सेफ्टी वाल्व - लघुकथा

कपिल शास्त्री

प्रेशर कुकर गैस पर चढ़ाकर अनु पति अविनाश पर बरस पड़ी, "अब तो तुम्हारी शकल देखकर भी गुस्सा आता है, आखिर हो तो उन्हीं का खून। किस मनहूस घड़ी में तुमसे नाता जोड़ा।"

कुकर के तापमान के साथ उसका पारा भी चढ़ता जा रहा था।

"मैं तो हर रिश्ते में ठगी गई, सबने मेरा इस्तेमाल ही किया, माँ बाप क्या, सास ससुर क्या, भैया भाभी क्या और ननद नंदोई ने तो बंटाधार ही कर दिया, चुगली कर-कर के घर से ही निकलवा दिया और रही सही कसर तुमने घर छोड़ कर पूरी कर दी, कोई तकाज़ा भी नहीं किया, जो उन्होंने बाद में ठिकाने लगा दिया।"

अविनाश ने टालते हुए कहा "अब जब हमने सब कुछ अपने दम पर बना लिया है तो क्यों पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ रही हो।"

"मुर्दे पुराने हैं तो क्या हुआ, ज़ख्म तो हरे हैं, अपने घर वालों के खिलाफ तो कुछ सुन ही नहीं सकते न! सही है, मैं तुम्हारे लिए अपना खून भी बहा दूं तो क्या हुआ, मैं तो गैर हूँ न! घुटना तो पेट की तरफ ही मुड़ेगा न!" अनु ने फिर कुरेदा।पहली और दूसरी की तरह इधर तीसरी बार भी सीटी बजने पर सेफ्टी वाल्व से निकल रही वाष्प से ढक्कन नाचता और फिर बैठ जाता, जैसे वो अवांछित वाष्प के निकल जाने से खुद की और कुकर की सलामती के लिए प्रसन्न तो था मगर डरा भी हुआ था। गैस बंद कर दी गयी। 

"बस कुकर ज़रा ठंडा हो जाने दो, फिर खाना लगाती हूँ।" इस बार अनु की आवाज़ में कुछ ठंडक लगी।

अविनाश को लगा जैसे वो स्वयं इन वाष्परूपी ज़ख्मों के ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हुआ एक ढक्कन है। 
भोजन के पश्चात् वो भी कमर हिलाते हुए बाय कह कर निकल लिया।