ज़ुबान - निबंध

वागीशा शर्मा

उस दिन तो भई, कमाल ही हो गया। सारी हदें पार हो गईं। ऑफिस में बॉस का गुस्सा देखने लायक था। कागज फटे, फाइलें फटीं , गिलास फूटे – वगैरह वगैरह। पूरी तरह भूल गए बॉस, कि क्या कह रहे हैं, क्यों कह रहे हैं, किसके लिए कह रहे हैं। सभी सुनने वाले हैरान! हतप्रभ जिज्ञासा भी, कुछ कहने के इरादे से, बॉस के विषैले वक्तव्य में अल्पविराम खोजतीं रहीं, पर बॉस के वाग्बाणों की बरसात सावन की झरी के समान निरन्तर बनी ही रही। क्रोध संवर्धन के रसायनों का ऐसा जबर्दस्त उबाल, हमें काफी अनूठा लगा। वहाँ मौजूद मूक दर्शक दीर्घा में से एक से हमने भी, अचरज भरे अंदाज़ में, पूछ ही डाला कि ये सब क्या हो रहा है? बताया गया कि यह तो रोज़ का ही प्रोग्राम है। सिर्फ सुनने वाले पात्र बदलते रहते हैं। इनकी ज़ुबान तो इतनी ही कड़वी है। पर आज की पात्रा ‘जिज्ञासा’ हैं, इससे हम सभी संस्थाकर्मी काफ़ी अचंभित हैं! जिज्ञासा, जिनकी कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण, ईमानदारी और सक्षमता की कसमें उठाई जा सकती हैं, जिनके सौम्य और सौहार्द भरे व्यक्तित्व के सभी संस्थाकर्मी क़ायल हैं, और जो संस्था के आधारभूत स्तंभों में से एक मानी जाती रही हैं, उनके लिए इन शब्दों का प्रयोग काफी विस्मयकारी भी है और अनुचित भी।

मन उद्विग्न हो उठा। क्रोध एक मानवीय दुर्बलता है, बद्सूरत श्राप है। क्रोध वास्तव में गुस्से और अहंकार का मिश्रित रूप है। मनोवैज्ञानिकों ने इस क्रोध के अनेक प्रकार गिनाए हैं जिन्हें मुख्यतः दो भागों में देखा जा सकता हैं – सकारात्मक और नकारात्मक। सकारात्मक क्रोध तो कभी-कभी किसी व्यक्ति को प्रेरित करने के उद्देश्य से दिलवाया भी जाता है। पर नकारात्मक क्रोध, जो अधिकतर अहंकार युक्त होने के भयंकर रूप धारण कर लेता है, उसको नियंत्रित करना अत्यावश्यक है। इस प्रकार के क्रोध का जितना प्रभाव सुनने वाले पर पड़ता है उससे कहीं अधिक क्रोध करने वाले पर होता है।

ऑफिस के इस तनाव भरे माहौल को थोड़ा हल्का करने के इरादे से, रुख़ पलटते हुए हमने कहा, “भई, इसमें ज़ुबान का क्या दोष? हमें तो यह दिमागी असंतुलन नज़र आता है”। वास्तव में बेचारी ज़ुबान तो किसी के भी विचारों की गुलाम है, जो कहलवाओगे, वही कहेगी। और फिर शब्दोच्चारण का जिम्मा केवल और केवल जिह्वा का ही तो नहीं है,  कितने ही वर्णों के उच्चारण के लिए तो तालु, दाँत और प्राण-वायु का भी प्रयोग होता है, उन्हें तो कोई दोष नहीं देता! हमारी यही सोच हमारे इस रचनात्मक लेख के लिए प्रेरणा बनी।

