दो कविताएँ - सुजश शर्मा

सुजश शर्मा

तीन वृत्त

फिलहाल
तीनों वृत्तों के मध्य के केंद्र से
परिधि खींचने की
यात्रा से हो रहा।

तुम, वो और वे
के बीच खंड से
जो बना है मैं
वहाँ वास्तविक स्वयं का
देख रहा केंद्र साक्षी
और कोशिश कर रहा मैं
खींचने की, वास्तविक परिधि,

जिससे
वे (माता-पिता)
छनकर आ जाएँ
उतना ही
जितना कि कुछ
मैं स्वयं का हूँ
माता-पिता
वो..{ ईश्वरत्व (यदि हैं/हैं/हैं ही)}
वो भी उसी अनुपात में आ जाए
(जो अनुपात भी नहीं)
अपनी संपूर्ण तीव्रता से।

और
तुम (प्रेमिका/प्रेमिका/अन्य)
अपने-अपने मौलिकता में
हो आओ
परिधि सीमा में स्वतंत्र
और उभरो प्रतिमा सी सजीव
प्रेमिका के ठोस पत्थरत्व से,

फिर
जो सहज/पवित्र/चेतन दशा
हो आए
(रहे ना रहे)
वही वास्तविक

(मात्र काल्पनिक से इतर नहीं
या इतर से इतर ही नहीं)
स्वयं होऊँ मैं।

जिसका केंद्र
अनायास, अप्रयास, नैसर्गिक हो निर्मित
(व्यक्तित्व की इमारत नहीं)
वहीं से अपनी परिधि
खींचना चाहता हूँ
जहाँ स्वयं ही नहीं
नहीं ही नहीं
बस हों
कुछ के कण।
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एक पुष्प

मुझ में एक पुष्प
गुलाबी होते-होते श्वेत हो रहा।

वहाँ चुप उतरकर
शून्य को कुछ क्षण निहारा
रिमझिम बारिश के बाद
इसी शाम, उस शाख पर
भीगे पुष्पगुच्छों को छू जाना हुआ
पाया, फूलों ने मुझे जाना,
अब कोई संवाद सा हो गूँज रहा
लौटते पंछियों के कलरव से होकर
भीतर एक सा
पुष्प और ‘मुझ’ में।

जीया, मगर जी ही नहीं गया
या जी नहीं रहा बाद को
वरना क्यों कर कविता सी होती,
वो वही, है अभी
मगर वर्तमान नहीं
क्योंकि होकर (या न होकर) भी
सजगता नहीं है अभी।

कविता है जीवंत क्षणों को अर्पित
उसी से उठ उसी को
फिर भी इसमें (अप्रयास)
वही खो जाता है क्यों?

ऐसा हो रहा
प्राण वही लेकिन साँस बदल रही
एक प्रार्थना उठकर तुझ में जा रही,
मैं देखता हूँ
‘मुझ’ में एक पुष्प
गुलाबी होते-होते श्वेत हो रहा।