जूते के इर्द गिर्द

हरीश कुमार

चुनाव के दिन है और अब चुनावों में जूता बहुत पॉपुलर हो रहा है। आये दिन अखबार में जूते की कहानी बन चुकी होती हैं। किसी नेता के फेंक के मारा जूता, किसी की तरफ उछल दिया गया जूता, चूक गया जूता और इसके साथ साथ कई ब्रांडेड, नान ब्रांडेड जूतों के विज्ञापन अखबारों में छाये रहते हैं।

मेरे ब्रांडेड जूते भी कुछ कुछ प्रेमचंद के फटे जूतों सी कहानी हो रहे थे।सुबह दफ्तर के लिए निकलना था तो नहा धोकर कपडे पहन जब जूते पहनने के लिए निकाले तो उनकी कुछ फटे से किनारे देखकर सोचा कि वैसे तो जूते अभी कुछ दिन और चलाये जा सकते है पर फिर भी पर्सनालिटी में फर्क भी एक बात हैं। मेरा छ साल का बेटा भी अपनी स्कूल वैन का इन्तेजार करता हुआ गाना गा रहा था, "मेरा जूता है जापानी, है पतलून इंगलिस्तानी ..."

और मुझे राजकपूर की वो फटेहाल हालत याद आ रही थी। अभी कल रात ही पिता जी ने जूतों को लेकर एक पुराना किस्सा सुना दिया कि जब वो मेरी माँ को देखने गये तो किस प्रकार आनन् फानन एक जोड़ी अच्छे कपडे का इन्तेजाम तो कर लिया पर नये जूते लाना भूल गये। वे श्रम के मारे जाने में आना कानी करने लगे तो दादी ने कहा कि पड़ोस वाले हरी दूकानदार का लड़का अभी कल ही नए जूते लाया हैं और कल पूरे मोहल्ले में हरी की बीवी उन जूतों का ढिंढोरा पीट चुकी है, उसका बेटा तो तेरा दोस्त है तू उसके जूते मांग ला और पहन के चल। इस तरह पिता जी ने मांगे हुए जूते पहनकर माँ को देखने की एक रस्म पूरी की।

खैर अब जमाना बदल चूका था और इस तरह मांगने का चलन कुछ बेढब सा लगता था। वैसे भी मुझे तो या जूते नए लेने थे या पुरानो से काम चलाना था और मै कोई लड़की देखने नहीं जा रहा था पर पिता जी को हर बात पर कोई न कोई किस्सा सुनाने की आदत पड चुकी थी और हमें सुनने की।

बहरहाल सरकारी स्कूल का अध्यापक होते हुए मैं रोज की तरह वही जूते पहनकर मन को समझाते हुए अपने स्कूल की और चल दिया। रास्ते में मै लोगो के चेहरों के साथ साथ उनके पहने हुए अलग अलग स्टाइल के जूतों को भी देखता रहा। गाड़ियों, ट्रको के आगे बुरी नजर से बचाने के लिए टंगे और लटकते जूते भी मैंने उस दिन गौर से देखे। सोचा कि जूता बुरी नजर से बचाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। कुल मिला कर जब पैर में पहनने लायक न रहे तो नजर से बचने का अस्त्र बन जाता है। बस में बैठे यात्रियों के बीच भी अखबार में छपी उन ख़बरों को लेकर चर्चा थी जिसमे फल लड़की ने फल आवारा आशिक की सरे बाजार अपनी जूती से पिटाई की और लगे हाथ आस पास के लोगो ने भी उसे अपने अचूक जूतों से जुतियाया| नेताओं पर फेंके या मार दिए गये जूतों पर लोग मिली जुली प्रतिक्रिया दे रहे थे।

“ये सरासर गलत है, सभी समाज वोट के द्वारा अपना बदला लेता है, जूता मारना तो सरासर हिंसा है।”

“ये है ही इसी लायक, और जूता तो आगे ही गिर पड़ा, मुंह पे पड़ता तो साड़ी नेतागिरी धरी की धरी रह जाती|”
ऐसा लग रहा था कि पूरा ब्रह्मांड ही जूता विमर्श पर एक जुट हो रहा है।

