प्रायश्चित - कहानी

सर्वेश्वर प्रताप सिंह, शोध छात्र (चलभाष: +91 759 817 6087)
हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय - 605014
ईमेल - sarveshvarpratap779@gmail.com
बच्चे स्कूल जा चुके थे। पति भी अपनी डिस्पेन्सरी चले गये थे। पर आज उसे स्कूल  जाने की इच्छा नहीं थी। पूरे दो मंजिलों के घर में काटता हुआ सन्नाटा घूम रहा था। वह बेड पर लेटी थी। बार-बार टी.वी चैनलों को बदल रही थी। अजीब सी विक्षिप्तता थी उसके मन में। वह क्या करे या क्या न करे। उसे आज इतने दिनों के बाद क्या सूझा? उसके हाथों से सब कुछ छूटता जा रहा है उसको ऐसा लगा। सात जन्मों का बंधन घिसकर टूटता सा प्रतीत हो रहा था उसे। आखिर कुछ दिनों से चल रहे इस टकराहट का परिणाम क्या होगा उसे नहीं पता? वह उसके साथ आई थी आज से बीस वर्ष पहले। अपने माता-पिता और परिवार से विरोध करके। 

पिताजी ने उससे कहा था, “मीनू! हम ब्राह्मण हैं। समाज के सामने हम क्या मुँह दिखाएँगे? अपना ही मत सोचो मीनू बेटी... तुम्हारे पीछे तुमसे तीन छोटी बहनें हैं तुम्हारी!” पर उस दिन मीनाक्षी किसी की भी सुनने की मुद्रा  में नहीं थी। वह घर से निकल जायेगी और कभी लौटकर नहीं आएगी। ऐसा उसने उस दिन पिता जी से निश्चय भाव से कहा था। अम्मा ने उसे समझाया था, “बेटा मीनू! ब्राह्मणों के संस्कार अलग होते हैं। उनमें और तुममें फर्क है। वो ठहरे निम्नजाति के संस्कार वाले। तुम वहाँ नहीं रह पाओगी। अभी समय है। हाथ से मौका निकलने के बाद रेत की तरह उसी प्रकार बिखर जाओगी जैसे मुट्ठी को कसकर पकड़ने पर रेत हाथ से गिरकर जमीन पर बिखर जाती है और तुम्हारा जीवन भी।” पर मीनू ने अपना फैसला सबको सुना दिया था। तीर अब निकल चुका है पिता जी। उसने उस समय बेबाकी से कहा था। पिता जी को मजबूर किया था। आंध्र के कुलीन ब्राह्मणत्व और ब्राह्मण समाज को उसने चुनौती दी थी।

बीस बरसों के बाद अब उसके अंदर के विद्रोह की आंच शिथिल पड़ने लगी थी। उसे कमरे में बैठे हुए अचानक आभास हुआ कि अम्मा जोर-जोर से उसके ऊपर हँस रही हो जैसे और कह रही हो कि “देखा मैंने सच कहा था न बेटी मीनू। अब वही बात तुम्हारे सामने राक्षस जैसे खड़ा है न।” उसके कानों में बीस वर्ष पहले कहे गए अम्मा के वचन गूंचने लगे, “बेटा मीनू! ब्राह्मणों के संस्कार अलग होते हैं।” उसका सिर भन्नाने लगा। सर से पैर तक एक झनझनाहट महसूस हो गई। उसको लगा कि वह जिस ब्राह्मणत्व के खूंटे को घायल गाय की तरह तोड़कर आयी थी वही ब्राह्मण संस्कार इतने दिनों के बाद भवर की तरह उसको अपने अंदर निगलने के लिए मुुँह बाये खड़ा है। वह क्यों अपने बच्चों को ब्राह्मण संस्कार देना चाहती है। क्या अम्मा की बातें सच थी? क्या अम्मा को इस बात का आभास पहले से था जो उनसे अनायास ही निकल आई थी?

प्रजीष के संस्कार आज उसे छोटे मालूम होने लगे हैं। आज ही सुबह उसने झगड़े के दौरान अचेतन में ही सही पर निकला तो था कि “प्रजीष मेरे बच्चों का संस्कार मेरा होगा तुम्हारा नहीं। मैं नहीं चाहती कि वे तुम्हारे लोगों के बीच में रहे जिन्हें थोड़ी-सी भी तमीज नही है।” इस पर प्रजीष ने झुझलाहट में कहा था, “कौन से संस्कार तुम उन्हें देना चाहती हो मीनाक्षी! वो संस्कार जो मानव-मानव में भेदभाव रखना ही श्रेष्ठता की कसौटी मानते हैं। मीनाक्षी तुमें हो क्या गया है? तुम तो स्वयं इतनी शिक्षित हो तो भी?” लेकिन वह यह तर्क मानने को तैयार नहीं थी। जो विद्रोह वह अपने माता-पिता से कर चुकी थी वही चीज आज उसके और प्रजीष के बीच पुनः सुरसा की तरह मुंह फैलाये खड़ी थी तथा उसके निजत्व और परिवार को समूचा निगलने को तैयार है । वह पुनः लौटना चाहती थी जहाँ से वह आयी थी। प्रजीष से उसने कहा भी, “प्रजी मुझसे सहा नहीं जाता। कुछ है जो मेरी अंतरात्मा को बाँट रहा है। वह क्या है मैं नहीं जानती प्रजी...। अम्मा ने भी मुझसे कहा था उस समय।”

