द्विपदी व हाइकु - मंजु गुप्ता

मंजु गुप्ता

द्विपदियों में  हमारा जनतंत्र 

पाप की पगडंडी पर, बना रहे वे  राह।
विश्वासों की आड़ में, नारी रहे कराह ॥

सत्ता ही जनतंत्र में, करती केवल मौज ।
बना योजना कागजी, भरें  तिजोरी रोज॥

शोषण पोषित हो रहा, है समाज भयमान।
घोटालों की बाढ़ में, डूबा हिन्दुस्तान॥

 घर में ही जनतंत्र के, मची है खूब लूट।
कुर्सी पाने के लिए, पड़ी आपसी फूट॥

जनतंत्र का  है नारा, समानता - सहयोग।
तभी दिखा राजपथ पर, था दिव्य दिवस योग॥

जनतंत्र की दुपहर में, खो गया है प्रकाश।
व्यक्ति  की कब्र बनाए, आतंकी हथियार॥

सेंध मारने देश में, घूमे हैं गद्दार।
ओढ़े चादर दोगली, निभा रहे किरदार॥

संस्कृति - संस्कारों से, शांति, सच का  उजास ।
जग गुरु बने  फिर भारत, करें हम सब प्रयास॥

विदेश नीति  डोर थमी, अब लॉबी के हाथ।
देश हित में हो  विरोध, लोग  डालें  दवाब॥

सच का गला  घोट रहे , हावी होता झूठ।
व्यापम के  जालों  में, भविष्य फँसा खूब॥

आजादी के दीवाने, गए फँदे  पे झूल।
जरा याद उसकी करें, जिसे  गए  हम भूल॥

हवाई सपने देखें, बनाने को बुलेट।
हादसों की कब्रगाह, बने  मौत की रेल॥

निर्दोष  के  साए में, होती है घुसपैठ।
मासूमों को मार के, करते ये मुठभेड़॥

नजरें फिर मंडराई, करने देश गुलाम।
कपटी जालसाजों की, देखो! बिछी बिसात॥

अब तकनीकी  है सुलभ, जुड़ जाता संसार।
बस गया है गूगल में, ज्ञानों  का भंडार॥

बढ़े हैं  प्रगति  के पग, है बहुमुखी विकास,
प्रदूषण न करो   'मंजू', बने  देश  खुशहाल॥

माँ पर हाइकु

1
माँ  का प्यार
मन उड़ानों पर
पंख लगाए।

2
तेरे बिम्ब माँ!
यादों के सागर में
उपकारों के।

3
मन  घावों   पै
बांध के नेह पट्टी
जख्मों को भरे।

4
जग पै मांएं
करती शासन तो
युद्ध न होते।

5
पीड़ा सहके
करे मजबूत माँ
रिश्तों की नींव।

6
टूटे दिल को
ढांढस देकर माँ
दुःख उबारे।

7
रक्त से सींचे
संतती - सी सम्पत्ति
 जग की माएं।

8
खिला देती माँ
जीवन की बगिया
थाम के हाथ।

9
डाले है पर्दा
गलतियों पर माँ
करती  क्षमा।

10
कडी धूप में
सुखों का पल्ला बन
दे प्यारी  छाँव।
11
नेह की लोरी
धडकनों में गूंजी
अहनाद- सी  .

12
छिपाती गम
ओरों की खुशी में
सजल आँखें।
13
माँ की दुआ
दुःख के सफर में
आँखें हैं पोंछे।

14
माँ ईश्वर की
धरती के अंक की
दिव्य सर्जना।

15
माँ है महान
पूजा जीवन की
करें सम्मान।

16
सुलझाती है
उलझनों के  जाल
पलभर में।

17
माँ  पाठशाला
बन  प्रथम गुरु
भविष्य गढे।