स्कूल पहुँचते ही सोचा कि जब खाली समय मिलेगा तो किसी अच्छे ब्रांडेड जूते के बारे में अपने साथियों से भी सलाह लूँगा। ऑनलाइन मार्केट के ज़माने में भी सलाह की ज़रूरत तो पड़ती ही हैं। आज मेरी कक्षा में बच्चे क्लास टेस्ट दे रहे थे। मैं कमरे में बच्चों की नज़रसानी करता हुआ कुछ देर के लिए कुर्सी पर बैठ गया। ये महीने के आखिरी हफ़्तों का एक नाचीज सा दिन था।

अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्नैपडील की भरी ऑफर वाले मैसेज फोन पर आ चुके थे। मैंने उन मैसेज को पढ़ा और अपने कुछ फटे हुए रीबॉक के जूतों को देखा। नए जूते लेने की इच्छा मेरे मन में वैसे ही कुलबुला रही थी जैसे पहली बार किसी प्रेमिका को प्रपोज करने का विचार मन में कुलबुलाता हैं। महीने के आखिरी दिन पर फिर भी क्रेडिट कार्ड का सहारा बड़ी हिम्मत देता हुआ नए जूते खरीद लेने को जोर जोर से पुकार रहा था। मेरे मन में अलंग रंग और सोल वाले स्पोर्ट्स शूज की तस्वीरें आ जा रही थी। मेरा दोस्त रवि एडिडास के जूते अमेजन से माँग चूका था, पूरे स्कूल के मास्टरों के सामने एडिडास के गुण गाता और उसकी कीमत पर इतराता घूम रहा था। सातवें पे कमीशन की उद्घोषणा हम सभी युवाओं को और भी युवा दिखने के लिए उकसा रही थी ।

“अरे यार, जब नौकरी नही थी तो पचास बार सोचते और जूता लेते। पिता जी ने हमेशा एक नंबर बड़ा जूता ही दिलाया, कि चलो बेटा दो साल तो चलेगा। पर अब कम से कम महंगा जूता ऑफर पर मिल रहा है और हम सब अच्छी तनख्वाह पाते है तो यार कुछ तो मन की करे।” रवि कहता।

“हाँ भाई, अभी नौकरीशुदा हो शादीशुदा और बच्चों वाले नही हुए हुए वरना कौन सा रीबॉक और कौन सा एडिडास। हम तो यह नुक्कड़ बाजार की सेल से तीन सौ रूपये वाला जूता ले लेते है। तुम लोगों का समय हैं, कर लो ऐश।” एक सीनियर मास्टर नेक राम जी ने ठंडी आह छोड़ते हुए कहा।

उनकी बात ठीक भी थी। मैं अभी तीन साल पहले शादीशुदा हुआ हूँ, बच्चे भी है और तनख्वाह का पता नही चलता की महीने के आखिरी हफ्ते तक कहा बेवफा की तरह फुर्र हो जाती थी । पे कमीशन कुछ सुधरे तो कुछ सहारा हुआ।

कक्षा में टेस्ट खत्म हो चूका था, बच्चे फुरसत के मूड में थे। मैं भी उनकी बाते सुनने के मूड में था।
“सर, ये ज्योति न बहुत लड़ाकी है, मेरे साथ रोज झगड़ा करती रहती हैं।”
“क्यों बेटा ज्योति, ये अमन क्या कह रही है, तुम क्यों इससे झगड़ा करती हो?” मैंने पूछा।

“ये अमन एक नम्बर की झूठी है सर, मैंने कभी कोई झगड़ा नही किया, शुरू ये करती हैं आप चाहे तो बिंदु से पूछ लो।” ज्योति ने कहकर अम्न की तरफ जीभ निकलते हुए देखा।
“क्यों बिंदु, लड़ाई की जड़ कौन है?” मैं उनकी कहानी सुनने के मूड में था।
“सर, अब मैं क्या कहूँ, इनका तो रोज का यही चलता रहता है। लड़ेगी भिड़ेगी, लेकिन मिड से मील के समय एक दुसरे का आचार खूब मजे ले लेकर खाती हैं, मुझे देती है तो बीस मिन्नत करवा कर।” बिंदु की अपनी जरूरत थी।

