पल्लवी त्रिवेदी की 'अंजाम ए गुलिस्ताँ क्या होगा?'

समीक्षक: भीष्म देसाई


अंजाम ए गुलिस्ताँ क्या होगा

लेखिका: पल्लवी त्रिवेदी
आईएसबीएन: मुद्रित नहीं
प्रकाशक: रुझान पब्लिकेशंस, जयपुर, राजस्थान
प्रकाशन वर्ष: जनवरी, 2016
विधा: व्यंग्य
पेपरबैक
पृष्ठ: 150
मुद्रित मूल्य: ₹ 150


2016 में रुझान पब्लिकेशन द्वारा पल्लवी त्रिवेदी की पहली पुस्तक 'अंजाम ए गुलिस्ताँ क्या होगा?' के प्रकाशन से बहुत पहले ही पल्लवी हिंदी ब्लॉग जगत में अपना स्थान बना चुकी थीं। एक पुलिस अधिकारी और हास्यबोध का संयोग सामान्य नहीं लगता। लेकिन पल्लवी के लेखन ने स्थापित मान्यताओं से आगे बढ़कर एक से बढ़कर एक व्यंग्य, रोचक परिस्थितियाँ, चुटीले संवाद और चटक एकल-वाक्यों से भरपूर संग्रह मुद्रित मूल्य पर ही आपके पैसे वसूल करा देता है। और फिर अब तो प्रकाशक द्वारा यह पुस्तक विशेष छूट पर मात्र ₹ 50.00  में उपलब्ध है। इस संग्रह में पल्लवी त्रिवेदी ने सामान्य जीवन की परिस्थितियों में बिखरे हास्य को उजागर किया है। पच्चीस व्यंग्य रचनाओं से भरी यह पुस्तक पढ़ते समय किसी भी रचना में वर्णित कोई भी परिस्थिति काल्पनिक या असामान्य नहीं लगती बल्कि पाठक इन घटनाओं को अपने चारों ओर घटते हुए देखता है।

संग्रह का आरम्भ "घासीराम मास्साब की जिंदगी का एक दिन" से हुआ है। आइये ज़रा घासीराम मास्साब के एक दिन की एक झलक देखें:

घासीराम मास्साब पूरे वॉल्यूम में प्रार्थना गा रहे हैं, "हे शारदे माँ... हे शारदे माँ" हैड मास्टर ने पुनः घूरा कि गला जरा कम फाड़ो! मास्साब ने टप्प से मुँह बंद कर लिया! सिर्फ होंठ हिलते रहे! प्रार्थना ख़त्म हुई। बच्चे लाइन बनाकर कक्षाओं की ओर चल पड़े! दस कदम तक लाइन चली फिर चिल्ल पों करते झुंड ही झुंड नज़र आने लगे! अब किसी मास्टर के बाप के बस की नहीं है कि इन होनहारों की लाइन दुबारा बनवा दे!


इस संग्रह में लेखिका ने जीवन के विभिन्न पक्षों की विविधता को बखूबी चुना है जिसका अंदाज़ रचनाओं के शीर्षकों से ही हो जाता है। 'आत्मा की तेरहवीं' में वर्तमान युग के सामान्य शगल यानि कि अंतरात्मा का गला घोंटने की प्रक्रिया का यथार्थ वर्णन है:


हमें कोई ग़म नहीं उसकी मौत का। कोई गुनाह तो नहीं किया हमने, आखिर कानून में भी तो आत्मा के मर्डर के लिए कोई धारा नहीं बनी है। रोज़ ही तो लोग खुल्लम खुल्ला आत्मा का क़त्ल कर रहे हैं और हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं।


बहरहाल, अगली ग्यारस को हमारी आत्मा की तेरहवीं है। पंडित ने बताया है कि 101 आत्माओं की आहूति देने से मरी आत्मा कभी वापस नहीं आती। सो सभी आत्मा पीडितों से अनुरोध है की अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर अपनी अपनी आत्माओं की आहूति दें और मृत्युभोज को सफल बनाएँ!


खूबसूरत आवरण और रूपसज्जा वाला यह संग्रह एक बार हाथ में लेने के बाद आप इसे पूरा पढ़े बिना रखना नहीं चाहेंगे। 'आसा और मुकेस: एक प्रेमकथा' का प्रेमालाप आपको गुदगुदाए बिना नहीं रहेगा:

मुकेश ने कहा, "ए आसा... तू मुझे बहुत अच्छी लगती है" आशा भाव विभोर हो कह उठी, "मुकेस रे... आप भी हमें बड़े जँचे।" दोनों "श" को "स" कहते थे। यह गुणों के मिलने का एक महत्वपूर्ण संकेत है। ये तो फिर भी उतनी बड़ी बात न थी। दो दिन बीतते बीतते दोनों को पता चला कि वे दोनों ही सूटकेस को 'शूटकेश' और 'समस्या' को 'शमश्या' कहते थे। अब तो कन्फर्म हो गया था कि वे दोनों एक दूसरे के लिए ही बने थे। फिर ईश्वर ने अपने आगे के दो दिन भी दोनों को संकेत ट्रांसफर करने में खर्च किये।