माना ये भी जा सकता है कि यहाँ ज़ुबान, बोली या भाषा का पर्याय है। उर्दू-मिश्रित हिन्दी बोलने वालों में यह एक लोकप्रिय शब्द है, तो भी, ज़ुबान यानी भाषा का इतना कड़वा होना न्यायसंगत नहीं है। भाषा चाहे कोई भी हो, उच्चारण से उठने वाली ध्वनियाँ वही हैं जो साक्षात माहेश्वर के डमरू से निकली हैं और वही वर्ण माने गए हैं। तो ऐसी दिव्य ध्वनियों का प्रयोग किसी को भी बुरा-भला कहने में क्यों प्रयुक्त किया जाए। क्योंकि इन बोलीयों के लिए भी ‘ज़ुबान’ शब्द का प्रयोग इसीलिए किया जाता है क्योंकि इनके उच्चारण के लिए ज़ुबान का ही प्रयोग होता दिखाई पड़ता है।

जब ईश्वर ने अपनी मानस सृष्टि में मानव शरीर की कल्पना की होगी तो सभी अंग-प्रत्यंग बहुत सूझ-बूझ के साथ बनाए और उन्हें बेहद महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त कर दिया। तदनुरूप ही उनकी संरचनाएँ बनाईं गईं। जैसे पैरों के तलवे तो काफी सख़्त बनाए पर हाथों के मुलायम, खोपड़ी को अत्यन्त कठोर बना कर उसमें अतिसंवेदनशील और नाज़ुक मस्तिष्क को सहेज कर रख दिया। शारीरिक बनावट के अनुपात में ग्रीवा (गर्दन) को मोटा, पतला, लम्बा, छोटा आकार दिया, वगैरह वगैरह। इस हाड़-माँस के पुतले में ना तो कोई अंग व्यर्थ स्थान घेरे है और ना ही कोई अकर्मण्य है।

इसी कड़ी में इंसानी ज़ुबान या यूँ कहें जिह्वा का भी निर्माण हो गया - बेहद चिपचिपे, दानेदार और निहायत ही लचीले रूप में, ताकि बोलने और खाने जैसी अत्यन्त आवश्यक प्रक्रियाओं में प्यारे मनुष्यों  को कोई परेशानी न होने पाये। महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रिय का दर्ज़ा प्राप्त इस लचीली को पैने और नुकीले दांतों से भारी गुफ़ा में छिपा कर रखा गया। बावजूद इसके, बेहद जांबाज़ सिपाही के तरह ये अक्सर दंतावली के आघातों से बची ही रहती है। कितनी उच्चकोटि की रणनीतिज्ञ है यह जिह्वा! कर्मठता में इसका कोई सानी नहीं है, क्योंकि एक दिन में आप कितना भी खाओ, कितनी बार भी खाओ, मजाल इसकी कि ये अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए। हर बार, उतनी ही निष्ठा और समर्पण से, खाने वाले को रसास्वाद का एहसास कराने में जुट जाती है। बोलने के लिए भी कोई कहाँ पूछता है इस बेचारी से कि अगर तुम थक गयी हो या ऊब गयी हो तो आज या अब हम बोलने की छुट्टी कर लें, या कम बोलें, या मौन व्रत धारण कर लें।

इतनी उपयोगी, लेकिन उतनी ही पराधीन, निस्सहाय जिह्वा पर कटु शब्दों को बोलने का संगीन इल्ज़ाम - राम-राम, ये तो घोर अन्याय हुआ। इसके अतीव लचीलेपन का गलत इस्तेमाल कोई और करे, तथा दोषी मानी जाए ये लाचार ज़ुबान - यह तो हमें गवारा नहीं है। जो शब्द, इंसानी खुराफाती मस्तिष्क ने इसे दे दिये, ये तो उन्हीं शब्दों को, ज्यों का त्यों, दुनिया को सुना देती है। वास्तव में तो यह कर्तव्यनिष्ठा के पुरस्कार की प्रबल हक़दार है। पर हम तो देतें हैं इसे, सिर्फ और सिर्फ इल्ज़ाम और इल्ज़ाम! काश, इसकी व्यथा को कोई तो समझ पाता! पर तुम चिंता न करो बहन, आज हम तुम्हारे हक के लिए आवाज़ उठाए खड़े हैं। पूरी शिद्दत से तुम्हारी वकालत करेंगे और दुनिया को समझा कर ही दम लेंगे की ये ज़ुबान ‘बेक़सूर’ है। किसी के भी द्वारा कहे गए शब्दों का सम्बन्ध जिह्वा यानि ‘ज़ुबान’ नामक इंसानी अंग से बिलकुल नहीं है, वह तो केवल एक माध्यम है।