मिड डे मील में आचार तो नही मिलता था पर कई बच्चे घर से नींबू, आम और गलगल का आचार लाया करते।
“अरे तुम दोनों ने मुझे तो नही खिलाया कभी आचार, बड़ी छुपी रुस्तम निकली” मैंने शिकवा जाहिर करते हुए कहा। सब बच्चे खिल खिला के हंस दिए।

“सर ऐसी बात नही है, आप अभी ले लो हमारा आचार।” कहकर कुछ बच्चे अपने बेस्ट से आचार की रंग बिरंगी प्लास्टिक की डिब्बियां निकलने लगे।

“अरे अभी ठहरो, जब मिड डे मील का समय होगा तो एक बच्चा अचार दे देना।” मैंने टालते हुए कहा।

“क्यों भाई करण, बेटा खाना वाना कम खा रहे हो गया। बड़े पतले हो, थोड़ी बहुत सेहत बनाओ। मम्मी आलू वाला परांठा नही बनाती क्या? रोज खूब खाया करो, जल्दी मोटे हो जाओगे।”

“सर मैंने नही खाया कभी आलू वाला परांठा।” उसने बड़े शांत मन से कहा।

“हैं, क्या कह रहे हो यार, आलू का परांठा तो घर घर में बनता हैं। तुम कह रहे ही कभी खाया नहीं।”मैंने हैरानी और हंसी के मिक्स स्टाइल में कहा।

“सर इसके माँ बाप ईंट भट्टे पर काम करते है न, तो सुबह सुबह घर से निकल जाते हैं, ये रात की बची रोटी तवे पर गर्म कर के खा आता हैं।” चंदू ने असलियत बताई तो मेरा मन पसीज गया।

“चलो कोई बात नही, मैं कल घर से एक परांठा आलू वाला बनवा कर करण के लिए ले आऊंगा।” मैं उसके प्रति दया से भर सा गया पर शायद बच्चों को मेरी बात मजाक लगी और सब हंसने लगे।

“सर आपके जूते साइड से फट गए हैं, इन्हें सिलवाते क्यों नहीं।” एक लड़की ने मेरे जूतों की तरफ ध्यान फिर लौटा दिया।

सभी बच्चे गौर से मेरे जूतों की तरफ देखने लगे।

“अरे हाँ सर के जूते तो सिलवाने वाले हैं। यह अपने गाँव का वो बूढा मोची तो इन्हें अच्छी तरह से ठीक कर देगा।” एक बच्चे ने सलाह दी तो बाकि सब उस मोची का पता ठिकाना और काम का तरीका बताने लगे।

“हाँ सर मेरे पिता जी के जूते जब भी ख़राब हुए या फटे, बूढ़े मोची ने उसे सिल कर या चमड़े का नया टुकड़ा लगाकर बिलकुल नए जैसा बना दिया। आप वही से ठीक करवा लो।”

“हाँ, बिलकुल उसकी दुकान वो सरकारी डिपो के बगल में ही तो है। सारा दिन जूतियां सिलता है और शाम को दारु पीकर टुन्न ही जाता है।”

टुन्न शब्द कुछ इस तरीके से कहा गया कि सब फिर हँसने लगे।


आठवी क्लास की एक लड़की अपना टेस्ट पूरा करके मेरे पास आई।

“अरे नही बेटा, मैं तो सोच रहा हूँ कि जूता नया ले लूँ, ये स्पोर्ट्स शूज हैं, अब मोची वोची से ठीक नही होंगे।” मैंने कहा।

सब बच्चे कुछ देर के लिए चुप हो गए।और फिर एक दुसरे से बाते करने लगे।
अगली घंटी बजी तो बच्चों का खेलकूद की क्लास थी। सब स्कूल के खेल मैदान की तरफ चले गए।
मैंने कुछ देर दोबारा अपने जूतों के बारे में सोचा, मोबाइल पर एक बार फिर पचास प्रतिशत तक की अमेजन फ्लिपकार्ट वाली एड को देखा। मन कर रहा था की अभी क्रेडिट कार्ड से आर्डर बुक कर दूं, फिर न जाने कई हिसाब किताब, खर्च और फायदे, जोड़ तोड़ दिमाग में नाचते हुए खरीदारी के विचार को रिजेक्ट करने लगे। मैंने टेस्ट चेक करने का काम शुरू कर दिया। प्रश्न पत्र में ज्यादातर बच्चो ने डा संसार चन्द्र का व्यंग “ए वन जूता” लिखा हुआ था। आप्शन में वे “चिकित्सा का चक्कर” वाला व्यंग भी लिख सकते थे पर उस दिन सब जूते के ही मुरीद लग रहे थे।

