अव्यक्त वाणियों में ‘स्वराज्य अधिकारी’ की अवधारणा

डॉ हरदीप सिंह
शोध सारांश
प्रस्तुत शोध पत्र में मानव को स्वराज्य अधिकारी बनाने की अवधारणा पर विचार करते हुए यह स्थापित किया गया है कि अध्यात्मिक ज्ञान में ही वह शक्ति है जो व्यक्ति को कर्मेन्द्रियों के दास बनने से मुक्त करके ‘स्व’ पर अपना राज्य स्थापित करने के सक्षम बनाता है। भारतीय चिंतकों ने व्यक्ति को इन्द्रियजीत बनाने अथवा ‘मन जीते जग जीत’ जैसी स्थिति की प्राप्ति की कामना की है। वास्तव में इस स्थिति की प्रप्ति के लिए जिस ज्ञान और समझ की आवश्यकता है उसके विविध आयामों को अत्यंत स्पष्टता के साथ अव्यक्त वाणियों में व्यक्त किया गया है। इन विविध आयामों के अंतर्गत स्वराज्य की नीति, स्वराज्य से रूलिंग पॉवर और कंट्रोलिंग पॉवर, स्वराज्य अधिकारी के नवीन अर्थ जैसे सर्व प्रकार की अधीनता समाप्त और सदा मौज में रहना, प्रकृतिजीत और विकार्जीत, सदैव चढ़ती कला और सर्वशक्तिवान की अनुभूति जैसे ज्ञान के नये आयामों की व्यावहारिकता परीक्षा करना ही इस शोध पत्र का लक्ष्य है। ब्रह्मा कुमरीज़ के साहित्य और विचारधारा को लेकर विदेशों में शोध कार्य चल रहे हैं। हिंदीजगत को अभी इसका परिचय होना शेष है।

आज का हर मानव किसी न किसी रूप में अधीनताका अनुभव करंता है। जितना-जितना वह किसी वस्तु, वैभव, नाम, मान और शान की इच्छा रखता है उतना ही वह यथार्थ सुख शांति से दूर होता जाता है। व्यक्ति भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए आँखों पर पट्टी बांध कर एक ऐसी अंधी दौड़ में शामिल है। जिसमें उसका स्व पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। वह प्रकृति को अपने नियंत्रण में लेने के लिए उसका बेतहाशा दोहन करने में लगा है। जिसके दुष्परिणाम कभी सुनामी के रूप में, कभी भू-कम्प के रूप में , कभी भयानक बाढ़ के रूप में प्राकृतिक आपदाओं के कारण अनेक बार बड़े स्तर अनियंत्रितविनाशलीला को झेलना पड़ता है। दूसरीओर धर्म पर नियंत्रण पाने की चाहना रखने और अपने धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिक दंगों की आग में सद्भावना की बलि चढ़ा देता है। आतंकवाद की समस्या भी इसी कारण से है। इसी तरह भ्रष्टाचार के मूल में लोभ है। लोभ के वशीभूत होकर ही व्यक्ति एक से बढ़ कर एक घोटाले करता चला जा रहा है। इन सब समस्याओं का मूल कारण यह है कि मानव अपने वास्तविक स्वरूप की विस्मृति के कारण अपनी इन्द्रियों और पुरानी आदतों का गुलाम बन गया है। प्रकृतिजीत बनने के स्थान पर प्रकृति के अधीन हो गया है। मानव के पास सांसारिक जानकारी बहुत है लेकिन ऐसा विवेक नहीं है जो उसकी आत्मा को शक्तिशाली बना सके।

अव्यक्त वाणियाँ क्या हैं ? अव्यक्त वाणियाँ परमात्मा का आत्माओं के साथ संवाद है। परमात्मा, जिनका ज्योति बिंदु स्वरूप विश्व के सर्व धर्मों में मान्य है, अजन्मा, अकर्ता और अभोक्ता हैं। उनका दिव्य अवतरण होता है। वे परकाया परवेश द्वारा विश्व की आत्माओं के साथ संवाद करके उन्हें सतोप्रधानसम्पूर्ण बनाते हैं। दूसरे शब्दों में मानव आत्मा को शांति, सुख, और पवित्रता से सम्पन्न बना कर सत-चित्त और आनंदस्वरूप का अनुभव कराते हुए विश्व-शांति की स्थापना करते हैं। वर्तमान समय उनका विश्व-परिवर्तन का कार्य चल रहा है। इसका प्रमाण डॉ अब्दुल कलाम के ये शब्द हैं कि 2002 में माउंट आबू में ब्रह्मा कुमरीज़ के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय के दौरे के दौरान दादी गुलज़ार के तन में वे उस सर्वोच्च शक्ति से मिले जिसे परमात्मा ‘शिव’ कहते हैं :

“On 3 February, 2002, I had an extraordinary spiritual experience when I visited the Brahma Kumari Spiritual Academy at Mount Abu. The deity of the Brahmakumais, Shiv Baba, descended on one of the disciples, DhadhiGulzar. Before our eyes her personality changed, her face became radiant, her voice became deeper as she talked about four treasures knowledge, yoga, virtue and service. We- I, Sivathanu Pillai, and Selvamurthy – were lucky to be called by her on dais and blessed. As she blessed us she said, ‘Bharat will become most beautiful land on earth’.”
(Kalam, Abdul, APJ (2002)

अव्यक्त वाणियों में ऐसा अध्यात्मिक ज्ञान है जो मानव को अपनी इन्द्रीय भोग की गुलामी और मन, बुद्धि और संस्कारों की अधीनता से मुक्ति दिला कर ‘स्वराज्य अधिकारी’बनानेमें सक्षम है। यह वाणियाँ न केवल ‘स्वराज्य अधिकारी’ की अवधारणा को स्पष्ट करती हैं अपितु अत्यंत सरलता और सहजता के साथ धारण करने के लिए प्रेरित भी करती हैं। इन्हीं अव्यक्त वाणियों में मनुष्यात्मा को स्वराज्य अधिकारी बनाने के लिए परमात्मा शिव की प्रेरणा है। इन वाणियों में स्वराज्य अधिकारी की विशेषताएँ निम्नलिखित उदाहरणों से स्पष्ट हो जाती हैं :

स्वराज्य अधिकारी की नीति –
स्वराज्य की नीति है-मन, बुद्धि, संस्कार और सर्व कर्मे-न्द्रियों के ऊपर स्व अर्थात् आत्मा का अधिकार। अगर कोई कर्मेन्द्रियां-कभी आंख धोखा देती, कभी बोल धोखा देता, वाणी अर्थात् मुख धोखा देता, संस्कार अपने कन्ट्रोल में नहीं रहते-तो उसको स्वराज्य अधिकारी नहीं कहेंगे।
स्वराज्य अधिकारी आत्माओं की विशेष नीति के बारे में अव्यक्त वाणी में लिखा है-

