अब और नहीं (कहानी) - रिया शर्मा

रिया शर्मा
ऑफिस का काम सुरसा के मुँह जैसा होता है। कभी पूरा होने का नाम ही नहीं लेता। सब कुछ निबटाने में उसे आज फिर बहुत देर हो गई थी। शनिवार इन सबके चलते हमेशा ही व्यस्त हो जाता था। दीवार घड़ी के घण्टे की आवाज पर उसने नज़र उठाकर देखा।

‘‘सात बज गए हैं …” उसने एक दबी हुई उसाँस छोड़ी और पर्स उठा कर झट-पट बस स्टॉप की तरफ बढ़ गई। लगभग दौड़ते हुए सोचने लगी कि जल्द ही शाम ढल जाएगी और अंधेरा उतर आएगा। रजत भी घर आ चुके होंगे। घड़ी की तरफ देखते हुए एक -एक मिनिट गिनते हुए भरे बैठे होंगे। मेरे घर पहुँचते ही फिर मिचमिच शुरू हो जाएगी। वही रोज़ की महाभारत बाँची जाएगी।

बाहर जून के महीने की तपन भरी उमस और सड़कों पर रफ़्तार से दौड़ती-भागती ज़िंदगियाँ। मेट्रो और रिक्शे का करीब घंटे भर का सफ़र तय करके घर पहुँचना उसे ऊर्जा विहीन कर देता था। लेकिन कौन उसका खैरख्वाह बैठा है जो उसे एक ग्लॉस ठंडा पानी ही थमा जाए। उसे कभी किसी से कोई उम्मीद भी नहीं होती। घर पहुँचते ही उसने पर्स, दुपट्टा और बैग सोफे पर फेंका और रसोई में जाकर एक गिलास ठण्डा पानी पिया। चाय बंनाने के बाद वह रात के खाने में क्या बनाएगी सोचने लगी। उधर रजत के श्लोक उच्चरित होने लगे।

‘‘सरकारी काम ही तो कर रही हो। क्या जरूरत है इतना सिर खपाने की। घर गृहस्थी के प्रति कोई ज़िम्मेदारी है कि नहीं तुम्हारी?” वह सोचती है क्या उसे अब ये सब सुनने की आदत डाल लेनी चाहिए? पूरे दिन आफिस में आठ-नौ घंटे काम करके वह इतना नहीं थकती, जितना घर पर इस तरह रोज के गिले -शिकवे सुनकर वह चंद मिनटों में ही थक जाती है। कई बार वह अन्दर तक कड़ुवाहट से भर जाती है। रजत टीवी के सुर में सुर मिलाकर कुछ देर तक उसे ताने देते हुए अपने अन्दर की कोफ़्त निकालता रहा।

‘‘ऐसा क्या तीर मार रही हो? तुमसे ऊपर पोस्ट पर बैठा हूँ ज्यादा ज़िम्मेदारियाँ हैं। परन्तु मजाल कभी देर हो जाए। एक तुम हो ...”

‘‘कामकाजी बहुओं की यही तो परेशानी है। चाय और खाने के लिए मुँह देखना पड़ता है। कब रसोई से धुँआ उठेगा, कब खाना मिलेगा।” पैंसठ वर्षीय स्वस्थ माताजी भी उसे अपना आशीर्वचन सुना देती हैं। सरल हृदय बाबूजी ने थकी हुई निशा की तरफ देखा और अखबार के पन्ने पटलते हुए बोले, ‘‘आ गई हो? चलो अब जल्दी से चाय पिला दो बेटा, बहुत देर से मन था।” बाबूजी जब भी उससे स्नेह से बोलते हैं उसकी आँखें भीग जाती हैं। रसोई में जाकर निशा ने चाय का पानी चढ़ाया और पानी उबलने तक सेाच का बुलबुला फिर उठने लगा। कहते हैं स्त्री और पुरूष एक ही गाड़ी के दो पहिए होते हैं। कैसे कह सका होगा वह ऐसा कहने वाला?

