प्रवासी हिन्दी कहानी में नस्लवाद

(महिला कहानीकारों के विशेष संदर्भ में)
डा. मधु संधु
       नस्लवाद, नृजातिवाद अथवा रेसिस्म का संबंध  उस अवधारणा से है, जिसमें एक नस्ल के लोगों को दूसरी से श्रेष्ठ अथवा निम्न माना जाता है। माना गया है कि हर नस्ल की अपनी खूबियाँ और कमियाँ होती हैं। कुछ पूर्वाग्रह या भेदभाव इनकी पहचान बने रहते हैं। आज लगभग 35 लाख प्रवासी भारतीय विश्व के भिन्न हिस्सों में रह रहे हैं। ऐसे में विश्वग्राम के, भूमंडलीकरण के समय में नस्लवाद की बातें मानवता को युगों पीछे धकेल देती हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक समागम के अनुसार नस्लीय भेदभाव के आधार पर श्रेष्ठता, वैज्ञानिक दृष्टि से गलत, नैतिक रूप से निंदनीय, सामाजिक अन्याय और खतरनाक है और नस्लीय भेदभाव के लिए कोई औचित्य नहीं है, सिद्धान्त में या व्यवहार में कहीं भी।[1] 21 मार्च (2001 से) को अंतर्राष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन दिवस मनाया जाता है। 2017 को इसकी 16वीं वर्षगांठ मनाई गई है ।
      आज भूमंडलीकरण, धर्मनिरपेक्षता, बहुजातीयता अथवा बहुसांस्कृतिकता की बातें भले ही की जाती हों, लेकिन समय समय पर अखबारों की सुर्खियों में नस्लभेद, रंगभेद पर पढ़ने को मिलता ही रहता है। कभी शाहरुख, कभी हरभजन, कभी निकिता राव, (अमेरिका का ग्यारह वर्षीय स्कूली छात्रा), कभी थनहलवा( मिज़ोरम के मुख्यमंत्री) ने विदेश और देश में हो रहे इस शारीरिक और मानसिक अपमान, घृणा, दुर्व्यवहार, असमानता, रंगभेद और नस्लीय टिप्पणियों पर चिंता व्यक्त की है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन में अफ्रीकन या एशियाई लोग यह सब झेलने के लिए विवश हैं।  जबकि भारत में भी स्थिति इससे कोई खास भिन्न नहीं है।
            अमेरिका से उषा प्रियम्वदा, सुषम बेदी की कहानियों में रंगभेद या नस्लवाद का अंकन अनेक स्थलों पर मिल जाता है। अमेरिका सपनों का देश माना गया है। इसे प्रवासियों की धरती भी कहा गया है। बेहतर शिक्षा और बेहतर रोजगार के लिए लोग वहाँ आते, रहते और बसते हैं। लेकिन अमेरिका में नस्लवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। अश्वेत अमेरीकन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नस्लवाद पर चिंता व्यक्त करते माना है कि नस्लवाद अमेरिका के डी. एन. ए. में है, वह इससे उभर नहीं पा रहा। उषा प्रियम्वदा की कहानी शून्य[2]


का नायक अमेरिका के संघर्षमय जीवन का उल्लेख करता कहता है- वहाँ की ज़िंदगी, खासकर हम विद्यार्थियों की बेहद मुश्किल है। कैनेडियन, अमेरिकन, अंग्रेजों से कॉम्पटिशन करना पड़ता है।  
