टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी - कहानी

मीना पाण्डेय
- मीना पाण्डेय

पार्क में टहलते-टहलते रात गहराने लगी तो रामेश्वर बेमन से घर की तरफ चल निकले। आजकल पूरा दिन वो शाम का इंतजार करते हैं। पार्क में हमउम्र दोस्तों के साथ बतियाना, हँसी मजाक करना उनके नीरस जीवन को ऊर्जा देता है। डेढ़-दो घंटे की ये टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी उनके जीवन की निराशा व अकेलेपन को कुछ देर के लिए ही सही कम कर देती है। मगर शाम ढले बेमन उसे फिर घर की तरफ निकलना होता। घर? क्या वाकई घर था वो? वो तो बेटे का घर था, बेटे का घर बाप का घर कब होता है? वृद्ध रामेश्वर अक्सर सोचता बूढ़ा आदमी इतना महत्वहीन क्यों हो जाता होगा, इतना बेबस, दयनीय की अपनी औलाद की चारदीवारी में साँस लेना भी उसे अपराधी सा बना देता है। कई बार रामेश्वर का दिल किया चुपचाप बिना बताये निकल जाये कहीं, किसी को कोई खबर न दे। मगर जाये भी तो कहाँ? जीवन भर की जमा पूंजी बेटा-बेटी के ब्याह व करियर में लगा चुके थे। यूँ पत्नी सुशीला की मृत्यु के बाद से ही एकाकी हो गए थे रामेश्वर मगर बच्चों का मुँह देखकर जी लिए।

पत्नी से अपार प्रेम करते थे रामेश्वर, उनके बगैर एक कदम भी बाहर नहीं निकालते। दफ्तर में जो छह-साठ घंटे उनके बिना बीते सो बीते इसके अतिरिक्त रामेश्वर कभी पत्नी को अकेला नहीं छोड़ते। सत्तर के दशक का प्रेम विवाह था दोनों का, सुशीला का सौन्दर्य व रामेश्वर का शायराना मिजाज दोनों के प्रेम की नींव बन गया था। रामेश्वर तो पत्नी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। मगर होनी किसके टाले टली है। पैंतालीस की रही होगी सुशील, तब अचानक कमजोर दिखने लगी, धीरे-धीरे भूख-प्यास-नींद कम हुई तो डॉक्टर को दिखाया गया, कैंसर की आखिरी स्टेज थी। सुशीला को तो पता भी नहीं चलने दिया गया मगर रामेश्वर अंदर ही अंदर घुलते रहे। पत्नी के सामने खुश रहने का दिखावा करते और अकेले बच्चे की तरह बिलख उठते। मात्र दो महीने जीवित रही उसके बाद सुशीला। रामेश्वर ने जान लगा दी पत्नी के पीछे मगर उसे बचा नहीं पाए। बस सुशीला गई तो जीवन से सारे रंग भी चले गए। दो तरुण बच्चों की अकेली जिम्मेवारी रामेश्वर पर आ गई। बाद के कुछ साल कहाँ हवा हुए कुछ पता नहीं। दिन भर दफ्तर व बच्चो के साथ लगने के बाद रात में अकेला कमरा उन्हें खाने को दौड़ता, इसीलिये जितना हो सके वो खुद को व्यस्त रखते।

