काव्य: अंजु लता सिंह

अंजु लता सिंह

शब्द  (मुक्तक)

कटु शब्दों से बेधते जो सज्जन के कान।
उन्हें सदा धिक्कारता भू पर हर इंसान॥
ऐसे दुर्जन से कोई रखे न मेल मिलाप ।
कृपा करें न भूलकर उसपर तो भगवान॥

शब्दों का उच्चार ही वशीकरण का मंत्र।
मृदुभाषी का लोकप्रिय होता शासन तंत्र॥
कटु वाणी जो बोलते  उनसे बचते लोग।
हर वाचक की जीभ में लगे हुए ये यंत्र॥

शब्द बड़े अनमोल हैं इनके हाथ  न पाँव।
फिर भी घूमें जगत में नगर डगर हर गाँव॥
दिल पर राज सहज करने में लगे रहें दिन रात ।
बस लग जाना चाहिये इनका अपना दाँव॥

जीवन की नाव

लिये चल दिये थे
न नदिया न पानी
नहीं थी रवानी

पतवार हाथों में
बहकी सी बातों में
बहने की जिद थी
डगर खो गई थी

बरसीं खुशी की
तनिक नीक बूंदें
नहाया सा तन-मन
विकल हो चला था

बही मीठी पुरवा
किनारों ने छुआ
अंबर से घनघोर
अमृत भी बरसा

मेरी नाव को भी
हुआ फिर भरोसा
नदिया, समंदर ने
जोखिम  परोसा

गजब काठ की मेरी
नैया बनी थी
लिये साथ आशाएँ
हँसकर तनी थी

भंवर ने झिंझोड़ा
अटकाया रोड़ा
लहर ने उछाला
दे डर का हवाला

अडिग हो चली
ये नाव भली
पहुँची हूँ तट पर
यही है कहानी

बहता सा पानी
है इसमें रवानी
जीवन की नाव
हुई है दीवानी


दोस्ती

उत्तम पथ प्रदर्शक
विपदा में बने रक्षक
जो हाथ थाम ले
संयम से काम ले
दोस्ती वही है...

पलकों में खुशी भर दे
जिये न कभी डर के
होठों पे मधुर स्वर हों
डोले नहीं घर-घर वो
दोस्ती वही है...

शूलों की चुभन सी हो
फिर भी महकती हो
बिंदास गुल गुलाब सी
चमकते आफताब सी
दोस्ती वही है...

आगाज सुखद सुंदर
गहरी हो ज्यों समंदर
अंजाम में निराली
सावन की सी हरियाली
दोस्ती वही है...

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