कविता - पद्मा मिश्रा

पद्मा मिश्रा
- पद्मा मिश्रा

पतझर में झर जाते पत्ते, शाखें रह जाती हैं
कुछ भी शेष नहीं रहता बस यादें रह जाती हैं

कभी नियति ने बाँहें फैला, खुली चुनौती दी है
जीवन पथ पर फूल मिले तो चुभते कांटें भी हैं
मंजिल दूर नजर आती, बस, राहें थक जाती हैं
कुछ भी शेष नहीं रहता बस यादें रह जाती हैं

निर्झर के आँसू मिलते है, निर्जन पाषाणों पर
बूंदों का सहगान बिखर जाता कोमल पातों पर
सूनी आंखें चुपके चुपके जाने क्या कहजाती है
कुछ भी शेष नहीं रहता बस यादें रह जाती हैं

मन की बातों को समझूँ क्या इतना भी कम था
भीगी पलकों पर सोया हर कतरा कतरा नम था
अंतरमन की गहन उदासी बूंदों मे बह जाती है
कुछ भी शेष नहीं रहता बस यादें रह जाती हैं

मेघों का जादू नभ के आंगन को रंग जाता है
धानी रंग धरती का आंचल, और संवर जाता है
कंपित अधरों पर मौसम की बाते रह जाती है
कुछ भी शेष नहीं रहता बस यादें रह जाती हैं

इस रिमझिम में अनजाना संसार निखर जाता है
सपनों के मधुमय आंगन में, प्यार बिखर जाता है
दूर बसे पाहुन की बस, मुलाकातें रह जाती हैं
कुछ भी शेष नहीं रहता बस यादें रह जाती हैं।