सुधीर द्विवेदी की लघुकथाएं

सुधीर द्विवेदी 

जीने का सलीका

उसको देखकर लगता था जैसे उसे दुनिया-जहान की कोई फिकर ही नहीं है। बस अपनी ही धुन में मगन। तकरीबन सत्रह-अठारह बरस की रही होगी वह। दुबली-पतली साँवली-सी। पर उसकी असली सुन्दरता तो उसके अल्हड़पन में ही थी। वह एक चालीस-पैतालीस बरस के आदमी के साथ साइकिल पर आती थी। वह उसे अपार्टमेंट के गेट पर छोड़ जाता था।
इधर वह आदमी उसे छोड़ कर गली में गुम होता, उधर वह अपने चेहरे से गम्भीरता की चादर उतार फेंकती। फिर अपने खिलंदड़े अंदाज़ में अपार्टमेंट की पार्किंग में खेलते बच्चों के साथ धमाल मचाने में मगन हो जाती। उसका अंदाज़ अचानक तब बदलता, जब उस फ्लैट से उसकी पुकार होती जिसमें वह चौका-बर्तन करने आती थी।
“आई...” हड़बड़ा कर आवाज़ देते हुए वह तितली सी उड़ती और पार्किग पार करते हुए एक साथ कई सीढियाँ नापती हुई उस फ्लैट के अंदर गुम हो जाती।
उसे देखकर मिहिर अक्सर अपने अतीत में खो जाता।
कैसे उसके सारे सुनहरे सपने उसी पल बिखर गये थे, जब वाणी ने उसे फोन पर बताया कि उसकी शादी कहीं और तय हो गयी है, और चाह कर भी अब वह उससे कभी बात नहीं कर पाएगी।
उस दिन के बाद मिहिर को हंसना तो दूर किसी से बात तक करने का मन नहीं करता। उसे हर चीज़ से विरक्ति सी हो गयी थी। एक अरसा हो चला था, उसे अपनें मनपसन्द गिटार को स्पर्श किये हुए।
पर जब से वह लड़की सामने वाले फ्लैट में काम करने आने लगी थी तब से उसके अल्हड़पन ने मिहिर को बार-बार मुस्कुराने पर मजबूर कर किया था। मिहिर अब रोज़ाना उसका बेसब्री से इन्तज़ार किया करता।
आज, खेलते-खेलते जब बच्चों की गेंद मिहिर की बालकनी में आ गिरी तो वही लड़की गेंद वापस माँगने आई। मिहिर ने उसे करीब से देखा। देखने में सामान्य ही थी पर उसके चेहरे पर हमेशा खिली रहने वाली मुस्कान उसे दूसरों से अलग कर रही थी। उसे सामने खड़ा देख थोड़ा सकुचाते हुए मिहिर ने उससे पूछ ही लिया, "तुम इतना खुश कैसे रह लेती हो?"
थोड़ी देर तो वह चुप रही फिर अपने उसी अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोली, "बाबू जी! हँसते-मुस्कुराते जियो तो ज़िंदगी आसान हो जाती है।"
"अच्छा-अच्छा! देखो तुम्हारे बापू आज तुम्हें जल्दी लेने आ गए।" गेट के बाहर, उसका इन्तजार करते हुए उस आदमी की ओर इशारा करते हुए मिहिर ने कहा।
"धत... ये तो मेरा मरद है बापू नहीं। इसे पता है कि आज तनख्वाह मिली होगी मुझे, इसीलिए जल्दी..." कहते-कहते, मुस्कुराने की कोशिश में उसकी आँखें भर ही आईं। उसने फौरन गालों में ढुलक आये आंसुओं को पोंछ दिया। जाते-जाते वह पलटी और हौले से बोली, "बाबू जी जि़ंदगी खुद के मन-मुताबिक़ किसी की नहीं होती।" और फिर उसे ठगा-सा छोड़कर सीढियाँ उतर गई।
मिहिर न जाने और कितनी देर सोचता रहता कि तभी उसका मोबाइल घनघना उठा, "हैलो मैं! हाउ इज लाइफ़?"
उधर से जाना-पहचाना स्वर उभरा।
"झक्कास! बस्स...अभी-अभी कोई मुझे जीने का सलीका सिखा कर गया है।" कहते हुए मिहिर की उंगलियाँ थिरकीं और अरसे बाद गिटार के तार एक बार फिर झनझना उठे।

