जिन्होंने प्रवासी भारतवंशियों को अनुबंधित दासत्व से मुक्ति दिलाई

महामना पं. मदनमोहन मालवीय: शर्तबंदी गुलामी से मुक्ति

25 दिसंबर, 2016 को विराट व्यक्तित्व महामना पं. मदनमोहन मालवीय की 155वीं जयंती और उनके द्वारा स्थापित एशिया के सबसे बड़े एवं विश्व के तीसरे सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का शताब्दी वर्ष हर्षोल्लास से मनाया गया। विलक्षण प्रतिभा के धनी एवं बहुआयामी व्यक्तित्व राष्ट्ररत्न मालवीयजी का पूरा जीवन राष्ट्र, राष्ट्रीय शिक्षा एवं राष्ट्रभाषा के लिए समर्पित रहा। मालवीयजी ने अपने जीवनकाल में राष्ट्रीय हित के अनेक कार्य किये जिसके कारण उनका नाम राष्ट्रनायकों की प्रथम पंक्ति में लिखा गया पर इसके साथ ही उन्होंने प्रवासी भारतवासियों से भी संबंधित एक ऐसा कार्य किया जो भारत की आजादी के लिए किये जा रहे संघर्ष से किसी भी प्रकार कमतर नहीं था और जिसके लिए भी उनका नाम लाखों प्रवासी भारतवंशियों को घृणित कुली-प्रथा से मुक्ति दिलाने के लिए इतिहास में सदा के लिए सुनहरे अक्षरों में अंकित हो गया।

प्रवासी भारतवासियों की समस्याओं को उजागर करने एवं उनसे जनमानस को परिचित का कार्य कई भारतीय, प्रवासी भारतीय एवं विदेशी व्यक्तियों ने किया था। इस क्षेत्र में प्रथम प्रयास आर्य समाजियों का था और उसके बाद महात्मा गांधी, भवानीदयाल सन्न्यासी, सी. एफ. ऐंड्रूज, हेनरी पोलक एवं गोपालकृष्ण गोखले सदृश लोगों का इस क्षेत्र में विशेष योगदान था। गोपालकृष्ण गोखले ने 1910 और 1912 ई. में इस प्रथा को पूर्णतः बंद करवाने का प्रयास किया था, पर वे असफल रहे थे। इस कार्य में पूर्ण सफलता पं. ममदनमोहन मालवीय (25 दिसंबर, 1861-12 नवंबर, 1946 ई.) को मिली जब उन्होंने 101 वर्ष पूर्व 20 मार्च, 1916 ई. को केंद्रिय असेंबली में प्रतिज्ञाबद्ध कुली-प्रथा बंद करने का आह्वाहन किया था और अपने प्रस्ताव के पक्ष में प्रबल प्रमाण दिया था, उसी का परिणाम था कि ब्रिटिश सरकार ने 1917 ई. में इस घृणित प्रथा को आधिकारिक रुप से पूर्णतः बंद कर दिया और इस युगांतकारी घटना के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

डॉ. राकेश कुमार दूबे
अब प्रश्न उठता है कि प्रवासी भारतवासियों की गुलामी क्या थी? अंग्रेजों द्वारा सीधे-साधे भारतीयों को ले जाकर विदेशी मंडियों में गुलामों की तरह बेंचा जाना और वहां उनपर पशुवत् अत्याचार किये जाने की प्रथा ब्रिटिश भारत में ‘शर्तबंदी गुलामी’ के नाम से जानी गयी। इसके अन्य नाम ‘गिरमिटिया प्रथा’ ‘प्रतिज्ञाबद्ध कुली प्रथा’ ‘शर्तबंदी कुली प्रथा’ इत्यादि थे। संसार से जब गुलामी की प्रथा समाप्त हो गयी तो भारत की अंग्रेज सरकार ने अफ्रीका एवं अमेरिका इत्यादि महाद्वीपों में अपने स्वजातियों को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए भारत से 1834 ई. से शर्तबंद गुलाम भेजने आरंभ किये जहाँ उन्हें लगभग 20 पौंड में पांच वर्ष के लिए बेच दिया जाता था और इन भारतीयों को यूरोपियन मालिकों के खेतों, बागानों अथवा खानों में नगण्य मजदूरी पर काम करना पड़ता था और उनपर जानवरों जैसा अत्याचार किया जाता था और वहां उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था।