            सुषम बेदी के पात्र जानते हैं कि वे कितने भी होशियार या पढे लिखे हों, पर उनकी नियति उनकी चमड़ी के रंग में शामिल है। यहाँ ब्राहमण अमेरिकन अंग्रेज़ है, क्षत्रिय यहूदी है, वैश्य एशियाई है और शूद्र काला है। यानी नस्लीय भेदभाव यहाँ चार स्तरों पर है- अमेरिकन, यूरोपियन, एशियन और अश्वेत। उनकी विभक्त’/ काला लिबास[3] में भारतीय मूल के उन अमेरिकनों का मन:ताप है, जिनका व्यक्तित्व पूर्णत: विभक्त है। वे अमेरिका में जन्म होने पर भी अमेरिकन नहीं माने जाते और भारतीय मूल के होने पर भी जिन्हें भारतीय नहीं कह सकते। कहानी की अनन्या डॉक्टर माँ बाप की अमेरिका में जन्मी अति संवेदनशील बेटी है। वह विश्वविद्यालय के जूनियर ईयर अवार्ड कार्यक्रम के अंतर्गत पढ़ाई के सिलसिले में साल भर के लिए भारत आती है। उसके अंदर जड़ों की पहचान की जिज्ञासा है। यहीं आकर उसे पता चलता है कि जिस देश को अमेरिका मे इतना पिछड़ा, हींन, गरीब कहा जाता है, वहाँ ऐसा कुछ नहीं है। अमेरिकन होते हुये भी वहाँ हर मिलने वाले का प्रश्न होता है- आप कहाँ से हैं, जबकि भारत मे ऐसा कोई नही पूछता। अमेरिका लौट कर वह खिले खिले रंगों के कपड़े पहनने लगती है। कत्थक के लिए गुरु ढूंढ लेती है। एक काले युवक के साथ रहना शुरू कर देती है। उसकी मानसिकता विभक्त हो जाती है। यह विभक्त मानसिकता उसे अस्पताल पहुंचा कर ही दम लेती है। 
           सुषम बेदी की एक अधूरी कहानी[4]  अमेरिका के कानून में, अमेरिका के समाज में, अमेरिका के जीवन में, न्यूयार्क जैसे मेट्रो में नस्लवाद के वीभत्स रंग-रूप दिखाती है। लेखिका सोचती है कि भारत के अछूतों जैसा जीवन ही अमेरिकी अफ्रीकियों का है। यहाँ तक कि उनकी रिहायशी कॉलोनियों के भाव भी बड़े कम होते हैं। गहरे साँवले रंग का भारतीय राजा अश्वेत युवती से प्रेम विवाह करता है। उनका किशोर छ्ह फुट लंबा बेटा माईकल था। अमेरिका के काले जानते हैं कि पुलिस उनकी संरक्षक नहीं, मात्र एक दानवी शक्ति है। खेल रहे बच्चों ने पुलिस की गाड़ी देखी और भयभीत हो भागने लगे। पुलिस ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी और गोलियों से भाग रहे माईकल की गोलियां लगने से मृत्यु हो गई और हृदयहीनता या दरिंदगी का आलम यह है कि घंटों उसकी लाश पुलिस स्टेशन के फर्श पर इसलिए पडी रहती है क्योंकि वह अमेरिकन या यूरोपियन नहीं है।  
            उनकी सरस्वती की धार[5] में समस्या दोहरी है। अफ्रीका से सारे भारतियों को सब कुछ छीन कर निकाल दिया जाता है। शारदा के डॉक्टर मम्मी-पापा भी कंगाल होकर भारत लौट आते हैं। कुछ अंतराल के बाद शारदा भाई के कैंसर के ईलाज के लिए अमेरिका आती है और वहीं एक स्कूल में नौकरी कर लेती है। स्कूल का अधिकतर स्टाफ गौरों का है। मैलकम जैसे काले बच्चों के मन में रंगभेद के कारण इन के लिए अपार नफरत है।
                 उनकी अजेलिया के फूल[6] की नायिका ने बीस वर्ष पहले निक से शादी की थी। निक आज कॉलेज का प्रिन्सिपल है। सम्मानित जीवन है, किन्तु नायिका मिसेज मिलर अपने को यहाँ- वहाँ कहीं नहीं पाती।  