई बात भी नहीं करना चाहता। ऋग्वेद के सप्तम मण्डल का 34 वाँ सूक्त, जिसके देवता विश्वेदेवा अहि और अहिर्बुध्न्य हैं, इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वैदिक संहिताओं की ऋचायें ज्ञान और रहस्य में तो अद्भुत् हैं ही, कामना और संकल्प इनकी वे विशिष्टतायें हैं जो अन्यत्र नहीं दिखायी पड़तीं। यहाँ उपदेश और संकल्प के अंतर को समझा जाना चाहिये।

इस सूक्त की प्रथम ऋचा शक्तियुक्त दृढ़ मनीषा के आह्वान से प्रारम्भ होती है जो उत्तम संतति की योजना
का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है – “प्र शुक्रैतु देवी मनीषा अस्मत्सुतष्टो रथो न वाजी” ॥1॥ (बलवान अश्वों द्वारा
संचालित सुगढ़ रथ की तरह देवी मनीषा हमारे समीप आयें।)

दूसरी ऋचा पांचभौतिक सृष्टि क्रम के अनुरूप गर्भ के घटकों पर ध्वनि तरंगों के प्रभाव की ओर संकेत करती
है – “विदुः पृथिव्या दिवो जनित्रं शृण्वंत्यापो अध क्षरंतीः ॥2॥ (अधोगतिज क्षरणशील जल पृथिवी की उत्पत्ति को
जानने वाला है। वे सुनते हैं।)

विकसित हो रहा गर्भ ध्वनि और सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के प्रति बहुत ही संवेदनशील होता है। अनावश्यक
अल्ट्रासोनोग्राफी या एक्स-रे आदि से दूर रह कर वैदिक प्रबन्धन द्वारा श्रेष्ठ संतति के लिये प्रयत्न किये जाने चाहिये।

हमें स्वीकार करना होगा कि संकल्प के साथ किया गया कोई भी कार्य निश्चित ही उत्तमफलदायी होता है। हमने
राजाओं द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ किये जाने के बारे में सुना और पढ़ा है। यह पुत्रेष्टि यज्ञ संतति प्रबन्धन ही है जिसकी कुछ
विशिष्ट शर्तों में इच्छा, हर्ष, तीव्र वेग और आगे बढ़ने की प्रवृत्ति का उल्लेख किया गया है – “अभि प्र स्थाताहेव यज्ञं
यातेव पत्मंत्मना हिनोत ॥5॥ ( यज्ञ करने के लिए स्वयं की इच्छा से, सहर्ष, तीव्र वेग से अवश्य ही आगे बढ़ें।)
वेदों में त्वष्टा को देवशिल्पी के रूप में उल्लेखित किया गया है। त्वष्टा का एक और अर्थ है बीजभाग अवयव,
जो कि शुक्राणुओं में पाया जाने वाला वह स्वतंत्र घटक है जो गुणों का संवहन करने में समर्थ है। पाश्चात्य भाषा में
इसकी तुलना डी.एन.ए. से की जा सकती है। संतति हेतु समागम की योजना और उसके प्रबन्धन के अगले चरण में गर्भाधान के अनंतर श्रेष्ठ डी.एन.ए., उनके डोमिनेंट होने और गर्भ के धारण की कामना की गयी है – “आ यन्नः
पत्नीर्गमंत्यच्छा त्वष्टा सुपाणिर्दधातु वीरान्” ॥20॥ (जब पत्नी हमारे निकट आती है, तब त्वष्टा श्रेष्ठ बाहुओं अर्थात् श्रेष्ठ डी.एन.ए. स्ट्रेंड्स से वीरों को धारण करें।)

आगे की ऋचाओं में प्राणरूप धन (गर्भ) के संरक्षण हेतु पृथिवी, मरुद्गण, इन्द्र, वरुण, द्यौः एवं ओषधियों की
श्रेष्ठ योजना के प्रबन्धन की कामना की गयी है। गर्भ के विकास में पंचमहाभौतिक घटकों के युक्तियुक्त संयोजन,
विभाजन आदि में वात-पित्त और कफ की श्रेष्ठ कामुकता के लिए आवश्यक ऊर्जा एवं द्रव्य पृथिवी, मरुद्गण, इन्द्र,
वरुण, द्यौः, ओषधियों आदि से ही प्राप्त होती है।

गर्भिणी और गर्भ का प्रबन्धन अब उपेक्षित हो चला है जिसके कारण मनुष्य जाति श्रेष्ठ संतति से तो वंचित
हो ही रही है, गर्भिणी को गर्भावस्था के उपद्रवों का भी दुःख झेलने के लिए विवश होना पड़ रहा है।

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