“सेमीनार वाले वक्ता सही कह रहे थे कि हम जिन चीजों के बारे में ज्यादा सोचते है और पॉजिटिव होते है वह लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन काम करता है, मतलब कि वैसी चीजे हमारी और बढ़ने लगती हैं।” मैंने अपने आप से ही जैसे बात की।

मेरी अगली क्लास खाली थी। मैंने देखा कि एक लड़की गुमसुम और भावशून्य होकर अभी भी क्लास में ही बैठी थी। और मेरी तरफ देख रही थी।

“क्या हुआ बेटे, आप खेलने नही गए कोई समस्या?” मेरे पूछने पर लड़की ने न में सर हिलाया और मेरे पास आकर खडी हो गयी।

“हूँ!” मैंने उसकी तरफ बिना देखे आवाज़ निकाली। मैं टेस्ट चैक करने में व्यस्त था।

“सर, जब आप नए जूते खरीद लेंगे, तो इन पुराने जूतों का क्या करेंगे?” उसने बड़ी मासूमियत से पूछा।

“क्यों?” मैंने एक पल के लिए उसके प्रश्न को दुबारा अपने मन में सुना और थोड़ी हैरानी से कहा।

वो चुप रही।

“करना क्या है, कबाड़ी या रद्दी वाले को दे देंगे।" मैंने उसके मौन को कुछ और सुनने के लिए इशारा समझा ।
वो लड़की कुछ देर रुकी फिर चुपचाप अपनी सीट की तरफ धीमे कदमों से जाने लगी।
मेरे दिमाग में उसका ये प्रश्न, आप इन जूतों का क्या करोगे, एक बार फिर कौंधा। मेरे मन में एक प्रश्न पैदा हुआ और मैंने टेस्ट चेकिंग छोड़ कर उसे आवाज दी।

“अच्छा सुनो, तुम ये क्यों पूछ रही हो बेटा।”

“सर वो.....ऐसा है कि ...अगर आप ये जूते कबाड़ी या रद्दी वाले को ही देने वाले हैं ... तो मुझे ही दे देना।”
उसने हिचकते और सकुचाते हुए कहा।

“अरे तुम क्या करोगे बेटे इन जूतों का?” मैं टेस्ट चैक करने का काम छोड़ उसकी बात की तरफ केन्द्रित हो गया।

“जी मेरे पिता जी के जूते ... बिलकुल ख़राब हो चुके हैं और अब बूढा मोची भी उन्हें तीन बार ठीक करने के बाद फेंकने के लिए कह चूका हैं, इसलिए पूछ रही थी।”

“तुम्हारे पिता क्या काम करते है?”

“जी, दिहाडी मजदूर हैं।” लड़की ने बड़ी साफगोई से कहा।

“कोई बात नही बेटा, मैं अपने ये जूते तुम्हे दे दूंगा पर ये तो पहले से ही फटे हुए हैं।” मैंने हमदर्दी जताते हुए कहा।

“नहीं, वो बूढा मोची इन्हें बिलकुल ठीक कर देगा, मैं जानती हूँ।” उसे अपने आप पर और बूढ़े मोची पर पूरा यकीन था।

“ठीक है ले लेना।” मेरे मन में एक अजीब सा समर्पण आया।

लड़की इतना सुनकर खेल मैदान की तरफ मुस्कुराते हुए भाग गयी।

छुट्टी के बाद स्कूल से घर लौटते वक्त मैंने रास्ते में दिखते रिक्शेवालो, मजदूरों और गरीबनुमा आदमियों के पैरों की तरफ बार बार देखा। मुझे जाने क्यों ये अहसास हुआ कि मैं खुद उनमे से एक हूँ। अब मेरा ध्यान अपने जूतों की ओर नहीं जा रहा था।