भारत में प्रवास का इतिहास कोई नया नहीं है और भारतवासी प्राचीनकाल से ही दूसरे देशों को जाते रहे हैं। प्राचीन भारतीय प्रवास के कारण अखिल विश्व में भारतीय गौरव बढ़ा था परंतु, आधुनिक काल में भारतवासियों का जो प्रवास हुआ वह भारतभूमि के लिए अपकीर्ति और कलंक साबित हुआ। जब संसार से गुलामी की प्रथा उठ गई तो भारत में मियादी गुलामी का जन्म हुआ। औपनिवेशिक काल में प्रवास के कारण अंग्रेज थे और अपने को तथाकथित सभ्य कहने वाली अंग्रेज जाति ने भारत के लोगों के साथ वह कार्य किया जिसके कारण आज भी भारतीयों को कभी-कभी अपमान एवं नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अमेरिका के लोग तो कहा करते थे कि “India is a mine of coolies and labourers” अर्थात् ‘भारत मजदूरों और कुलियों की खान है।’

भारत के लोगों की आँखों पर पराधीनता की पट्टी बंध गई थी। उनका आत्मसम्मान इतना भी नहीं रह गया था कि वे अपने को विदेशियों का गुलाम मानने में किसी प्रकार का अपमान समझते। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी संपूर्ण 19वीं और 20वीं सदी के ढ़ाई दशकों तक प्रवासियों की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया था। कांग्रेस की एक अपील पर लाखों रुपये प्रवासी भारतीयों ने ‘तिलक स्वराज्य फंड’ में दिये थे और अन्य मदों में भी मदद से कभीं मुँह नही मोड़ा था, इसके विपरीत कांग्रेस ने प्रवासियों की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया, उल्टे अनेंक कांग्रेसवाले प्रवासी भारतीयों के प्रश्न को एक अमोघ उत्तर से हल कर देते थे कि “जिसका घर में मान नहीं उसे बाहर कौन पूछेगा। जब तक हमें यहां स्वराज्य प्राप्त नहीं होता तब तक प्रवासी भारतीयो के लिए आंदोलन करना व्यर्थ है।”

इसी घृणित प्रथा को समाप्त करने का आंदोलन गोपालकृष्ण गोखले ने आरंभ किया था पर उसे पूर्णता तक पहुॅचाया पं. मदनमोहन मालवीय ने, जब उन्होंने 20 मार्च, 1916 ई. को केंद्रिय असेंबली में इस घृणित प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रस्ताव उपस्थित किया था। अपने प्रस्ताव में, जिसका सारांश निम्नलिखित है, मालवीयजी ने कहा था, "अध्यक्ष महोदय! मैं यह प्रस्ताव उपस्थित करना चाहता हूँ कि- यह कौंसिल, सपरिषद् गवर्नर-जनरल से सिफारिश करती है कि कुली प्रथा का अंत करने के लिए शीघ्रातिशीघ्र उपाय काम में लाने चाहिए।”

अपने प्रस्ताव में आगे उन्होंने कहा था कि:
“आज से लगभग 80 वर्ष पूर्व भारत में प्रतिज्ञाबद्ध कुली-प्रथा का जन्म हुआ था। ब्रिटिश उपनिवेशों में पार्लियामेंट द्वारा दासत्व-प्रथा का अंत होने के बाद ही यह उपाय काम में लाया गया था। यह बात सन् 1834 ई. की है। उस समय ब्रिटिश उपनिवेशों के गोरे भूमिपतियों ने दासत्व-प्रथा के नष्ट होने से अपने व्यवसाय को चैपट होते देख, भारत से मजदूर प्राप्त करने का उपाय सोचा। दासत्व-प्रथा के नष्ट होने से वे उस हानि को सहन नहीं कर सकते थे, और उनका उद्देश्य ऐसे मजदूर प्राप्त करने का था जो उनकी इच्छानुसार कार्य कर सकें।”

