तीन कविताएँ - वत्सला पाण्डेय

वत्सला पाण्डेय
- वत्सला पाण्डेय

नारी

तुम अक्सर कराहती ही दिखती हो
आँसुओ में नहाई ही लगती हो...
कितनी कमजोर हो
कभी तन पे आघात सहती हो
तो कभी मन पे ...
पीडाओ में दहकती ही लगती हो
बल से अधिकार से जबरिया
सहती हो खुद पर आघात...
छली ही जाती हो
सुनहरे सब्जबागों से
उमर भी तुम्हे रोक नहीं पाती
सोलह से अडतालीस तक
जब तक तुममें बात रहे तब तक
किसी न किसी के लुभावने
वादों की भेट चढ़ती ही रहती हो
तुड़वाये जाते है तुम्ही से
तुम्हारे दायरे  ...
फिर तुम्हे ही लगाना पड़ता है
कलंक का काजल ...
तुमको ही ढोना होता है
तुम्हारा थका हारा तन और मन
फिर भी थमता नहीं है
ये चलन ...
हर बार आशाओं का दीपक
जला लेती हो आँखों में...
उम्मीदों से छ्ल्वाती हो खुद को
कभी कभी तन बचा लेती हो...
पर मन?
रोक नहीं  पाती तुम भावनाओं का बलात्कार
प्रेयसी बना कर छल लेते है तुम्हारी
कोरी अनछुई भावनाए...
लुटती रहती हो ...
मुस्कुराकर हर पल...
टूटी टूटी सी
नारी हो न ...
वो भी आज की।
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मन का सिनेमा

यादें मन का सिनेमा
लगती है ...
जिसके सितारे
हम तुम...
आज फिर देख
डाली तुम्हारी मेरी
अभिनीत वो फिल्म
पहली मुलाक़ात की...
आँखों आँखों में
मुस्कुराना
कितनी बाते बिन शब्दों के
कह जाना...
सारे सम्वाद फिर से
कानों में घुल गए...
वो ही सारे रंग
आँखों में उतर गये...
बिन अंतराल
पूरी मूवी देख डाली...
तरोताजा हो गए
फिर से सारे अरमान...
तुम और हम
दोनों मुस्कुराए ....
सिनेमा बहुत
भा गया।
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नर्म ख़्वाहिशें

फिर से लौटा दो 
मुझे वो शबनमी
गुलाबी सुबह...
फिर से बिखरी हो जिसमें
स्याह बेतरतीब  लटें...
खिसक जाए
वेलवेटी बिंदिया भी
अपनी जगह से...
खो जाए कान से
बाली भी चुपचाप...
महके चंदनी देह
प्रेम की खुशबू से...
मुसुकुरायें आँखे
गुलाबी हो जाए कपोल
निहारूँ फिर से
भोर में दर्पण...
ज़िंदा है
आज भी ऐसी
नर्म ख्वाहिशें।
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