इस संग्रह में शिक्षक भी हैं, मध्यवर्गीय अंतरात्मा की आवाज़ भी है, प्रेमी-प्रेमिका की 'शमश्या' भी है तो फिर घरेलू नारियों की समस्याएँ कैसे छूट सकती थीं। 'लेने-देने की साड़ियाँ' नामक रचना में ज़रा देखिये, एक हाथ से दूसरे हाथ तक होने वाला साड़ियों का निरंतर प्रवाह:

सब जानते हैं कि लेने देने की साड़ियाँ कभी पहनी नहीं जातीं! चाहे अस्सी की हों चाहे ढाई सौ की! ये हमेशा सर्क्युलेशन में ही रहती हैं! ये रमता जोगी, बहता पानी हैं! ये सच्ची यायावर हैं! ये वो प्रेत हैं जो कभी इसे लगीं, कभी उसे लगीं! इधर से मिली, उधर टिकाई और उधर से मिली इधर टिकाई!


एक बेहद कुशल गृहणी यह पहले से पता करके रखती है कि जो साड़ी उसे मिलने वाली है, वह किस दुकान से खरीदी गयी है! वह बेहद प्रसन्नता पूर्वक उस साड़ी को स्वीकार करती है, बल्कि उसके रंग और पैटर्न की तारीफ़ करती है और जल्द ही फ़ाल, पिकू करवाकर पहनने की आतुरता भी दिखाती है और अगली दोपहर ही उसे दुकान पर वापस कर दो सौ रुपये और मिलाकर एक अच्छी साड़ी खरीद लाती है!


वैसे तो अंजामे-गुलिस्ताँ का हर व्यंग्य पाठक को हँसाएगा ही लेकिन ये रचनाएँ उसे एक पल रुककर सोचने को बाध्य भी करती हैं। उदाहरण के लिये 'काए सुनीता' की सुनीता अपने घर के जनसंख्या विस्फोट की पीड़िता है:


"सुनीता! तू तो समझदार है न। समझा कर थोड़ा। मम्मी थोड़े दिन बाद सब काम कर लेगी। थोड़े दिन और देख ले बस।"


सुनीता मन ही मन कहती है, "हे भगवान! अब मेरी मम्मी को सारे मरे बच्चे देना" और सर हिलाते हुए वहाँ से चली जाती है।



वह अपनी सबसे पक्की सहेली राशि से एक दिन कहती है, "मुन्ने के बाद मेरा और कोई भाई-बहन हुआ तो क्या होगा राशि?"



राशि उसे बड़ी दृष्टियों की तरह समझाती हुई कहती है, "नहीं अब नहीं होगा । मुन्ना लड़का है ना! सबको एक लड़का ही चाहिए होता।"



सुनकर सुनीता कुछ राहत की साँस लेती हैं। मगर उसकी राहत की ऐसी-तैसी दो ही दिन बाद हो जाती हैं जब वह अपनी दादी को माँ से कहते सुनती हैं, "अब एक बार और चांस ले लेना, दो लड़के हो जायेंगे तो अच्छा रहेगा।" सुनीता की मम्मी जिसकी अब बच्चे पैदा करना हॉबी बन चुकी है, लजाते हुए ही में सर हिलाती हैं।


औसत आकार के इस संग्रह के विषय विस्तृत हैं। इस छोटी सी समीक्षा में सबको ले पाना सम्भव नहीं है। अगर आपका ध्यान चला गया तो वर्तनी की ग़लतियाँ खटक सकती हैं, लेकिन यह तय है कि इस पुस्तक की हर रचना आपको हँसायेगी भी और सोचने को बाध्य भी करेगी।

भीष्म देसाई
[बहुआयामी प्रतिभा वाले भीष्म देसाई अभियांत्रिकी में शिक्षित हैं। लगभग सारी दुनिया घूमने के अलावा उन्होंने भारत, अफ़्रीका और अमेरिका में लम्बे समय तक निवास किया है। विनोबा भावे के गीता प्रवचन को ऑडियो में परिवर्तित करने का प्रकल्प लेकर उन्होंने उसे हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेज़ी में ऑनलाइन तथा सीडी प्रारूप में निःशुल्क उपलब्ध कराना सम्भव बनाया। एक लेखक और विचारक होने के अलावा उन्होंने अपना समय और संसाधन भारत के पिछड़े क्षेत्रों के अल्प-शिक्षित और संसाधनहीन किसानों को सेंद्रिय (organic) खेती में प्रशिक्षित करने में लगाया है।]
 सम्पर्क: bhishmadesai@yahoo.com