“ जैसे राजा अपने सेवा के साथियों को, प्रजा को जैसा, जो ऑर्डर करते हैं, उस ऑर्डर से, उसी नीति प्रमाण साथी वा प्रजा कार्य करते हैं। ऐसे आप स्वराज्य अधिकारी आत्माए अपनी योग की शक्ति द्वारा हर कर्मेन्द्रिय को जैसा ऑर्डर करती हो, वैसे हर कर्मेन्द्रिय आपके ऑर्डर के अन्दर चलती है। न सिर्फ यह स्थूल शरीर की सर्व कर्मेन्द्रियां लेकिन मन, बुद्धि, संस्कार भी आप राज्य-अधिकारी आत्मा के डायरेक्शन प्रमाण चलते हैं। जब चाहो, जैसे चाहो-वैसे मन अर्थात् संकल्प शक्ति को वहाँ स्थित कर सकते हो। अर्थात् मन, बुद्धि, संस्कार के भी राज्य-अधिकारी। संस्कारों के वश नहीं लेकिन संस्कार को अपने वश में कर श्रेष्ठ नीति से कार्य में लगाते हो, श्रेष्ठ संस्कार प्रमाण सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हो। तो स्वराज्य की नीति है-मन, बुद्धि, संस्कार और सर्व कर्मे-न्द्रियों के ऊपर स्व अर्थात् आत्मा का अधिकार। अगर कोई कर्मेन्द्रियां-कभी आंख धोखा देती, कभी बोल धोखा देता, वाणी अर्थात् मुख धोखा देता, संस्कार अपने कन्ट्रोल में नहीं रहते-तो उसको स्वराज्य अधिकारी नहीं कहेंगे, उसको कहेंगे-स्वराज्य अधिकार के पुरुषार्थी। अधिकारी नहीं लेकिन पुरुषार्थी। वास्तव में राज्य-अधिकारी आत्मा को स्वप्न में भी कोई कर्मेन्द्रिय वा मन, बुद्धि, संस्कार धोखा नहीं दे सकते। क्योंकि अधिकारी हैं, अधिकारी कभी अधीन नहीं हो सकता। अधीन हैं तो अधिकारी बनने के पुरुषार्थी हैं। तो अपने से पूछो-पुरुषार्थी हो या अधिकारी हो? अधिकारी बन गये या बन रहे हैं? तो स्वराज्य का रूहानी नशा क्या अनुभव कराता है? क्या बन जाते हो? बेफिक्र बादशाह, बेगमपुर के बादशाह! ”(1)


स्वराज्य अर्थात् रूलिंग पॉवर औरकन्ट्रोलिंग पॉवर

स्व पर राज्य का अर्थ है की मानव का हर कर्मेन्द्रिय के ऊपर अधिकार हो अर्थात् रूलिंग पॉवर और कंट्रोलिंग पॉवर हो। इस संबंध में अव्यक्त वाणी में लिखा है :

“ ऐसे नहीं कि देखने तो नहीं चाहते थे लेकिन देख लिया। आंखें खुली थीं ना, इसलिए देखने में आ गया। कान को दरवाजा नहीं है, इसलिए कान में बात पड़ गई। लेकिन दो कान हैं। अगर ऐसी बात सुन भी ली तो निकालने का भी रास्ता है। इसलिए इस भारत में ही विशेष यह चित्र बापू की याद में बना हुआ है-बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न बोलो। यह तीन दिखाते हैं, आप चार दिखाते हो। बुरा सोचो भी नहीं। क्योंकि पहले सोचना होता, फिर बोलना होता, फिर देखना होता है। तो इसलिए कन्ट्रोलिंग पॉवर, रूलिंग पॉवर रखो। राजा अर्थात् रूलिंग पॉवर। राजा हो और रूलिंग पॉवर हो ही नहीं, तो कौन राजा मानेगा। तो स्वराज्य अर्थात् रूलिंग पॉवर, कन्ट्रोलिंग पॉवर। कई परखने में बहुत होशियार होते हैं। कोई भी गलती होती है, जो नीति प्रमाण नहीं है, तो समझते हैं कि यह नहीं करना चाहिए, यह सत्य नहीं है, यथार्थ नहीं है, अयथार्थ है, व्यर्थ है। लेकिन समझते हुए फिर भी करते रहते या कर लेते। तो इसको क्या कहेंगे? कौनसी पॉवर की कमी है? कन्ट्रोलिंग पॉवर नहीं है। जैसे-आजकल कार चलाते हैं, देख भी रहे हैं कि एक्सीडेन्ट होने की सम्भावना है, ब्रेक लगाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ब्रेक लगे ही नहीं तो जरूर एक्सीडेन्ट हो जाएगा। यदिब्रेक है लेकिन पॉवरफुल नहीं है और यहाँ के बजाए वहाँ लग गई, तो भी क्या होगा? इतना समय तो परवश होगा ना। चाहते हुए भी कर नहीं पाते। ब्रेक लगा नहीं सकते या ब्रेक पॉवरफुल न होने के कारण ठीक लग नहीं सकती। अपने अंदर यह चेक करो। जब ऊंची पहाड़ी पर चढ़ते हैं तो लिखा हुआ होता है’ब्रेक चेक करो’ क्योंकि ब्रेक सेफ्टी का साधन है। तो कन्ट्रोलिंग पॉवर का वा ब्रेक लगाने का अर्थ यह नहीं कि लगाओ यहाँ और ब्रेक लगे वहाँ। कोई व्यर्थ को कन्ट्रोल करने चाहते हैं, समझते हैं-यह रांग है तो उसी समय रांग को राइट में परिवर्तन होना चाहिए। इसको कहा जाता है कन्ट्रोलिंग पॉवर। ऐसे नहीं कि सोच भी रहे हैं लेकिन आधा घण्टा व्यर्थ चला जाये, पीछे कन्ट्रोल में आये। बहुत पुरूषार्थ करके आधे घण्टे के बाद परिवर्तन हुआ तो उसको कन्ट्रोलिंग पॉवर औररूलिंग पॉवर नहीं कहा जाता। यह हुआ थोड़ा-थोड़ा अधीन और थोड़ा-थोड़ा अधिकारी-मिक्स। तो उसको राज्य-अधिकारी कहेंगे या पुरुषार्थी कहेंगे? तो अब पुरुषार्थी नहीं, राज्य-अधिकारी बनो। यह स्वराज्य अधिकार का श्रेष्ठ मज़ा है।“ (2)

रूलिंग पॉवर का अर्थ है आत्मा की सूक्ष्म शक्तियां मन, बुद्धि और संस्कारों पर शासन करना। इसके विषय में अव्यक्त वाणियों में लिखा है :