वहाँ कोई उन्हें अपना नहीं मानता। हर कोई पूछता है- आप किस मुल्क से हैं। निक के माँ-बाप ने कभी इस शादी को स्वीकार नहीं किया। कहता कोई कुछ नहीं, पर सब ऐसे देखते हैं, मानों वह निक की कोई गलती है। अमेरिका में आने वाले एशियाई यहाँ आकर इतनी मेहनत करते हैं कि मूल लोग अपने निठल्लेपन के कारण ईर्ष्यावश उन्हें अपने ढंग से तंग करते रहते हैं। उनकी ब्राडवे[7] में एक एशियाई युवा दंपति खूब मेहनत और किफायत से जी रहा है। पुरुष दिन मे फलों की दुकान करता है और रात को घर में ताबूत बनाता है। एक रोज खाना खाकर लौटे परिवार के पुरुष को गुंडे पुलिस के कारण बंधक बना लेते हैं। बिना किसी अपराध के उसकी हत्या हो जाती है और उसी ताबूत में उसके शव को रख परिवार अपने देश लौट आता है। रंगभेद इंसान और इंसान के बीच की दूरियाँ बढ़ाने वाली मानसिकता को जन्म देता है। उनकी चट्टान के ऊपर, चट्टान के नीचे[8] में न्यूयार्क के एक हिस्से में चट्टान के ऊपर गोरे अमेरिकनों की श्रेष्ठ बस्ती और यूनिवर्सिटी है और चट्टान के नीचे अभाव और गरीबी में पलती कालों की बस्ती। डोरा जॉनसन पिछले पाँच वर्ष से चट्टान के ऊपर के अभिजात इलाके में रहती है। अवधारणा है कि सब काले लड़के चोर डाकू ही होते हैं। ऊपर के इलाके की सुरक्षा के लिए वे चेतावनी हैं। डोरा नीचे की बस्ती में रहने वाले जैस्सी को शुक्रवार के शुक्रवार सफाई के लिए कहती है। लेकिन गोरी मैनेजमेंट सुरक्षा का हवाला देती काले जैस्सी के आने पर रोक का फरमान जारी कर देती है।
            उनकी बीच की भटकन[9] की वीणा बेबी से कहती है- यहाँ तूँ बैलजियन, फ्रेंच, इटैलियन या अफ्रीकन से शादी कर ले, मामा पापा को कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन किसी पाकिस्तानी से?
            यानि अमेरिका की प्रवासी महिला कहानीकारों ने उस प्रथम दुनिया के सर्वाधिक अभिजात माने जाने वाले देश की संकुचित राजनैतिक, सामाजिक, वीभत्स सोच और उसके शिकार अश्वेत, एशियन की त्रासदियों को प्रखर स्वर दिये हैं।  
            अपनी धरती से उखड़ कर पराई ज़मीन पर सांस लेना कोई बहुत आसान काम नहीं। उषाराजे सक्सेना, कादंबरी मेहरा, उषा वर्मा, दिव्या माथुर ने भी नस्लवाद के संदर्भ में इंग्लैंड के प्रवासियों की नंबर दो की हैसियत को महसूसा और स्वर दिया है। उषा राजे सक्सेना की प्रवास में[10] का शंशाक अपनी मेहनत के बल पर लंदन के ब्रिटिश सर्विस कमिशन में ऊंचा रुतबा प्राप्त करता है। भारतीय ही नहीं वहाँ के सभी प्रकार के नागरिकों में अपना विशेष स्थान बना लेता है। उसके अंग्रेज़ मित्र भी हैं। नस्लवाद पर वह विश्वास कर ही नहीं सकता। उसे लगता है कि लंदन में रह रहे भारतीय हीन ग्रंथि और गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। वहाँ के अदब-कायदे, रीति-रिवाज, मनोभाव- सब पर उसकी पकड़ है। लेकिन यही प्रगति अवरोध बन जाती है। वह नस्लवाद का शिकार होता है और अविश्वसनीयता के आरोप में उसे निलंबित कर दिया जाता है।
            उनकी मेरा अपराध क्या है[11] की स्टेला रोजर्स के पाँच भाई- बहन हैं। सभी भूरी- नीली आँखों और गोरे रंग के हैं। स्टेला की काली आँखें और गंदुमी रंग ब्रिटेन के नस्लवादी चिंतन में उसका जीवन विषम बना देता है। बच्चे माँ के लिए चिल्ड्रेन अलाउंस और सोशल लाभांशों के मोहरे मात्र हैं। पितानुमा आदमी उसे सिर्फ दुतकारता है। नानी उसे बेटी के दुर्भाग्य का कारण मानती है। गरीबी के कारण उसे और भाई-बहनों को सोशल-कस्टडी में रहने की आदत हो गई है। पिता के न लौटने, नानी के वृद्धाश्रम में जाने और माँ के पुन: गर्भ धारण करने पर बच्चे अपनी नीली आँखों, गोरे रंग और सुनहरे बालों के कारण अलग-अलग दम्पतियों द्वारा गोद लिए जाते हैं। लेकिन गंदुमी रंग की स्टेला को कोई गोद नहीं लेता। अनाथालयों से बार-बार विस्थापन और असुरक्षा ही उसकी नियति है। सोलह साल की होने पर उसे असेसमेंट सेंटर भेज दिया जाता है।
