रामकुमार आत्रेय की लघुकथाएँ

रामकुमार आत्रेय

फुरसत

दो बूढ़े व्यक्ति एक स्थान पर मिले। शीघ्र ही एक दूसरे का परिचय लिया-दिया। परिवार की बात चली तो पहले ने भाव विह्वल होते हुए कहा, “भाई साहब, एक ही बेटा है मेरा। पैसा कमाने के लिए जर्मनी गया हुआ है। वह इतना व्यस्त है कि उसे यहाँ आने की फुरसत ही नहीं मिलती। कहता है, जल्दी लौटने से वहाँं की नागरिकता पाने में कठिनाई आयेगी। चार महीने पहले उसकी माँ गुजरी तब भी वह नहीं आ पाया। मैं तो तरस गया हूँ भाई, बेटे की शक्ल देखने के लिए।”

कहते-कहते बूढ़ा व्यक्ति रो पड़ा था।

“दुखी मत होवो, भाई। स्थिति लगभग मेरे साथ भी ऐसी ही है। बेटा मेरा भी एक ही है। उसे भी मुझे से मिलने की फुरसत ही नहीं मिलती।” दूसरे बूढ़े ने पहले को ढाढ़स बंधाते हुए कहा था।

“किस देश में गया है तुम्हारा बेटा?” अपनी आँखें पोंछते हुए उसने दूसरे बूढ़े से पूछा था।

“वह यहीं रहता है मेरे पास। फर्क इतना है कि वह ऊपर की मंजिल में रहता है और मैं नीचे। ऊपर से उतरकर सीधे दफ्तर चला जाता है और लौटकर सीधे ऊपर। साल से ऊपर हो गया है मुझे उसकी शक्ल देखे हुए।”
इस बार फूट-फूटकर रोने की बारी उस बूढे़ की थी।

दो कोणों वाला त्रिभुज

ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक स्थिति के विषय का एक शोधार्थी गली के मुहाने पर स्थित जिस घर पर पहुँचा, उसके दरवाजे पर एक बुढिया बैठी थी जो रोये जा रही थी। शोधार्थी ने बुढिया से विनम्रतापूर्वक पूछा, “माता जी, क्या बात है? आप रो क्यों रही हैं?”

“बेटा, उधर देख, अन्दर जो साँपिन बैठी है न ...” उसने घर के खुले किवाडों के भीतर की ओर संकेत करते हुए कहा, “वह मेरे बेटे की बहू है। वही मुझे जीने नहीं दे रही है!” बुढिया अब भी आंखों से बहते आसुंओं को बार-बार पोंछे जा रही थी।

“आप अपने बेटे से क्यों नहीं कहती? वह अपनी बहू को समझा देगा। इस तरह रोने झगड़ने से कोई फायदा ही नहीं।” शोधार्थी ने बुढियों को परामर्श दिया।

“बेटा रे, अब तो बेटा भी बहू का ही हो गया है... वह भी मेरा नहीं रहा रे।” बुढिया ने ऐसा कहते हुए फिर से रोना शुरू कर दिया।

शोधार्थी को लगा कि बुढिया के साथ सचमुच में ही अन्याय हो रहा है। वह भीतर घुसा। वहां एक जवान महिला चूल्हे पर खाना पका रही थी। शोधार्थी ने देखा कि वह भी चुपचाप रोये जा रही है। उसे अपनी ओर देखता पाकर महिला ने अपना पल्लू थोडा नीचे खिसका लिया। उसने महिला से भी वही सवाल किया, “क्या बात है? आप रो  क्यों रही हैं?

“साहब जी, उधर देखिए, वह जो  बुढिया है न,” उसने बाहर की ओर संकेत करते हुए कहा, “वह पक्की डायन है, वही मुझे जीने नहीं दे रही है!”

औरत ने ऐसा कहते हुए ऊँची आवाज में रोना शुरू कर दिया था।

शोधार्थी सकपका गया। उसे लगा कि जवान महिला भी  ठीक ही कह  रही होगी। उसके मुँह से निकल गया,
“आप अपने पति को क्यों नहीं कहती?” वह बुढिया को समझा देगा।

“पति अब मेरा नही रहा, वह भी अब तो मां का हो गया है!” महिला ने ऐसा कहते-कहते फिर से रोना शुरू कर दिया।

शोधार्थी ने देखा कि उसके सामने एक ऐसी त्रिभुज मौजूद थी, जिसका तीसरा कोण जाने कहाँ खो गया था!