 “सदा यह चेक करो कि मेरे में रूलिंग पावर कहाँ तक है, पहले सूक्ष्म शक्तियाँ, जो विशेष कार्यकर्ता हैं, उनके ऊपर कहाँ तक अपना अधिकार है। संकल्प शक्ति के ऊपर, बुद्धि के ऊपर और संस्कारों के ऊपर। यह विशेष तीन शक्तियाँ राज्य-अधिकारी बनाने में सदा सहयोगी अर्थात् राज्य की कारोबार चलाने वाले मुख्य सहयोगी कार्यकर्ता हैं। अगर यह तीनों कार्यकर्ता आप आत्मा अर्थात् राज्य-अधिकारी राजा के इशारे पर चलते हैं तो सदा वह राज्य यथार्थ रीति से चलता है। जैसे बाप को भी तीन मूर्तियों द्वारा कार्य कराना पड़ता है इसलिए त्रिमूर्ति का विशेष गायन और पूजन है। त्रिमूर्ति शिव कहते हो। एक बाप के तीन विशेष कार्यकर्ता हैं जिन द्वारा विश्व का कार्य कराते हैं। ऐसे आप आत्मा रचयिता हो और यह तीन विशेष शक्तियाँ अर्थात् त्रिमूर्ति शक्तियाँ आपके विशेष कार्यकर्ता हैं। आप भी इन तीन रचना के रचयिता हो। तो चेक करो कि त्रिमूर्ति रचना आपके कंट्रोल में है? उत्पत्ति करने वाला अर्थात् संकल्प रचने वाला। बुद्धि है निर्णय करना अर्थात् पालना के समान कार्य करने वाली। संस्कार है अच्छा व बुरा परिवर्तन कराने वाला। जैसे ब्रह्मा आदि देव है वैसे पहले आदि शक्ति है मन अर्थात् संकल्प शक्ति। आदि शक्ति यथार्थ है तो और भी कार्यकर्ता उनके साथी यथार्थ कार्य करने वाले हैं। पहले यह चेक करो मुझ राजा का पहला आदि कार्यकर्ता सदा समीप के साथी के समान इशारे पर चलता है क्योंकि माया दुश्मन भी पहले इसी आदि शक्ति को बागी अर्थात् ट्रेटर बनाती है और राज्य-अधिकार लेने की कोशिश करती है। इसलिए आदि शक्ति को सदा अपने अधिकार की शक्ति के आधार पर सहयोगी, विशेष कार्यकर्ता करके चलाओ। जैसे राजा स्वयं कोई कार्य नहीं करता, कराता है। करने वाले राज्य कारोबारी अलग होते हैं। अगर राज्य कारोबारी ठीक नहीं होते तो राज्य डगमग हो जाता है। ऐसे आत्मा भी करावनहार है, करनहार ये विशेष त्रिमूर्ति शक्तियाँ हैं। पहले इनके ऊपर रूलिंग पावर है तो यह साकार कर्मेन्द्रियाँ उनके आधार पर स्वत: ही सही रास्ते पर चलेंगी। कर्मेन्द्रियों कोचलाने वाली भी विशेष यह तीन शक्तियाँ हैं। अब रूलिंग पावर कहाँ तक आई है - यह चेक करो।“ (3)

स्वराज्य अधिकारी स्व के इशारे पर चलने वाले और एक धर्म अर्थात् एक ही धारणा वाले होते हैं इस लिए उनकी सदैव चढ़ती कला होती है। इस संबंध में अव्यक्त वाणियों में लिखा है :
“ अब स्वराज्य में भी एक राज्य अर्थात् स्व के इशारे पर सर्व चलने वाले हैं। एक धर्म अर्थात् एक ही धारणा सब की है कि सदा श्रेष्ठाचारी चढ़ती कला में चलना है। मन अपनी मनमत पर चलावे, बुद्धि अपनी निर्णय शक्ति की हलचल करे, मिलावट करें, संस्कार आत्मा को भी नाच नचाने वाले हो जाएं तो इसको एक धर्म नहीं कहेंगे, एक राज्य नहीं कहेंगे। तो आपके राज्य का क्या हाल है? त्रिमूर्ति शक्तियाँ ठीक हैं? कभी संस्कार बन्दर का नाच तो नहीं नचाते हैं? बन्दर क्या करता है? नीचे ऊपर छलांग मारता है ना। संस्कार की भी अभी-अभी चढ़ती कला अभी-अभी गिरती कला। यह बन्दर का नाच है ना। तो ये संस्कार नाच तो नहीं नचाते हैं ना? कन्ट्रोल में है ना सब? कभी बुद्धि मिलावट तो नहीं करती है? जैसे आजकल मिलावट करते हैं तो निर्णय शक्ति भी मिलावट कर देती है, कभी बुद्धि मिलावट तो नहीं कर देती है? अभी-अभी यथार्थ अभी-अभी व्यर्थ तो मिलावट हुई ना। ” (4)

स्वराज्य अधिकारी अर्थात् सदा मौज ही मौज में रहना

स्व पर राज्य करने वाला सदैव प्रसन्न चित रहता है। सृष्टि चक्र में पहला युग सतयुग और दूसरा युग त्रेता युग है जहाँ प्रजा एक परिवार की तरह रहती है। यह सतयुग –त्रेता की राजनीति है। जहाँ लॉ नहीं बल्कि स्नेह और संबंध की नीति चलती है। सतयुग और त्रेतायुग में सभी स्वराज्य अधिकारी होते हैं। इस संबंध में अव्यक्त वाणी में लिखा है :

“स्वराज्य अधिकारी अर्थात् सदा मौज ही मौज में रहना। मौज में रहने वाला कभी किसी बात में मूँझता नहीं है। अगर मूंझते हैं तो मौज नहीं है। तो संगमयुग पर मौज ही मौज है ना। या कभी-कभी मौज है? शक्तियों को, पाण्डवों को मौज है ना। तो समझा, स्वराज्य की नीति क्या है और विश्व-राज्य की नीति क्या है? चाहे प्रजा है, चाहे रॉयल फैमिली है लेकिन प्रजा, प्रजा नहीं, प्रजा भी एक परिवार है। परिवार की नीति-यह है सतयुग-त्रेता की राजनीति। राजा कहलाते हैं लेकिन राजा होते भी परमप्रिय पिता का स्वरूप है। परिवार की विधि से राजनीति चलती है। चाहे राज्य कारोबार भिन्न-भिन्न हाथों में होगी लेकिन परिवार के स्नेह की विधि से कारोबार होगी। ऐसे नहीं कि राजा के पास बहुत धन-दौलत हो और प्रजा में कोई को खाने-पीने के लिये भी नहीं हो। द्वापर-कलियुग की राजनीति में लॉ एण्ड ऑर्डर चलता है। लेकिन विश्व-राज्य, देव-राज्य के समय यही नीति चलती है, लॉ नहीं लेकिन स्नेह और सम्बन्ध की नीति चलती है। कोई भी आत्मा ‘दु:ख’ शब्द को भी नहीं जानती। चाहे राजा हो, चाहे प्रजा हो लेकिन दु:ख-अशान्ति का नाम-निशान नहीं। दु:ख क्या चीज होती है-उसका अज्ञान है, ज्ञान ही नहीं है। जैसे इस समय स्वराज्य के समय भी आपको बापदादा किस नीति से चलाते हैं? स्नेह और श्रीमत। श्रीमत पर चलते रहते तो कोई भी सख्त ऑर्डर करने की आवश्यकता नहीं है। अगर नीति को भूलते हैं तो स्वयं, स्वयं को कलियुगी नीति में चलाते हैं। तो विश्व के राज्य की नीति भी बहुत प्यारी है क्योंकि अनेकता नहीं है, एक राज्य है और अखुट खज़ाना है! प्रजा भी इतनी सम्पन्न होगी-आजकल के जो बड़े-बड़े पद्मपति हैं, उन्हों से भी ज्यादा! अप्राप्ति का नाम-निशान नहीं। लेकिन इसका आधार क्या? स्वराज्य।“ (5)


स्वराज्य अधिकारी बनने के लिए अव्यक्त वाणी के महावाक्य इस प्रकार हैं:

