मुट्ठी भर जिंदगी

विदुषी शर्मा


आज बात करते हैं जी भर कर जी लेने की। कहाँ मिल पाता है हम औरतों को जी भर कर जीना? लम्हा, लम्हा चुराना पड़ता है, जीना पड़ता है, झेलना पड़ता है, सहना पड़ता है तब कहीं जाकर मिलती है खुशी, आत्मिक आनंद और उसमें भी एक डर है कि कहीं हमें कोई अपनी उन्नति, अपने एहसास, अपनी निजता अपनी मुट्ठी भर आजादी, अपने अंदाज जीते हुए देख तो नहीं रहा? कहीं इस पर भी कोई विवाद न हो जाए। इस पर भी कोई तल्ख़ टिप्पणी उभरकर सामने न आ जाए, या फिर भविष्य के लिए यह सब सहेज कर न रख लिया जाए कि सबके सामने हमारे इस ख़ास लम्हे को एक 'व्यंग्य', 'एक खास खबर' की तरह उजागर किया जा सके।

आज नारी दोहरी भूमिका निभा रही है। वह सशक्त है, सबल है, आश्वस्त भी है परंतु फिर भी यह सब करते हुए भी कहीं न कहीं सम्बन्धो में अस्थिरता है। हमारा समाज बदल रहा है। परंतु उस हद तक बदलने में उसे शायद अभी सदियाँ ही लग जाए कि औरतें भी अगर काम करके घर लौटती हैं तो उन्हें भी उसी सम्मान और इज्जत के साथ व्यवहार मिले जितना कि एक पुरुष को दिया जाता है। यहाँ नारी को यह बताना पड़ता है कि वह भी काम करके आई है थक के आई है। परंतु पुरुष के लिए यह सब बिना कहे ही समझ लिया जाता है कि वह बाहर से आया है तो अवश्य ही थका हुआ होगा और काम करके ही आया होगा। उसे यह बताने की जरूरत नहीं पड़ती। सब अपने आप ही समझ जाते हैं और दूसरी तरफ औरत को यह एहसास दिलाना पड़ता है कि मैं भी आपकी ही तरह घर से बाहर धक्के खा कर, घर के लिए ही कमा कर लाई हूँ। दूसरी तरफ पुरुष को यह सब कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह कटु सत्य है। औरत चाहे किसी तरह भी संघर्षों से लड़कर, समाज से जीतकर, अपने आप से जीत कर, अगर कहीं भी, किसी भी क्षेत्र में अपनी मेहनत, अपने त्याग, अपने समर्पण से यदि कोई मुकाम हासिल करती है तो कई लोगों को यह कहते हुए देर नहीं लगती कि शायद 'कोई सेटिंग' होगी। यदि औरत खूबसूरत हो तो संभावनाएँ और अधिक बढ़ जाती है। यह समाज यह मानने को तैयार क्यों नहीं होता यदि वह खूबसूरत है तो उसे और अधिक संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि वह खूबसूरत है, 'चरित्रहीन' नहीं। वह अपने सौंदर्य को सीढ़ी नही बनाना चाहती। जबकि हर पड़ाव पर उसे इस तरह की 'जिल्लत' झेलनी पड़ती है। (अपवाद हर जगह, हर क्षेत्र में मौजूद हैं। ऐसी औरतों की भी कमी नहीं है जिन्होंने सिर्फ अपनी खूबसूरती और अपने शरीर को ही अपनी कामयाबी की सीढ़ी बनाया है) वैसे तो औरत होना ही अपने आप में एक सजा है, और खूबसूरत औरत होना तो उससे भी बड़ी सजा। क्यों हमें बार-बार अपने सतीत्व,अपने स्त्रीत्व को साबित करना पड़ता है? क्यों हमें बार-बार हर चीज का प्रमाण देना पड़ता है कि हम जो कुछ कर रहे हैं, जो कुछ प्राप्त कर रहे हैं वह सिर्फ और सिर्फ हमारी मेहनत है, हमारा त्याग है।

यह बात हम ही जानती हैं यह किन-किन सवालों से भरी निगाहों का सामना हमें समय समय पर करना पड़ता है। किस तरह हमें अपने मनोरंजन के छोटे-छोटे क्षणों को त्यागना पड़ता है। किस तरह उनींदी आंखों से नींद को भगाकर काम करना पड़ता है। किस तरह अपने बच्चों को थोड़े समय में अधिक से अधिक प्यार, दुलार और चाहत, ममता और देखभाल सब कुछ प्राप्त समय में ही देना पड़ता है। 'अपर्याप्त भावनाओं' को प्राप्त समय समायोजित करना पड़ता है।

सच तो यह है कि हम आज के युग में भी यदि कोई पुरुष नारी को तंग करता है, तो सहारा भी तो पुरुष का ही लेना पड़ता है। चाहे वह रिश्ता कोई भी हो, बस परिभाषा ही बदल जाती है। यह कटु सत्य है कि नारी सदा प्रताड़ित भी पुरुषों द्वारा होती है,होती रही है, तो सम्बल भी पुरुषों द्वारा ही प्रदान किया जाता रहा है। विडंबना तो यह है कि सब कुछ होते हुए भी आज़ादी है पर उसका उपभोग भी उन्हीं के साथ, उन्ही के इशारों पर करना पड़ता है। साधन है, शक्ति है, सब कुछ है परंतु इन सब का प्रदर्शन सब कुछ पुरुष सत्तात्मक समाज में, उन्हीं के द्वारा ही संचालित करना पड़ता है, यही है विडंबना। हम समाज के सामने चाहे कुछ भी प्रदर्शित करते हैं परंतु नग्न सत्य यही है कि नारी को हर हाल में झुकना ही पड़ता है, परिवार के लिए, बच्चों के लिए, शांति के लिए अपनों के लिए, अवसर पाने के लिए, स्वयं के लिए। क्या करे? नारी है ना।

शायद इसलिए ईश्वर ने सहनशक्ति ज्यादा नारी को ही प्रदान की है। परंतु इस सहनशीलता का गलत उपयोग नहीं करना चाहिए और न ही होने देना चाहिए। मेरा यही मानना है कि वक्त-वक्त पर अपनी अस्मिता को, अपने सम्मान को, आत्मगौरव को साबित करते रहना चाहिए ताकि आगे कुछ भी गलत करने की किसी की हिम्मत न हो। शुरू से ही अपने अधिकारों के प्रति, आत्मरक्षा के प्रति सचेत रहें ताकि बाद में इनकी मिन्नत न करनी पड़े और न ही इस बात का एहसास हो कि यह सब हमें 'भीख' मिल रहा है।

अतः अपने अधिकारों का 'सम्मान' करें, 'शालीनता' के साथ उपभोग करें, तथा 'सजगता' के साथ अपने अधिकारों की रक्षा करें। बस इससे अधिक और क्या कहना है कि -
अंदाज़-ए-बयाँ बना देता है, हर बात को और हसीं,
वरना इस दुनिया में, कोई बात नहीं बात नहीं।

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