‘‘निशा, कॉफी का क्या हुआ भई?” रजत की ऊँची आवाज पर वह चौंक कर तेजी से हाथ चलाने लगी। एक प्लेट में फ्रंटियर बिस्कुट रख कर झटपट तीन कप चाय और रजत के लिए कॉफी बनाकर पहले माँ बाबूजी के कमरे में गई। बाबूजी को फ्रंटियर बिस्कुट खूब पसंद हैं इसलिए वह अक्सर उनके लिए रास्ते से इसके पैकेट लेती हुई आती है। एक बाबूजी ही तो हैं जो उससे स्नेह के दो बोल, बोल लेते हैं वरना अन्य सभी को अपने आप के बारे में ही सोचने से फुर्सत कहाँ! माता जी और बाबूजी की दो कप चाय और बिस्कुट की प्लेट उनके कमरे में रख कर वह टी वी पर खबरें सुनते रजत के आगे कॉफी का मग रखते हुए बोली। ‘‘तुमसे एक बात कहनी थी रजत। वो कल मेरी सहेली का जन्मदिन है... और …”

उसकी पूरी बात सुनने से पहले ही रजत टी वी पर चल रही खबरों से बिना नजरें हटाए कॉफी का घूँट भरता हुआ बोला, ‘‘शानदार बहस चल रही है यार, अभी डिस्टर्ब मत करो, बाद में बात करेंगे।”

‘‘रजत! इससे पहले तुम कल का कोई और प्रोग्राम न बना लो इसलिए कह रहीं हूं ... वो मेरी बचपन की सहेली...”

‘‘कहा न, चुप करो अभी....मेरे सर पर सवार मत हो जाया करो।”

मायूस होकर उसने अपना चाय का कप उठाया और भीतर कमरे में आ गई। अपनी उस कोने वाली प्रिय कुर्सी पर निढाल होकर बैठ गई। आँखें बन्द करके चाय पीते हुए सेाचने लगी कुछ पुरूष इतने आत्मकेन्द्रित व स्वार्थी क्यों हो जाते है? उसे पीहर की .... भाभियों से प्रेम करते हुए बड़े भाइयों की, माँ के स्नेह और उनकी ममता की याद आने लगी। कैसे माँ उसके घर लौटते ही उसे चाय का गर्म प्याला पकड़ा देती थी। बाद में ढेर सारे घी वाली तरकारी और उसका मनपसन्द खाना खिलाती थी। वह जब भी भोजन से जी चुराती, माँ प्यार व दुलार से उसे खिलाते हुए कहती थी। ‘‘कुछ दिन और माँ के हाथ का खाना खा ले नीशू, कल ससुराल चली जाएगी तो वहाँ तुझे बैठा कर कौन खिलाएगा? सासरे में अपना, खुद का और सबका ख्याल रखना बहू की जिम्मेदारी होती है। कई बार अपना मन मार के, अपनी इच्छाएं दबा के उसे सभी की उम्मीदों पर सही उतरना होता है। देख नीशू....”

कितना सही कहती थी माँ। सोचकर उसकी आँखें बरसने लगीं।

उसकी और रजत की शादी को अभी लगभग डेढ़ वर्ष हुआ था। परन्तु बेमेल विचारों के रहते उसे लगने लगा था जैसे उसने गृहस्थ जीवन की लम्बी यात्रा कर ली है। कैसे थोड़े से हालात बदल जाने पर ज़िंदगी जीने का तरीका ही बदल जाता है, या कहें बदलना पड़ता है। वह दो भईयों में सबसे छोटी इकलौती बहिन थी। शादी के नाम से उसे हमेशा बहुत घबराहट होती थी। उसने अपनी सहेलियों से दहेज़ के लिए बलि चढ़ती औरतें और ससुराल के ज़ुल्मों से त्रस्त लड़कियों के कई किस्से सुन रखे थे। अपने घर परिवार, सरकारी नौकरी और मित्रों के साथ वह बहुत खुश रहती थी। परन्तु उसके लिए व्यग्रता से दूल्हा खोजते पिताजी और भाई अक्सर परेशान रहने लगे थे। पिता दलीलें देते थे, ‘‘शादी तो करनी ही होगी निशा। लोग क्या कहेंगे, पिता अपनी इकलौती बेटी के हाथ पीले नहीं कर सका, अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभा सका।”