“आवाज में आने के लिए वा आवाज को सुनने के लिए कितने साधन अपनाते हो? बापदादा को भी आवाज में आने के लिए शरीर के साधन को अपनाना पड़ता है। लेकिन आवाज से परे जाने के लिए इस साधनों की दुनिया से पार जाना पड़े। साधन इस साकार दुनिया में है। बापदादा के सूक्ष्म वतन वा मूल वतन में कोई साधनों की आवश्यकता नहीं है। सेवा के अर्थ आवाज में आने के लिए कितने साधनों को अपनाते हो? लेकिन आवाज से परे स्थिति में स्थित होने के अभ्यासी सेकण्ड में इन सबसे पार हो जाते हैं। ऐसे अभ्यासी बने हो? अभी-अभी आवाज में आये, अभी-अभी आवाज से परे। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर अपने में अनुभव करते हो? संकल्प शक्ति को भी, जब चाहो तब संकल्प मे आओ, विस्तार में आओ, जब चाहो तब विस्तार को फुलस्टाप में समा दो। स्टार्ट करने की और स्टाप करने की - दोनों ही शक्तियाँ समान रूप में हैं?
हे कर्मेन्द्रियों के राज्यधारी, अपनी राज्य सत्ता अनुभव करते हो? राज्य सत्ता श्रेष्ठ है वा कर्मेन्द्रियों अर्थात् प्रजा की सत्ता श्रेष्ठ है? प्रजा पति बने हो? क्या अनुभव करते हो? स्टाप कहा और स्टाप हो गया। ऐसे नहीं कि आप कहो स्टाप और वह स्टार्ट हो जाए। सिर्फ हर कर्मेंन्द्रिय की शक्ति को आँख से इशारा करो तो इशारे से ही जैसे चाहो वैसे चला सको। ऐसे कर्मेन्द्रिय जीत बनें तब फिर प्रकृतिजीत बन कर्मातीत स्थिति के आसनधारी सो विश्व राज्य अधिकारी बनो। तो अपने से पूछो - पहली पौढ़ी - कर्मेंन्द्रिय जीत बने हैं? हर कर्मेंन्द्रिय ‘‘जी हजूर'' ‘‘जी हाजर'' करती हुई चलती है? आप राज्य अधिकारियों का सदा स्वागत अर्थात् सलाम करती रहती हैं? राजा के आगे सारी प्रजा सिर झुकाकर सलाम करती है?

हे राज्य अधिकारी, आप सबकी राज्य कारोबार कैसी है? मंत्री, उपमंत्री कहाँ धोखा तो नहीं देते हैं? चैक करते हो अपनी राज्य कारोबार को? राज्य दरबार रोज लगाते हो या कभी-कभी? क्या करते हो? राज्य अधिकारी के यहाँ के संस्कार भविष्य में कार्य करेंगे। चैक करते हो कि वर्तमान समय मुझ आत्मा के राजवंश के संस्कार हैं? वा प्रजा के संस्कार हैं? वा स्टेट के राज्य अधिकारी के संस्कार हैं अर्थात् हद के राज्य अधिकारी के संस्कार हैं वा बेहद विश्व महाराजन के संस्कार हैं वा उनसे भी लास्ट पद दास-दासी के संस्कार हैं? जो किसी भी समस्या वा संस्कार के अधीन बन उदास रहता है तो उदास वा उदासी ही निशानी है -दास दासी बनना। तो मैं कौन? यह स्वयं ही स्वयं को चैक करो। कहाँ किसी भी प्रकार की उदासी की लहर तो नहीं आती? उदास अर्थात् अभी भी दास हैं तो ऐसे को राज्य अधिकारी कैसे कहेंगे?” (6)

निश्चय ही इस प्रकार का संबोधन ज्ञान के सागर और सर्व-शक्तिवान परमात्मा का ही हो सकता है जो वर्तमान समय मनुष्यात्माओं को संपन्न बना कर फिर से वापिस ले जाने आए हैं।

आवश्यकता है ज्ञान को स्वरूप में लाने की , इसके लिए अव्यक्त वाणी में लिखा है :
“समय आने पर स्वयं को अधिकारी बनाकर सफलतामूर्त्त बन जाएं, वह कन्ट्रोलिंग पावर और रूलिंग पावर नहीं है अर्थात् नालेजफुल हैं लेकिन पावरफुल नहीं हैं। शस्त्रधारी हैं लेकिन समय पर कार्य में नहीं ला सकते हैं। स्टाक है लेकिन समय पर न स्वयं यूज़ कर सकते और न औरों को यूज़ करा सकते हैं। विधान आता है लेकिन विधी नहीं आती। ऐसे भी संस्कार वाली आत्माएं हैं अर्थात् साहूकार संस्कार वाली हैं। जो राज्य अधिकारी आत्माओं के सदा समीप के साथी जरूर होते हैं लेकिन स्व अधिकारी नहीं होते।“(7)

स्वराज्य अधिकारी अर्थात सर्व प्रकार की अधीनता समाप्त
जब व्यक्ति यह मानकर काम करता है कि मैं शरीर धारण करने वाली एक शांत और पवित्र आत्मा हूँ तो इसे आत्म-अभिमानी स्थिति कहते हैं इसी बात को अव्यक्त वाणी में इस तरह व्यक्त किया है :
“जब देह का भान छूट जाता तो क्या बन जाते? आत्मा, देही वा मालिक। देह के बन्धन से मुक्त, अर्थात् जीवनमुक्त राज्य अधिकारी। जब राज्य अधिकारी बन गये तो सर्व प्रकार की अधीनता समाप्त हो जाती क्योंकि देह के दास से देह के मालिक बन गये। ऐसा अन्तर अनुभव किया ना! दासपन छूट गया। दास और अधिकारी दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते। दासपन की निशानी है - मन से, चेहरे से उदास होना। उदास होना निशानी है दासपन की। और अधिकारी अर्थात् स्वराज्यधारी की निशानी है - मन और तन से सदा हर्षित। दास सदा अपसेट होगा। राज्यअधिकारी सदा सिंहासन पर सेट होगा, दास छोटी सी बात में और सेकेण्ड में कनफ्यूज हो जायेगा और अधिकारी सदा अपने को कम्फर्ट (आराम में) अनुभव करेगा। इन निशानियों से अपने आप को देखो - मैं कौन? दास वा अधिकारी? कोई भी परिस्थिति, कोई भी व्यक्ति, कोई भी वैभव, वायुमण्डल, शान से परे अर्थात् तख्त से नीचे उतार दास तो नहीं बना देते अर्थात् शान से परे परेशान तो नहीं कर देते हैं? तो दास अर्थात् परेशान, और अधिकारी अर्थात् सदा मास्टर सर्वशक्तिवान, विघ्न विनाशक स्थिति की शान में स्थित होगा। परिस्थति वा व्यक्ति, वैभव, शान में रह मौज से देखता रहेगा। दास आत्मा सदा अपने को परीक्षाओं के मजधार में अनुभव करेगी। अधिकारी आत्मा मांझी बन नैया को मजे से परीक्षाओं की लहरों से खेलते-खेलते पार करेगी। ”(8)

