साक्षात्कार: मॉरिशस से अभिमन्यु अनत

नौ अगस्त 1937, में मारीशस के त्रियोले ग्राम में जन्मे अभिमन्यु अनत, वर्तमान हिंदी के सर्वोपरि साहित्यकारों में से एक हैं। हिंदी अध्यापक, और नाट्य कला विभाग में नाट्य प्रशिक्षक रहने के उपरांत वे महात्मा गांधी संस्थान, मॉरिशस में हिंदी के विभागाध्यक्ष और संस्थान की हिंदी पत्रिका ‘वसंत’ के संपादक रह चुके हैं।
हिंदी के विश्वप्रसिद्ध साहित्यकार अभिमन्यु अनत से, उनकी कृति 'रोक दो कान्हा' के विषय में, महात्मा गांधी संस्थान, मोका (मॉरिशस) में सृजनात्मक लेखन की विभागाध्यक्ष डॉ० राजरानी गोबिन की संक्षिप्त वार्ता

राजरानी: अभिमन्यु जी 'रोक दो कान्हा' रचने की प्रेरणा आपको कहाँ, कब और कैसे मिली?
अनत: रचना प्रक्रिया मेरे भीतर बहुत पहले से थी। मैं हमेशा युद्ध के खिलाफ रहा हूँ। युद्ध विनाश का कारण और सारी सभ्यता को मिटाने की वजह है। यह मानवकल्याण के लिए नहीं होता। महाभारत में कृष्ण पर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने युद्ध करने के लिए लोगों को विवश किया। परन्तु कृष्ण का महती उद्देश्य युद्ध करवाकर लोगों को उसका परिणाम दिखाना था। उपदेश मात्र से काम नहीं चलता। भगवान् लाख बोलें कि युद्ध मत करो! युद्ध होता ही रहेगा। लेकिन, यदि आदमी स्वयं युद्ध का परिणाम झेल लेगा तो वह युद्ध बन्द करने का प्रयास करेगा।

राजरानी: महाभारत को 'रोक दो कान्हा' नाटक का आधार बनाने का क्या कारण है?
अनत: महाभारत एक युद्ध विरोधी रचना है। चाहे इलियड हो या 'la guerre de cent ans' हो, विश्व के इतिहास और साहित्य में कहीं भी इस समस्या को उतने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया, जिस तरह युद्ध की समस्या  महाभारत में दिखाई गयी है। इसीलिए मैंने महाभारत को ही आधार बनाया। मैंने महाभारत की मूल कथावस्तु की रक्षा की, लेकिन इतिहास को रेखांकित करने के लिए उसमें सृजनात्मकता और कल्पना का भी इस्तेमाल किया। अस्त्रपति पात्र मेरी मौलिक कल्पना है। उसे मूल कथा में रखकर मैंने यह प्रश्न किया कि युद्ध के पीछे जिम्मेदार कौन है? जब दो आदमी लड़ते हैं तब क्या कोई तीसरा व्यक्ति उन्हें लड़ने के लिए नहीं उकसाता? आज मॉरीशस में भी हमसे युद्ध करवाया जा रहा है। इसी सत्य को उजागर करने के लिएमैंने यह नाटक लिखा।

राजरानी: इसका आशय यह है कि 'रोक दो कान्हा' का उद्देश्य शांति की पुनर्स्थापना है?
अनत: हाँ, शांति की पुनर्स्थापना। लेकिन मैने महाभारतकार की तरह अपनी विचारधारा को इम्पोज़ नहीं किया है। मेरा उद्देश्य अपनी युद्ध विरोधी विचारधारा को लोगों पर थोपना नहींअपितु उन्हें स्वयं विचारने के लिएआमंत्रित करना है। यदि आपको आज के युग में रोक दो कान्हा की प्रासंगिकता अकली। पर तो आप इस विषय में क्या कहेंगे?अनत: यह महाभारत की ही हमेशानाटक तरह प्रासंगिक रहेगा। महाभारत एक महाकाव्य है। गोश्ते' ने कहा है कि जो महाभारत में नहीं मिलेगा, वह हमको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा। महाभारत संसार का प्रतिबिम्ब है। महाभारत का सत्य समकालीन और शाश्वत है। मैंने युद्ध के सम्बन्ध में लिखा। मेरे बाद भी, हजारों लोग इसी विषय पर लिखेंगे। हर आदमी युद्ध की एक नयी व्याख्या देगा। मेरा लक्ष्य मिथक का पुष्टिकरण करना था। मिथक में केवल कथा नहीं होती है। उसमें दुनिया का सबसे बड़ा सत्य होता है

