कविता: यकीन है

डॉ. विश्वास शर्मा
- विश्वास शर्मा

सँभालो  ख़ुद  को,
चलो सँभल-सँभल कर
सँभाल सकोगे तभी
सब  को।

जो सोचा,
वह हुआ नहीं,
जो सोचा
न होगा कभी,
वह हो गया अभी।

संकरे हैं रास्ते
छिलेंगे अभी
कुहनियाँ, घुटने,
हौले-हौले गुजरते
हैं भारी-भारी  दिन
चिड़िया से उड़ जाते हैं
खुशियों के छिन।

हौसला है कुछ करने का
ग़लत कभी  किया नहीं
न करने देंगे
बिछाओ अँगारे
जितने बिछा सकते हो
नंगे पाँव चल कर
राख कर देंगे
अंधेरे की राख में दबे
तुम्हारे अँगारों को

हम अग्नि शिखाओं को लाँघ कर
सीधे निकल आए हैं कई बार

ढलते सूरज को
मुठ्ठियों में भींच कर
फिर उछाल देंगे
फट पड़ेगा उजाला
बदरंग क्षितिज पर
दिशाएँ मनाएँगी
रोशनी का महोत्सव
यकीन है
हमें पूरा यकीन है।

7 comments :

  1. Lovely and inspiring...
    Great going Vishwas.
    Proud of you.

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  2. Amazing.too good

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  3. Hume pura yakeen hai....very nice sir.

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  4. Very nice poetry sir...!!

    Tarun

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  5. Very nice poem sir. I am impressed with your hindi vocabulary.We are proud of you sir.

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  6. प्रेरक

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  7. Congrats Vishwas, impressed by the poem and by knowing the fact that you have such artistic talents too!!

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