प्रजीष ने उससे कुछ नहीं कहा। वह अपने काम पर चला गया और बेडरूम के अन्दर  मीनाक्षी उलझे हुए सूत्रों के बीच और उलझती जा रही थी। उसके जीवन के कसे हुए तार ढीले पड़ रहे थे। उसके दबे हुए संस्कार इस तरह  हुंकार भर रहे थे मानो की उस पर अट्टाहस कर रहे हो। वह कमजोरी और असहायता के बोझ तले दबी जा रही थी। घना कुहासा उसके चारों ओर भर रहा था। उसकी आँखें आर-पार देखने में असक्षम हो रही थी। आज अचानक उसके मन में अचेतन की गहराई से उपजे द्वंद्व ने उसकी आत्मा को भयभीत कर डाला है। वह हमेशा से  एक निष्कर्ष पर पहूंचना जानती थी पर आज वह असमर्थता की खाई में गिरी हुई जान सी पड़ रही थी ।
उसे याद है प्रजीष ने उससे पूछा था, “मीनाक्षी क्या तुम बीते हुए कल की परछाई से अपने को बचा सकोगी। अगर नहीं तो फिर वापस चली जाओ अन्यथा जीवन की ऊंचाई और गहराई को पार करने में मुश्किल होगी। तुम्हें एक बार और सोचना चाहिए।” यह सुनकर वह उस समय नाराज हो गई थी और कही थी, “प्रजी तुमको मुझ पर विश्वास नहीं रहा क्या?” यह सुनने के बाद प्रजीष ने कहा था, “मीनाक्षी प्रश्न विश्वास-अविश्वास का नहीं है। तुम्हारी अम्मा के प्रश्न का है। संस्कारों के प्रश्न का है।” तब वह नहीं डिगी थी। पर अब क्यों वह लौटना चाहती है?

अचानक उसके मन के अन्दर कंपन की लहर मद्धिम-मद्धिम प्रकाश की तरह झंकृत हुई। अचानक उसके अंदर 'प्रायश्चित' शब्द ने शोर मारकर कह-कहाने लगा। वह निर्णय का सूत्र पा चुकी थी। उसने निश्चय का सीमांत पा लिया है। वह प्रायश्चित करेगी उसने दराज़ से एक पन्ना निकाला। वह कुछ लिखना चाहती थी। प्रजीष से कुछ कहना चाहती थी। फोन नहीं करेगी पर उसके लिए जाने से पहले कुछ लिखना चाहती थी । ए.सी. की हवा में भी उसे पसीना आने लगा था । वह तर्क करना चाह रही थी अपने मन से और अपने दबे हुए मन की गहराई से।  प्रायश्चित किसका और किसलिए? तभी वह मन ही मन बुदबुदाई, “मैं तो जन्म से संस्कार वाली हूँ, ब्राह्मणत्व कभी छोड़ा ही नहीं। इसीलिए तो प्रजीष से शादी के कुछ दिन बाद ही कह दिया था कि हम शहर के सिविल लाइन्स में रहेंगे।” प्रजीष इस शर्त पर माना था कि उसके परिवार वाले भी उसके साथ ही रहेंगे तो वह भी तैयार होगा। उसने भी प्रजीष का प्रस्ताव माना था। पर अब? अब क्या? अब क्यों वह उम्र के आधा रेत हो जाने के बाद अचानक उसे अपना नैहर, ब्राह्मणत्व के संस्कार, क्यों खींच रहे हैं? उसको अपना हाथ काँपता हुआ महसूस होने लगा।

वह उठ खड़ी होती है। खिड़की दरवाजे खोलती है। कुर्सी पर बैठती है। पन्ने को फिर से संभालती है। टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखती है, “प्रजी में आज जा रही हूँ। वापस, अपने नैहर। उस दिन तुमने समझाया था। अम्मा ने रोका था। पिता ने समझाया था। नहीं मानी। प्रजी मैंने कभी अपने निज संस्कारों से मुक्ति नहीं पायी और तुम्हारे संस्कारों को अपना भी नही मान सकी। मैं कटे हुए वृक्ष की तरह जड़ से अलगाव की स्थिति को अपने अंदर आभास करती थी। बच्चे मेरे और तुम्हारे दोनों के हैं। वे अपना संस्कार चुनने को स्वतंत्र है। मेरा उन पर कोई दबाव नहीं... पर मैं? मैं नहीं। यही मेरा प्रायश्चित है... अपने संस्कार को पुनः जीवित करना... जो कि मेरा था, मेरा अपना जिसके साथ मेरा जन्म हुआ...”