पुनर्चक्रण

"सुनिए!" 
पत्नी मेज़ पर चाय का प्याला रखते हुए बोली।
"हाँ बोलो!"
पति ने टी वी पर नजरें जमाये हुए जवाब दिया।
"आपने विकल के टोफेल-टेस्ट का रिपोर्ट कार्ड देखा?"
"हूँ..."
पति की नजरें अब भी टी वी पर ही जमी थीं।
"बिलकुल सुकेश की तरह ही होनहार है ना?"
"तो? दोनों में हमारा ही तो खून है।"
पति ने चाय का प्याला मुँह में लगाते हुए जवाब दिया।
"पर..."
पत्नी ने पति के बालों में हाथ फेरते हुए कहा।
"पर क्या?"
चाय का एक सिप लेकर कप, प्लेट में रखते हुए पति ने रिमोट से टी वी का चैनल बदलते हुए पूछा।
"कुछ नहीं..." कहते हुए पत्नी नें बिस्किट का पैकेट पति की ओर बढ़ा दिया।
"यार तुम भी न...अजीब हो! पेरेंट्स अपने बच्चों की सफ़लता पर जश्न मनाते हैं ,और एक तुम हो जो मूड बिगाड़ कर बैठी हो। "
पति ने उसका हाथ अपनें हाथ में समेटते हुए कहा।
"हाँ, वो तो है, पर कहीं सुकेश की तरह ये भी हमें अकेला छोड़ विदेश तो नहीं चला जाएगा?" पत्नी के माथे की लकीरें गहरी हो चली थीं।
"माँ-बाप अपनें बच्चों को इसीलिए तो पढ़ाते-लिखाते है कि वे जिंदगी में आगे बढ़ें, खुद के पैरों पर खड़े हों। हम भी तो आये थे अपने माँ-बाप को छोड़कर..."
पति ने एक गहरी साँस लेते हुए, पत्नी को समझाते हुए कहा।
"वो तो ठीक है पर ..." कहते-कहते पत्नी की आँखों की कोरें गीली हो आईं।
"पर क्या? अगर ये भी विदेश चला गया तो हम वापस चलेंगे... अपनें गाँव। अपने माँ-बाप के पास। एक बार फ़िर से उनके बच्चे बनकर..." पति, पत्नी को अपनी बाहों में समेटते हुए बोला।

आखिर किस पर गया है?

