यादें - कहानी

मनमोहन भाटिया

दोपहर के समय उमाशंकर घर में अकेले आराम कर रहे थे। बच्चे, बहुएँ और पोते, पोतियाँ सभी काम पर गए हुए थे। उम्र छिहत्तर वर्ष। तभी फोन की घंटी बजी। फोन पर उसकी बड़ी बहन कौशल्या थी।
"उमा कितने समय बाद बात हो रही है। कैसे हो?"

"ठीक हूँ, जीजा और बच्चे कैसे हैं?"

"सब ठीक हैं। युक्ति का रिश्ता तय किया है।" युक्ति कौशल्या की पोती है।

"बहुत बधाईयाँ बहन। शादी कब की है?"

"शादी दो महीने के बाद। पूरे परिवार को आना है। यही तो मौका होता है जब पूरा परिवार एकत्रित होता है।"

"हाँ जरूर, मैं तो जरूर आऊँगा। बाकी बच्चों का अपना हिसाब है, सबको बोलूँगा।"

दो महीने बाद पूरा परिवार युक्ति के विवाह में सम्मलित हुआ। हँसी मजाक, मिलना जुलना, बच्चों युवाओं का नाच गाना के बीच विवाह संपन्न हुआ। विवाह के अगले दिन सभी रिश्तेदारों ने रुक्सत ली। कौशल्या ने उमाशंकर को रोक लिया।

"भाई बरसों बाद मिले हैं, कुछ दिन रुक जाओ।"

बहन के निवेदन पर उमाशंकर रुक गया। अगली सुबह उमाशंकर की छह बजे नींद खुली। बिस्तर छोड़ देखा सभी सो रहे हैं। उमाशंकर वापिस कमरे में आ गया और खिड़की खोली। ताजी हवा के झोंकों से शरीर तरोताजा हो गया। खिड़की से सामने समुंदर देखने लगा। कौशल्या के फ्लैट से सामने समुंदर नजर आता है। हालांकि कोई बीच नही है मछुआरे मछली पकड़ते हैं। इक्का दुक्का नौका नजर आ रही थी तभी कौशल्या ने उमाशंकर को जागते देख आवाज दी।

"भाई जल्दी उठ गए। चाय लोगो?"

बहन की आवाज सुन उमाशंकर बैठक में आ गया। कौशल्या ने चाय बनाई। चाय पीते हुए दोनों बातें करने लगे।

"भाई बोलते तो तुम कम ही थे अब ऐसा लगता है कि तुम एकदम चुप हो गए हो?"

"छिहत्तर की उम्र हो गई है, तेरी भाभी के जाने के बाद जीवन सूना हो गया है। बच्चे अपने में मस्त रहते है, उनकी अपनी जिंदगी है और अलग सोच। हर पीढ़ी के हालात और सोच अलग हो जाती है। सारा दिन काटना मुश्किल होता है इसलिए काम कर रहा हूँ। थोड़ा शरीर शिथिल हो गया, काम भी उतना तेज रफ़्तार से नही होता। शुक्र है कि कंपनी में पिछले तीस वर्षों से काम कर रहा हूँ। मेरे काम के प्रति समर्पण को देखते हुए कंपनी रिटायर नही कर रही। कंपनी के मुश्किल समय में काम किया उसी के कारण मालिक कहता है कि घर बैठ कर क्या करोगे, जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं काम करते रहो और दूसरी वजह पैसा भी है, बच्चों के सामने हाथ नही फ़ैलाने पड़ते।"

तभी उमाशंकर के जीजा भी उठ कर भाई-बहन की गुफ्तगू में शामिल हो गए, "मुझे भी बताओ भाई-बहन में क्या चल रहा है?"

"मेरा चुपचाप भाई क्या चलाएगा?"

तीनो हंस पड़े। कौशल्या औऱ परिवार का अपना व्यवसाय है जिसको उसके भांजे चला रहे है। जीजा दिन में दो-तीन घंटे ऑफिस में समय व्यतीत करते हैं।

"उमा तुम इधर आ जाओ। एक ही उम्र के हैं, हंस बोल कर अब बाकी जिंदगी गुजारेंगे।" जीजा ने उमाशंकर से कहा।"

"जीजा की बात मान लो, अब इधर आ जाओ। फार्महाउस चल कर रहेंगे। समुंदर का किनारा तुम्हे हमेशा अच्छा लगता है।"

"बहन जब भी यहाँ आता हूँ, समुंदर देख कर अति प्रसन्नता होती है। मुम्बई का समुंदर दिल्ली में नजर नही आता। बालकनी से सड़क का ट्रैफिक ही नजर आता है।"

"फिर यहाँ आ जा न। वर्षो बीत जाते हैं हमें मिले।"

"बहन के घर रहना मुझे अच्छा नही लगता। तुमने भी दिल्ली आना छोड़ दिया।"

"कुछ उम्र ढल गई और अब न माँ न बाप औऱ न भाभी, किससे मिलने आऊं?"