            उषा राजे सक्सेना की अभिशप्त[12] में एक गोरे एशियन के गोरे चेहरे पर गहरे रंगों का मेक अप करके उसे काला दिखाया जाता है। पढे लिखे, बौद्धिक से हास्यस्पद संवाद बुलवाए जाते हैं। मीरा सोचती है कि इस देश में एशियन अभिनेता को निराशा, कुंठा, तनाव और हताशा में ही जीना है।
            तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। जैसे सुषम की सरस्वती की धार में अमेरिका का अश्वेत मैलकम गौरों और एशियन से नफरत करता है, वैसे ही ब्रिटेन के मुस्लिम एशियन हैं। उषा राजे सक्सेना की मज़हब[13] के परिवार का पुरुष विम्बुल्डन पार्क की मस्जिद में नमाज पढ़वाने का काम करता है। उसने अपने परिवार को गोरों से सलाम-दुआ न करने के आदेश दिये हुये हैं। उसके अनुसार गोरे अल्लाह के बंदे नहीं और न ही उनका कोई दीन है। साढ़े चार वर्षीय ज़ेबा कक्षा के बच्चों से झट से गाली-गलौच पर उतर आती है- शिट, यू गोरा, गेट लॉस्ट, यू ब्लडी । वह स्कूल में हिजाब बांध कर आती है स्कूल में खाना इसलिए नहीं खाती कि वह हलाल नहीं होता। उसकी दादी को लंदन का उन्मुक्त वातावरण दोज़ख लगता है। दूसरी ओर ब्रिटेन का स्कूल कहता है कि पाकिस्तान से आए बच्चों से उनकी भाषा में ही संपर्क किया जाय। उन्हें रोज़ों में नमाज़ अदा करने के लिए संगीत कक्ष दिया जाता है। यहाँ एक ओर पाकिस्तान से आकर मिचल में बसा अति रूढ़िवादी, पूरा नस्लवादी, फिरकापरस्त परिवार है तो दूसरी ओर ब्रिटेन की नस्लवाद विरोधी नीतियाँ हैं।
            उनकी एलोरा[14] की नायिका पंद्रह वर्षीय इंडो-ब्रिटिश किशोरी है। उसमें अंग्रेज़ युवतियों वाला ठसकेदार आक्रोश, तिलमिलाहट, निश्चय और बेबाकी है। नई पीढ़ी का आत्मविश्वास कि ब्रिटेन के नागरिक को वहाँ से ही अपने अधिकार मांगने होंगे। उसका आत्मविश्वास कहता है कि वह टैक्स पेईंग नागरिक है, अतिथि नहीं।
                  समझौते करना प्रवासियों की नियति है। नस्लवाद के सामने मानवाधिकारों की बात फीकी पड़ जाती है। ढेरों ऐसे समाचार पढ़ने को मिलते हैं कि समान अपराध में अंग्रेजों को और सज़ा मिलती है और एशियन को और। कादम्बरी मेहरा की समझौता[15] में बदमाश अंग्रेज़ ग्राहकों द्वारा टैक्सी का भाड़ा न देने पर क्रोधित सत्ता घर आता है और ऐश ट्रे ज़ोर से फ़ैकता है। अचानक उधर से आ रही उसकी पत्नी को ऐश ट्रे लगता है और वह खून से नहा जाती है। वह उसे अस्पताल भिजवाता है और घरेलू हिंसा के आरोप में पुलिस उसे पकड़ लेती है। सत्ते पर आरोप है कि वह शराब पीकर गाड़ी चलाता है और जानवरों की तरह पत्नी को पीटता है। पुलिस उसे इतना मारती है कि एक रात में ही सत्ते की मृत्यु