कुछ कह रहा सम्पादक भी...

साथियों,   

                                     चित्र: फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी 
 साहित्य स्वयं में एक सेतु है, संवेदनशीलता और पल-प्रतिपल मशीन में तब्दील होती जा रही मानवजाति के बीच एक पुल जो दोनों को जोड़े रखने की भरसक कोशिश करता है। साहित्य चाहे किसी भी भाषा का हो, क्योंकि भाषा तो केवल सम्प्रेषण का माध्यम है और विचार ही मूल है। वर्तमान में जीवनमूल्यों के बदलने के साथ-साथ इन जर्जर होते जा रहे पुलों को बनाए रखने, बचाए रखने की जिम्मेवारी हर इंसान की है तो सही लेकिन वह उन तमाम जिम्मेवारियों के नीचे, जिन्हें हम प्राथमिकताऐं समझते हैं, कुछ इस क़दर दब जाती है कि हमें इसका एहसास तलक नहीं हो पाता। नतीजा यह कि हम खुद प्रयास किए बिना दिन-बा-दिन दूसरों को दोषी ठहराने के आदी होते जा रहे हैं। 
यहाँ आपके सामने प्रस्तुत नेटपत्रिका 'सेतु' दुनिया को बेहतर बनाने के लिए चल रहे तमाम प्रयासों के बीच एक और प्रयास है, यह प्रयास है भिन्न-भिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, विषयों, विधाओं, कला-संगीत, विज्ञान आदि को आपस में जोड़े रखने का। 
आगाज़ भले ही साहित्य की अधिकता से हो रहा है लेकिन सिर्फ साहित्य या सामजिक विषयों तक सीमित रहना हमारी मंशा बिल्कुल नहीं। इसीलिए अपने सभी शोध, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, शिक्षा, बैंकिंग, प्रबंधन, समाजसेवा, व्यवसाय, पत्रकारिता, कृषि, प्रशासन आदि क्षेत्रों से सम्बद्ध दोस्तों से अनुरोध है कि अपने-अपने क्षेत्र से जुड़े उन पहलुओं को जिनपर आमतौर पर दूसरे क्षेत्र के लोगों की नज़र नहीं पड़ पाती उन्हें सबकी समझ में आ सकने वाली भाषा-शैली में हम तक लिख भेजें।
हिन्दी में पाठकों की घट रही आबादी के बीच लगभग तय है कि यहाँ भी आप और हम ही लेखक होंगे, पाठक भी और प्रयासक भी। इसलिए हम सबकी कोशिश रहे कि जो भी लेखक जिस विषय पर लिखे वह उसका विशेषज्ञ ना हो तो कम से कम सालों से उस विषय से जुड़ा हुआ हो। 
असल में यह सेतु किन्हीं भी दो ज़मीनों के बीच हो सकता है ताकि एक ज़मीन के विचार ज्यों के त्यों, अपने लगभग सम्पूर्ण रूप में दूसरी ज़मीन तक पहुँच सकें और उनके बीच पड़ने वाली नदी-नाले या खाई के हवाले न हो जाऐं क्योंकि विचारों को तैरना नहीं आता और न ही छलाँग लगाना इसलिए उन्हें माध्यम की, एक सेतु की आवश्यकता होती है। इस 'सेतु' के लिए जरूरत है आपके भी एक लकड़ी, एक पत्थर या एक रस्सी की, साथ आइए। इस अंक से जुड़े हर साथी को बेग़रज़ सहयोग के लिए शुक्रिया।
बहुत अधिक बात न करते हुए पहला अंक आपके हवाले है, कुछ ठीक लगे तो setuhindi@gmail.com पर लिख भेजें। 
आपका-
दीपक मशाल