सम्पादकीय: करोना दुष्काल

अनुराग शर्मा
नमस्कार मित्रों!

भारत के लिये यह बड़ा कठिन समय है। भारत में करोना की नयी लहर का प्रभाव अधिक भयानक है क्योंकि विकसित राष्ट्रों की अपेक्षा हमारी प्रशासनिक तैयारी भी अपूर्ण रही और नागरिकों की ओर से बेध्यानी भी भरपूर रही है। शायद ही कोई भारतीय हो जिसने इन दिनों किसी न किसी परिचित को न खोया हो। हिंदी साहित्य ने पिछले दिनों में नरेंद्र कोहली और कुँवर बेचैन जैसे प्रख्यात साहित्यकारों को खोया है। यह पंक्तियाँ लिखते-लिखते टीवी पत्रकार रोहित सरदाना के असमय देहावसान के बारे में पता लगा। सेतु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि!

करोना काल हिंद के लिये तो कठिन है ही हिंदी के लिये भी कुटिल है। आकाशवाणी के विदेश सेवा विभाग का हिंदी प्रसारण मार्च 2020 से बंद है। पहले तो यूट्यूब चैनल आरम्भ करने के नाम पर सभी सेवाओं का शॉर्टवेव प्रसारण बंद किया गया। बाद में अन्य अन्य देशी विदेशी भाषाओं के रेडियो प्रसारण तो पुनर्स्थापित किये गए लेकिन हिंदी को निरस्त ही रहने दिया गया। मामला संसद तक गया तो अंग्रेज़ी के साथ हिंदी को संसाधन एकांश (resource unit) घोषित कर दिया गया। फ़िलहाल आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा से हिंदी या अंग्रेज़ी में विदेशियों या प्रवासियों के लिये कोई रेडियो प्रसारण नहीं हो रहा है। यहाँ तक कि हिन्दी सेवा केवल कागज़ों में ही संसाधन अनुभाग बनी हुई है चूंकि उसके पास संसाधन छोड़े ही नहीं गये हैं।  हिंदी विभाग की वैबसाइट पहले ही उपेक्षित थी, अब तो उसे अपडेट भी नहीं किया जाता। क्या इस तरह संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में हिन्दी को स्थान मिल सकेगा, यह विचारणीय विषय है। चूंकि विश्व के जितने भी देश अंतरराष्ट्रीय रेडियो प्रसारण करते हैं, उनमें भी ऐसा कोई नहीं जो अपनी राजभाषा के प्रचार-प्रसार को परे रखते हुए उसमें प्रसारण न करता हो। 

सोशल मीडिया और वाट्सऐप आदि पर करोना से सम्बंधित असली-नकली सलाहों की बाढ़ आयी हुई है। दुःखद है कि अप्रामाणिक कचरे के पीछे वास्तविक और लाभप्रद सामग्री भी छिप जाती है। भारत में मानव-रक्त-पिपासु उन लकड़बग्घों की बन आयी है जो कुछ दवाओं की कालाबाज़ारी कर रहे हैं और कुछ दवाओं के नाम पर नकली और खतरनाक पदार्थ बेच रहे हैं। यात्रा के लिये नकली करोना निगेटिव प्रमाणपत्रों की बिक्री तक की बातें सुनने में आ रही हैं। आज जहाँ लोग एक दूसरे के सामने आने से कट रहे हैं, शव ले जाने तक के लिये भारत में एम्बुलेंस तथा वैकल्पिक वाहनों द्वारा अत्यधिक धन की मांग की जा रही है। शवदाहगृहों के निम्नस्तरीय कर्मचारी बिना किसी सुरक्षा के प्रतिदिन अनेक रोगियों के शवों का दाह कर रहे हैं। इस अफरातफरी में स्थिति बदलने के प्रयास करने के बजाय उससे प्रसन्न होने वालों और अवसर का लाभ उठाकर भारतविरोधी प्रचार करने की भी कमी नहीं है। यह स्थिति बदलनी चाहिये।

अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिये और सेतु के इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवश्य अवगत कराइये।
 
शुभाकांक्षी,   

सेतु, पिट्सबर्ग
30 अप्रैल 2021 ✍️

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