हो जाती है। माँ छिन्दो क्या करे? उसके पास बोस्टन से आया मिकी जैसा भाई है। पीटर, हेलेन जैसे पडौसी हैं। गुरुद्वारा साहब है। शवयात्रा पर सफ़ेद पगड़ी पहन कर जाने वाले एक हजार लोग हैं। फिर भी प्रवासिनी अकेली है। समझौते करने के बाद ही उसे पंद्रह दिन बाद शव दिया जाता है। कादम्बरी मेहरा की ही जीता जीत गया[16] का गाँव का गंवार मानिंदर जीता को भारतीयों से घृणा करने वाली नस्लवादी अध्यापिका लूसी के झूठे चोरी और अश्लीलता के आरोप का शिकार हो पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।
            अपवाद यहाँ भी हैं। व्यक्ति चाहे जितना भी गोरे, गंदमी, काले रंग के पीछे भागे, किन्तु आत्मिक संबंध रंगों के उस पार ही जन्म लेते हैं। कादम्बरी मेहरा की रंगों के उस पार[17] में गौरे मार्टिन की सिर्फ एक ही पसंद है - आबनूस सी काली गुजराती कोयना, वह उसकी बचपन की साथिन है। वह उसी से शादी करता है। क्योंकि आत्मिक और आंतरिक प्रेम गौरे काले में भेद नहीं करता।
            उषा वर्मा ने भी रंगभेद के शिकार एशियन और अश्वेत अपनी कहानियों में चित्रित किए हैं। उनकी मंजूर अली[18] में भी ब्रिटेन का नस्लवाद है। पाकिस्तान के मंजूर अली और भारत (उड़ीसा) के सुधाकर ब्रिटेन की एक ही कॉलोनी के फ्लैटस में रहते हैं। थोड़े बहुत परिचित हैं। पर्स खो जाने से परेशान मंजूर अली उसे खोजता खरीदने के लिए पकड़ी चीजों के साथ ही स्टोर से बाहर आ जाता है और उस पर चोरी का पुलिस केस बना दिया जाता है। सुधाकर जमानत पर उसे छुड़ाता है। तथ्यों और प्रमाणों के अभाव में उसे अपराधी मान लिया जाता है। भारतीय हों या पाकिस्तानी, अंग्रेजों के लिए सब काले हैं, सब एशियन हैं, सब मुजरिम हैं, सब सज़ा के काबिल हैं।  
            उषा वर्मा की रौनी[19] में अनाथ अश्वेत बच्चे की दुरावस्था और ब्रिटेन का नसलवाद है। सात वर्षीय अश्वेत रोनी की माँ जेल मे थी और पिता का पता नहीं था। उसका जीवन सोशल वर्कर और फॉस्टर पेरेंटस  के बीच भटक रहा था। उसे ब्लडी निगर कहा जाता, सारे काले चोर होते हैं’ - कहा जाता। विद्यार्थी और अध्यापक दोनों उसे अपमानित करते, पीटते, अमानवीय व्यवहार करते।  
            नस्लवाद का यह रोग इतना फैला हुआ है कि दिव्या माथुर को नहीं लगता कि इससे आने वाले दशकों में छुटकारा मिल सकता है। जनसंख्या नियंत्रण के निरकुश कानून, नसलवाद की पराकाष्ठा उनकी कहानी 2050[20] में मिलती है। फैंटेसी के परिप्रेक्ष्य में कहती हैं कि ब्रिटेन के प्रशासन ने धरती पर स्वर्ग लाने के लिए अनेक हिटलरशाही कानून बना रखे हैं। ऋचा और वेद निस्संतान दंपति बच्चे के लिए तड़प रहे है। उन्होने समाज सुरक्षा परिषद में बच्चा पैदा करने के लिए आवेदन दे रखा है, पर अभी तक अनुमति नहीं मिल पाई। नस्लवाद ऐसा है कि गौरों को झट से बच्चा पैदा करने की इजाजत मिल जाती है। उनकी पंगा की पन्ना ड्राइविंग करते समय किसी गौरे को ओवरटेक करने का पंगा नहीं लेना चाहती। क्योंकि परिणाम वह जानती है।
