‘सरोज-स्मृति’ शोक गीत में अभिव्यक्त करुणा

डॉ. कंचन गोयल

- कंचन गोयल

            छायावाद आधुनिक हिन्दी कविता का स्वर्ण युग है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिन्दी साहित्य के एक ऐसे युगान्तकारी कवि हैं जिनकी रचनाओं में तत्कालीन मानव की पीड़ा, परतन्त्रता एवं पक्षता के प्रति उत्पन्न तीव्र आक्रोश की ध्वनि सुनाई पड़ती है। ऐसा क्रान्तिकारी कवि एक ओर अपनी ओजस्वी कविता द्वारा ज्वालामुखी का विस्फोट भी करता है तो दूसरी ओर नारी के दिव्य-सौंदर्य की अलौकिक झाँकी भी प्रस्तुत करता हुआ प्रेम के मर्मस्पर्शी गीत गाता है।

            निराला एक ऐसे कवि थे जिनमें एक ओर अनुसरण एवं अनुकरण दोनों के व्यामोह से मुक्त उनके व्यक्तित्व में अदम्य जिजीविषा थी तो दूसरी ओर आधुनिकता के मोह में अनावश्यक स्थान पर अतित संस्कृति के प्रति आस्था। इन्होनें संध्या सुंदरी, ’बसन्त आया, ’बादल आये घन पावस, वसन वासन्ती लेगी, ’बनबेला, ’नरगिस आदि प्रकृति चित्रों का अंकन किया तो दूसरी ओर तोड़ती पत्थर और भिक्षुक जैसी कविताओं में दीनों-पद-दलितों के प्रति गहरी सहानुभूति का परिचय दिया है। प्रेयसी का अंकन करने में उन्होनें सौन्दर्य और प्रेम भावना को चरम सीमा तक पहुँचा दिया है तो कुकरमुत्ता में शोषकों के प्रति असीम कृपा को पूंजीभूत कर दिया है। राम की शक्ति-पूजा, ’छत्रपति शिवाजी का पत्र जैसी लम्बी कविताओं में आख्यानबद्ध नाटकीय गीति विधान की कला का अद्वितीय रुप देखा जा सकता है। सरोज स्मृति हिन्दी का संभवतः सबसे लम्बा शोक-गीत है। ऐसा शोक-गीत हिन्दी में दूसरा नहीं है। इसमें महाकवि ने अपनी पुत्री सरोज के आकस्मिक और अकाल निधन पर अत्यंत सकरुण उद्गार व्यक्त किए हैं। डॉ. जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव ने सरोज-स्मृति के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है - ’’अस्तु, निराला का शोक-गीत हिन्दी में अपने ढँग की पहली और अनूठी रचना है। विषय वस्तु नितांत वैयक्तिक है और इसी कारण उसकी करुणा हमें मर्माहत कर देती है। इसकी शैली वर्णन-प्रधान है और भावातिरेक के प्रगति-क्षण इसमें संयमित रुप से गुंफित हो गए है। इसमें कवि नितांत व्यक्तिगत परिवेश में होते हुए भी अपनी वस्तुपरक तटस्थता का निर्वाह कर सका है और यही कारण है कि रचना मात्र शोकोद्गार न होकर एक अच्छी कलाकृति, परिनिष्ठित सर्जना के रुप में समादृत होती है।’’1

            ’सरोज-स्मृति हिन्दी का सबसे लम्बा शोक गीत है। शोक एक ऐसा मनोभाव है, जिसमें प्रगाढ़ राग, अनुरक्ति और आत्मीयता की अभिव्यक्ति के साथ अगाध और असफलता की पीड़ा भी मिश्रित रहती है। अंग्रेजी साहित्य में शोक-गीतों की बहुत पुरानी परम्परा है, जिसके अन्तर्गत मिलटन का लिलीडस, टॉमस गे्र की 1750 ई. में समाप्त अति प्रसिद्व एलिजी रिटर्न एन ए कण्ट्री चर्चयार्ड शैली से शताब्दी पूर्व लिखे जा चुके थे। उधर विक्टोरियन कवियों में टेनीसन द्वारा अपने मित्र-आर्थर हेनरी हेलम की मृत्यु पर 18330 के पश्चात् कई वर्षों में पूर्ण किया शोक-गीत -इन मेमोरियम और मैथ्यू आर्नल्ड द्वारा अपने मित्र आर्थर क्लफ की मृत्यु पर सन् 1866 में तथा अपने पिता डॉ. टॉमस आर्नल्ड की मृत्यु पर 1867 में लिखे गये थिर्सिस तथा रगबी चैपल शीर्षक-गीत विशेष उल्लेखनीय है। शोक-गीतों का सारा वातावरण विषाद और व्यथा से भीगा हुआ, अवसाद से खिन्न, अन्तःम्लान दिखाया जाता है, जिससे शोक की गहरी छाया की प्रतीति हो सके। सरोज-स्मृति शोक-गीत की सर्जना निराला ने सन् 1935 में की। अपनी पुत्री सरोज के असामयिक निधन पर निराला ने शोक सन्तप्त हृदय की विह्वल भावनाओं को इस रचना में वाणी दी है। उन्नीस वर्ष की अल्पायु में ही कवि पुत्री की मृत्यु ने भावुक पितृ-हृदय को किस प्रकार आहत किया, ’सरोज-स्मृति उस स्थिति का पूर्ण अंकन करती है। इस कविता में कवि के व्यक्तित्व के आलेखन के साथ साथ हार्दिकता ममतापूर्ण वात्सल्य, आत्मप्रतारणा और अभिव्यक्ति की सुघराई भी है। निराला जी ने साहित्य साधन के पीछे अपना सब कुछ होम कर दिया था। यही कारण था कि निराला को सदैव अर्थाभाव से पीड़ित रहना पड़ा। अपनी पुत्री सरोज का पोषण भी वे संतोषजनक रुप से नही कर सके। वे लिखते है -
                        ’’धन्ये, मैं पिता निरर्थ था,
                        कुछ भी तेरे हित न कर सका।
                        जाना तो अर्थागमोपाय,
                        पर रहा सदा संकुचित-काय
                        लख कर अनर्थ आर्थिक पथ पर
                        हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।
                        शुचिते, पहनाकर चीनाशुक
                        रख सका न तुझे अतः दधिमुख।’’2

      ऐसी शोकजनित परिस्थितियों ने अतीत की बहुत सी स्मृतियां शोक को ओर भी बढ़ा देती है। निराला को सरोज और उसके भाई की मार-पीट का चुभता हुआ दृश्य याद आता है -
                        ’’खाई भाई की मार विकल
                        रोइ उत्पल दल-दृग छलछल,
                        चुमकारा फिर उसने निहार,
                        फिर गंगा-तट-सैकत-विहार
                        करने को लेकर साथ चला,
                        तू गटकर चली हाय चपला।’’3

      निराला को साहित्य के क्षेत्र में भी बहुत अपमान और विद्रोह सहना पड़ रहा था। निराला ने कविता को छंदो के बंधन से मुक्त कर छंद की रचना की। प्रारंभ में निराला की रचनाओं का लोग उपहास करते। संपादक गण उनकी कविताओं को अस्वीकृत कर वापिस कर देते थे। वे संपादकों के प्रति व्यग्ंय करते हुए लिखते है -
                        ’’लौटी रचना लेकर उदास
                        ताकता हुआ मैं दिशाकाश
                        बैठा प्रांतर में दीर्घ प्रहर
                        व्यतीत करता था गुन-गुन कर
                        संपादक के गुण, यथाभ्यास
                        पास की नोचता हुआ घास।’’4            

      निराला जी झुके नहीं, वे मुक्त छंद में ही रचना करते रहे। बाद में उनकी रचनाओं को उन्हीं संपादको ने आदर के साथ छापा। निराला जी रुढ़ियों और ज्योतिष में कतई विश्वास नहीं था। उनकी जन्मपत्री में दो विवाह लिखे थे, परन्तु निराला भाग्य के लिखे को मिटाने हेतु हंसते थे। वे लिखते है -
                        ’’मोढे पर ले कुडली हाथ
                        अपने जीवन की दीर्घ गाथ।
                        पढ़, लिखे हुए शुभ दो विवाह
                        हंसता था, मन में बड़ी चाह
                        खंडित करने को भाग्य-अंक
                        देखा भविष्य के प्रति अशंक।’’5

      निराला के समक्ष जो लोग विवाह का प्रस्ताव लेकर आते थे, उन्हें वे नाना प्रकार के बहाने बनाकर वापस कर देते थे। एक बार एक सज्जन ने विवाह का प्रस्ताव रखा। निराला की सास भी चाहती थी कि वे अपना दूसरा विवाह कर ले। जैसे ही सास नहाकर इस संबंध में बातचीत करने को आई त्यों ही देखती है कि कुंडली के टुकड़ों पर सरोज बैठी हुई थी। निराला की कुंडली के प्रति इस उदासीनता ने सास को बोलने का अवसर ही नही दिया। इस प्रकार पारिवारिक दृश्यों का चित्रण बड़ा ही करुण बन पड़ा है। अपनी पुत्री सरोज के तारुण्य का वर्णन कर कवि ने सिद्ध कर दिया कि वे लोक-भूमि से कितने ऊँचे उठे हुए हैं। वे लिखते हैं -
                        ’’धीरे-धीरे फिर बढ़ा चरण
                        बाल्य की केलियों का प्राँगण
                        कर पार, कुँज तारुण्य सुधर
                        आई, लावण्य भार थर थर
                        काँपा कोमलता पर सस्वर
                        ज्यों मालकोष नव वीणा पर
                        फूटा कैसा प्रिय कंठ स्वर
                        माँ की मधुरिमा व्यंजना भर

                        बन जन्मसिद्ध गायिका, तन्वि
                        मेरे स्वर की रागिनी वहिन।’’6

      इसी प्रकार तरुण कन्या के दूसरे के घर जाने का बड़ा ही सुन्दर काव्यमय संकेत किया गया है -
                        ’जाना बस, पिक-बालिका प्रथम
                        पल अन्य नीड़ में जब सक्षम
                        होती उड़ने को, अपना स्वर
                        भर करती ध्वनि मौन प्राँतर।’’7

      निराला सामाजिक रीति-रिवाजों, परम्पराओं और रुढ़ियों में विश्वास नही करते थे। वे अपने पूर्वजों के मार्ग का अनुसरण करना चाहते है, परंतु पूर्ण रुप से प्राचीनता का भार वहन करने में वे स्वयं को असमर्थ पाते हैं। वे लिखते हैं -
                        ’वे जो यमुना के - से कछार
                        पद फटे विवाई के उधार
                        खाए के मुख ज्यों, पिए तेल
                        चमरौधे जूते से सकेल
                        निकले, जी लेते घोर-गांध
                        उन चरणों को मैं यथा-अंध
                        कल घ्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
                        हो पूजूँ, ऐसी नही शक्ति
                        ऐसे शिव से गिरिजा विवाह
                        करने की मुझको नही चाह।’’8

      निराला अपनी कन्या का विवाह बहुत सीधे-साधे ढंग से करते है। वह कन्नौजी ब्राह्मणों की विवाह पद्धति का समर्थन नही कर पाते। दहेज तथा बारात पर किया जाने वाला व्यय उन्हें अखरता है। निराला जी कन्नौजियों के पैर पूजन करने में संकोच होता है। अतः वे कुछ साहित्यिक मित्रों को बुलाकर स्वयं ही पुरोहित का कार्य करते हुए अपनी कन्या का विवाह बिना किसी आडम्बर के करते है। यह कविता केवल एक पिता का पुत्री के वियोग में लिखा गया रुदन या प्रलाप ही नही है। इसमें कवि की भावनाओं का समाज-सापेक्ष उतार-चढ़ाव है। इसी कारण कृति का काव्य सौंदर्य द्धिगुणित हो गया है।

            ’सरोज-स्मृति में प्रधान रस करुण है। शोक की भूमि को निर्वेद युक्त होने के कारण रस योजना काव्यशास्त्रीय परम्परा में आती है। महाकवियों ने करुण रस को अपने काव्य की मूल भूमि के रुप में अपनाया भी है। सरोज-स्मृति की करुणा हमें मर्माहत कर देती है। निराला के हृदय की सारी करुणा भी मानो इन पंक्तियों में साकार हो उठी है -
                        ’’मुझ भाग्यहीन की तू संबल
                        युग वर्ष बाद जब हुई विकल
                        दुःख ही जीवन की कथा रही,
                        क्या कहूँ आज, जो नही कही।’’9

      अपनी पुत्री से विलग पिता को कोई भी धैर्य नही बँधा सकता। कवि को अपना सारा जीवन व्यर्थ लगता है। जिसकी परिणति है - सरोज का निधन। वे अपनी कन्या का तर्पण भी दार्शनिक विधान के साथ करते है -
                        ’’हो इसी कर्म पर वज्रपात
                        यदि धर्म रहे नत सदा साथ
                        इस पथ, मेरे कार्य सकल
                        हो भ्रष्ट शीत के से शतदल
                        कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
                        कर, करता मैं तेरा तर्पण।’’10

      यह दार्शनिक विधान कविता को और भी त्रासद बना देता है। इस संबंध में डॉ. बच्चन सिंह ने लिखा है, ’’वह गत कर्मों को ईश्वरार्पित करके कन्या का तर्पण करता है। कविता में दार्शनिक स्तर पर उसे मुक्ति मिल जाती है, पर कविता का समग्त प्रभाव इस अर्पण से कम नही होता, बल्कि ट्रेजडी और भी धनीभूत हो जाती है।’’11

            ’सरोज-स्मृति में महाकाव्यात्मक औदात्य के दर्शन होते है। इसमें रागात्मकता, भावप्रवणता और आत्मचेतना के दर्शन होते है। इस शोक-गीत में वर्णित घटनाओं में एक क्रम है, एक संगीत है। यह निराला जी की सम्मुन्नत काव्य-साधना का प्रमाण है। सरोज-स्मृति में संरचनागत कसावट की भित्ति पर कवि ने वैयक्तिक व्यथा को जीवन स्थितियों की सापेक्षता में अभिव्यक्ति दी है। इस प्रकार शोक-गीत की संज्ञा से युक्त इस कविता में जीवन के संघर्ष से छनकर आयी हुई साहस, विद्रोह, वात्सल्य, अवसाद, ग्लानि की मिली-जुली अनुभूतियाँ उद्भूत होती है।

संदर्भ सूची
1.         निराला का काव्य, डॉ. जगदीश प्रसाद श्री वास्तव, पृ. 191
2.         राग विराग, सं. राम विलास शर्मा, पृ. 80
3.         वही, पृ. 82
4.         वही, पृ0 83
5.         वही, पृ0 84
6.         वही, पृ0 85-86
7.         वही, पृ0 86-87
8.         वही, पृ0 88
9.          वही, पृ0 91
10.        वही, पृ0 91
11.       निराला का काव्य, डॉ. बच्चन सिंह, पृ0 90     

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