बच्चों की पढ़ाई पूरी हुई, ब्याह हुआ और दोनों अपनी गृहस्थी में मगन हो गए। बेटा नोकरी के चलते छोटे शहर से बड़े शहर आया तो रिटायरमेंट के बाद रामेश्वर को भी अपनी जड़ो को छोड़ साथ आना पड़ा। लेकिन इस नए शहर ने उसे अकेलेपन के सिवा कुछ नहीं दिया। बहु की वक्त -बेवक्त की टिप्पणियां उसके हृदय में नस्तर सी चुभती और बेटे के पास अपनी व्यस्त आधुनिक दुनिया में से दो घड़ी पिता के पास बैठने का भी समय नहीं था। इस एकाकी जीवन से उकता गए थे रामेश्वर। उन्ही दिनों वे स्वर्णकांता के नजदीक आ गए। स्वर्णकांता, रामेश्वर के यहाँ बाई का काम करती थी। शुरू-शुरू में रामेश्वर का उदेख मन दो घड़ी स्वर्णकांता के साथ बतियाकर बहल जाता था मगर धीरे-धीरे उसे स्वर्णकांत की चुटीली बातों व वात्सल्यपूर्ण व्यवहार की आदत हो गई। सावलीं साधारण नैन-नक्श वाली, अधेड़ उम्र स्वर्णकांता, रामेश्वर की हर छोटी बात का ख्याल रखने लगी। कभी उसकी दिनभर की शिकायतों में स्नेह का मरहम चढ़ाती कभी ऐसे ही इधर-उधर की बातें कर रामेश्वर के नीरस जीवन में हँसी घोल देती।

हंसती-मुस्कुराती स्वर्णकांता का जीवन भी दुखों का ही पुराण रहा। शराब की लत में फंसकर असमय पति मर गया, एक जवान बेटा साईकिल चलाते हुए बस के नीचे आकर मर गया। दो बेटियो का ब्याह कर चुकी थी मगर उनके नसीब में भी सुख कहाँ था, दामाद भी नशेड़ी-नकारे ही मिले। स्वर्णकांता दिनभर लोगो के घरों में काम करती तब जाकर बेटियों का लेना देना और अपना दो वक्त का खाना पूरा होता। इन सब के बाद भी उसके चेहरे पर एक चिंता की लकीर दिखाई नहीं देती। कभी-कभी रामेश्वर को संकोच होता एक कामवाली से इतनी आत्मीयता ठीक नहीं पर काश उसके पास इसके अतिरिक्त कोई और विकल्प होता। धर्मपत्नी के बाद उनके जीवन,उनकी पसंद-नापसंद, सुख-दुःख से सरोकार रखने वाला स्वर्णकांता के सिवाय कोई और उनकी जिंदगी में नहीं आया। सुबह-सुबह बहू बेटा इतने बड़े घर में उन्हें तनहा छोड़ दफ्तर चले जाते और देर रात ही लौटते। सारा दिन घर में पड़े-पड़े कभी रामेश्वर अतीत को याद करते कभी वर्त्तमान से व्यथित हो जाते। ऐसे में सुबह चढ़ते ही दरवाजे की घंटी उनके कानों के लिए सबसे सुमधुर संगीत था, रामेश्वर के वृद्ध तन में जान आ जाती जब दरवाजे के बाहर खड़ी स्वर्णकांता अपने साँवले चेहरे में चमकती छोटी-छोटी आंखें घुमाती हुई कहती, “क्या साब जी एक घंटी तो पूरी बजने दिया करो” तो रामेश्वर की पोपली आँखे सुख से भर उठती।

“बड़ी देर कर देती है आजकल तू। चल पहले एक -एक कप गरमा-गरम चाय बना ला।”

“अभी लो साब!” कहती स्वर्णकांता भीतर होती तो मानो रामेश्वर जिंदगी के सबसे सुखद पल जी रहा होता और चाय की चुस्कियों के साथ स्वर्णकांता उस एकांकी वृद्ध के जीने का सामान उड़ेलकर उसके आगे कर देती। घर, आस-पड़ोस, दुनिया-जहान का चक्कर लगा जब उसकी बातें काम पर आकर अटकती तब जाकर बातों में कुछ खलल पड़ता। जाने कैसा सम्बन्ध जुड़ गया था दोनों के मध्य स्नेह, प्रेम, मित्रता, वात्सल्य, अकेलेपन का दर्द या कुछ और पता नहीं। बिना नाम के रिश्तों में इतनी मिठास क्यों होती होगी?नाम ही सब बिगाड़ देता है। मानो किसी अनजान रास्ते में बेसुध, बेफिक्र चले जा रहें हों न रास्तों की चुभन न मंजिल की चिंता। न अधिकार, न जिम्मेदारी, न उपेक्षा, न बंधन, ये अपरिभाषित आत्मीयता आंख मूंदकर उचक लेती है आसमान की आसमानी चुनर से असंख्य तारे और सजा देती है दो व्यथित हृदयों का कोना-कोना। घंटे-दो घंटे बाद जब स्वर्णकांता मुस्कुरा कर, “अच्छा साब जी चलती हूँ” कहती तो एक अनजाना डर रामेश्वर को घेर लेता।