खुदा के रहमोकरम से जिह्वा तो सभी जीवों को मिली ही है। अब उसका कौन कैसा प्रयोग करता है, यह हर जीवात्मा की बिलकुल निजी पसन्द है। जानवर और कीड़े-मकौड़े अपनी इसी गुणी जीभ के चलते शिकार करते हैं और खाते हैं। छोटे-बड़े बच्चे इसे बाहर निकाल कर एक दूसरे को चिड़ाने में भी इसका इस्तेमाल करते पाये गए हैं। मानव रूपी जीव इसकी सहायता से ईश्वरोपासना भी कर सकता है, रसास्वादन भी कर सकता है, और तो और निकृष्टतम गालियाँ देने में भी इसी का सहयोग लेता है। जिज्ञासा के बॉस ने भी तो विषैले वाग्बाणों की बारिश में इसी का भरपूर उपयोग किया था। गुरु, अभिभावक और सज्जनवृंद सभी सही मार्ग दिखा सकते हैं, पर उस पर चलने की जिम्मेवारी हर इंसान की वैयक्तिक इच्छा है। बचपन में एक कविता पढ़ी थी:
लड़को जब अपना मुँह खोलो तुम भी मीठी बोली बोलो।
इस से कितने सुख पाओगे सबके प्यारे बन जाओगे ॥

(‘लड़को’ शब्द के प्रयोग के लिए कवि को लिङ्गभेद के आरोपों में न घेरते हुए) हम जैसे बहुतों ने इस कविता को पढ़ा, समझा और पाठ्यक्रम में पढ़ाए गए इस साधारण से शब्द-गुल्म को अपने जीवन में उतारा । पर अन्य बहुत ऐसे होंगे जिन्होने यह कविता, या तो कभी पढ़ी ही नहीं, या इसका भावार्थ कभी समझ नहीं पाये, या फिर समझ कर भी जीवन में उतरना आवश्यक  नहीं माना । इसीलिए रोडरेज, मारपीट, रेप जैसी, बदले की भावना से भारी घटनाओं का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा । मानसिक विकृतियों के चलते अनाप-शनाप बोलने, गाली-गलौच करने से कोई पीछे हटने को तैयार नहीं है। पक्ष-विपक्ष आपस में लड़ते-उलझते थकते नहीं हैं। हिन्दी व्याकरण के प्राध्यापक शब्द-शक्ति से हमारा परिचय कराते-कराते थक गए हैं पर हमें तो अभिधा शक्ति इतनी पसन्द है कि लक्षणा और व्यंजना को तो हम भूल ही गए हैं। ख़ैर, इन सब कहने-सुनने में, क्योंकि सामने लहराती, इठलाती और बलखती हुई तो जिह्वा/ ज़ुबान ही दिखाई पड़ती है इसीलिए यह इल्ज़ामों में बराबर घिरी रहती है।

बच्चा जब पहली-पहली बार बोलना शुरू करता है तो माता-पिता मिठाइयाँ बाँटते हैं कि उनका बच्चा अपंग नहीं है, और उसकी जिह्वा सही कार्य कर रही है। यदि दुर्भाग्यवश कोई बच्चा बोल नहीं पाया अर्थात वह दिव्याङ्ग की श्रेणी में रखा गया तो उसके और उसके अभिभावकों का जीवन-संघर्ष उसी दिन से आरम्भ हो जाता है। इसीलिए कभी–कभी इसकी मौजूदगी का एहसास हमें ईश्वर के प्रति धन्यवाद करने को भी मजबूर कर देता है। तो जीभ की मौजूदगी और सही सलामत होने की खुशी, कम से कम जीवन के कुछेक पलों में तो इसके   प्रति आभार प्रकट करने के लिए मानव को बाध्य कर ही देती है।

शारीरिक क्रियाकलापों के वितरण के समय ज़ुबान को तो दोहरी ज़िम्मेवारी दी गई – रसास्वादन और वाचन। वागेश्वरी ने इस रसीली और लचीली जिह्वा को जब अपनी सेवा में नियुक्त पाया होगा तो कभी न सोचा होगा की उसकी अनमोल लचीली, रसीली को कभी कोई कटीली का नाम भी दे देगा। विषैला तो सोचे इंसानी मस्तिष्क, और रोष का पात्र बने हमारी रसीली, तौबा-तौबा !

