शाम को उसे 'टच' मत करना (व्यंग्य)



बहुत दिनों से इच्छा थी कि मित्र छद्मेश्वर  के घर जा कर मिलूँ, कुछ बतियाऊँ। कुछ उसकी सुनूँ, कुछ अपनी सुनाऊँ, लेकिन टीवी देखने और बीवी की सेवा से फुरसत मिले तब न। और अब तो 'फेसबुक' तथा 'व्हाट्सऐप' पल्ले पड़ गया है. इसकी मोहनी ऐसी है कि हम अपने ही बंधुआ मज़दूर बन गए हैं. फिर टीवी तो जैसे टीबी की बीमारी है ही. लाइलाज। न तो किसी के घर  जाना  अच्छा लगता है और न किसी का अपने घर पर  आना सुहाता है । ये ससुरे चैनलवाले  चैन नहीं लेने देते। इस चैनल के चक्कर में लोग बेचैन होने लगे हैं। लेकिन दिल है कि मानता नहीं। कभी-कभी लगता है पुराने दोस्तों से मिल लिया जाय। पता  नहीं कब यह आत्मा परमात्मा तक पहुँच जाए. 
मैंने मित्र गपोडूराम  से कहा- ''चलो यार, आज शाम छद्मेश्वर  के घर चलते हैं।''
इतना सुनना था कि मित्र बोला- ''अरे... अरे, उसे शाम को  'टच' मत किया  करो। कभी दिन में, हाँ, छुट्टी वाले किसी दिन मिलने चलेंगे न ।''
मैं समझ गया कि छद्मेश्वर  भी शाम को मेरी तरह टीवीबाजी में व्यस्त हो जाता होगा, या उसका भी ''व्हाट्सऐपीकरण' हो गया है,  इसलिए मित्र  मना कर  रहा  है।
कुछ दिन बाद फिर मेरी इच्छा  ने जोर मारा।
मैंने कहा- ''चलें आज, छद्मेश्वर  के घर ?''
मित्र  ने मुस्कराते हुए कहा- ''शाम को उसे 'टच' करना ठीक नहीं ।''
मैंने झल्ला कर कहा- ''अरे यार, तुम अपने मित्र को  इस टी.वी.फ़ोबिया से मुक्त करो। ये क्या तमाशा है कि  शाम होते ही वह टीवी से चिपक जाता है या बीवी से ?''
मित्र  बोला- ''यह बात नहीं है पार्टनर,  मामला कुछ और है।''
''क्या ? उसके घर  में कोई  बीमार है, जिसकी सेवा छद्मेश्वर  को करनी पड़ती है?''
मित्र हँस कर  बोला- ''यह बात भी नहीं, अब तुम ज़्यादा   जोर दे रहे हो तो बता देता हूं। हमारे मित्र  छद्मेश्वर  को पीने-पाने के शौकीन है। बेचारे किसी बार में तो जा नहीं सकते, सो बेचारे घर पर ही शौक  पूरा कर लेते हैं। दो-चार पैग मारकर मस्त हो जाते हैं। और ऐसे माहौल में तुम उसके पास चले जाओगे तो रंग में भंग हो जाएगा। इसलिए कहता हूं कि भैया, शाम को  उसे  टच मत करना।''

