गोविंद शर्मा की लघुकथाएँ

गोविंद शर्मा

सत्यवचन

रामू, याद है तुम्हें, मैंने कल ‘सच बोलो’ पाठ पढाया था।
हाँ, गुरूजी, यह पाठ मैं घर में भी पढता रहा हूं। मेेरे, दादा जी बताया करते थे कि उनके दादा जी, उनके पिताजी सदा उन्हें सत्य बोलने का पाठ पढाया करते थे। मेरे दादा ने मेरे पिता को, यह पाठ पढाया था। मेरे पिता जी ने मुझे सदा ही सत्य बोलने का पढ़ा पढ़ाया है... और यह पाठ मुझे अच्छी तरह से याद है, इसलिए मैं बड़ा होने पर अपने बच्चों को यह पाठ पढाया करूँगा।

"वाह, यानी तुम्हारे खानदान में सब पीढ़ी दर पीढी सच बोलते रहे हैं?"

"गुरू जी, मैं सिर्फ पाठ पढ़ने-पढ़ाने की बात कर रहा हूँ।"

फर्क

पेड़ो के उस झुरमुट के एक बड़े पेड़ पर गौरेया के एक जोड़े ने घोंसला बना रखा था। उनमें से एक ने कहा, "अरे, सामने देखो, उस पत्थर पर वृद्ध पुरुष और महिला बैठे हैं। कुछ पहचाने से लगते हैं। याद करो, कुछ साल पहले इन्हीं के घर में अपना घोंसला होता था। बाद में इन्होंने परिवर्तन कर के घर ऐसा बना लिया कि कोई परिंदा वहां पर भी नहीं मार सकता । तभी तो हमें आदमबस्ती छोड़कर यहाँ इस पेड़ पर आबाद होना पड़ा है।"

"मैंने इन्हें दिन भर इधर उधर घूमते या यहाँ अकेले बैठे देखा है। ये अपने घर में आराम क्यों नहीं करते?"

"इंसानों और हम पक्षियों में यह भी एक फर्क है। हमारे बच्चे युवा होते ही घोंसला छोड़ कर उड़ जाते हैं, इनके बच्चे छुड़वा देते हैं।"

आजादी

उसने देखा चिड़िया दर्पण पर चौंच मार मार कर खुद की छवि से लड़ रही हैैै। फिर वह दर्पण के
पीछे गई। वहां भी उसने दो चार चौंच मारी।

वह हंस पड़ा। चिड़िया चौंच कर उड़ी ओर उससे थोड़ी दूरी पर जाकर बैठ गई। वह बोला-
चिड़िया, तुम्हें क्या मिला? अपनी ही छवि पर चौंच मार रही थी तुम। फिर तुमने दर्पण के पीछे भी जाकर चौंच मारी जबकि वहाँ तुम्हें अपनी छवि दिखाई नहीं दे रही थी।

हाँ, मैं चौंच मार रही थी, पर अपनी छवि पर नहीं, बल्कि उसे दूसरी चिड़िया समझकर, यह मानकर कि वह इसमें बंद है , उसे आजादी दे दूं, इसलिये।

भ्रमित चिड़िया... क्या तुम्हें मिली आजादी?

हाँ, मुझे तो मिली है। भ्रम-मुक्ति से बड़ी आजादी क्या होगी!

बिजनेस

युवा पुत्र ने पिता से कहा, "आज एक सज्जन मुझसे मिलने घर आने वाले है। यदि वे मुझ से प्रभावित हो गये तो उनसे एक अच्छे फायदे वाला बिजनेस मिल सकता है। पर यह होगा कैसे? अपने घर में तो कोई नौकर भी नहीं है। फिर आप हर वक्त माँ से झगड़ते रहते हैं..."

पिता ने पुत्र की चिंता दूर करने की कोशिश में कहा, "नौकर? तुम्हारी माँ है ना। नौकरानी सी लगती है। उस आने वाले के सामने नौकर बनी रहेगी तो क्या ​बिगड़ेगा इसका?"

पिता ने यह बात कही थी अपमान करने के लिये। क्योंकि यह उनकी आदत में शुमार था। पहले पहले माँ इसका विरोध करती थी। अब इसे अपनी नियति स्वीकार कर चुप रहने लगी। पिता अड़ गये। आने वाले सज्जन के सामने यही ड्रामा होगा। उससे पहले इसकी रिहर्सल होगी। उन्होंने स्वयं के लिये युवा पुत्र की भूमिका चुनी। नौकर तो युवक की माँ को ही बनना था। ड्रामा हुआ। आने वाले सज्जन के रूप में युवा पुत्र ने प्रवेश किया तो पिता खड़े हो गये। "आइए... आइए" कहते हुए स्वागत किया और फिर युवक की माँ की और देखते हुए कहा, "साहब के लिये पानी लाओ।"

भीतर गई माँ कुछ देर में ट्रे में रख कर दो गिलास लाई। पानी का गिलास हाथ में लेते ही पिता नाटक वाली भूमिका भूल कर वास्तविक यानी पति की भूमिका में आ गये। गरज कर बोले, "कितने साल बीत गये तुम्हें समझाते हुए, पर अभी तक अक्ल का एक दाना नहीं उगा। इस बेहूदे ढंग से पानी लाते हैं। ट्रे गीली है। पानी गर्म हैं तुम एकदम पागल हो...।"

माँ ने सिर ऊँचा कर कहा, "साहब, मैं आपकी पत्नी नहीं हूँ, नौकर हूँ। अगर आपने मेरे प्रति ऐसी बदतमीजी दोबारा दिखाई तो मैं यह घर छोड़ दूंगी। कोई और घर देख लूंगी।"

सुनते ही पिता के हाथ से गिलास छूट गया। कुछ देर भौंचक खडे़ पिता नीचे गिरा गिलास स्वयं उठा कर पत्नी को पकड़ा रहे थे। युवक को लगा, आज अच्छे फायदे वाला एक बिजनेस तो मिल ही गया।