राजरानी: आपने नाटक का शीर्षक 'रोक दो कान्हा' ही क्यों रखा?
अनत: क्योंकि कृष्ण ने ही युद्ध करवाया। कृष्ण अर्थात् कान्हा प्रकृति का प्रतीक हैं। वे नियति नहीं है। प्रकृति को हम खुद मिटाते हैं और कहते हैं कि इसकी रक्षा करनी चाहिए। महाभारत में जो रक्षक है, वह भक्षक भी बनता है। मिथक में विष्णु सृष्टा है, ब्रहमा पालक है और महादेव विनाशक है। इस त्रिमूर्ति में जन्मपालन और संहार की प्रक्रिया है। प्रकृति ही संहार करती है। कालिदास ने कहा है कि नर्मदा नदी जब तक अपनी मर्यादा के साथ बहती है, तब तक हरियाली बढ़ती है। देश पल्लवित होता है। नर्मदा जब अपनी मर्यादा को छोड़कर बहती है तब बाढ़ आ जाती है या सूखा पड़ जाता है। कृष्ण से प्रार्थना की गयी है कि प्रकृति! तुम्हीं रोक सकती हो इस युद्ध को। प्रकृति हम है। हमारी मानसिकता प्रकृति है। रोक दो कान्हा - यह द्रोपदी की माँग है। आज पूरे विश्व की यही माँग है। युद्ध से रक्षा तभी होगी जब हम स्वयं से 'रोक दो कान्हा ' कहें और आह्वान करें कि हमें खुद इस युद्ध को रोकना है।

राजरानी: आपके विचार से  'रोक दो कान्हा' और धर्मवीर भारती के 'अंधा युग' में क्या अन्तर है?
अनत: 'अंधा युग' एक सरोवर है और 'रोक दो कान्हा'  एक बूंद है। Comparison has no reason, especially in art and literature. धर्मवीर भारती की गणना आधुनिक काल के दस महान् लेखकों में की जाती है। मैं अपनी तुलना धर्मवीर भारती के साथ करने का साहस नहीं करूंगा। मेरे नाटक का लक्ष्य युद्ध का पुनर्मूल्यांकन करना है। प्रत्येक रचना का लक्ष्य अलग होता है। मैंने अंधा युग के उस क्षण के आधार पर रोक दो कान्हा लिखा, जब गांधारी कृष्ण को श्राप देती है। कृष्ण का कथन है, "जब एक सैनिक जमीन पर गिरता है तब मैं स्वयं गिरता हूँ। जब कोई मरता है तब मैं स्वयं मरता है। इस युद्ध में मेरी मृत्यु बार-बार हुई है।" इस एक वाक्य के सामने दुनिया भर की पुस्तकों के वाक्य बौने पड़ जाते हैं। इस वाक्य को दोहराना होगा। दूसरों की यातनाओं को आत्मसात करने की प्रवृत्ति पैदा करती होगी।

राजरानी: 'रोक दो कान्हा' नाटक में युयुत्सु विवेकशील है जब कि अंधा युग' का युयुत्सु विक्षिप्त हो जाता है। इस अन्तर के बारे में आपका क्या कहना है?
अनत: 'रोक दो कान्हा' का युयुत्सु मेरा विवेचन है। केवल विवेकहीन व्यक्ति ही दुविधा में नहीं पड़ता। निर्णय न ले पाने की युयुत्स की दुविधा, आज के बुद्धिजीवी वर्ग की दुविधा है। युयुत्सु को पता नहीं चलता कि वह पांडवों के पक्ष में है या कौरवों के पक्ष में। आज का बुद्धिजीवी भी नहीं जानता कि वह कहाँ खड़ा है। युयुत्सु खामोश रहता है। बुद्धिजीवीवर्ग भी अनर्थ होते देखकर चुप है। युयुत्सु उन लोगों का प्रतीक है, जिनके पास दिमाग, कलम और आवाज़ है। लेकिन वे उन्हें बुलंद नहीं करते हैं।