“थोड़ी देर और ठहर जा मुझे एक और कप गरम चाय पिला कर चली जाना।”

अपने वृद्ध परंतु तेजयुक्त चेहरे पर दयनीयता ओढ़ते हुए रामेश्वर कहते तो स्वर्णकांता से भी जाया न जाता। रामेश्वर प्रसन्न थे, उनके अकेलेपन को ठेलते कुछ चुहलक भरे घंटे उनकी दिनचर्या में भी थे। मगर वृद्ध रामेश्वर की प्रसन्नता दुनिया, आस-पड़ोस से देखी नहीं गई। लोगों के पास किसी का अकेलापन दूर करने का समय तो नहीं होता मगर किसी अकेले झुलसते हृदय में स्नेह की रिमझिम हो रही बारिश में खलल डालने का समय जाने कहाँ से आ जाता है। अपनों की उपेक्षा व दर्द से छलनी दो हृदयों की आत्मीयता लोगो को रास नहीं आई तो तरह-तरह की बातें उठने लगी। रामेश्वर के चरित्र पर छींटाकशी हुई, दोनों के अनाम रिश्ते को बदनाम किया गया और उससे भी बात नहीं बनी तो रामेश्वर के बहु-बेटे के पास सोसाइटी का माहौल ख़राब करने की गुहार लगाई गई। और फिर बहु-बेटे ने उन्हें जो खरी-खोटी सुनाई बस मत पूछो। दुनिया जो कहती, कहती मगर खुद के बेटे के मुँह से दुशचरित्र का तमगा बर्दाश्त न हुआ। उन्हें लगा काश ये धरती फट जाये और वे उसमे समा जाएँ। लेकिन फिर भी जी गए, बहू-बेटे की हिदायतों व नसीहतों के साथ बेमन निष्प्राण जीवन।

स्वर्णकांता फिर उन्हें नजर नहीं आयी, किस मुँह से आती बेचारी? उस निष्कलंक पर जो कीचड़ उछाल गया उसके बाद कोई भी गैरतमंद औरत वहाँ क्यों लौटकर आती।

एक बार फिर तनहा हो गए रामेश्वर। कई बार मन किया स्वर्णकांता के घर चला जाय, मिलने, माफ़ी मांगने,मगर फिर बेटे की नसीहत में छिपी धमकी बेबस वृद्ध को भयभीत कर जाती। इसीतरह अकेले दिन बीतते गए, दिनभर एक कैदी की तरह रामेश्वर घर में बंद रहते और शाम को कुछ हमउम्र मित्रों के साथ पार्क में टहल आते। रामेश्वर समझ चुके थे एक विधुर, वृद्ध के नसीब में यही टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी है, एकमुश्त, पूरी जिंदगी में उनका हक़ नहीं। अक्सर खीझ उठते रामेश्वर ये दुनिया इतनी निष्ठुर क्यों होती होगी, मेरे दर्द, अकेलेपन से इन्हें कोई लेना-देना नहीं फिर मेरी खुशियों में क्यों सेंध लगाकर बैठा है ये समाज?

इसलिए शाम होते ही पार्क में हमउम्र मित्रों के साथ चहल कदमी और हँसी मजाक से उन्हें कुछ सुकून मिल जाता मगर लौटकर घर की तरफ निकलते हुए फिर उनके पैर कमजोर पड़ जाते और मन भारी हो उठता।