काव्य: नन्दिता राजश्री

1. खोए हुए पते

सपनों में अक्सर मेरा पता एक पहाड़ होता था
सर्पिल हरी पगडंडियाँ वहाँ बादलों की चिट्ठियाँ लेकर आती थीं
और साँस सघन देवदार वृक्षों से छनकर आती थी
सूरज हिमशिखरों को हर रोज़ सोने से मढ़ देता था
और रात सितारों का बुंदा मैं कानों में पहन लेती थी

सपनों के बाहर मेरे पते पर आती सड़कें धूसर हैं
जागे हुए पतों पर अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं
और दम भर साँस की हवा भारी है
हाँ सूरज हर रोज़ ही आता है जलाता है
सितारों की शक्लें मुझे अब याद नहीं

सोये हुए पते शायद खोये हुए पते होते हैं।
***


2. चिड़िया बेटी

उसके घर एक बेटी आई थी
वो खुद एक बेटी थी और उसकी माँ
भी एक बेटी थी पर वो डरती थी अपनी बेटी से
उसका डर दरअसल उसके बेटी होने से था
सो एक दिन उसने कभी का सीखा जादू
बेटी पर इस्तेमाल कर लिया और
बेटी उसकी एक चिड़िया बन गई
माँ ने बड़े एहतियात से उसे एक
सुंदर पिंजरे में रखा चाँदी की कटोरी में
पानी और सोने की कटोरी में दाने डाले
माँ चिड़िया को खूब लाड़ करती और
चिड़िया साथ-साथ टहूकती पर फैलाकर
पिंजरे में ही नाचती और माँ धीरे से उसके
पर सहलाते हुए दबा कर समेट देती
बिल्लियाँ घूमा करती थीं आसपास
जूठन पर मुँह मारती और अक्सर
पिंजरे के आसपास भी लपक आती थीं
माँ मुस्तैदी से उन्हें भगा कर दम लेती
चिड़िया बेटी सहम कर पर और समेट लेती
पर एक दिन बिल्ली को मौका मिला
और उसने पंजा मार ही दिया
चिड़िया पिंजरे से निकली.. भागी
माँ ने देख लिया दूर से.. चिल्लाई
'चिड़िया बेटी उड़ जा', पर वो नहीं उड़ी
माँ पास आई चिड़िया बेटी मुँह खोले
उलटी पड़ी थी...
माँ ने देखा उसके पर चिपके हुए थे


3. लम्हे 

लम्हे वो दिन-रात के -

भरी दुपहरी रोके पर भी
जब अमिया चुनने जाते थे

शामों को जब खेलकूद कर
देर से घर को आते थे

बत्ती गुल हो जाने पर जब
पढ़ने में अलसाते थे

मोमबत्ती को टपका-टपका कर
मोती खूब जमाते थे

रात हमेशा चाँदनी खिड़की से घुस आती थी
ओढ़ उसे हम चैन से जल्दी ही सो जा थे

सपने में फिर परियों के संग
घूम जहाँ भर आते थे

लम्हे वो बरसात के -

मेढ़क जैसे टर्रा-टर्रा कर
बूँदों संग इठलाते थे

भीग-भीग गौरैया जैसे
दुबके-दुबके आते थे

आँगन में पानी भर जाने पर
बंसी और पैरों को पानी में डाले रहते थे

पैरों में कीचड़ भर-भर कर
घर में वापस घुस आते थे

ओले कभी टपक जाते तो
मुट्ठी भर-भर खाते थे

लम्हे वो ठिठुरे मौसम के -

सूरज के चढ़ जाने पर भी
उठने में शोर मचाते थे

अक्सर ही बिन स्वेटर के
रहने की ज़िद पर अड़ते थे

और नहाने में  कभी-कभी
किट-किट दाँत बजाते थे

माँ की गोदी नर्म-गर्म सी
भीगे ही घुस जाते थे

जली अंगीठी में  अक्सर ही
मटर पका कर खाते थे

लम्हे वे खट-मिटठे से -

जब पाचक वाले की पुड़िया के
चटखारे से औरों को ललचाते थे

फूली पूरी पाने को
आपस में  लड़ जाते थे

भरा पेट होने पर भी पापा से ले एक कौर
फिर खाना पूरा करते थे

दादा खुरपी लेकर अक्सर
क्रोटन रोपा करते थे

कोई पौधा नन्हा लेकर
हम भी  रोपा करते थे

दादी-नानी के किस्सों को
सच ही माना करते थे

नाना के जुमलों को नहीं समझ पाने पर भी
पेट पकड़ कर हँसते थे

सोने का नाटक करते-करते
सचमुच ही सो जाते थे

गिर जाने पर कभी-कभी
धूल झाड़ उठ जाते थे

पर खड़ी हो माँ सामने तो
रोने को हो आते थे

खूब सुनहरी धूप के जैसे
ये लम्हे छोटे-छोटे जाने कितने थे

कहाँ छुपे हैं पता नहीं!
***


4. अच्छा लगता है 

जब मेरी आँखों का काजल धीरे से
रात बन आसमान पर पसरता है
अच्छा लगता है
रातों को कोलतार की काली सड़क पर
चलते हुए जब रुपहला चाँद साथ चलता है
अच्छा लगता है
जब कभी मेरे माथे की बिंदी सुबह आसमान में
नारंगी सूरज बनकर  निकलती है
अच्छा लगता है
ठहरे हुए से किसी हरे ताल में जब
काँपती है मेरी  साँवली सी परछाईं
अच्छा लगता है
बस यूँ ही दूर तक घूमते भटकते
तुम्हारा चुपके से मेरी रूह को छू लेना
अच्छा लगता है
ये यूँ ही अच्छा लगना भी न...
कभी-कभी कितना अच्छा लगता है।
***

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