नारी - चार कविताएँ - अनिता ललित

अनिता ललित

स्त्री –भावनाएँ और प्रेम 

बहना नदी का स्वभाव है!
जो जिधर चाहे,
उधर उसका रुख़ मोड़ देता है -
और वह मुड़ जाती है -सहजता से!
परन्तु मुड़ने के लिए उसे कटवाने पड़ते हैं -
अपने किनारे!
जिनके कटने का दर्द
सिर्फ़ वही समझती है!

स्त्री भी बहती है –
एक नदी की तरह!
भावनाओं की लहरें,
प्रेम की उमंगें
दिल में लिए -
अपने किनारों में सिमटी,
ख़ामोशी से!
जब भी कोई मोड़ आता -
मुड़ जाती वह स्वतः ही -
अपने अपनों के लिए!
स्वयं ही काट लेटी अपने किनारे,
बदल लेती अपनी धारा -
उफ़्फ़ भी न करती!
सबका अक्स अपने भीतर सँजोए -
वह होती रहती है - तरंगित,
मधुर संगीत लिए!

एक नहीं, कई-कई बार
वह पी जाती है -
अपने सपने!
खड़े कर लेती है बाँध -
अपनी ख्व़ाहिशों पर,
रोक लेती है ज्वार
भावनाओं का -
कर लेती है संतोष
उतने में ही -जितना मिले!
धर लेती है धैर्य –
रखकर सीने पर पत्थर!
मगर मरने नहीं देती -
अपनी भावनाओं को, प्रेम को!
भावनाएँ ही तो हैं –
जो उसके बहाव का कारण हैं!
प्रेम ही तो है –
जो उसके जीवित होने का प्रमाण है!
प्रमाण है -
कि वह स्त्री है!!!
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उसका ये हुनर 

रेज़ा-रेज़ा ख्व़ाब
अश्क़ों के सैलाब में गूँध कर
टूटी-बिखरी
क़तरा-क़तरा हुई
अपनी हस्ती को
फिर से गढ़ती है वह -
अपने ही हाथों से!
ख़ुद को समेटने के जतन में,
न जाने कितनी बार
फिर टूटकर बिखरती है!
सजाती है, सँवारती है,
फिर खड़ा करती है -
अपना जीता-जागता
एक ख़ूबसूरत मुक़म्मल मुजस्सिमा!
दुनिया को नहीं दिखते मगर  -
उसके जज़्बात, एहसासात
उसका ख़ुलूस,
फिर से जी उठने का
उसका ये हुनर!
वो तो सुना देती है बस
फैसला!
करती है हिसाब-किताब -
उसके वजूद में पड़ी सिलवटों का,
दरकती दरारों का!!!
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साँझ का सफ़र

बहुत कठिन है -
उम्र की साँझ का सफ़र,
दो पीढ़ियों के बीच का सफ़र -
विशेषकर एक स्त्री के लिए!
कहने को तो यह वक़्त है -
सुक़ून का, ठहराव का,
स्वयं को खोजने का, पाने का!
मगर ऐसा होता कहाँ है ?
जब डोलता है, दिल और वजूद दोनों -
दो सिरों के बीच,
ज्यों अटका हो किसी रबरबैंड के बीचों-बीच,
खिंचाव - कभी इधर तो कभी उधर!
तनाव से भरपूर -
किसे पकड़े, किसे छोड़े ?
न अपनी ममता छोड़ी जाए
न माता-पिता की ममता नकारी जाए!
और तीसरे-चौथे सिरे पर
पति और सास-ससुर!
कभी-कभी तो टकराव, मतभेदों का –
बच्चों और पति के बीच!
और वह! -बीच की धुरी –
सबके बिना अधूरी!
अपने कोमल, थके हुए काँधों पर लिए
हरेक का दायित्व,
सम्भाले हरेक सिरे को
वह बस चलती रहती है!
उसके पाँव तो मानों
चार कश्तियों पर टिके -
संतुलन बनाते, डगमगाते -
प्यार, ममता और कर्त्तव्य की लहरों में
डूबते-उतराते किनारे की आस में
भटकते-भटकते, बस थकते जाते हैं!
साँस लेने ख़ातिर
जब थमती वह किसी एक बिंदु पर –
तो पाती स्वयं को
एक अलग ही धरातल पर!
सबको समेटने की आस में,
वह ख़ुद मिट जाती
और बन जाती
एक टूटा हुआ सिरा –
जो झूलने लगता है,
फिर किसी सहारे की तलाश में,
और ताकने लगता है - अगली पीढ़ी की ओर,
बनकर पिछली पीढ़ी।
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मैं एक स्त्री हूँ

भावनाओं में सिमटी ;
भावनाओं से लिपटी ;
भावनाओं की गीली मिट्टी से
गुँधी हुई हूँ!
भावनाओं में ही -
बसती हूँ, बहती हूँ;
जीती हूँ, मरती हूँ;
बनती हूँ, बिखरती हूँ;
भीगती हूँ, सूखती हूँ!
कभी भीगने की आस में
सूखती जाती हूँ;
कभी सूखने की आस में
सीलती जाती हूँ!
भावनाओं की नमी ने ही
जोड़ रखा है मुझे -
तुमसे, अपने आप से -
हरेक शय से!
भावनाएँ न हों –
तो तुम कौन और मैं कौन ?
तुम कहते हो -
मैं पागल हूँ!
मैं कहती हूँ -
मैं एक स्त्री हूँ!
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