            यह भारत की प्रवासी लेखिकायेँ हैं। इस देश की नस्लवादी सोच की तो वे रग-रग पहचानती हैं। नस्लवादी सोच और भारतीय जीवन में स्वीकृत हो रहे परिवर्तन को उन्होने बड़ी बारीकी से देखा समझा और चित्रित किया है। यहाँ उत्तर भारत में आर्य, दक्षिण में द्रविड़, पूर्वोत्तर में मंगोल नस्ल के लोग है। अर्चना पेन्यूली की कुछ बदल रहा है[21] में अंतर्देशीय, अन्तर्जातीय, अंतर्धार्मिक शादियों से नस्लगत, जातीय एवं धर्मगत कट्टरता कम होने का संदेश है। माँ सुनीता शर्मा अपनी सारी कट्टरता के बावजूद बेटे को असम की उस विजातीय ईसाई लड़की से शादी की इजाजत दे देती है, जो ढंग से हिन्दी भी नहीं बोल पाती
             उनकी मैं उन्हें पहचान न सकी[22] कहानी कट्टर धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता का एक साथ चित्रण करती है। डेनमार्क आए डॉ कृष्णन जितने कट्टर धार्मिक और जातिवादी दिखते हैं, उतने हैं नहीं। उनका मुँहबोला बेटा विजय मराठी दलित है। वह आठ वर्ष का था, किसी ढाबे में चाय का काम करता था। उन्होने उसे ग्रेजुएशन करवाया और अब डेन्मार्क से पोस्ट-ग्रेजुएशन करवाना चाहते हैं।
            नस्लवाद प्रवासियों की दुखती रग है। ऐसा मन:स्ताप – जिसे भुक्त भोगी ही समझ सकता है। सुनहरे भविष्य की खोज में विस्थापन और असुरक्षा। नम्बर दो-तीन की स्थिति और कुंठा, तनाव, निराशा, हताशा और विभक्त व्यक्तित्व। पुलिस और प्रशासन का अमानवीय व्यवहार/निर्णय। समझौते, निपट असहायावस्था और अपनेपन की खोज। लेकिन इस प्रवासी ने हार नहीं मानी। अधिकारों के लिए लड़ने को कटिबद्ध है। हालांकि उसे स्पष्ट है कि दूर भविष्य में भी रंगभेद की इस मानसिकता से छुटकारा सम्भव नहीं।

संदर्भ:-


[2] उषा प्रियंवदा, शून्य और अन्य कहानियां, शून्य, पृ. 48
[3] सुषम बेदी, विभक्त/ काला लिबास, चिड़िया और चील, पराग, दिल्ली, 1995
[4] वही, एक अधूरी कहानी, हंस, सितम्बर 2015
[5] वही, सरस्वती की धार, चिड़िया और चील, पराग, दिल्ली, 1995
[6] वही, अजेलिया के फूल
[7] वही, ब्राडवे
[8] वही, चट्टान के ऊपर, चट्टान के नीचे, तीसरी आँख, पराग, दिल्ली, 2016
[9] वही, बीच की भटकन, चिड़िया और चील, पराग, दिल्ली, 1995
[10] उषा राजे सक्सेना, प्रवास में, अभिव्यक्ति, 15 जुलाई 2009
[11] वही, मेरा अपराध क्या है, अभिव्यक्ति, 24 मार्च, 2008
[12] वही, अभिशप्त, प्रवास में, ज्ञान गंगा, दिल्ली, 2002
[13] वही, मज़हब, वाकिंग पार्टनर, दिल्ली, 2004
[14] वही, एलोरा, वह रात और अन्य कहानियाँ, सामयिक, दिल्ली, 2007
[15] कादंबरी मेहरा, समझौता, हंस, अक्तूबर 2006 
[16] वही, जीता जीत गया , अभिव्यक्ति, 9 जून, 2015
[17] वही, रंगों के उस पार, जय विजय, 24 नवम्बर  2015
[18] उषा वर्मा, मंजूर अली, अभिव्यक्ति, 28 अप्रैल, 2012
[19] वही, रौनी, कारावास, विद्या विहार, दिल्ली, 2009
[20] दिव्या माथुर, 2050, 2050 और अन्य कहानियाँ, डायमंड पॉकेट बुक्स, दिल्ली, 2011
[21] अर्चना पेन्यूली, कुछ बदल रहा है, गर्भनाल -41, मार्च 2010
[22] वही, मैं उन्हें पहचान न सकी, गर्भनाल-7, जून 2007

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