बरसों से मन में पलते ख्वाब आज़ हक़ीक़त का चोला पहन उसकी बूढ़ी आँखों के बिलकुल सामने थे। उसका अपना बेटा आई.आई.टी. के दीक्षान्त समारोह में गले में गोल्ड मेडल लटकाये तेज़ कदमों से उसकी तरफ़ बढ़ता चला आ रहा था। 
रह-रह कर उसे नर्स के कहे शब्द याद आ रहे थे। नर्स ने रुई के फाहे सा नन्हा शिशु उसकी गोदी में थमाते हुए कहा था, "बिलकुल अपनी माँ पर गया है!" 
"नहीँ!" नर्स की बात पर तुनक उठा था वह। ... नहीं, मेरा बेटा मुझ जैसा बनेगा। सोचते हुए उसका चेहरा सख्त हो गया था।
तब से आज तक जब भी वह किसी से भी बेटे का परिचय कराता तो पूछना नहीं भूलता, "बिलकुल मुझ पर ही गया है ना?" लोग अक्सर मुस्कुराते हुए सहमति में सिर हिला देते। वह एक भँव चढ़ा कर पत्नी की तरफ देखता और पत्नी अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लेती।
उसने देखा, बेटा उसी विदेशी कम्पनी के एच.आर. हेड से बात रहा था जिस कम्पनी ने अपने लन्दन स्थित हेड-आफिस के टेक्निकल हेड के पद के लिए उसके बेटे को चुना था। बातचीत करने के हाव-भाव तो मेरे जैसे ही हैं। सोचते हुए उसकी मुस्कान फिर एक बार और चौड़ी हो गयी। 
पर यादें थी कि एक के बाद एक उसके दिमाग़ में दस्तक दिए जा रहीं थी। उसे याद है कि कैसे पिता जी की बीमारी की सूचना पाने के बावज़ूद भी वह अपनीं जमी-जमाई नौकरी छोड़ भारत नहीं आना चाहता था? पर पत्नी थी कि ज़िद पकड़ कर बैठ गयी थी,तब कहीं बड़ी मुश्किल से वह राज़ी हुआ था। 
"हुँह! भला ये कैसे समझेगी कैरियर की इम्पॉर्टेन्स?" उसने सिर झटकते हुए पत्नी की तरफ़ देखा। पत्नी मुँह में पल्लू दबाये अपलक बेटे को निहार रही थी।
पर न जाने क्यों अब उसे एक अजीब से डर ने घेरना शुरू कर दिया था। बुढ़ापा, ऊपर से लकवाग्रस्त, कैसे रहेगा बेटे के बिना?
बेटा अब उसकी तरफ ही बढ़ा चला आ रहा था। 
"नहीं! मैं अपनी इस हालत को अपने बेटे की प्रगति में रोड़ा नहीं बनने दूँगा।" सोचते हुए उसने व्हील-चेयर के हत्थे को कस कर थाम लिया। 
"डैड! मैंने कंपनी वालों से बात कर ली है वे मुझे दिल्ली में ही पोस्टिंग देने को तैयार हैं। मैं आपको ऐसी हालत में छोड़ कर नहीं जा सकता।" कहते हुए बेटे ने उसका सिर अपनी दोनों हथेलियों में भरते हुए माथा चूम लिया। 
बेटे के गले का मेडल उसकी आँखों के सामने झूल रहा था। उसने देखा कि मेडल में उसका ही अक्स दिख रहा है। दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए उसने अपना चेहरा दाएं-बाएं किया। …वही बेबसी, वही लाचारी। जैसे वर्षों पहले उसके विदेश जाते समय उसके पिता जी के चेहरे पर थी। उसके माथे की सलवटें और गहरी हो गयीं। पसीना छलछला आया।
"क्या हुआ जी?" पास खड़ी हुई पत्नी परेशान होते हुए बोली। 
"कुछ नहीं नर्स ने सही कहा था। बिलकुल तुम पर ही गया है हमारा बेटा।" कहते हुए वह मुस्कुरा दिया।