स्वराज्य त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी, तीनों लोकों के नॉलेजफुल अर्थात् त्रिलोकीनाथ बना देता है
जिसका‘स्व’ के ऊपर अधिकार होता है वह त्रिनेत्री अर्थात् तीन नेत्रों वाला बन जाता है। कहने का आशय यह है कि उसकी तीसरी आँख अर्थात् आत्मिक दृष्टि क्रियाशील हो जाती है जिससे वह तीनों कालों- भूत, वर्तमान और भविष्य – का ज्ञाता बन कर सोच – समझ कर कार्य करने लगता है। इससे उसका हर कार्य श्रेष्ठ और सुखकारक होता है। इसके आलावा स्वराज्य अधिकारी आत्मा तीनों लोकों – प्रकृति के पांच तत्त्वों वाला स्थूल लोक, सूक्ष्म लोक, और परमधाम - का ज्ञाता बना देता है। इस संबंध में अव्यक्त वाणी में लिखा है :
“स्वराज्य सदा के लिए राजयोगी सो राज्य अधिकारी बना देता है। स्वराज्य त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी, तीनों लोकों के नॉलेजफुल अर्थात् त्रिलोकीनाथ बना देता है। स्वराज्य सारे विश्व में कोटों में कोई, कोई में भी कोई विशेष आत्मा बना देता है। स्वराज्य बाप के गले का हार बना देता है। भक्तों के सिमरण की माला बना देता है। स्वराज्य बाप के तख्तनशीन बना देता है। स्वराज्य सर्व प्राप्तियों के खज़ाने का मालिक बना देता है। अटल, अचल, अखण्ड सर्व अधिकार प्राप्त करा देता है। ऐसे स्वराज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्मायें हो ना!” (9)

स्वराज्य अधिकारी के चार अधिकार
‘स्व’ पर राज्य करने वाले को चार प्रकार के अधिकार स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं :
“कितने प्रकार के अधिकार प्राप्त किये हैं, जानते हो? अधिकार-माला को याद करो। पहला अधिकार - परमात्म बच्चे बने अर्थात् सर्वश्रेष्ठ माननीय पूज्यनीय आत्मा बनने का अधिकार पाया। पहला अधिकार - पूज्यनीय आत्मा बने। दूसरा अधिकार - ज्ञान के खज़ानों के मालिक बने अर्थात् अधिकारी बने। तीसरा अधिकार - सर्व शक्तियों के प्राप्ति के अधिकारी बने। चौथा अधिकार - सर्व कर्मेन्द्रियों-जीत स्वराज्य अधिकारी बने। इस सर्व अधिकारों द्वारा मायाजीत सो जगत जीत विश्व-राज्य अधिकारी बनते। तो अपने इन सर्व अधिकारों को सदा स्मृति में रखते हुए समर्थ आत्मा बन जाते। समर्थ बने हो ना!(10)

जब परमात्मा मनुष्यत्माओ से संवाद करते हैं तो यह बड़ा अलौकिक, विचित्र और उत्साहवर्धक होता है। अव्यक्त वाणी में निराकार, ज्योति बिंदु परमपिता परमात्मा शिव कहते हैं :

“सभी अपने स्वराज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? स्वराज्य का अधिकार मिल गया? ऐसी अधिकारी आत्मायें शक्तिशाली होंगी ना! राज्य को - ‘सत्ता’ कहा जाता है। सत्ता अर्थात् शक्ति। आजकल की गवर्मेन्ट को भी कहते हैं - राज्य सत्ता वाली पार्टी है। तो राज्य की सत्ता अर्थात् शक्ति है। तो स्वराज्य कितनी बड़ी शक्ति है? ऐसी शक्ति प्राप्त हुई है? सभी कमेन्द्रियाँ आपकी शक्ति प्रमाण कार्य कर रही हैं? राजा सदा अपनी राज्य सभा को, राज्य दरबार को बुलाकर पूछते हैं कि - कैसे राज्य चल रहा है? तो आप स्वराज्य अधिकारी राजाओं की कारोबार ठीक चल रही है? या कहाँ नीचे-ऊपर होता है? कभी कोई राज्य कारोबारी धोखा तो नहीं देते हैं! कभी आँख धोखा दे, कभी कान धोखा दे, कभी हाथ, कभी पांव धोखा दे! ऐसे धोखा तो नहीं खाते हो! अगर राज्य सत्ता ठीक है तो हर संकल्प, हर सेकण्ड में पद्मों की कमाई है। अगर राज्य सत्ता ठीक नहीं है तो हर सेकण्ड में पद्मों की गँवाई होती है। प्राप्ति भी एक की पद्मगुणा है तो और फिर अगर गँवाते हैं तो एक का पद्मगुणा गँवाते हो। जितना मिलता है - उतना जाता भी है। हिसाब है। तो सारे दिन की राज्य कारोबार को देखो। आँख रूपी मंत्री ने ठीक काम किया? कान रूपी मंत्री ने ठीक काम किया? सबकी डिपार्टमेन्ट ठीक रही या नहीं? यह चेक करते हो या थक कर सो जाते हो? वैसे कर्म करने से पहले ही चेक कर फिर कर्म करना है। पहले सोचना फिर करना। पहले करना पीछे सोचना, यह नहीं। टोटल रिजल्ट निकालना अलग बात है लेकिन ज्ञानी आत्मा पहले सोचेगी फिर करेगी। तो सोचसमझ कर हर कर्म करते हो? पहले सोचने वाले हो या पीछे सोचने वाले हो? अगर ज्ञानी पीछे सोचे उसको ज्ञानी नहीं कहेंगे। इसलिए सदा स्वराज्य अधिकारी आत्मायें हैं और इसी स्वराज्य के अधिकार से विश्व के राज्य अधिकारी बनना ही है। बनेंगे या नहीं - यह क्वेश्चन नहीं। स्वराज्य है तो विश्व राज्य है ही। तो स्वराज्य में गड़बड़ तो नहीं है ना? द्वापर से तो गड़बड़ शालाओं में चक्कर लगाते रहे। अब गड़बड़ शाला से निकल आये, अभी फिर कभी भी किसी भी प्रकार की गड़बड़ शाला में पांव नहीं रखना। यह ऐसी गड़बड़ शाला है एक बार पांव रखा तो भूल भुलैया का खेल है! फिर निकलना मुश्किल हो जाता। इसलिए सदा एक रास्ता। एक में गड़बड़ नहीं होती। एक रास्ते पर चलने वाले सदा खुश - सदा सन्तुष्ट।“(11)

स्वराज्य का नशा उड़ती कला में ले जाने वाला नशा

सदा अपने को राजस्व अधिकारी समझ, इन कर्मेंन्द्रियों को कर्मचारी समझ अपने अधिकार से चलाते हो या कभी कोई कर्मेन्द्रिय राजा बन जाती है? आप स्वयं राजा हैं या कभी कोई कर्मेन्द्रिय राजा बन जाती? कभी कोई कर्मेन्द्रिय धोखा तो नहीं देती है? अगर किसी से भी धोखा खाया तो दुख लिया। धोखा दुख प्राप्त कराता। धोखा नहीं तो दुख नहीं। तो स्वराज्य की खुशी में, नशे में, शक्ति में रहने वाले। स्वराज्य का नशा उड़ती कला में ले जाने वाला नशा है। हद के नशे नुकसान प्राप्त कराते, यह बेहद का नशा अलौकिक रूहानी नशा सुख की प्राप्ति कराने वाला है। तो यथार्थ राज्य है - राजा का। प्रजा का राज्य हंगामें का राज्य है। आदि से राजाओं का राज्य रहा है। अभी लास्ट जन्म में प्रजा का राज्य चला है। तो आप अभी राज्य अधिकारी बन गये। अनेक-अनेक जन्म भिखारी रहे और अब भिखारी से अधिकारी बन गये। बापदादा सदा कहते - बच्चे खुश रहो, आबाद रहो। जितना अपने को श्रेष्ठ आत्मा समझ, श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ बोल, श्रेष्ठ संकल्प करेंगे तो इस श्रेष्ठ संकल्प से श्रेष्ठ दुनिया के अधिकारी बन जायेंगे। यह ‘स्वराज्य आपका जन्म-सिद्ध अधिकार है’, यही आपको जन्मजन्म के लिए अधिकारी बनाने वाला है।(12)