राजरानी:  'रोक दो कान्हा का युयुत्सु असल में बहुत मुखर है।
अनत: लेकिन उसकी मुखरता का कोई परिणाम नहीं निकलता। बिरला ही कोई ऐसा बुद्धिजीवी मिलेगा जो सवाल करता है और उसे सवाल का जवाब मिलता है। युयुत्सु का प्रश्न करना पानी में तलवार मारने वाली बात होती है। आदमी की बेबसी का सबसे बड़ा प्रतीक है - युयुत्सु। आज का हरेक आदमी युयुत्सु है। मैं भी युयुत्सु हूँ।

राजरानी:  अभिमन्यु जी युद्धविषय पर लिखने के लिए आपने नाटकविधा का ही चयन क्यों किया?
अनत: सभी साहित्यिक विधाओं में से नाटक ही एक ऐसी विधा है, जिसमें लेखक और दर्शक के बीच संवाद चलता है। नाटककार अपने दर्शकों के सामने होकर बात करता है। मैंने अतीत को गौरवान्वित करने के लिए 'रोक दो कान्हा' नहीं लिखा। मेरा लक्ष्य दर्शकों के साथ वार्तालाप करके, उन्हें नाटक में तत्काल सम्मिलित करना है। मैंने चाहा कि युद्ध की समस्या सामूहिक चिंतन का विषय बने। यह नाटक के माध्यम से ही संभव था।

राजरानी: अभिमन्यु जी 'गूंगा इतिहास', 'भरत सम भाई' और 'उर्मिला नाटकों का मंचन देश-विदेश में हुआ है, 'रोक दो कान्हा' का मंचन कब-कब हुआ है?
अनत: श्री राजेन्द्र सदासिंह के निर्देशन में महात्मा गांधी संस्थान, पोर्ट लुई थियेटर, रामसुन्दर प्रयाग एस०एस०एस और त्रियोले के 'तादबिर' सिनेमा हॉल में इस नाटक का मंचन हुआ त्रियोले के नटराज ग्रुप के कलाकारों ने लगभग एक साल इनकी तैयारी की थी। सन् 1985 में यह नाटक पहली बार मंचित हुआ था, जब यह पुस्तक रूप में नहीं आया था। कलाकारों ने पांडुलिपि से ही काम चलाया था।

राजरानी: आपने अनेक नाटकों की रचना की। इनमें 'रोक दो कान्हा' को क्या स्थान देते है?
अनत: यह तो ऐसा प्रश्न हुआ जैसे कि मेरे पाँच बच्चों में से मुझे कौन-सा बच्चा अधिक प्रिय है। 'रोक दो कान्हा' में परम्परागत मूल्यों को प्रकाश में लाने की कोशिश की गयी है। गूंगा इतिहास' नाटक को मॉरीशस और भारत के सात शहरों में बड़ी सफलता मिली प्रेस में भी इसकी बहुत प्रशंसा हुई। पर वह पौराणिक आख्यान नहीं है। केवल 'रोक दो कान्हा' नाटक में मिथक है और इतिहास का सत्य मानव मूल्यों के विघटन के साथ संपृक्त है। 'रोक दो कान्हा' में नवनिर्माण की शंखध्वनि है, जो मेरे अन्य नाटकों में नहीं है। शंख ध्वनि युद्ध की शुरुआत और समाप्ति में होती है। मैं उपदेशवाहक, संदेशवाहक या फरिश्ता नहीं हैं। पर मैंने वह शंख ध्वनि फूँकने की कोशिश की है, जिससे युद्ध की समाप्ति होती है।

राजरानी: आपने पौराणिक आख्यान का प्रयोग क्यों किया?
अनत: जिस सत्य को भुला दिया गया है, उसको में उद्घाटित करना चाहता था। 'रोक दो कान्हा'  की नाट्य-शैली अलग है। मेरे शब्द चयन भी अलग हैं। मैंने सोचा कि कुछ अलग ढंग से महाभारत की कथा को लोगों तक पहुँचाऊँ। रामायण और उपनिषद में ऐसा नहीं है। महाभारत के कृष्ण ने ही कहा था- उठो और लड़ो।