ढीठ 

जब से अम्मा सिधारी थीं, बाबू जी ने भीतर आना ही छोड़ दिया था। जब तक अम्मा थीं तो वह उनकी हर जरूरत का ध्यान रखतीं, पर उनके सिधारने के बाद बाबू जी ने अपनी भावनाओं के साथ-साथ मानो अपनीं इन्द्रियों पर भी नियंत्रण कर लिया था। बाबू जी के बोल शाम को खेतों से पुतई और बिशन के वापस आने पर ही सुनाई देते।
दोनों बहुएँ बड़ी बुआजी के कायदेदारी से परिचित थीं सो किसी की हिम्मत भी न पड़ती थी कि उनसे कुछ पूछ सकें। पर नई-नई ब्याह कर आयी छोटी बहू बाबू जी का विशेष ध्यान रखती। वह अक्सर बाबू जी से उनका हाल-चाल पूछ लेती। बाबू जी बिना कुछ कहे संकोचवश चुपचाप दूसरी तरफ चल देते।
छोटी बहू का उनसे यूँ बोलना-चालना बुआ जी को बिलकुल न सुहाता। "बेशरम! ढीठ!" और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाते हुए उनका सरौता और तेज़ी से सुपाड़ी के टुकड़े करने लगता।
पुतई और बिशन को मुकदमे के सिलसिले में शहर जाना पड़ गया था सो आज शाम को भी बाबू जी के बोल न सुनाई दिए। रात में बड़ी बहू ने खाने की थाली उनकी चारपाई के बगल में रखते हुए जब कुण्डी जोर से खड़कायी तो भी बाबू जी न उठे न कोई हलचल की।
बड़ी बहू की जब हिम्मत न हुई तो वह फौरन बुआ जी को बुलाने जा पहुँची। बुआजी जाप करने में व्यस्त थी। घबराहट में उसे जब कुछ न सूझा तो वह छोटी बहू को बुला लाई। बाबू जी पसीने से लथपथ थे। अधखुली आँखें दर्द के कारण लाल हो रहीं थीं। छोटी बहू ने आव देखा न ताव फौरन उनका सिर गोद में रख उनका सीना मलने लगी। उसे देख अब बड़ी बहू की भी हिम्मत बंध गयी, उसने भी फौरन बाबू जी को हाथ से सहारा देते हुए सीधा लिटा दिया।
बाबू जी की उखड़ी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो चली थीं।
"क्यों री अब का होवेगा जो बुआ जी को पता चला तो?" बड़ी बहू परेशान होते हुए इधर-उधर देखते हुए बोली।
"जो अपना सुख-दुःख न कह सके अपने.., अपनों से कोई! तो ऐसा पर्दा कौन काम का? पर्दा नजर से होवे है अनबोला होने से नाहीं।" छोटी बहू बाबू जी का सिर दबाते हुए बोल उठी।
अब तक दरवाजे पर खड़ी, उनकी बातें सुन रहीं बुआजी मन ही मन बुदबुदाईं, "ढीठ कहीं की..." और मुस्कुराते हुए बिना आहट किये धोती के पल्लू से आँखों की गीली हो आई कोरें मसलती हुईं, वापस पलट पड़ीं।

हाँ, यह प्रायश्चित है

आज उसने जनता दरबार रद्द करने का मन बना लिया था। फिर भी खाना-पूरी करने के लिए उसने लिस्ट पर एक सरसरी निगाह दौड़ाई। 
"अरे! ये तो मेरे ही गाँव के हैं..." एक नाम के नीचे लिखे पते को देखते हुए वह बुदबुदा उठा। खुद ही बाहर निकल उसने आवाज़ लगाई, "रामनिवास कौन है?" 
एक बूढ़ा व्यक्ति उठ खड़ा हुआ। 
"बाबा आप उस्मानगंज से?" उस बूढ़े ने हाथ जोड़ते हुए सहमति में सर हिला दिया। 
"आइये" उसने बड़े प्यार से उस बूढ़े के एक हाथ को अपने कन्धे पर रखा और दफ्तर के अंदर ले आया। तब तक चपरासी भी गिलास में ठण्डा पानी ले आया। 
"बाबा! आप फ्रिज का पानी पी लेंगे?" 
बूढ़े की असहमति देख, "मैं जानता था।" कहते हुए वह स्वयं दौड़ कर गया और घड़े का पानी ले आया। 
"आपको कैसे पता साहब?" वृद्ध गिलास को मुँह में लगाते हुए बोल उठा।
"मेरे पिता जी भी ज्यादा ठण्डा पानी नहीं पी पाते थे।" कहते-कहते उसकी आवाज भर्राने लगी थी। उसने मुँह फेर कर चश्मे के पीछे झाँकते आँसुओं को उँगलियों से आँखों में ही मसल दिया।
नए-नए भर्ती हुए छोटे बाबू से रहा न गया। बगल में बैठे बड़े बाबू को कुहनी मारते हुए उसने पूछा, "ये साहब का कोई सगे-वाला है क्या?"
"नहीं रे! जब भी साहब के गाँव का कोई बुजुर्ग व्यक्ति मिलने आ जाता है, तो साहब इसी तरह बौरा जाते हैं। खुद के पिता कितने दिन बीमार पड़े रहे पर साहब ने उनसे मिलने तक की जहमत नही उठाई। बिचारे बेटे से आखिरी बार मिलने की तड़प लिए दुनिया से विदा हो गए। अब ये सब" बड़े बाबू ने मुँह बिचकाते हुए कनखियों से देखा तो उसे अपनी ओर आता देख उसकी उंगलियाँ फिर से फुल-स्पीड टाइपराइटर पर दौड़ने लगीं।
"कहीं प्रायश्चित?" छोटा बाबू भी कहते-कहते रुक गया था।
वह तेजी से उनके पास गुजरा और सामने वाशरूम में घुस कर उसने चिटकनी चढ़ा ली। उन दोनों के शब्द टाइपराइटर की चटर-चटर करती कुंजियों की तरह उसके दिमाग में बज रहे थे। दरवाजे पर पीठ के बल निढाल टिका वह सिसक उठा, "बाबा कैसे आता मैं, आपने तो कहा था गैर बिरादरी में ब्याह करके सदा के लिए मर गया तू हमारे लिए।"
‘‘हां यह प्रायश्चित है पर मेरा नहीं बाबा का’’ बाहर निकलते हुए वह जोर से बड़बड़ाया।

