कविताएँ: पंचराज यादव

पंचराज यादव
ख्वाहिशें अपनी अपनी

सपनों के साये में
जीते हैं हम।

ख्वाहिशों की लपटेंं
हमारे अंदर भी जलती हैं साहब,
प्लास्टिक की बोतलें
अपने साथी से ज्यादा बिनने की।
रेस लगती है हमारी भी
कबाड़ में फेंके
टूटे रेडियो के पुर्जे को पहले पाने की।

सपने हम भी देखते हैं
सामने पड़े पोटली के उस खूँट में
कहीं कोई बहुमूल्य चीज है,
खूँट खोलते ही कागज की पर्ची में
कुछ लिखा होता है
शायद किसी दिन लाये गये
दैनिक सामानों की सूची।

उम्मीदें हमारी भी
चुनाव के वक्त ही ज्यादा होती हैंं
किसी नेता की रैली से आपके जैसे,
फर्क इतना है
कि आप जाते हैं रोजगार के लिए
और हम जाते हैं
प्लास्टिक की बोतल के लिए।


निर्वासन

अलसाई भोर में
कुँए की गडा़री की गड़गडा़हट
अलार्म हुआ करती थी
नये सवेरा की।
घर का जाँता
छोटकी और बड़की बहुओं का
संवाद माध्यम हुआ करता था।
बतियाने का ऐसा माध्यम
आज विलुप्त क्यों?
उजाला होते ही
जाँते की आवाज पर गुफ्तगू जारी।
ऐसा जाँता
जो पूरे मुहल्ले को जगाता
खुशियन आटा पिसवाता
एकता और समरसता बाँटता
अब विदा हो चला है,
नहीं, विदा कर दिया गया है
इसलिए कि
हमें मेहनत की जरूरत नहीं,
समरसता की जरूरत नहीं,
केवल मशीनी समाज की जरूरत है।
एकता व समरसता
परोसता जाँता
अब नहीं
नीम की डाल कटवाएगा
हत्था बनवाने के लिए।
बढ़ई नहीं बुलवाएगा
फिटिंग करने के लिए।
गुड़ पानी नहीं बँटवाएगा
नये घर में लगने के लिए।
क्योंकि वह खुद
अपने ही घर से
निर्वासित कर दिया गया है।
अफसोस नयी पीढी़
तुम जाँता के बारे में
सिर्फ कहावतें सुनोगे
या फिर
सिंधु घाटी के मनके की तरह
खुदाई में पाओगे।


जन्म स्थान - गोइसरा, इलाहाबाद, उ.प्र.
संप्रति- बीएड, एमफिल महात्मा गांधी.अं.हिं वि.वि. वर्धा महाराष्ट्र, पी.एच.डी. (शोधकार्य जारी) तेजपुर विश्वविद्यालय, तेजपुर (असम) कविता, कहानी एवं स्वतंत्र लेखन में सक्रिय।
संपर्क - +91 805 208 1200, panchraj2@gmail.com

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