राजरानी: अभिमन्यु जी, क्या आपका गोकुलवासी काल्पनिक पात्र है?
अनत: नाटक में दो काल्पनिक पात्र हैं - अस्त्रपति और गोकुलवासी। एक तरफ नकारात्मकता है, दूसरी तरफ सकारात्मकता। मैंने सकारात्मकता की पूर्ति के लिए गोकुलवासी और नकारात्मकता दिखाने के लिए अस्त्रपति की परिकल्पना की है।

राजरानी: गोकुलवासी किसका प्रतीक है?
अनत: हमारे यहाँ जो संस्कृत नाटक है, उन सभी में नट है। नट के साथ एक और महिला होती है, जो स्थिति को स्पष्ट करती है। शेक्सपियर ही नहीं, कई नाटककारों ने एक आदमी को रखा है, जो सूत्रधार का काम करता है। यह एक परंपरा-सी चली आ रही है। दर्शकों में बुद्धिजीवी और अति साधारण लोग भी होते हैं। अतः नाटक में हमेशा एक ऐसा पात्र रखा जाता है, जो सारा कुछ समझाता है। गोकुलवासी नट की भूमिका निभाता है।

राजरानी: गोकुलवासी कहता है- मैं वर्तमान हूँ और भविष्य भी हूँ।
अनत: वह वर्तमान, अतीत और भविष्य है। मैंने एक अन्य नाटक में मुड़िया पहाड़ को प्रहरी और साक्षी दोनों बनाया है। वह सभी लोगों को आते-जाते देखता है और खेत के बजरबट्टू की तरह खड़ा भी रहता है। चिड़िया खेत में चुगकर उड़ भी जाती है, और वह देखता रहता है। इसी तरह गोकुलवासी एक पात्र है, जो बताना चाहता है कि देखो मैं समय का गवाह हूँ।

राजरानी: गोकुलवासी दो घायल सैनिकों को पानी पिलाता है।
अनत: हमें समय ही घाव देता है और समय ही मरहम पट्टी करता है। इसका मतलब क्रिया पट्टी लगाने प्रतीक है? पानी पिलाने की मरहम का।

राजरानी: क्या पानी भी काल्पनिक है?
अनत: चेखव ने जो बात नहीं कही है, वही उसकी कहानी का सत्य होता है। हमारे यहाँ यदि खाली लोटा है, तो उसे पानी से भरा हुआ समझते हैं और यदि उसमें पानी होता है, तो उसे शराब या अमृत से भरा हुआ मानते हैं। पाठक जानता है कि यह सब काल्पनिक है। फिर भी वह रंगमंच के साथ जुड़ जाता है।

राजरानी: क्या इस नाटक का अनुवाद आपको उचित लगता है?
अनत: बहुत ही उचित है। गार्सिया के का अगर अनुवाद नहीं होता हम Gacia इनसे कहाँ परिचित हो पाते? कालीदास का अनुवाद संस्कृत से अंग्रेज़ी में नहीं होता, तो अन्य देशों के लोग उन्हें कैसे जानते? लेखक का अपना एक वाद्ययंत्र होता है। वह मुरली बजाता है या सितार। उसकी धुन को अमेरिका में भेजना चाहे, तो उसे जाज़' शैली में बदलना पड़ता है। उसे इंग्लैंड ले जाना चाहें, तो गिटार का इस्तेमाल करना होता है। अनुवाद एक ऐसा यंत्र है, जो एक रचना को उसके सीमित क्षेत्र से निकालकर विश्व पटल पर ले जाता है। अनुवाद सौ प्रतिशत सही नहीं हो सकता है। बढ़िया से बढ़िया अनुवाद मूल के 75% का ही संरक्षण पाता है भाषाओं 75 प्रतिशत कर। जब दोनों भाषाओं के विशेषज्ञों को लेकर अनुवाद किया जाता है, तब वह बेहतर अनुवाद होता है। अनुवाद अच्छा हो, तो एक लेखक का प्रश्न अलग भाषा में अधिक बड़ी जनता से किया जा सकता है। मैंने प्रश्न किया, "युद्ध क्यों?" इसका फ्रेंच अनुवाद पढ़ने वाले लोग पूछेंगे - Pourquoi la guerre?

राजरानी: आपका धन्यवाद अनत जी।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।