जाहिल 

उसे बहुत उलझन होती है उस माहौल में,पर मज़बूरी थी जो उसकी पत्नी के सगे चाचा जी भर्ती थे वहाँ। नई-नई रिश्तेदारी थी और ऊपर से कहीं घर में कोहराम न मच जाए, बस इसी कारण वह आया था यहाँ वरना भगवान बचाये ऐसी जगह से। मन ही मन ईश्वर को प्रणाम करते हुए ,हिम्मत बाँध कर वह अस्पताल आ पहुँचा। 
अस्पताल में घुसते ही दवाइयों के एक जबरदस्त भभके से उसे उबकाई आ गई। उसने फौरन रुमाल से अपने नथुने ढँक लिए।
'वैसे तो बड़े धन्नासेठ बने फिरते हैं, और भर्ती कर दिया बुढ़ऊ को इस अस्पताल में।' मन ही मन कुढ़ते हुए वह जनरल वार्ड में घुस आया। चाचा जी अभी बेहोश ही थे और उनका बेटा और उसकी पत्नी बगल में परेशान बैठे हुए थे। उसे देखते ही वे दोनों बुक्का फाड़ कर रो दिए।  
उसनें बड़ी मुश्किल से उन्हें सम्भाला फ़िर उनके बगल में पड़े स्टूल पर बैठ गया। धीरे-धीरे वे दोनों अब शांत हो चले थे। दवा-इलाज़ के बारे में पूछते हुए कई दफ़ा मन में तो आया कि पूछे  कि किसी हाईटेक अस्पताल की बजाय इस अस्पताल में क्यों? पर इन जाहिलों को क्या समझाए? यही सोच कर वह खामोश रहा। समय बीतने के साथ अब उसे ऊबन होने लगी। उसनें मन बहलाने के लिए इधर-उधर ताका। 
बगल के बेड के मरीज़ से मिलने एक देहाती सा युवक आया हुआ था और मरीज के साथ आये हुए तीमारदारों की बात-चीत से वह फौरन समझ गया कि युवक, मरीज का दामाद है। 
'लगता है यह अस्पताल जाहिलों के लिए ही बना है।' मुँह बिचकाते हुए उसनें घड़ी देखी। साढ़े चार बज रहे थे।
उसनें देर होने का बहाना बना कर वहाँ से जान छुड़ाई फ़िर तेज़ कदमो से बाहर निकल आया। इधर-उधर देखने पर पास के नुक्कड़ पर ही उसे, चाय की दुकान दिख गयी। वह उधर ही बढ़ गया। 
एक कटिंग चाय का ऑर्डर दे, वह अखबार पलटने लगा पर दिमाग़ तो अभी तक वहीं उलझा हुआ था। 'कोई दुनियादारी का लिहाज़ नही है इन लोगों में। घर का दामाद पहली बार मिला और चाय तक को नहीं पूछा इन लोगों ने।'

"ज़ाहिल कहीं के!" चाय का हुंडा होठों से लगाते हुए वह भुनभुनाया।  
तब तक वही देहाती युवक वहीं आ पहुँचा और चाय वाले से बोला "अरे भाई! जरा दो स्पेशल चाय  पैक कर देना, और सुनो! साथ में वो मीठे-नमकीन बिस्किट के दो पैकेट भी दे देना। क्या पता? उन लोगों ने कुछ खाया-पिया होगा भी नही।" 
उस युवक के चेहरे को घूरते हुए उसनें चाय का हुंडा ज्यूँ ही दोबारा होठो में लगाया तो गर्म चाय होंठो से छू जाने से वह तिलमिला उठा। 

