दो कविताएँ: सतीश राठी

जीवन-मंथन

उम्र का वह हिस्सा
सबसे अच्छा मानते हैं लोग
जब आप अपनी मर्जी के मुताबिक
जीवन जीने लगे

कुछ लोग
साठ के बाद की उम्र को
मान लेते हैं अच्छा
जब नौकरी वाले नौकरी से रिटायर हो
जीने लगते हैं अपना जीवन
अपनी मर्जी से

कुछ लोग
इसे सठिया जाने की उम्र भी
मान लेते हैं और
कुछ खिसक जाने की

कुछ यह भी मानते हैं कि
साठ के बाद की उम्र
होती है भगवत - भजन करने की
और इस बहाने से
गुजार जाते हैं नास्तिक होकर सारा जीवन

उम्र तो रोज खिसकती ही रहती है
साँस की हर आवाजाही के साथ
ढूंढती रहती है सदैव
मृत्युसे मिलन का अपना चरम क्षण

जीवन का कौन सा हिस्सा
सबसे अच्छा जीया गया
इसे खताने के लिये
कई लोग लिखतें हैं अपनी आत्मकथा भी

लेकिन शायद
जीवन को अच्छा जीना ही
कठिन होता है सबसे अधिक

लक्ष्यों को निर्धारित कर
आगे बढ़ने में कई पड़ाव
निकलते जाते हैं और
खाते में आ जाती हैं कई सारी उपलब्धियाँ

उपलब्धियों के मायने
सबके लिए अलग – अलग होते हैं
क्योंकि होते हैं अलग लक्ष्य
कोई अर्थ को , कोई प्रतिष्ठा को ,
कोई समाज सेवा को , कोई राष्ट्र सेवा को
बनाते हैं अपने – अपने लक्ष्य

बावजूद इन सारी बातों के
कई लोग यह पश्चाताप भी करते हैं
कि , हमने तो कुछ जीया ही नहीं जीवन में
हमने तो कुछ देखा ही नहीं जीवन में

मुझे लगता है कि
छोटी सी गिलहरी की तरह फुदक कर
छोटी सी चिड़ियाँ की तरह चहक कर
खुशियों के कुछ पल
जो जी लिए जाते हैं जीवन में
वही होते हैं उम्र का सबसे अच्छा हिस्सा
सी भी हाल में

हम चाहे जो भी
जीवन जी जाएँ
चाहे जैसे भी जी जाएँ
आत्म संतोष से जीवन जी लेना ही देता है
मृत्यु के बाद चेहरे पर
मुस्कान की चरम अभिव्यक्ति |
***


पिता के जाने के बाद

पिता के जाने के बाद
बहुत कुछ ढह जाता है जीवन में

घर हो जाते हैं खण्डहर
गिरने लगते हैं टूटते रिश्तों की तरह
सम्बन्धों में आ जाती है नीरसता
सब कुछ हो जाता है औपचारिक
बचपन की मधुर स्मृतियाँ
होने लगती है धूमिल

जब तक रहे थे पिता आँखों के समक्ष
सारे जीवन में थी एक निश्चिंतता
उनकी बाँहों में
मर जाते थे सारे दुख
मिट जाती थी सारी पीड़ा
और मिल जाता था उनके पास
हर समस्या का समाधान

अब पिता के चले जाने के बाद
जो भी कुछ ढह गया है जीवन में
बड़ा मुश्किल हो गया है
फिर से उसका वापस आ जाना |
***

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