राजस्थान की लोक गायकी 'चारबैत शैली'

नवीन कुमार जोशी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर
चलभाष: +91 773 762 6466; ईमेल: nsaraswat510@gmail.com

चारबैत शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। चार और बैत जिसका अर्थ होता है चार पंक्ति। चारबैत एक लोक गायन की शैली है। इसे फौजी राग के नाम से भी जाना जाता है। चारबैत का गायन जन्म से मृत्यु पर्यंत सब प्रकार के अवसरों पर किया जाता है। चारबैत का गायन करते समय कलाकारों द्वारा राजस्थान का परंपरागत वाद्य यंत्र ढ़प बजाया जाता है। चारबैत शैली सूफियाना एवं आशिकाना होने के साथ-साथ सामाजिक एवं धार्मिक कलामों से ओतप्रोत रहती है। चारबैत गायन का कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं होता है। इसका गायन सांयकाल से प्रभात तक कभी भी किया जा सकता है। चारबैत का गायन शौकिया अंदाज में किया जाता है। जिसमें अर्थ यानी पैसों की कोई प्रधानता नहीं होती है। लेकिन वर्तमान समय में इसके मायने बदल चुके हैं। और इसमें अर्थ की प्रधानता प्रमुखतः हो चुकी है। 

चारबैत का गायन करते समय कलाकार लोग भावावेश एवं जोश के साथ घुटनों के बल खड़े होकर गाते हैं। कुछ गायक ऊँची कूद लेकर दफ/धप/ढ़प को उछालते हुए बजाते हैं। इसमें नायक पहले एक बंध गाता है और उसके सहयोगी उसकी पुनरावर्ती करते है। पठानी मूल की इस प्रधान संगीत विधा का गायन पहले पश्तो भाषा में हुआ करता था। लेकिन भारत में इसका गायन लोक भाषा के रूप में किया जाने लगा। चारबैत में कलाकारों की संख्या लगभग 15 से 20 रहती है। चारबैत हिंदी व उर्दू दोनों भाषाओं में लिखी गई है। इसका गायन पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। लोककला को जानने वाले इसका संबंध ख्याल व ध्रुवपद गायन से भी जोड़ते हैं। दरअसल चारबैत की एक किस्म 'डैड फडक्का' है। जिसे ख्याल भी कहा जाता है। इसको पठानी लोकगीत या पठानी राग के नाम से भी जाना जाता है। भारत में चारबैत शैली प्रमुखत: उन स्थानों पर पनपी जहाँ पर नवाबों का आधिपत्य था। तत्कालीन समय से ही चारबैत शैली के भारत में तीन प्रमुख केंद्र रहे हैं। जिनमें एक टोंक (राजस्थान) में, दूसरा रामपुर (उत्तरप्रदेश) में और तीसरा भोपाल (मध्यप्रदेश) में है।

 चारबैत शैली का गायन पाँच रंगों में आयोजित किया जाता है-

1 हम्द-  खुदा की शान में गायी जाने वाली चारबैत।

  हिन्द में ठोकरे खाता हूँ बहुत है रंजूर
   रंज यह है के दरे अकदश से पड़ा हूँ मैं दूर
  अरज करना मदीने में बुला लीजे हुजुर
  ऐ सबा जाए अगर तू शहे अबरार के पास 

2. नाअत- हुजुर की शान में गायी जाने वाली चारबैत।
  
  तोहीद के कायल हूँ अल्लाह को पहचाने
  पाबंद शरीयत हो हर हुक्म खुदा माने
  सर सदके करें अपना कुर्बान करे जाने
  सब दिल से तेरा माने फरमान रसूल्लाह
 
3. आशिकाना- प्यार मोहब्बत मे गायी जाने वाली चारबैत।  

संयोग श्रृंगार -
    फिजाएँ मस्त है भंवरा गुलों पे उड़के आता है
    शराबे नाज पी-पी कर वो सर को धुनता जाता है
    चढ़ी आँखे नजर बहकी कदम भी डगमगाता है
    वो बजमे रिंद में पीकर बा शकले जाम आता है
    
वियोग श्रृंगार -
    रुख से घुंघट को उठा दिल को चुरा कर चल दिये
    दर्द आए उलझने बदले में देकर चल दिये
    किसलिए फिर दामन को झटक कर चल दिये
    क्यों मुझे देकर सहारा बेसहारा कर दिया
 
4  रकीबखाना- प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत गायी जाने वाली चारबैत।
    सामने शेरों के गीदड़ भी कहीं आते हैं
    देखते हैं वो हमें खोंफ से थरथराते हैं
    मिले खरगोश के झाड़ी में दुबक जाते हैं
    दुम दबाते हैं दबक जाते हैं कोहसारों में।

5. काम्माज खानी- गाली गलौज वाली चारबैत।
 
चारबैत शैली का उद्भव अफगानिस्तान में हुआ जहाँ से इस शैली का आगमन भारत में नवाबों का साम्राज्य में हुआ। लेकिन भारत में इसका विकास मुख्यतः टोंक, रामपुर और भोपाल में हुआ। माना जाता है कि टोंक के प्रथम नवाब अमीर खां पिंडारी के समय यह शैली संबल मुरादाबाद होते हुए टोंक पहुँची। नवाब का लश्कर प्रमुखत: टोंक के बहीर नामक स्थान पर आकर ठहरा और वहीं से इस शैली का फलना फूलना प्रारंभ हुआ। पहले शहर के कच्चे बंधा एवं पक्के बंधा क्षेत्र में इसके आयोजन होते थे। बाद में चारबैत को सूफियाना और आशिकाना कलाम के माध्यम से इसका गायन लोक कला के रूप में जारी रखा गया। इस कला के प्रथम उस्ताद अब्दुल करीम खां निहंग थे। तब से लेकर अब तक इस कला के बहुत से कलाकार हुए। हालांकि नवाब इब्राहिम अली खान ने किसी कारणवश कला का आयोजन बंद करवा दिया था। टोंक में चारबैत की पहली पुस्तक उत्तमचंद चंदन की “बहारे चंदन” के नाम से सन् 1962 में प्रकाशित हुई। वर्तमान समय में इसके कलाकार उस्ताद मोहम्मद उमर मियाँ और मोहम्मद साबिर मियाँ हैं। उस्ताद मोहम्मद उमर मियाँ नवाब सआदत अली खां के दौर से ही चारबैत गायन में भाग ले रहे हैं और तब से अब तक चार नवाबों के समय में अपनी गायन कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। रियासत काल के बाद तक भी चारबैत के बहुत मुकाबले जोश खरोश के साथ हुआ करते थे। उनकी चारबैत पार्टी “फकरे वतन” नाम से प्रसिद्ध सबसे पुरानी चारबैत पार्टी है, जिसका प्रतिनिधित्व करने वाले मोहम्मद साबिर मियाँ है। चारबैत गायन के क्षेत्र में उस्ताद सरर टोंकी एवं मुसवीर ने भी देशभर में टोंक का नाम रोशन किया है। आज यह शैली अनूठी गायन शैली के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है।

टोंक की चारबैत शैली भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी नई पहचान बना चुकी है। बी.बी.सी. लंदन द्वारा टोंक की चारबैत कला को कई बार प्रसारित किया जा चुका है। जिससे हमें मालूम पड़ता है कि चारबैत कला एक नए रूप में जनता के सम्मुख उपस्थित है और निरंतर अपने विकास पथ पर अग्रसर है।

संदर्भ:-
1. मोहम्मद, उमर मियाँ का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
2. मोहम्मद, उमर मियाँ का साक्षात्कार, निवास स्थान, बहीर, टोंक

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