उलझन

सरकारी नलके पर खड़ी मीना की नजर बार बार सामने की दूकान में लगी घड़ी पर जा टिकती थी। घड़ी की सुइयाँ नौ बजा चुकी थी। पानी भरने के लिए लगी लाइन में दस औरतों के पीछे लगी अपनी बहू को देख उसकी उलझन समय के साथ बढ़ती जा रही थी।
'दस बजने वाले है बबुआ के दफ्तर जाने का समय हो रहा है और बहू की बारी आने में अभी देर लगेगी बगैर पानी खाना कैसे बनाएगी बहू।'
'हुँह मैं अकारण ही परेशान हो रही हूँ। बबुआ ने भी तो बंटवारे के लिए हुए झगड़े में बहू का ही साथ दिया था।' अपने को दृढ़ करने की एक बार फिर कोशिश की मीना ने। 
कुछ ही पल बीते थे कि नजर फिर घड़ी पर जा टिकी। घड़ी की सुइयाँ भी मीना की सोच के साथ तेजी से दौड़ रही थी।
'साढ़े नौ, हे भगवान! बबुआ भूखा कैसे जाएगा दफ्तर?' पल भर में मीना की सोच पलटा खा गयी।
"ओ बहू..." मीना ने हिचकते हुए बहू को आवाज दी।
"अब क्या है?" बहू खिसियाती हुई बोली।
"सुन तू मेरी जगह लग जा यहाँ बैठने की जगह नही है। पीछे कम से कम बैठ तो जाउंगी। टाँगे दर्द करने लगी है खड़े खड़े।"
"ठीक है ठीक है" कहते हुए बहू ने स्थान की अदला बदली कर ली।
घड़ी की सुइयों ने मानो अब अपनी रफ़्तार सुस्त कर ली थी।

सावन

बेटी ससुराल से आती तो अम्मा का स्वभाव ही बदल जाता। बेटी यदि एक गिलास पानी भी अपने हाथ से ले लेती, तो घर में भूचाल आ जाता। 'जल्ली ,कामचोर' न जाने और कितने ही विशेषणों से नई नवेली बहू को नवाज दिया जाता। 
"ससुराल में तो बिचारी खटराग में फ़ंसी ही रहती है मायके में भी सुख न मिले तो बेकार है।" बेटी के पक्ष में अम्मा का झंडा सदैव बुलन्द रहता। लेकिन बहू अम्मा की बात अनसुनी कर काम में व्यस्त रहती। 
पहले सावन पर बहू को मायके गए दो दिन ही बीते थे कि अम्मा मन्दिर की सीढ़ियों से फिसल गयीं। शाम होते-होते चोट के कारण चलना दूभर हो गया। मन ही मन बहू पर कुढ़ते हुए उन्होंने बेटी को बुलाने के लिए फोन मिलाया। 
"अम्मा इनको आफिस से छुट्टी नहीं मिल रही और ऊपर से ये बरसात... आना मुश्किल है" बेटी फोन पर अपनी मजबूरी जता रही थी।
"कोई बात नहीं बिटिया" कहते हुए अम्मा ने बुझे मन से फोन काट दिया। सोच रही थी कि क्याा करूं तभी दो दिन से खामोश तोते को "जल्ली जल्ली" रटते हुए सुन चौंक उठी। "ये पट्टू भी न..." बहू भुनभुनाते हुए घर में प्रवेश कर रही थी। 
"भला हो मालती काकी का जो फोन करके बता दिया हमें, नहीं तो ... बहू और बेटी में यही तो फर्क होवे है।" चोट में दवा मलते हुए बहू बड़बड़ाती जा रही थी। 
"फर्क तो होवे है बहू बेटी में..." कहते हुए अम्मा ने बहू के सर पर स्नेह से हाथ रख दिया। 
सावन अब अम्मा की आँखों से बरस रहा था।