स्वराज्य अधिकारी अर्थात् प्रकृतिजीत और विकारजीत

स्वराज्यअधिकारी का आशय है प्रकृतिजीत और विकारजीत बनना। इसे अव्यक्त वाणी में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है :
“हर एक स्वराज्य अधिकारी के आगे कितने दास दासियाँ हैं? प्रकृतिजीत और विकारजीत। विकार भी 5 हैं प्रकृति के तत्व भी 5 हैं। तो प्रकृति ही दासी बन गई है ना! दुश्मन सेवाधारी बन गये हैं। ऐसे रूहानी फखर में रहने वाले, विकारों को भी परिवर्तित कर काम विकार को शुभ कामना, श्रेष्ठ कामना के स्वरूप में बदल, सेवा में लगाने वाले, ऐसे दुश्मन को सेवाधारी बनाने वाले, प्रकृति के किसी भी तत्व की तरफ वशीभूत नहीं होते हैं। लेकिन हर तत्व को तमोगुणी रूप से सतोप्रधान स्वरूप बना लेते हैं। कलियुग में यह तत्व धोखा और दुख देते हैं। संगमयुग में परिवर्तन होते हैं। रूप बदलते हैं। सतयुग में यह 5 तत्व देवताओं के सुख के साधन बन जाते हैं। यह सूर्य आपका भोजन तैयार करेगा तो भण्डारी बन जायेगा ना! यह वायु आपका नैचरल पंखा बन जायेगी। आपके मनोरंजन का साधान बन जायेगी। वायु लगेगी वृक्ष हिलेंगे और वह टाल टालियाँ ऐसे झूलेंगी जो उन्हों के हिलने से भिन्न-भिन्न साज़ स्वत: ही बजते रहेंगे। तो मनोरंजन का साधन बन गया ना! यह आकाश आप सबके लिए राज्य पथ बन जायेगा। विमान कहाँ चलायेंगे? यह आकाश ही आपका पथ बन जायेगा। इतना बड़ा हाईवे और कहाँ पर है? विदेश में है? कितने भी माइल बनावें लेकिन आकाश के पथ से तो छोटे ही है ना। इतना बड़ा रास्ता कोई है? अमेरिका में है? और बिना एक्सीडेंट के रास्ता होगा। चाहे 8 वर्ष का बच्चा भी चलावे तो भी गिरेंगे नहीं। तो समझा! यह जल इत्र-फुलेल का कार्य करेगा। जैसे जड़ी-बूटियों के कारण गंगा जल अभी भी और जल से पवित्र है। ऐसे खुशबूदार जड़ी-बूटियाँ होने के कारण जल में नैचरल खुशबू होगी। जैसे यहाँ दूध शक्ति देता है ऐसे वहाँ का जल ही शक्तिशाली होगा, स्वच्छ होगा। इसलिए कहते हैं - दूध की नदियाँ बहती हैं। सब अभी से खुश हो गये हैं ना! ऐसे ही यह पृथ्वी ऐसे श्रेष्ठ फल देगी जो जिस भी भिन्न-भिन्न टेस्ट के चाहते हैं उस टेस्ट का फल आपके आगे हाजर होगा। यह नमक नहीं होगा। चीनी भी नहीं होगी। जैसे अभी खटाई के लिए टमाटर है, तो बना बनाया है ना। खटाई आ जाती है ना। ऐसे जो आपको टेस्ट चाहिए उसके फल होंगे। रस डालो और वह टेस्ट हो जायेगी। तो यह पृथ्वी एक तो श्रेष्ठ फल, श्रेष्ठ अन्न देने की सेवा करेगी। दूसरा नैचरल सीन-सीनरियाँ जिसको कुदरत कहते हैं - तो नैचरल नजारे, पहाड़ भी होंगे। ऐसे सीधे पहाड़ नहीं होंगे। नैचरल ब्युटी भिन्न-भिन्न रूप के पहाड़ होंगे। कोई पंछी के रूप में कोई पुष्पों के रूप में। ऐसे नैचरल बनावट होगी। सिर्फ निमित्त मात्र थोड़ा-सा हाथ लगाना पड़ेगा। ऐसे यह 5 तत्व सेवाधारी बन जायेंगे। लेकिन किसके बनेंगे? स्वराज्य अधिकारी आत्माओं के सेवाधारी बनेंगे। तो अभी अपने को देखो 5 ही विकार दुश्मन से बदल सेवाधारी बने हैं? तब ही स्वराज्य अधिकारी कहलायेंगे। क्रोध अग्नि, योग अग्नि में बदल जाए। ऐसे लोभ विकार, लोभ अर्थात् चाहना। हद की चाहना बदल शुभ चाहना हो जाए कि मैं सदा हर संकल्प से, बोल से, कर्म से निःरस्वार्थ बेहद सेवाधारी बन जाऊँ। मैं बाप समान बन जाऊँ - ऐसे शुभ चाहना अर्थात् लोभ का परिवर्तन स्वरूप। दुश्मन के बजाए सेवा के कार्य में लगाओ। मोह तो सभी को बहुत है ना। बापदादा में तो मोह है ना। एक सेकेण्ड भी दूर न हों - यह मोह हुआ ना! लेकिन यह मोह सेवा कराता है। जो भी आपके नयनों में देखे तो नयनों में समाये हुए बाप को देखे। जो भी बोलेंगे मुख द्वारा बाप के अमूल्य बोल सुनायेंगे। तो मोह विकार भी सेवा में लग गया ना। बदल गया ना। ऐसे ही अहंकार। देह-अभिमान से देही-अभिमानी बन जाते। शुभ अहंकार अर्थात् ईश्वरीय नशा सेवा के निमित्त बन जाता है। तो ऐसे पाँचों ही विकार बदल सेवा का साधन बन जाए तो दुश्मन से सेवाधारी हो गये ना! तो ऐसे चेक करो मायाजीत, प्रकृति जीत कहाँ तक बने हैं? राजा तब बनेंगे जब पहले दास-दासियाँ तैयार हों। जो स्वयं दास के अधीन होगा वह राज्य अधिकारी कैसे बनेगा!(13)
इसके लिए आगे क्या करना है , इस संबंध में अव्यक्त वाणी कहती है:

“अमृतवेले से अपने मुख्य तीन कारोबार के अधिकारी, अपने सहयोगी, साथियों को चेक करो। वह कौन? 1. मन अर्थात् संकल्प शक्ति। 2. बुद्धि अर्थात् निर्णय शक्ति। 3. पिछले वा वर्तमान श्रेष्ठ संस्कार। यह तीनों विशेष कारोबारी हैं। जैसे आजकल के जमाने में राजा के साथ महामन्त्री वा विशेष मन्त्री होते हैं, उन्हीं के सहयोग से राज्य कारोबार चलती है। सतयुग में मन्त्री नहीं होंगे लेकिन समीप के सम्बन्धी, साथी होंगे। किसी भी रूप में, साथी समझो वा मन्त्री समझो। लेकिन यह चेक करो - यह तीनों स्व के अधिकार से चलते हैं? इन तीनों पर स्व का राज्य है वा इन्हों के अधिकार से आप चलते हो? मन आपको चलाता है या आप मन को चलाते हैं? जो चाहो, जब चाहो वैसा ही संकल्प कर सकते हो? जहाँ बुद्धि लगाने चाहो, वहाँ लगा सकते हो वा बुद्धि आप राजा को भटकाती है? संस्कार आपके वश हैं या आप संस्कारों के वश हो? राज्य अर्थात् अधिकार। राज्य-अधिकारी जिस शक्ति को जिस समय जो आर्डर करे, वह उसी विधिपूर्वक कार्य करते वा आप कहो एक बात, वह करें दूसरी बात? क्योंकि निरन्तर योगी अर्थात् स्वराज्य अधिकारी बनने का विशेष साधन ही मन और बुद्धि है। मन्त्र ही ‘मन्मनाभव' का है। योग को बुद्धियोग कहते हैं। तो अगर यह विशेष आधार स्तम्भ अपने अधिकार में नहीं हैं वा कभी हैं, कभी नहीं है; अभी-अभी हैं, अभी-अभी नहीं हैं; तीनों में से एक भी कम अधिकार में है तो इससे ही चेक करो कि हम राजा बनेंगे या प्रजा बनेंगे? बहुतकाल के राज्य अधिकारी बनने के संस्कार बहुतकाल के भविष्य राज्य- अधिकारी बनायेंगे। अगर कभी अधिकारी, कभी वशीभूत हो जाते हो तो आधा कल्प अर्थात् पूरा राज्य-भाग्य का अधिकार प्राप्त नहीं कर सकेंगे। आधा समय के बाद त्रेतायुगी राजा बन सकते हो, सारा समय राज्य अधिकारी अर्थात् राज्य करने वाले रॉयल फैमिली के समीप सम्बन्ध में नहीं रह सकते। अगर वशीभूत बारबार होते हो तो संस्कार अधिकारी बनने के नहीं लेकिन राज्य अधिकारियों के राज्य में रहने वाले हैं। वह कौन हो गये? वह हुई प्रजा। तो समझा, राजा कौन बनेगा, प्रजा कौन बनेगा? अपने ही दर्पण में अपने तकदीर की सूरत को देखो। यह ज्ञान अर्थात् नॉलेज दर्पण है। तो सबके पास दर्पण है ना। तो अपनी सूरत देख सकते हो ना। अभी बहुत समय के अधिकारी बनने का अभ्यास करो। ऐसे नहीं अन्त में तो बन ही जायेंगे। अगर अन्त में बनेंगे तो अन्त का एक जन्म थोड़ा-सा राज्य कर लेंगे। लेकिन यह भी याद रखना कि अगर बहुत समय का अब से अभ्यास नहीं होगा वा आदि से अभ्यासी नहीं बने हो, आदि से अब तक यह विशेष कार्यकर्त्ता आपको अपने अधिकार में चलाते हैं वा डगमग स्थिति करते रहते हैं अर्थात् धोखा देते रहते हैं, दु:ख की लहर का अनुभव कराते रहते हैं तो अन्त में भी धोखा मिल जायेगा। धोखा अर्थात् दु:ख की लहर जरूर आयेगी। तो अन्त में भी पश्चाताप के दु:ख की लहर आयेगी। इसलिए बापदादा सभी बच्चों को फिर से स्मृति दिलाते हैं कि राजा बनो और अपने विशेष सहयोगी कर्मचारी वा राज्य कारोबारी साथियों को अपने अधिकार से चलाओ।

अपने ऊपर राज्य करो, अपने साथियों के ऊपर राज्य करना नहीं शुरू करना। जिसका स्व पर राज्य है, उसके आगे अभी भी स्नेह के कारण सर्व साथी भी चाहे लौकिक, चाहे अलौकिक सभी ‘जी हजूर', ‘हाँ-जी' कहते हुए साथी बनकर के रहते हैं, स्नेही और साथी बन ‘हाँ-जी' का पाठ प्रैक्टिकल में दिखाते हैं। जैसे प्रजा राजा की सहयोगी होती है, स्नेही होती है, ऐसे आपकी यह सर्व कर्म-इन्द्रियाँ, विशेष शक्तियाँ सदा आपके स्नेही, सहयोगी रहेंगी। स्वयं अपनी कर्म-इन्द्रियों को आर्डर में रखो तो स्वत: आपके आर्डर करने के पहले ही सर्व साथी आपके कार्य में सहयोगी बनेंगे। स्वयं सहयोगी बनेंगे, आर्डर करने की आवश्यकता नहीं। स्वयं अपने सहयोग की आफर करेंगे क्योंकि आप स्वराज्य-अधिकारी हैं। जैसे राजा अर्थात् दाता, तो दाता को कहना नहीं पड़ता अर्थात् मांगना नहीं पड़ता। तो ऐसे स्वराज्य-अधिकारी बनो। (14)

स्वराज्य अधिकारी की स्थिति सदा मास्टर सर्वशक्तिवान है

सभी अपने को स्वराज्य अधिकारी समझते हो? स्व का राज्य मिला है या मिलने वाला है? स्वराज्य अर्थात् जब चाहो, जैसे चाहो वैसे कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करा सको। कर्मेन्द्रिय-जीत अर्थात् स्वराज्य अधिकारी। ऐसे अधिकारी बने हो या कभी-कभी कर्मेन्द्रियां आपको चलाती हैं? कभी मन आपको चलाता है या आप मन को चलाते हो? कभी मन व्यर्थ संकल्प करता है या नहीं करता है? अगर कभी-कभी करता है तो उस समय स्वराज्य अधिकारी कहेंगे? राज्य बहुत बड़ी सत्ता है। राज्य सत्ता चाहे जो कर सकती है, जैसे चलाने चाहे वैसे चला सकती है। यह मन-बुद्धि-संस्कार आत्मा की शक्तियाँ हैं। आत्मा इन तीनों की मालिक है। यदि कभी संस्कार अपने तरफ खींच लें तो मालिक कहेंगे? तो स्वराज्य-सत्ता अर्थात् कर्मेन्द्रिय-जीत। जो कर्मेन्द्रिय-जीत है वही विश्व की राज्य-सत्ता प्राप्त कर सकता है। स्वराज्य अधिकारी विश्व-राज्य अधिकारी बनता है। तो आप ब्राह्मण आत्माओं का ही स्लोगन है कि ‘स्वराज्य ब्राह्मण जीवन का जन्म-सिद्ध अधिकार है।' स्वराज्य अधिकारी की स्थिति सदा मास्टर सर्वशक्तिवान है, कोई भी शक्ति की कमी नहीं। स्वराज्य अधिकारी सदा धर्म अर्थात् धारणामूर्त भी होगा और राज्य अर्थात् शक्तिशाली भी होगा। अभी राज्य में हलचल क्यों है? क्योंकि धर्म-सत्ता अलग हो गई है और राज्यसत्ता अलग हो गई है। तो लंगड़ा हो गया ना! एक सत्ता हुई ना। इसलिए हलचल है। ऐसे आप में भी अगर धर्म और राज्य - दोनों सत्ता नहीं हैं तो विघ्न आयेंगे, हलचल में लायेंगे, युद्ध करनी पड़ेगी। और दोनों ही सत्ता हैं तो सदा ही बेपरवाह बादशाह रहेंगे, कोई विघ्न आ नहीं सकता। तो ऐसे बेपरवाह बादशाह बने हो? या थोड़ी-थोड़ी शरीर की, सम्बन्ध की .... परवाह रहती है? पांडवों को कमाने की परवाह रहती है। परिवार को चलाने की परवाह रहती है या बेपरवाह रहते हैं? चलाने वाला चला रहा है, कराने वाला करा रहा है - ऐसे निमित्त बन कर करने वाले बेपरवाह बादशाह होते हैं। ‘‘मैं कर रहा हूँ'' - यह भान आया तो बेपरवाह नहीं रह सकते। लेकिन ‘‘बाप द्वारा निमित्त बना हुआ हूँ'' - यह स्मृति रहे तो बेफिकर वा निश्चिंत जीवन अनुभव करेंगे। कोई चिंता नहीं। कल क्या होगा - उसकी भी चिंता नहीं। कभी यह थोड़ी-सी चिंता रहती है कि कल क्या होगा, कैसे होगा? पता नहीं विनाश कब होगा, क्या होगा? बच्चों का क्या होगा? पोत्रों-धोत्रों का क्या होगा - यह चिंता रहती है? बेपरवाह बादशाह को सदा ही यह निश्चय रहता है कि - जो हो रहा है वह अच्छा, और जो होने वाला है वह और भी बहुत अच्छा होगा। क्योंकि कराने वाला अच्छे-ते-अच्छा है ना! इसको कहते हैं - निश्चयबुद्धि विजयी। ऐसे बने हो या सोच रहे हो? बनना तो है ही ना! इतनी बड़ी राजाई मिल जाए तो सोचने की क्या बात है? अपना अधिकार कोई छोड़ता है? झोंपड़ी वाले भी होंगे, थोड़ी-सी मिलकियत भी होगी - तो भी नहीं छोड़ेंगे। यह तो कितनी बड़ी प्राप्ति है! तो मेरा अधिकार है - इस स्मृति से सदा अधिकारी बने उड़ते चलो। यही वरदान याद रखना कि - ‘‘स्वराज्य हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है।'' मेहनत करके पाने वाले नहीं, अधिकार है। (15)