अपने  शहर में भी ऐसे जीवों की भरमार हैं  जिन्हें हम  शाम को या रात को  टच करना पसंद नहीं करते। कुछ लोग तो दिन में भी टच न करने की  स्थिति में पाए जाते हैं। ये दारू चीज ही -कुछ ऐसी मस्त-मस्त है कि  जो पीता है, वही इसका  मजा जानता है। ये मैं नहीं कह रहा, वे लोग पियक्कड़  हैं जो पीने का भयंकर किस्म का  शौक  पाल चुके  हैं और हर वक्त 'मधुशाला' की  पंक्तियां दोहराते हैं।
उस दिन एक पियक्कडज़ी मिल गये. हमको देखा तो खिल गए और बोले-  चलिए, जाम से जाम टकरा लें.''
मैंने कहा- टकराने से डर लगता है भाई.  मुझे माफ़ करो.'
पियक्कडज़ी बोले- ''क्या तुमने पढ़ा नहीं मंदिर-मस्जिद बैर करते, मेल करती मधुशाला। अरे एक बार पढ़ लो. पीने लग जाओगे.''
मैं  कहता हूं -''जिस 'मधुशाला' की कविता आप सुना रहे हैं उसके कवि ने कभी शराब नहीं पी।''
पियक्कडज़ी उखड गए - ''इसीलिए तो उस 'मधुशाला' में वो बात नहीं है जो होनी  चाहिए। अरे, बिना 'प्रेक्टिकल' किये अच्छे नंबर भी कभी मिलते हैं भला?''
मैंने कहा- ''ये शराब का  नशा तो ऐसा है बंधु कि  पीने के  बाद कुछ होश भी तो रहे। तभी तो किसी  प्रेक्टिकल ज्ञान की  प्राप्ति होगी।''
पियक्कड़   भाई बोले- ''ये भी ठीक रह रहे हो। लेकिन मैं तो सच-सच कह रहा हूँ कि ये चीज बड़ी है मस्त-मस्त।''
उनकी  पंक्ति को  मैंने आगे बढ़ाते हुए -कहा- 
''ये चीज बड़ी है मस्त-मस्त,
कर देती सब-को त्रस्त-त्रस्त,
हो जाता घर  भी अस्त-व्यस्त,
स्वास्थ्य  भी रहता लस्त-पस्त।
ये चीज है ऐसी मस्त-मस्त।''
पियक्कड़  महाराज बोले- ''तुम हमारे शराब संघ के आदमी नहीं हो, जाओ दुग्ध-पान करो बालक ।''
बाद में पता चला कि ये सज्जन भी ऐसे हैं कि लोगबाग इन्हें भी  शाम को  'टच' नहीं करते। ऐसे लोगों की संख्या  बढ़ती जा रही है जो शाम होते ही आबकारी  विभाग की  आय में वृद्धि -करने पर तुल जाते हैं। इसमें कुछ तो मौज-मस्ती वाले होते हैं, तो कुछ मजदूर भाई होते हैं जो सोचते हैं कि  दारू पी लो, थकान उतर जाती है। पता नहीं किस चालाक शराब ठेकेदार ने उनके दिमाग में यह  फिट कर  दिया है. जबकि  थकान तो घर पहुंच कर परिवार के  बीच जाने से वैसे ही उतर जाती है। जि़दगी की  आपाधापी पतझर है तो घर  एक मधुमास है। और ये दारू क्या  है? दुष्यंत ने खूब अच्छे  से समझाया है-
दिन भर धूप का  पर्वत काटा,
शाम को  पीने निकले हम,
जिन गलियों में मौत बिछी थी,
उनमें जीने निकले हम।''
तो, शाम को मौत की  गलियों में भटकने वाले लोगों की संख्या  बढ़ती जा रही है। कुछ लोग 'घर' में, कुछ लोग 'बार' में, अब तो जो ज्यादा 'माडर्न' हो गए है, वे लोग 'परिवार'  में पीने लगे हैं..कुछ लोग 'अड्डे' में शौक  पूरा करते हैं। आपका कोई दोस्त अगर किसी के बारे में यह कहे कि उसे शाम को 'टच' मत करना, तो आप थोड़ा-सा पुन्य  जरूर कमाएँ और उन्हें टच करें और समझाएँ कि आप दारू को  टच न करें। क्योंकि ये जब शरीर के भीतरी हिस्से को टच करना शुरू करती है तो शरीर 'बच' नहीं पाता। और हाँ, इस बात का भी ध्यान रखें, कि दारू छुड़ाने के चक्कर में खुद भी शराबी न बन जाये. मेरे एक मित्र के साथ यही हुआ. अब उनका दरुहा मित्र अपने मित्र की शराब छुड़ाने की कोशिश कर रहा है.
मैं आज शाम अपने मित्र गपोड़ूराम के घर जा रहा हूँ, उसे 'टच' करने और जाकर बोलूँगा-
छोड़ दे पीना छोड़ शराबी,
बोतल अपनी तोड़ शराबी।
जी ले जीवन को मस्ती से,
मौत से ले मत होड़ शराबी।

लेकिन ससुरे  पियक्कड़ बोतल के अलावा किसी की सुनते भी नहीं हैं न.