"मैं हूँ न।"

"तू हमेशा चुप रहता है, बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं। जो तेरा हाल वही मेरा।"

"मैं छिहत्तर का तुम अस्सी की। हमारी सन्यास की उम्र है, चलो, हरिद्वार रहते है।" कह कर उमाशंकर मुस्कुरा दिया।

"बिना दवा के चल नही सकते। अपना घर ही हरिद्वार है। हरिद्वार छोड़ अपने फार्महाउस चल कर दो-तीन दिन रहते है और पुरानी यादें ताजा करते हैं।"

"चल बहन इस बहाने कुछ दिन का साथ भी हो जायेगा, मालूम नही फिर कब मिलना हो।"

"ऐसा क्यों बोलता है?"

"धीरे-धीरे सब चले गए। तेरी भाभी भी गई, यार दोस्त भी चले गए। सिर्फ एक दोस्त बाकी है वो भी बिस्तर पर है, कभी-कभी मिलने चला जाता हूँ। उसे देखता हूँ तो यही अहसास होता है कि हमारी रवानगी कब हो जाये, हमें खुद को नही पता चलेगा।"

"प्रकृति का नियम है, सबने एक दिन जाना है।" जीजा ने कहा। "छोड़ो इन बातों को, जितने दिन भी बाकी हैं अच्छे हंस कर बीते, मैं तो ईश्वर से यही हर रोज सुबह उठ कर मांगता हूँ।"

"इसलिए नौकरी छोड़ कर घर नही बैठा। खाली दिमाग से उदासी ही जीवन में आती है।"

चलो फार्महाउस चलते हैं। उमाशंकर ने दो दिन फार्महाउस में बिताने की सोची परंतु एक सप्ताह बिता दिए। लॉन में बैठते और पुरानी बातें याद करते।

"बहन तुम्हारा माली ढंग से बागवानी नही कर रहा है। गुलाब के पौधों की कटिंग नही की तभी छोटे फूल आ रहे है।" कह कर उमाशंकर ने गुलाब के पौधों की कटिंग शुरू की। तीन घंटे तक बागवानी करता रहा। दोपहर खाना खाने के पश्चात आराम करते हुए कौशल्या ने कहा। "भाई तुम बागवानी नही भूले।"

"बचपन में हम दोनों अपने घर के पौधों को दुरुस्त करते थे।"

"हाँ क्या दिन थे वो। अब घुटने के दर्द से अधिक चलना नही होता। बस बैठे-बैठे जो काम हो जाये, वही कर लेती हूँ।"

"पतंग उड़ाया करते थे। तुम पतंगों में मांझा बांधती थी और कन्नी देती थी।"

"जब थोड़ी ऊपर हो जाती थी तब मैं पतंग हाथ में लेती थी। पतंग को सबसे ऊंचा रख कर पेंच लड़ाना सब याद है। बचपन की हर बात याद है भाई।"

"बहन अब सिर्फ यादें रह गई है। कबड्डी, खो-खो खेलना, पतंग उड़ाना और कंचे खेलना।"

"तुम्हारे पास कंचों के दो बड़े बक्से थे।"

"हाँ जब कॉलेज गए तब ये खेल छूटे थे।"

दो दिन के लिए कौशल्या ने उमाशंकर को रोका था और जीजा बहन के साथ एक सप्ताह गुजर गया। शनिवार की शाम सब बच्चे फार्महाउस आये और पूरी रात पुराने किस्से सुनाते रहे। रविवार शाम की वापस मुम्बई आये।

दो दिन रुक कर मंगलवार उमाशंकर दिल्ली के लिए रवाना हुआ। आज वर्षों बाद भाई-बहन गले मिल कर फूट-फूट कर रोए।

जीजा ने उनको रोते देख कहा "इतना तो तुम हमारी शादी पर नही रोये जितना आज रो रहे हो।"

"जीजा मुझे नही मालूम अब कब मिलना होगा। उम्र का तकाजा है कब ऊपर का टिकट कट जाए, बस यही सोच कर रोना आ गया।"

यह सुन कर जीजा की भी आंखें नम हो गई।