“इस प्रथा के परिणाम-स्वरुप बहुत सी भयंकर बुराइयाँ उत्पन्न हो गईं तथा कुली-प्रथा की जाँच के लिए मारीशस, ब्रिटिश गयाना तथा नेटाल में कमीशन नियुक्त किये गये। उसी समय भारत में बहुत से क्षेत्र कुली भर्ती करने के लिए स्थापित किये गये जिससे बच्चे भगाने की तथा अन्य भयंकर कुरीतियाँ उत्पन्न हो गयीं। इस दोष को दूर करने के लिए भारतीय व्यवस्थापिकाओं में प्रवासित होने के नियमों में सन् 1882 ई. में संशोधन उपस्थित किये गये और 1883 ई. में इस संबंध में एक विधान भी बन गया जिसका उद्देश्य प्रवासी भारतीयों को सावधनी से तुरंत रजिस्टर में दर्ज कर लेना था, जिससे उनका जल्दी से पता लग सके तथा देश के उत्तरी भाग के कुली भर्ती करने वाली कोठियों का मजिस्ट्रेटों द्वारा निरीक्षण हो सके। किंतु भारत सरकार के 1883 ई. के प्रस्ताव तथा इल्बर्ट एवं  सर एडवर्ड वर्क की बातों से स्पष्ट हो गया कि 1883 ई. के विधान से कुली भर्ती करने का कार्य और  भी अधिक सुलभ हो गया।”

“सन् 1890 ई. तक भारतीय प्रजा प्रवासी भारतीयों की दशा से बिल्कुल अपरिचित रही, जब तक कि महात्मा गांधी ने इस प्रथा के दोषों की पोल न खोलनी आरंभ की। किंतु भारत सरकार तथा भारतीयों ने उसकी महत्ता उसी समय अनुभव की जबकि ट्रांसवाल सरकार ने भारत विरोधी नीति का पालन करना प्रारंभ किया। उस समय से प्रवासी भारतीयों की दशा गहन अध्ययन का विषय बन गई है, और यह कहने में कोई अत्युक्ति न होगी कि प्रारंभ से ही इस समस्या ने जनता को इतना विचलित कर दिया था, तथा प्रवासी भारतीयों के इस असहनीय व्यवहार के परिणामस्वरुप लोकमत इतना क्षुब्ध हो उठा है, जितना इससे पहले वह कभी न हुआ था।”

“1910  ई. में गोपालकृष्ण गोखले ने कौंसिल में नेटाल के लिए कुली भर्ती करने की प्रथा का अंत करने के लिए प्रस्ताव किया था और भारत सरकार ने उनकी बात मानकर नेटाल के लिए कुली भेंजने की प्रथा को बंद कर दिया था। दो वर्ष पश्चात् उन्होंने दूसरा प्रस्ताव उपस्थित किया था, जिसमें इस प्रथा को पूर्णतः बंद करने की सम्मति दी थी और इस प्रथा के दोषों का वर्णन करते हुए इस प्रथा को ‘राक्षसी, अन्यायपूर्ण, छल के आधार पर आश्रित तथा बलात्कार’ कहकर पुकारा था ओर साथ में यह भी कहा था कि “यह प्रथा न्याय तथा मानवता के सिद्धांतों के एकदम विपरीत है, तथा जो राष्ट्र इसे स्वीकार करता है, उसकी सभ्यता के ऊपर अमिट कलंक है।” उस समय सरकार ने इस प्रथा को बंद करना उचित न समझा और उपनिवेशों की दशा जानने के लिए एक कमेटी नियुक्त की जिसमें मेकनील और चिममनलाल सदस्य थे, जिसकी रिपोर्ट के प्रति जनता ने घोर निराशा एवं असंतोष प्रकट किया था।”