पिताजी के आगे वह हारमान हो जाती थी और उनकी नम आँखों और भावुक बातों से उसका हृदय जाने कैसा-कैसा होकर डूबने सा लगता था। छब्बीस की उम्र पार चुकी निशा हर तरह से खुश थी। लेकिन उसके अविवाहित रहने के फैसले से जिस समाज में वह रहती थी वह समाज खुश नहीं था। रिश्तेदार, संबंधी कोई खुश नहीं थे। समाज का ये कैसा इंसाफ हुआ? दूसरों की बेटी को बहू बनाकर घर में रखना आसान है परन्तु अपनी बेटी को अपने ही घर में नहीं रख सकते। कोई माँ से कहता।

‘‘कितनी उम्र बीत गई इसकी, कब तक इस तरह घर पर बिठाए रखोगी?”

‘‘मेरी ममता भी इसी की उम्र की है पर देखो एक बेटे की माँ भी बन गई है।” दूसरा कहता था।

‘‘लड़की की कमाई कब तक खाओगे सक्सेना जी? क्यों पाप के भागी बनते हैं?” कोई पिताजी से कहता। ये सब सुन-सुनकर उसके कान दुखने लगे थे। परेशान होकर उसने माँ से पूछा था, ‘‘माँ जिस व्यक्ति को मै जानती नहीं उसे कैसे अपना हमसफर बना लूँ? पूरी ज़िंदगी किसी अनजान के साथ बिता देना? कैसा होगा वह साथी? कल कुछ ठीक नहीं चला तब?”

‘‘ऐसे नहीं बोलते बिटिया। मैने क्या तेरे बाबूजी को पहले से देखा या जाना था निशू, परन्तु सब कुछ ठीक चल रहा है न? देख यदि एक-दूसरे की भावनाओं का मान रखते हुए समझदारी से निभाओगी तो सब ठीक चलेगा। तू मेरी संस्कारी बिटिया है। तुझे सब का ध्यान रखना होगा, बड़ों का, बच्चों का।” माँ अपना वही सदियों पुराना राग अलाप देती जिसमें वक्त के हिसाब से अब थोड़ा बदलाव की जरूरत थी। 'परन्तु यदि रिश्ते में मान व समझ एक तरफा ही रही तब क्या करना चाहिए?' निशा सोचती थी परन्तु कह कुछ नहीं पाती थी। कुछ परिस्थितियाँ मनुष्य को कितना दयनीय और असहाय बना देती है कि वह अपने भीतर का हाल कह भी नहीं सकता। अभी वह अपनी सोचों में ही थी कि रजत की उग्र आवाज पर चौंक उठी।

‘‘आराम हो गया हो निशा तो जल्दी से कुछ बना भी लो।” कहता हुआ रजत हाथ में टी वी का रिमोट लिए उसके सामने खड़ा था। ‘‘... और हाँ डिनर पर अपने दोनों बच्चों के साथ सोमेश भी आएगा। उसकी पत्नी अपने बीमार पिता को देखने पीहर गई हुई है। परसों आ जाएगी तब तक उनका रात का खाना तुम्हें ही देखना है।” उसने निश्चिन्तता से आगे कहा। निशा को इस तरह आखिरी समय पर बताया गया आमंत्रण हमेशा ही असंयत कर देता है। कितनी बार यह बात वह रजत को बता चुकी है। परन्तु वह कभी नहीं समझता। उसने दो -एक बार मदद के लिए एक काम वाली बाई रखने की बात उठाई थी। जिसे माताजी ने एकदम नकार दिया था। और अपने बेटे को सुनाते हुए दो टूक कह दिया था। ‘‘इन काम वालियों की जाति -धर्म का पता तो होता नहीं। ऊपर से न जाने नहाती -धोती भी कब हैं…राम ही जाने। हमसे तो नहीं खाया जाएगा इनके हाथों का। अब इस उम्र में बेकार अपना बुढ़ापा खराब करो। इससे अच्छा गिरते-पड़ते अपनी दो रोटी मैं खुद ही सेंक लूंगी।” किसी ने उनकी इस बात का खंडन नहीं किया। तय हो गया बाई को घर में प्रवेश नहीं मिल सकता इसलिए अब सब बहू संभाले।

निशा परेशान होकर बोली, ‘‘रजत इतनी जल्दी ये सब मैं कैसे मैनेज करूंगी? जरा पहले बता देते तो मैं ऑफिस से आते समय कुछ सलाद और सब्जियाँ लेती आती। अब इस समय ... क्या तुम बाजार से कुछ ...”

