एहसास लघुकथा


कविता वर्मा
पहाड़ों पर बर्फ पड़ी ठंडी हवा ने मैदानों को भी ठिठुरा दिया। सुबह से खिड़की दरवाजे खोलना मुश्किल है। काम वाली सुबह जल्दी आती थी वह भी ठण्ड के चलते आधे घंटे लेट आने लगी। घडी की सुइयों के साथ सुमन का भुनभुनाना शुरू हो जाता है साथ ही डर भी लगता है कहीं नहीं आई तो?

उस दिन भी उसे देर हो गई तो सुमन ने खिड़की से झांक कर सड़क पर देखा कहीं आते दिख रही हो। दूर धुंधलके के बीच से एक साया अपनी ओर आते दिखा तो एक आस बंधी। वही थी एक पुराने कम्बल को सिर से अपने चारों ओर लपेटे पैरों को लगभग घसीटते हुए चली आ रही थी। घर पर आकर उसने कम्बल उतारा और लपेट कर एक कोने में रख दिया। 

उसे चाय देकर सुमन बाहर आई तो उसकी नज़र उस कम्बल पर गई। सिंथेटिक ऊन का वह पुराना थोड़ा मैला सा कम्बल लगभग छिरछिरा गया था। थोड़ा सा उठाकर उसने देखा तो एक दो छेद भी नज़र आये। कामवाली तब तक बाहर आई और उसके बगल में खड़ी हो गई उसे भी कौतुहल था कि उसके कम्बल को इतने ध्यान से क्यों देखा जा रहा है ?

सुमन अचकचा गई जैसे चोरी पकड़ी गई हो फिर खुद को संयत करके पूछा इतने पतले छिरछिरे कम्बल में तुम्हारी ठण्ड बच जाती है ?

कामवाली ने एक नज़र सुमन पर डाली और उसके हाथ से कम्बल लेते हुए बोली हाँ कम्बल ओढा है इस बात से ही गरीबों की ठण्ड बच जाती है और चली गई। 
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