मन-बुद्धि-संस्कार पर कंट्रोल ही स्वराज्य अधिकारी

हर एक में रूलिंग पावर और कंट्रोलिंग पावर कहाँ तक आई है - आज यह देख रहे थे। जैसे आत्मा की स्थूल कर्मेंन्द्रियाँ आत्मा के कंट्रोल से चलती है, जब चाहे, जैसे चाहे और जहाँ चाहे वैसे चला सकते हैं और चलाते रहते हैं। कंट्रोलिंग पावर भी है। जैसे हाथ-पांव स्थूल शक्तियाँ हैं ऐसे मन-बुद्धि संस्कार आत्मा की सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। सूक्ष्म शक्तियों के ऊपर कंट्रोल करने की पावर अर्थात् मन-बुद्धि को, संस्कारों को जब चाहें, जहाँ चाहे, जैसे चाहें, जितना समय चाहें - ऐसे कंट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर आई है? क्योंकि इस ब्राह्मण-जीवन में मास्टर आलमाइटी अथॉरिटी बनते हो।

जीवन में रूलिंग पावर, कंट्रोलिंग पावर सदा और कितनी परसेन्टेज में रही है। इसमें भी पहले अपनी सूक्ष्म शक्तियों की रिजल्ट को चेक करो। रिजल्ट में क्या दिखाई देता है? इस विशेष तीन शक्तियों - ``मन-बुद्धि-संस्कार'' पर कंट्रोल हो तो इसको ही स्वराज्य अधिकारी कहा जाता है। तो यह सूक्ष्म शक्तियाँ ही स्थूल कर्मेंन्द्रियों को संयम और नियम में चला सकती हैं। रिजल्ट क्या देखी? जब, जहाँ, और जैसे - इन तीनों बातों में अभी यथाशक्ति हैं। सर्वशक्ति नहीं हैं लेकिन यथाशक्ति। जिसको डबल विदेशी अपनी भाषा में समथिंग (Something) अक्षर यूज़ करते हैं। तो इसको आलमाइटी अथॉरिटी कहेंगे? माइटी तो हैं लेकिन आल हैं? वास्तव में इसको ही ब्राह्मण-जीवन का फाउण्डेशन कहा जाता है। जिसका जितना स्व पर राज्य है अर्थात् स्व को चलने और सर्व को चलाने की विधि आती है, वही नंबर आगे लेता है। इस फाउण्डेशन में अगर यथाशक्ति है तो ऑटोमैटिकली नंबर पीछे हो जाता है। जिसको स्वयं को चलाने और चलने आता है वह दूसरों को भी सहज चला सकता है अर्थात् हैंडलिंग पावर आ जाती है। सिर्फ दूसरे को हैंडलिंग करने के लिए हैंडलिंग पावर नहीं चाहिए। जो अपनी सूक्ष्म शक्तियों को हैंडिल कर सकता है। वह दूसरों को भी हैंडिल कर सकता है। तो स्व के ऊपर कंट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर सर्व के लिए यथार्थ हैंडलिंग पावर बन जाती है। चाहे अज्ञानी आत्माओं को सेवा द्वारा हैंडिल करो, चाहे ब्राह्मण-परिवार में स्नेह सम्पन्न, संतुष्टता सम्पन्न व्यवहार करो - दोनों में सफल हो जायेंगे।(16)

निष्कर्ष
अव्यक्त वाणियों के उपर्युक्त संक्षिप्त विश्लेष्ण के पश्चात यह स्थापित हो जाता है कि अव्यक्त वाणियों के मूल्यों की धारणा करने से मानव‘स्व’ पर राज्य अर्थात् पूर्ण अधिकार प्राप्त करने की कला सीख सकता है। इस‘स्व-राज्य’ से विश्व की प्रमुख समस्याओं – नस्सलवाद, साम्प्रदायिकता , रंग भेद, जाति भेद , आतंकवाद, अशांति एवं भय से मुक्ति मिल सकती है। सबसे बढ़कर व्यक्ति का जीवन सुख, शांति, आनन्द और शक्ति से भरपूर जो सकता है और वर्तमान विश्व एक श्रेष्ठ और बेहतर विश्व बन सकता है। जहाँ न विश्व युद्ध का भय होगा और न ही धार्मिक उन्माद के कारण खून ख़राबा। अपितु सच्चे अर्थों में विश्व-बंधुत्व और सर्वे भवंतु सुखिना की अवधारणा सत्य सिद्ध होगी।

सन्दर्भ
(Kalam, Abdul, APJ (2002), Learning From Saints and Seers, Ignited Minds, Viking, 88-89)

  • 1- अव्यक्त वाणी,(9-2- 75), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 2– वही
  • 3- वही
  • 4 – वही
  • 5-अव्यक्त वाणी (12-11-92), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 6-अव्यक्त वाणी (14-1-82), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 7- वही
  • 8-अव्यक्त वाणी (6-4-82), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 9- अव्यक्त वाणी (16-1-84), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 10- अव्यक्त वाणी(8-4-84), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 11- अव्यक्त वाणी (24-4-84), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 12- अव्यक्त वाणी (26-11-84), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 13- अव्यक्त वाणी (30-1-85), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 14- अव्यक्त वाणी (21-1-87), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 15- अव्यक्त वाणी (1-12-89), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
  • 16- अव्यक्त वाणी (7-3-90), माउंट अबू : ब्रह्मकुमारीज़
प्रोफेसर हिंदी, सतीशचन्द्र धवन सरकारी कॉलेज लुधियाना, सह-अध्येता, अखिलभारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, mobile : 09417717910)