आर्ष ग्रन्थों की मानें तो वाणी के चार प्रकार होते हैं – परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी। जब हम कुछ बोलना चाहते हैं तो सबसे पहले मस्तिष्क में विचार उठता है, तब शब्द नहीं होते, केवल विचार होता है। इसे ही ‘पश्यंती’ कहा गया क्योंकि तब विचार का केवल मानसिक रूप आप देख पा रहे हैं। इस विचार को जब, मन ही मन में, शब्दों में ढाल लिया गया तब इन शब्दों में कोई ध्वनि नहीं है, उस समय इसे ‘मध्यमा’ कहा गया, क्योंकि यह बोलने और विचारों के बीच की कड़ी है। अब आपने अपने इन्हीं विचारों को ध्वन्यात्मक शब्दों  के रूप में कह दिया – तो यह है ‘वैखरी’। रही बात ‘परा’ की, तो वह साधकों का ईश्वर से होने वाला वार्तालाप माना जा सकता है। अतः इस जिह्वा का काम सिर्फ वैखरी तक ही तो सीमित हुआ! तब अपशब्दों के लिए मस्तिष्क ज़िम्मेवार हुआ, जिह्वा तो नहीं। अब तो मामला साफ हो गया कि ज़ुबान से ध्वन्यात्मक शब्द निकलने से पहले पश्यंती और मध्यमा, दोनों ही रूपों मे, शब्दों पर व्यक्ति का अपना ही अधिकार होता है । अतः कटुता ज़ुबान में नहीं मस्तिष्क में होती है। कहा गया है – पहले तोलो, फिर बोलो। यह ‘तोलना’ ही तो ‘मध्यमा’ पर लगाम कसने जैसा है।

कभी-कभी क्रोध में व्यक्ति इतना असंतुलित हो जाता है कि उसकी ज़ुबान लड़खड़ा जाती है। यानि मस्तिष्क जिह्वा को नियंत्रित करने में नाकामयाब हो जाता है। तो क्या उस समय भी आप यही कहेंगे की जिह्वा कटु है? नकारात्मक भावों से हमारा दिमाग इतना प्रभावित हो जाता है की हम सही और गलत का अंतर ही नहीं कर पाते और अपने अंतरंग मित्रों और सक्षम सहकर्मियों से भी  हाथ धो बैठते हैं। इसीलिए क्रोध को सम्बन्ध-विच्छेदों का एक बहुत बड़ा कारण माना गया है। यही, उपरोक्त घटनाक्रम में, जिज्ञासा और बॉस के सम्बन्ध में भी हुआ होगा।

प्रिय पाठको, हमारे, उपरोक्त ज़ुबान-सम्बन्धी विश्लेषण को पढ़ने के बाद तो आप अब इस जिह्वा या ज़ुबान को कभी दोष न दे पाएंगे। कड़वे, विषैले, दूसरों को ज़लील करनेवाले वाग्बाणों का मूल कारण विकृत मानसिक प्रवृत्ति है न के ज़ुबान/ जिह्वा/ जीभ।

अतः पेश किए गए सभी सबूतों और बयानत के मद्देनजर, अदालत इस नतीजे पर पहुँचती है की ये ज़ुबान सर्वथा निर्दोष है और इसलिए उसे बाइज़्ज़त बरी करती है!

  देखा ज़ुबान बहन, हमने अपना वादा पूरा किया ना!

ईश्वर, मानसिक विकृतियों से ग्रस्त, असहिष्णु जीवात्माओं को सद्बुद्धि प्रदान करे ताकि ज़ुबान को फिर-फिर समाज में लोगों के कटाक्षों का सामना ना करना पड़े।