“शर्तबंदी-कुली प्रथा क्या है? यह वही प्रथा है जिसके द्वारा साधारण, अशिक्षित, अनभिज्ञ तथा निर्धन ग्रामवासी अपने घर-बार, सगे संबंधियों से अलग करके उन दूर स्थानों में जाने के लिए बाध्य किये जाते हैं, जहां की दशा से वे एकदम अपरिचित हैं। वहां जाकर उन्हें 5 वर्ष तक ऐसी परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, जहां वे अपने स्वामियों की दया के मोहताज हैं। उन्हें उन स्वामियों की अधीनता में कार्य करना पड़ता है, जो उनकी भाषा, रीति-नीति तथा आचार-व्यवहार से एकदम अपरिचित होते हैं जहां शर्तों के पालन न करने पर कठोर शारीरिक दण्ड दिया जाता है।”

“यह प्रथा एकदम अन्यायपूर्ण है। इस प्रथा को न तो कानून की दृष्टि से और न ही भारत सरकार के विधानों की दृष्टि से ही प्रतिज्ञाबद्ध समझौता कहा जा सकता हैं। 1883 ई. के बिल पर जब कौंसिल में वाद-विवाद हो रहा था तभीं कृष्टोदासपाल द्वारा यह प्रस्ताव रखा गया था कि ‘जिस प्रवासी से जिन शर्तों का पालन करने के लिए प्रतिज्ञापत्र लिखाया जाय, वे शर्तें उसे समझा देनी चाहिए तथा उसकी दूसरी लिखित प्रति उनको भी मिलनी चाहिए’। यह प्रस्ताव लार्ड रिपन के विशेष मत देने पर स्वीकृत किया गया था और विधान में यह धारा रखी गयी थी कि ‘कुली भर्ती करने वालों को चाहिए कि वे प्रत्येक प्रवासी को उस प्रतिज्ञा-पत्र की एक-एक प्रति दें तथा मजिस्ट्रेट और स्थानीय पुलिस कर्मचारी को उसकी असली नकल उनकी आज्ञा होने पर उनके संमुख उपस्थित करें’ पर इस विधान का पालन नहीं किया गया।”

“कुली भर्ती करने वाले व्यक्ति ऐसे रखे जाते हैं जो बहुत ही दुष्ट हों और उन्हें वेतन भी आदमी भर्ती करने के हिसाब से दिया जाता है। वे विवाहित स्त्रियों को बहकाने तथा हर एक व्यक्ति को फँसाने का प्रयत्न करते हैं। रेलवे स्टेशनों की भीड़भाड़, तीर्थस्थानों में अपने संबंधियों से बिछड़ने अथवा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते हुए स्त्री-पुरुष इन भर्ती करने वालों के चंगुल में फँसते हैं।”

“इस कुली प्रथा की सबसे बुरी बात तो इसका नैतिक अधःपतन है। कानून के अनुसार कुली स्त्रियों की संख्या मनुष्यों की संख्या का 40% होनी चाहिए, और स्त्रियाँ पुरुषों की संबंधी भी न हों तो भी कोई बात नहीं है। स्त्रियों की न्यूनता एवं चारित्रिक दुर्बलता के कारण नैतिकता का घोर पतन हुआ है। यह प्रथा आत्महत्या तथा मनुष्यहत्या के लिए भी उत्तरदायी है। 1908 से 1912 ई. तक आत्महत्याओं की संख्या कुलियों में प्रत्येक दस लाख पर 926 थी।”

