कुछ कह रहा संपादक भी

प्रिय साथियों,

दीपक मशाल 
एक बरस और बीत गया। बहुत कुछ घटा, बहुत कुछ बढ़ा जीवन व्यापार में इस साल। अमूमन हर व्यक्ति साल में दो बार अपने जीवन के लेखे-जोखे का हिसाब करता है, एक तो जन्मदिन वाले दिन और दूसरा साल की सांझ के वक़्त, आप भी कर ही रहे होंगे। जो तकलीफ देने वाली बातें, असफलताएं या दुर्घटनाएँ होती हैं उसके लिए अनुभवीजनों से सुनते आ रहे हैं कि 'बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय'।हालांकि पूरी तरह बिसारना भी सही नहीं, हाँ उससे आगे के लिए सबक ले लिया जाए तो भला, उसे इतिहास में दर्ज कर आगे बढ़ जाया जाए तो ठीक। यही बात सफलताओं और खुशखबरियों पर भी लागू होती है कि उनका नशा कुछ क्षणों तक का तो ठीक है, उससे ज्यादा का होगा तो नशा नाश का कारण भी बन सकता है।

तमाम सुखों-दुःखों के रूप में 2016 को अपनी जो छाप छोड़नी थी वह उसने छोड़ दी और अब यह साल तारीख़ के खण्डहरों में दाख़िल होने जा रहा है, अपने पीछे कुछ नमी, कुछ आँसू कुछ तबस्सुम छोड़ कर। कई नाम जिन्होंने अलग-अलग विधाओं के माध्यम से हिन्दी और हिन्दी साहित्य का मान बढ़ाया उनका साथ हमें सिर्फ 2016 तक ही नसीब था, अनुपम मिश्र जी से लेकर रवींद्र कालिया जी, नीलाभ अश्क़ जी, युगल जी, सतीश दुबे जी, विक्रम सोनी जी आदि हिन्दी को समृद्ध करने वाली विभूतियों को समस्त सेतु परिवार विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

साल की उपलब्धि रहीं लता सुर-गाथा (यतीन्द्र मिश्र), डॉमिनिक की वापसी (विवेक मिश्र), स्वप्नपाश (मनीष कुलश्रेष्ठ), अकाल में उत्सव (पंकज सुबीर), बेवकूफ़ी का सौन्दर्य (अनूप शुक्ल), अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा (पल्लवी त्रिवेदी), नक्काशीदार कैबिनेट (डॉ.सुधा ओम ढींगरा), अधूरे अफ़साने (लावण्या दीपक शाह), अलग़ोज़ा (रूपेश कश्यप), वैश्विक रचनाकार: कुछ मूलभूत जिज्ञासाएँ (डॉ.सुधा ओम ढींगरा), दिल्ली दरबार (सत्य व्यास), मुसाफिर कैफे (दिव्य प्रकाश दुबे )आदि पुस्तकें।

इस विश्वास के साथ कि आगामी वर्ष हम सबके लिए बेहतर खुशियाँ लाएगा, आप सबको नए साल 2017 की शुभकामनाएँ।
                                                                                                         अनुक्रमणिका, दिसम्बर 2016