‘‘अरे घर में हमेशा कुछ न कुछ होता ही है ... मैनेज कर लो भाई।” उसकी आधी बात हवा में यूँ ही तैरती छोड़कर वह बुदबुदाता हुआ वापस आकर फिर से टी वी के आगे बैठ गया। भारी और उलझन भरा मन लिए निशा चाय का खाली कप लेकर रात के खाने की तैयारी करने रसोईघर की तरफ बढ़ गई। 'अब उससे ये नौकरी नहीं हो पाएगी, वह जल्दी ही ये छोड़ देगी।' खिन्न होकर सोचने लगी। 'रजत को अच्छी तनख्वाह मिलती है। घर अपना ही है। पैसे की कोई कमी नहीं है। फिर किस बात की मारा -मारी। वैसे ये विचार उसे पहले भी कई बार आ चुका था और उसने रिजाइन करने के लिए लेटर भी बना दिया था। परन्तु हर बार रजत उसे अधिकार पूर्वक रोकते हुए कह देता था, ‘‘पूरे दिन घर पर बैठ कर क्या करोगी? सरकारी नौकरी है, ऐसे ही तो नहीं मिल जाती। आगे देखेंगे कभी, आजकल एक की कमाई से हो कहाँ पूरा हो पाता है। आगे परिवार बढ़ेगा, तुम्हारी जिम्मेदारियाँ बढ़ेंगी ...”

सब कुछ सोच कर उसका दिमाग परेशान हो जाता था। 'जिम्मेदारियाँ हमेशा उसी की क्यों बढ़ती है? जब वह शादी करके इस घर में आई, तब उसने रजत व उसकी छोटी बहिन रजनी की जिम्मेदारियाँ संभाल ली थीं। छह महीने पहले रजनी की शादी हो गई और वह अपने संपन्न ससुराल में बेहद खुश थी। उसकी शादी के बाद माँ- बाबू जी की ज़िम्मेदारी भी पूरी तरह निशा पर आ गई। माँ -बाबूजी छह माह एक बेटे के पास रहते थे और अगले छह माह दूसरे के। रजनी की शादी के तुरन्त बाद रजत के बड़े भाई साहब ये कहकर माँ -बाबूजी को यहाँ पहुँचा गए थे कि सुमिता से अब हो नहीं पाएगा, उसकी तबियत ठीक नहीं रहती। निशा सोचने लगी संपन्न भाई सहाब के नौकर चाकर वाले घर में व भाभी के घरेलू महिला होने के बावजूद भी माँ -बाबूजी कैसे उपेक्षित रह जाते होंगे? परन्तु वह चुपचाप बिना किसी शिकायत के सभी ज़िम्मेदारियों को अपनी आदत और संस्कार के अनुसार बखूबी निभाने लगी।

देर रात सब कुछ समेट- सहेज कर वह अपने कमरे में आई। अभी वह सुकून से लेट कर रजत से कुछ कहना ही चाह रही थी कि रजत फिर बोला। ‘‘सुनो निशा कल रविवार है। तुम्हारी छुट्टी है। इसलिए तुम्हारी सुविधा को देखते हुए माँ ने रजनी के ससुराल वालों को खाने पर बुलाया है। लंच का देख लेना जरा, और हाँ, माँ कह रही थी उसकी पहली तीज भी आने वाली है तो क्या देना करना है, वह सब भी माँ से पूछ कर निभा लेना। आखिर इकलौती बहिन है हमारी।” कहता हुआ वह पलट कर सो गया। कुछ ही पलों में उसके मध्यम खर्राटे कमरे की हवा में तैरने लगे।

वह जरा सा भी किसी बात का विरोध करे या अपनी कोई बात रखे तो उस पर मुँहज़ोरी करने का आरोप लग जाता था। उसके पिता-भाईयों को बुला लिया जाता था। शिकायतों के कसीदे पढ़ दिए जाते थे। ‘‘आप लोगों ने अपनी बेटी को यही संस्कार दिए हैं, बड़ों की बातें काटना, उनकी एक न सुनना ... हमारे यहाँ नहीं चलता ये सब ... हम ...”  न जाने कितने ही झूठे -सच्चे आरोप उसके मत्थे मढ़ दिए जाते थे। जब कभी उसने अपनी सफाई के एवज में थोड़ा मुँह खोलना चाहा, रजत का हाथ उठते देर नहीं लगती। वह अपमानित होती हैरानी से सोचती रह जाती थी। 'आखिर इस घर में उसका स्थान क्या है?'