“यह प्रथा धोखे से और बल से चलायी जाती है। कुलियों के लिए यह प्रथा एक शाप है। स्वतंत्र जनता की मान-मर्यादा तथा मजदूरी को भी इससे गहरा धक्का लगता है, और भारत का नाम बदनाम होता है। पूॅजीपतियों के लिए तो यह प्रथा लाभदायक है, क्योंकि अपने स्वार्थ के लिए वह मजदूर को अपनी कठपुतली बनाए रख सकता है। ... श्रीमन्! ऐसी प्रथा सुधारी नहीं जा सकती। उसका तो अंत ही हो सकता है। ... ब्रिटिश सरकार ने दासता का अंत कर दिया और उसके लिए दो सौ पचास लाख पौण्ड उसने हर्जाना दिया। भारत-सरकार ने अपनी अफीम की आय को इसलिए छोड़ दिया था कि चीनी लोगों का उससे नैतिक अधःपतन हुआ था। उसी भारत-सरकार से हम इस नीच तथा नीति-विरुद्ध कुली-प्रथा के उन्मूलन की प्रार्थना कर रहे हैं, और हमें आशा है कि हमारी प्रार्थना व्यर्थ न जायेगी। मेरा विश्वास है कि श्रीमान् की सरकार हमारी प्रार्थना को ध्यान में रखकर इस प्रथा को मिटाने का जल्दी से जल्दी उपाय करेगी।”

     मालवीयजी के प्रस्ताव का ही परिणाम था कि ब्रिटिश सरकार ने 1917 ई. में भारत में इस प्रथा को पूर्णतः बंद कर दिया। इस घटना के बाद देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं ने मालवीयजी के प्रयास की पूरे मनोयोग से सराहना की थी। यह घटना इतनी महत्वपूर्ण थी कि इस घटना के कई वर्ष बाद भी प्रवासी भारतीयों में सबसे चर्चित रहे भवानीदयाल संयासी ने जगरानी प्रेस, जेकोब्स, नेटाल, दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित ‘हिंदी’ पत्रिका के दिवाली अंक संवत्  1980 (8 नवंबर, 1923 ई.) में मालवीयजी का चित्र प्रकाशित किया था और उनके बारे में लिखा था कि “पूज्य मालवीयजी भारतके उन नररत्नों में एक हैं जिनपर बूढ़ी भारत माता अभिमान कर सकती है। आपनें प्रवासी भाइयों की भी बड़ी सेवा की। कुली-प्रथा के उच्छेद के लिये आपने जो उद्योग किया था उसे हम कभी नहीं भूल सकते। काशीके हिंदू विश्वविद्यालयके संस्थापक आप ही हैं और हिंदू महासभाके प्रधान भी। कई बार आप इंडियन नेशनल कोंग्रेसके प्रेसिडेन्ट हो चुके हैं। मार्शल लॉ के जमानेमें आपने पंजाबवासियों की बड़ी सहायता की थी। महात्मा गांधीजी आपको जेष्ठ-भ्राता के तुल्य पूज्य मानते हैं।”

    यद्यपि 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक प्रवासी भारतीयों की समस्या गंभीर बनी रही फिर भी मालवीयजी के प्रयास से 1917 ई. में यह निंदनीय प्रथा समाप्त कर दी गयी और प्रवासी भारतीयों को प्रथम बार मान मिला। जो भारतवासी गिरमिटिया प्रथा के अंतर्गत् उपनिवेशों में ले जाये गये थे, उनकी अवस्था तो अत्यंत दयनीय थी पर उनके वंशजों ने अपनी मेहनत के बल पर न केवल अपना बल्कि उन देशों का कायापलट करने का महान कार्य किया और आज वहां पर सभीं क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। हमारी वर्तमान सरकार भी उन्हें हर संभव तरीके से भारत से सीधे जोड़ने का प्रयास कर रही है। प्रवासी भारतीय सम्मेलन, विश्व हिंदी सम्मेलन इत्यादि आयोजन इसी शृंखला की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं।