संवेदनाओं की आवाज़ - बुरी लड़की



प्रियंका गुप्ता के कथा-संग्रह पर अनिता मण्डा के विचार
पुस्तक: बुरी लड़की
लेखिका: प्रियंका गुप्ता
विधा: कहानी
आईएसबीएन: 9789384419387
पृष्ठ: 96,
संस्करण: पेपरबैक
मूल्य: 100 रुपये
प्रकाशक: हिन्द-युग्म

लेखिका: प्रियंका गुप्ता
प्रियंका गुप्ता का 2016 में कहानी संग्रह आया है 'बुरी लड़की'.  इससे पहले बड़ी कहानियों का एक संग्रह आ चुका है 'ज़िन्दगी बाक़ी है' जिसको बहुत सराहा गया। 'बुरी लड़की' शीर्षक इस संग्रह की दूसरी कहानी का है। पुस्तक में 11 कहानियाँ हैं जिनमें एक छोटी कहानी व 10 मध्यम आकार की कहानियाँ हैं। प्रियंका गुप्ता की मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ है। सभी कहानियों में इस गुण का अच्छा उपयोग हुआ है। सामाजिक-पारिवारिक कहानियों में पात्रों का व्यवहार किस कारण से कैसे परिवर्तित हो रहा है यह इन कहानियों में गहराई से महसूस करते हैं।

     संग्रह की पहली कहानी 'अब वो खुश है', में माँ बेटी की तरह जी रही सास-बहू के बीच कायम मधुर व्यवहार भी किस तरह जलन व ईर्ष्या में बदल जाता है, बहुत बारीक़ी से बुना गया है। मालिनी को अपने अंदर उगी नागफ़नी का अहसास बहुत देर बाद होता है।

     "झिरी" कहानी का कथानक ऐसा है जिसकी प्रस्तुति में जरा सा लोच आते ही कहानी औसत हो जाती पर किसी नट के रस्सी पर चलते हुए संतुलन बनाने की तरह से ही लेखिका यहाँ सफल हुई है। आजकल के एकल परिवारों की तो बात ही क्या करें संयुक्त परिवारों में भी "झिरी" जैसे आनन्ददायी लम्हे बस किस्से बनकर रह गये हैं। एक खुशियों का खज़ाना जो भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं खो गया है वो सब आपको इस कहानी में मिलेगा। एक नवविवाहिता की जीवनसाथी से उम्मीदें व नये माहौल में नवागता का घुलना मिलना सब मिलकर बहुत अच्छा माहौल बनता है।

समीक्षक: अनिता मंडा
     संग्रह की आकार में सबसे छोटी कहानी 'नाम में क्या रखा है' शब्दों में चाहे छोटी हो पर विचार में बहुत बड़ी है। वर्तमान जीवन की आपाधापी में, रोजी-रोटी के जुगाड़ में व कुछ कर गुजरने की चाह में इंसान से परिवार पीछे छूट गये हैं। संयुक्त परिवार एकल में बदले और एकल परिवार से भी मजबूरीवश लोग दूर दराज रहने लगे, कहीं हॉस्टल, कभी होटल व अलग रूम, पेइंग गेस्ट इसी तरह के रूप में। संचार क्रांति ने जहाँ दूरियों को समेट सबको 24 घन्टे जुड़े रहने की सुविधा दी वहीं व्यस्तता की दूरियाँ भी, दिनों दिन बढ़ते कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल ने विश्व को एक गाँव की तरह बना दिया, दिन भर की थकान व चुप्पी के बाद जब भी किसी से बतियाने का मन करे तो इन्हीं माध्यमों पर बहुत सारे लोग मिल जाते हैं, और कभी कभी यही आभासी मुलाकात मित्रता बन जाती है, या मित्रता से कुछ अधिक भी। ऐसे ही अनजाने से रिश्ते में बंध जाते हैं इस कहानी के पात्र। यह तो हुई कहानी के कथानक की बात। पर जो बात कहानी के बाद आपके मन को कचोटती हुई रह जाती है वो यह कि इतने सब आधुनिक हो जाने के बावज़ूद, आज भी इंसान जात-धर्म की क़ैद से आज़ाद नहीं हुआ, दीपक को जब पता चलता है कि वह जिसके सामने प्रेम-प्रस्ताव रख रहा है और वो उसके लिए सौ प्रतिशत ख़री है उसका जब नाम पता चलता है व अपने से भिन्न समुदाय का पता चलता है तो वही खुद को 'डीप थिंकर' कहने वाला कुएँ का मेंढक बन जाता है। पढ़ी लिखी नौजवान पीढ़ी की वैचारिक रिक्तता पर बहुत बड़ा तंज है यह कहानी।

     'हरामी' कहानी अलग ही शिल्प की है, पूरी कहानी एक पत्र के माध्यम से सामने आती है, फिर भी चार-पाँच पात्रों का चारित्रिक विकास इसमें सम्भव हुआ है। गोद लिए बच्चे का अन्तर्द्वन्द्व पाठक की आँखें नम कर देता है। एक पत्र में समाप्त कहानी में उम्दा कथानक व सभी  पात्रों के साथ न्याय कर लेखिका ने साबित कर दिया कि उनकी पहुँच काफी आगे तक है, इस तरह के प्रयोग नये आयाम गढ़ते हैं साहित्य में।

     'कुछ आवाज़ें मरती नहीं' कहानी का कथानक बहुत ही संवेदनशील है। दूसरे की पीड़ा से अनजान हो रिश्ते अपनी आत्मीयता की पूँजी खो रहे हैं। झूठे प्रेम की कलई हटते ही अंदर स्वार्थ का लौह निकल आता है। संवेदनाओं का क्षरण इस हद तक दिखता है कि स्वयं माँ ही बीमार बेटी को उसके सामने ही उसके जूस का खर्चा अनावश्यक बताती है जबकि वो उसी के कमाये गये पैसे से खरीदा गया है। बीमार को ठीक होने की उम्मीद बंधवाने की जगह उसके सामने ही उसके सामान का बँटवारा कर रहे हैं कि उसके बाद कौन क्या लेगा। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है यह।

     कहानी 'झुमकी' उच्च मध्यम वर्ग सुविधाभोगी वर्ग जिसने कभी परेशानियों से आँखें दो-चार नहीं की, उसके चोंचलों पर व्यंग्य भरी कहानी है। इस वर्ग के दोगलेपन व मुखौटे लगे किरदारों से वितृष्णा सी हो जाती है। एक बार फिर से प्रियंका गुप्ता यहाँ अपने शिल्प से चमत्कृत करती हैं। एक पात्र के सम्वाद से ही कहानी के सारे पात्रों का परिचय मिलता है। यह इस कहानी की सीमा भी हो सकती थी लेकिन लेखिका ने न सिर्फ बख़ूबी कहानी को बचा लिया है बल्कि व्यंग्य के साथ उत्कृष्ट हास्य भी प्रस्तुत किया है।

     'कहानी ऐसे थोड़े न लिखी जाती है'  शीर्षक कुछ लम्बा जरूर है लेकिन जब कहानी पढ़ते हैं तो ज्ञात होता है यहाँ भी लेखिका ने अलग ही शिल्प बुना है। कहानी ऐसे नहीं लिखी जाती कहते कहते कहानी लिख दी है। प्रौढ़ महिला का स्मृतियों के माध्यम से पहले प्रेम की कशिश को जिन्दा रखने का दिलचस्प किस्सा जो वर्तमान में अपनी ख़ुश्बू बिखेर रहा है।

     'कलर ब्लाइंड' के शिकार पात्र नहीं समझ पाते या नहीं देख पाते रंग बदलते रिश्तों को और शिकार हो जाते हैं गिरगिटी चालों के। कलर ब्लाइंड के बिम्ब से रिश्तों से मिले दर्द को बहुत सटीकता से बुन दिया है। स्त्री का पूज्य रूप बहुत ही कुत्सित रूप लिये मिलता है इसमें।

     'चाँद'  कहानी आर्थिक उथल-पुथल के दौर में निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की दशा बख़ूबी कहती है जिसमें एक कमाने वाला पाँच खाने वाले हैं। कटौती कर त्यौहार मनाते पिता का हृदय भर आता है मासूम बच्चों की सूरत देखकर। यह उस विराट वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो वर्ग सपने देखता है लेकिन पूरे करने के लिए  साधन हमेशा कम पड़ जाते हैं।

  अब बात करते हैं कहानी-संग्रह की शीर्षक कहानी 'बुरी लड़की' की। स्त्री-स्वतंत्रता  की पैरवी करने वाला समाज कभी नहीं चाहता की स्त्री अपने अधिकारों के लिए जागरुक बने। तरह-तरह की बंदिशें उसकी उड़ानें रोक रही हैं। दोगलापन हर क्षेत्र में हावी है। जो इन सामाजिक बन्धनों को न माने वो हर स्त्री बुरी लड़की है। कहानी में बुरी लड़की सिगरेट पीती है। बन्धनों का अतिक्रमण करती है। किसी को खुद पर अपनी मर्ज़ी थोपने नहीं देती। विद्रोह को प्रेरित करती है। स्त्री को घुटी में घोल कर सदियों से पिलाया जा रहा है कि ससुराल में उसकी डोली जा रही है, उस घर से वो अर्थी में उठे। अपने जन्मदाताओं से ही सहयोग के आभाव में वो सब कुछ बिना प्रतिरोध किये अपना प्रारब्ध मान सहन कर लेती है। परन्तु कहानी नायिका अपने भाई के विवाह के अवसर पर  अपने पति द्वारा दहेज की माँग रखने व दो लाख मिलने की शर्त पर ही विवाह में शामिल होने की बात को अपने मम्मी पापा को नहीं बताती। बल्कि जब रवीश शराब पीकर उस पर हिंसात्मक हमला करता है तब उसे बुरी लड़की की याद आती है और उसमें न जाने कहाँ से साहस का संचार होता है ओर वो उसे पटखनी देकर चेताती है कि आगे से उससे इस तरह पेश आया तो अंजाम बुरा होगा।

दहेज व घरेलू हिंसा के मुद्दे को उठाने से यह कहानी महत्वपूर्ण है। इसमें हिंसा का विरोध का साहस करने की बात समसामयिक बना देती है।

  इस तरह हम प्रियंका गुप्ता की कहानियों से गुजरते हुए पाते हैं कि संवेदनशील विषयों पर मनोविज्ञान को दृष्टिगत रखते हुए असरकारक ताने-बाने बुने गये हैं। अच्छा संग्रह है, इसे अपने पुस्तकालय में स्थान देना चाहिए व ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। आगे ज्वलन्त विषयों पर लेखिका से कलम चलाने की अपेक्षा बन रही है, उम्मीद है इस तरफ़ वे निराश नहीं करेंगी।