अंतहीन सवाल उसके ज़हन में शोर करते रहतें थे। 'उसके बारे में कोई क्यों नहीं सोचता ? क्यों उसे कुछ बताया नहीं जाता? उसकी कोई राय क्यों नहीं ली जाती ? क्या वह इस घर की सदस्य नहीं है? क्या उसकी तरफ किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या उसे इस घर में कोई तकलीफ नहीं होती? इस घर में बेटी का सुख देखा जा सकता है तो क्या हम किसी की बेटी नहीं हैं? ऐसा कोई क्यों नहीं सोच पाता? बहू और बेटी में इतना बड़ा फर्क।' सोचते हुए उसकी आँखों के सामने आँसुओं की धुंध छाने लगती है ।

धीरे -धीरे अपने को और अपने हौसलों को समेट कर वह सहज हो गई। फिर वह और कुछ नहीं सोचना चाहती थी। कल उसकी सबसे प्रिय बचपन की सहेली का जन्मदिन है और उसने आने का वादा भी कर लिया था। परन्तु अब वह कैसे जाएगी? क्या कहेगी उससे, क्यों नहीं आ सकी? उसके अन्दर का समुद्र जो अक्सर हहराता हुआ घुमड़ता रहता था तब अपने पूरे वेग के साथ आँखों से बाहर बह निकला। जिसे नींद में बेसुध हो चुका रजत अन्य दिनों की ही तरह नहीं देख सका।

'आखिर ये सब वह कब तक सहेगी? उसका कभी कोई अस्तित्व होगा इस घर में। कभी तो उसे मात्र काम करने वाली के दर्जे से ऊपर घर का एक सदस्य समझा जाएगा। अभी उसके गृहस्थ जीवन की शुरुआत ही हुई है। आगे का रास्ता इस तरह तो नहीं कट सकेगा। कदापि नहीं। इस तरह तिरस्कृत और अपमानित होकर जीना अब उसे मंजूर नहीं। कमसकम वह अपनी ही नज़रों में क्यों गिरे। यूँ अत्याचार सहते हुए और अपने टूटे हुए आत्मविश्वास के साथ जीना अब उससे नहीं होगा। बहुत हुआ। उसके बर्दाश्त ही हदें पार हो चुकीं थीं। वह सर झुका कर बैठने वाली एक कमज़ोर औरत नहीं बनना चाहती। वह सर उठा कर हक से जीना चाहती है। प्रेम और सौहार्द्य के साथ रहना चाहती है।

माँ से पूछती हूँ तो वे फिर वही कहेंगी, 'नीशू औरत तो त्याग और धैर्य का ही दूसरा नाम है। सहन करना ही औरत का धर्म है ... वगैरह। ' नहीं माँ, अब मेरे से नहीं हो सकेगा यह सब। और अगर बेमन से, घुटन में जी कर, अवहेलना सह कर जीती हूँ तो यह औरों के साथ-साथ खुद मेरे अपने साथ भी अन्याय होगा। अपने साथ छलावा, अपने ऊपर अत्याचार। अब और नहीं। वह एक कठिन निर्णय लेती है।

'कल रजनी आ रही है। बड़े भाई साहब और भाभी भी होंगे। सभी परिवार वालों के साथ बात करनी ही होगी। निर्णय कुछ भी हो किन्तु जल्द ही कोई न कोई सही हल निकलना चाहिए। समय की अब यही मांग है। कल उसके जीवन की एक नई सुबह होगी।' सोचते हुए उसने करवट बदली और सुकून से आँखें बंद कर लीं। उसके मन का बोझ अब थोड़ा हल्का हो गया था।

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